सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पारसीक समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन

पारसीक समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन 

सामाजिक संगठन -प्राचीन पारसीक समाज चार वर्गा में विभाजित था। प्रथम वर्ग के अन्तर्गत शासक तथा उसके कुल के सदस्यों की गणना की जाती थी। इनका स्थान सर्वोत्कृष्ट था। द्वितीय वर्ग में वंशानुगत भू-स्वामी तथा पदाधिकारी आते थे। तृतीय वर्ग पुरोहितों का था किन्तु समाज में इन्हें विशेष प्रतिष्ठा मिली थी। चतुर्थ वर्ग में साधारण जन समुदाय था जैसे कृषक, व्यापारी, श्रमिक इत्यादि। इनकी सामाजिक स्थिति बहुत अच्छी नही थी। इन पर द्वितीय वर्ग के भू-स्वामियों का सदैव अंकुश बना रहता था। सामाजिक गठन कौटुम्बिक धा पर यह कहना कठिन है कि यह पितृसत्तात्मक था अथवा मातृसत्तात्मक। किन्तु हम इतना जानते हैं कि माता के रूप में यहाँ स्थरयों को विशेष प्रतिष्ठा मिली थी। विवाह को समाज में विशेष महत्व मिला था। सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए विवाह एवं सन्तान दोनों को आवश्यक माना गया था। वर-कन्या दोनों को ये अधिक दिन तक अविवाहित नहीं रख सकते थे। इसे धर्म-विरुद्ध माना गया था विवाह का निर्णय माता-पिता करते थे। कम से कम लोगों में भाई-बहन, पिता-पुत्री एवं माता-पुत्र के बीच वैवाहिक सम्बन्ध होते थे। पन्द्रह वर्ष की अवस्था में विवाह करना वे उचित समझते थे बहु-विवाह निद्य अवश्य था किन्तु शासकों तथा अमीरों के हरम में रखैलों जमघट लगा रहता था शासक तो इनके बिना युद्ध भूमि में भी नहीं जाते थे अन्तिम दिनों में तो यहाँ राजदरबारों में तीन सी उन्नीस से तीन सौ साठ रानियों के रहने के प्रमाण मिले हैं। 


जरथुश्व के समय यहाँ स्वियों की स्थिति अच्छी थी। बिना पर्दे के वे सार्वजनिक स्थलों में विचरण कर सकती थी। सम्पत्ति की देख-भाल करती हुई वे जमीदारी भी रख सकती थी किन्तु दारा प्रथम के समय उनकी स्थिति में कुछ परिवर्तन आया। अब धनी वर्ग की स्वियों बिना पर्यावाली गाड़ी के बाहर नहीं निकलती थी। इसी प्रकार पुरुषों से स्वतन्त्रतापूर्वक मिलने पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। विवाहित स्वियाँ अपने भाई नथा पिता से भी नहीं मिल सकती थी। इसी कारण प्राचीन लेखों तथा स्मारकों में कहीं उनका उल्लेख नही मिलता। सामान्य स्वियों की अपेक्षा वीरांगनाओं को अधिक सम्मान मिला था। ये स्वामी के साथ-साथ उसके अतिथियों को भी प्रसन्न करती थी सन्तानोत्पत्ति का उत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता था किन्तु यह पुत्र-जन्म तक ही सीमित था कन्या के जन्म को वे अभाग्य का सूचक मानते थे तथा ऐसे अवसरों पर शोक प्रकट कर दुःख शान्त करते थे। बहु-पुत्रता को प्रोत्साहित किया जाता था। ऐसे पिता के शासक की ओर से पुरस्कार की व्यवस्था थी। गर्भपात तथा भ्रूणहत्या पर मृत्युदण्ड दिया जाता था। पारसीकों का सामान्य जीवन सुखी, आडम्बरहीन तथा आदर्श था। हाँ, विद्याभ्यास में अवश्य इनकी विशेष रूचि नहीं थी सात वर्ष से बालक धर्माधीशे द्वारा संचालित विद्यालय में प्रवेश करते थे। विद्यालय या तो मन्दिरों में स्थित थे या पुरोहितों के घरों में। इसका वे विशेष ध्यान रखते थे कि विद्यालय किसी शोरगुल वाले स्थान में न हो। विद्यालय में विद्यार्थियों को अवेस्ता तथा उसके भाष्य पढ़ाये जाते थे। इसके साथ-साथ धर्म, कानून तथा औषधिविज्ञान की शिक्षा दी जाती थीं इसके अतिरिक्त साधारण बालकों को अश्वारोहण, तीरंदाजी एवं सत्य बोलने की शिक्षा दी जाती थी, जबकि धनिकों के बालकों को प्राशासकीय कार्यों में दक्ष बनाया जाता था युद्ध-विद्या की शिक्षा सबके लिए अनिवार्य थी। शिक्षा-व्यवस्था कठोर थी। विद्यार्थियों के धैर्य की परीक्षा ली जाती थी। इनकी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बालक को शिष्ट, विनयी, व्यवहार-कुशल, वीर, स्वाभिमानी एवं पुरूषार्थी बनाना था। 


व्यावहारिक दृष्टि से पारसीक अतिथि-सेवी तथा मृदुभाषी थे। शिष्टाचार में तो वे प्रसिद्ध चीनियों की समता करते थे। जब दो व्यक्ति परस्पर मिलते थे तो छोटा बड़े के प्रति सम्मान तथा बढ़ा छोटे के प्रति स्नेह प्रदर्शित करता था। सफाई का वे विशेष ध्यान रखते थे। प्रायः दिन में एक बार भोजन करते थे। वे मद्यपान से बचने का प्रयास करते थे। नाखून कटवाने, बाल कटवाने और यहाँ तक कि जंभाई एवं डकार लेने तक को वे अपवित्र मानते थे और ऐसा करने पर विशिष्ट संस्कारों द्वारा पवित्र होते थे। सड़कों पर खाना-पीना, नाक साफ करना तथा थूकना निषिद्ध था। शारीरिक दृष्टि से पारसीक पश्चिम एशिया के प्राचीन निवासियों में शायद सबसे अधिक स्वस्थ एवं सुन्दर थे। इसका पता प्राचीन स्मारकों पर उत्कीर्ण चित्रों से लगता है। उन्होंने वस्त्र-विन्यास मीडों से ग्रहण किया था। मुख के अतिरिक्त शरीर का शेष भाग ढका रहता था। शिर पर उष्णीश या टोपी तथा पैर में जूता धारण करते थे। समृद्ध पुरूषों के वस्त्र आकर्षक तथा कहें होते थे। स्त्रियों तथा पुरूषों के वस्त्रों में कोई विशेष अन्तर नहीं था। सामान्यतः पुरुष दाढ़ी तथा बाल रखते थे। बाद में कृत्रिम बाल (विग) भी धारण किया जाने लगा वे अलंकरण तथा प्रसाधनप्रिय थे। मादक द्रव्य, अंगराग एवं विभिन्न प्रकार की सदिय वर्द्धक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता था बुद्ध में जाते समय भी इन उपकरणों को चे साथ रखते थे। 


पारसीक नैतिकता एवं सदाचार के प्रति विशेष सजग थे। चारित्रिक दोष के लिये यहाँ कठोर दण्ड की व्यवस्था थी। व्यभिचार तथा वेश्यावृत्ति दोनों के लिए मृत्युदण्ड दिया जाता था। किन्तु हेरोडोटस के वर्णन से पता चलता है कि यहाँ कधनी-करनी में परस्पर अन्तर था। वह कहता है कि यहाँ किसी स्त्री को भगा ले जाने को अपराध तो माना जाता था किन्तु यह भी कहा जाता था कि ऐसे मामले में किसी से बदला नहीं लेना चाहिए। इसी प्रकार वह आगे कहता है कि यूनानियों के समान पारसीकों में भी समलिंगी मैथुन प्रचलित था। इस प्रथा के प्रचलन का समर्थन अवेस्ता में भी मिलता है क्योंकि इसमें इसकी निन्दा की गई है तथा इसे अक्षम्य अपराध स्वीकार किया गया है। 


पारसीकों का आर्थिक जीवन कृतिपरक था। इसी लिए अवेस्त में इसकी महत्ता प्रतिपादित है। खेतीहर भूमि का विभाजन कई प्रकार से किया गया था। कुछ भूमि पर किसानों का प्रत्यक्ष अधिकार था, जबकि कुछ पर सामूहिक कृषि की जाती थी। कुछ भूमि पर सामन्तों एवं जमींदारों का अधिकार था। इसे किसान लगान पर प्राप्त करते थे। लगान के रूप में कृषि उत्पादन का एक निश्चित भाग दिया जाता था। सामन्तो की जमीदारी में दास द्वारा भी खेती करायी जाती थी किन्तु इस कार्य में पारसीक दास नहीं लगाये जाते थे। जुताई बैलों द्वारा की जाती थी तथा सिंचाई के लिए वर्षा या नदी के जल पर आश्रित होना पड़ता था। नहरों द्वारा पहाड़ियों तथा नदियों से जल खेत तक पहुँचाया जाता था। दलदल भूमि का पानी निकाल कर उसे सुखाकर कृषि योग्य बना लिया जाता था इसका अनुकरण दूसरे देशा में भी किया गया। दारा ने भूमि की पैमाइश करायी। इसके पहले यह नियम था कि फसल बोने तथा काटने के पूर्व ही कर निर्धारित कर दिया जाता था। इससे किसानों को काफी कठिनाई होती थी। इसे दूर करने के लिए दारा ने प्रत्येक प्रान्त में पिछले वर्ष की उपज के आधार पर लगान कायम कर दिया। इसे बाजी कहा गया है। कृषि की उन्नति के लिए सिंचाई के साधन दिये गये।जंगलो को साफ कर कृषि योग्य बनाया गया तथा बाग-बगीचे लगाये गये। मुख्यतः गेहूं तथा जी पैदा किये जाते थे। किन्तु उर्वर भूमि की कमी के कारण अन्न की कमी पड़ती थी जिसकी पूर्ति फलों से करते थे। यहाँ बाग लगाने का बड़ा शौक था। फलों के वृक्षों का आयात भी किया जाता था। पारसीक मांसाहारी तथा मद्यसेवीं थे वे , मछलियों का शिकार करते थे। "होम' नामक एक मदिरा देवताओं को बहुत प्रिय थी। उनका विश्वास था कि इसके सेवन से शान्ति एवं पवित्रता मिलती है। साइरस द्वितीय तो सैनिकों के लिए भी मदिरा की व्यवस्था करता था। कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी प्रचलित था। मुख्य रूप से गाय, बैल, भेड़ तथा बकरी पालते थे। बन्दर अश्वतरी तथा अश्व भी पाले जाते थे। मधुमक्खी पालने का यहाँ आम रिवाज था। पारसीक चीनी के स्थान पर शहद का उपयोग करते थे। 


खनिज पदार्थों की दृष्टि से हखामनीशी साम्राज्य समृद्ध था। साइप्रस में प्रभूत मात्रा में चाँदी, तांबा तथा लोहा मिलता था। एशिया माइनर तांबे एवं चाँदी की दृष्टि से धनी था। तांबे तथा लोहे का लेबनान तथा उळपरी दजला एवं फरात से आयात भी किया जाता था। इसी प्रकार कर्मान (kerman) से सोना नथा चाँदी तथा सीस्तान (Seistan) से टिन मिलता था। इससे उद्योग-धन्धों को पूर्ण रूप से विकसित होने का अवसर मिला था किन्तु आवश्यकता की अधिकांश वस्तुएं वे पड़ोसी देशों से मंगा लेते थे। अतः उद्योग-धन्धों का अधिक विकास न हुआ। वे केवल दैनिक उपयोग की कुछ वस्तुओं के उत्पादन तक ही सीमित रह गए । नगरों में वे मुख्य रूप से वस्त्र सिलते थे तथा जूते, फर्नीचर, भाण्ड एवं आभूषण बनाते थे कुरता-पायजामा बनाने का उद्योग बड़े पैमाने पर चलता था। धनिकों के लिये स्वर्ण, रजत तथा कांस्य के भाण्ड बनाये जाते थे। वियाँ विभिन्न प्रकार के आभूषण तथा सदिर्यवर्द्धक द्रव्यों का उपयोग करती थीं अतएव इनका भी निर्माण किया जाता था। 


साम्राज्य की स्थापना के साथ-साथ यहाँ व्यापार एवं वाणिज्य की दिशा में विशेष प्रगति हुई। इनके व्यापारिक सम्बन्ध एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप के विभिन्न देशों में स्थापित हुए। जिन देशों में पहले व्यापारिक सम्बन्ध नहीं थे जैसे यूनान तथा बेबीलोन, उनसे भी परस्पर सम्बन्ध स्थापित हुए। किन्तु इस सम्बन्ध में ध्यात्व्य है कि पारसीक व्यापार को पृर्ा की दृष्टि से देखते थे, क्योंकि उनके विचार से बाजार झूठ के केन्द्र थे। अतएव पारसीक व्यापार पर मीडो, बेबिलोनियनों तथा हिब्रुओं का एकाधिकार स्थापित हो गया व्यापार मुख्यतः दैनिक एवं गृहोपयोगी वस्तुओं से सम्बन्धित था तथा विदेशी व्यापार की अपेक्षा आन्तरिक व्यापार अधिक विकसित था। व्यापारियों को अर्थ की सुविधा के लिये यहाँ बकों की स्थापना की गई थी। प्रारम्भ में इस पर युवराज अथवा मन्दिर का नियन्त्रण था किन्तु हखामनीशी काल में व्यक्तिगत बैंकों की स्थापना की गई। इनका कार्य ऋण तथा जमा करना था। चल खाता की व्यवस्था थी तथा चेक द्वारा लेन-देन होता था। व्यापार का प्रोत्साहित करने के लिये यातायात एवं सुरक्षा का उचित प्रबन्ध किया गया था। एक राजधानी को दूसरी से मिलाने के लिये यहाँ कई सड़कें बनायी गई थी। सूसा से सरडिस जाने वाला मार्ग लगभग 2,400 किमी लम्बा था। प्रति 450 किमी पर चिन्ह लगे के तथा प्रति चौथे चिन्ह पर विश्रामालय बनाया गया था। पूरी सड़क बस्ती तथा सुरक्षित स्थानों से हो कर गई थी। प्रत्येक विश्राम-स्थल पर पत्र ले जाने के लिये घोड़ों को बदलने की व्यवस्था रहती थी। पैदल इसे तीन माह तथा घोड़े द्वारा एक सप्ताह में तय किया जाता था। नदियों को पार करने के लिये नावों की व्यवस्था थी। इसके साथ पारसीक अभियन्ता इतने कुशल थे कि जब वे चाहते नाव की सहायता से बड़ी नदियों पर ऐसे पुल बना लेते थे जिस पर सैकड़ों हाथी पार हो जाते थे। इनकी कुछ सहके तो अफगानिस्तान पार कर भारत तक आयी थीं प्रारम्भ में तो निस्सन्देह इनका उद्देश्य राजनीतिक था, किन्तु बाद में इनका उपयोग व्यापारिक कार्यों में किया जाने लगा। जल-यात्रा तथा जलबेड़े का अधिक विकास वे नहीं कर सकें। यहाँ तक कि उनके पास अपना कोई जहाजी बेड़ा नहीं था नील नदी को लाल सागर से जोड़ने के लिए दारा तृतीय ने एक नहर का निर्माण करवाया था, जो बाद में बालू से पट गई थी। 


दारा प्रथम के शासन काल में लीडिया के अनुकरण पर यहाँ भी सोने-चाँदी के सिक्के चलाये गये। इसे हेरिक (Daric) कहा गया है इसमें सोने एवं चाँदी का अनुपात 1:13.5 था। इसमें असाधारण शुद्धता थी। नाप, माप तथा तौल के लिए नया नियम तथा साधन बनाये गये थे। वाण, ब्याज तथा भुगतान इत्यादि के लिये नियम बने थे पहले तो इसे कृषि-उत्पादनों तथा पशुओं द्वारा सम्पन्न किया जाता था किन्तु मुद्रा-प्रणाली के विकास से वह कम हो गया। पारसीक ऋण में रहना नहीं पसन्द करते थे। उनका कहना था कि ऋणप्रसत मनुष्य मिथ्या भाषण करता है। श्रमिकों के वेतन का उचित प्रबन्ध रहता था पहले तो उनका पारिश्रमिक 1/3 भाग नकद तथा शेष खाद्यान्न एवं पेय के रूप दिया जाता था किन्तु मुद्रा के प्रचलन से श्रमिकों को उनके पारिश्रमिक का 2/3 भाग नकद दिया जाने लगा ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत  राज्य की उत्पत्ति के ऐतिहासिक विकासवादी सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं। परन्तु गंभीर विवेचना से स्पष्ट होता है कि अन्य सभी सिद्धान्त गलत हैं और उन्होंने राज्य की उत्पत्ति की सही व्याख्या नहीं की है। इस सम्बन्ध में गार्नर का कहना ठीक है कि, "राज्य न तो ईश्वर की कृति है, न किसी उच्च शक्ति का परिणाम, न किसी प्रस्ताव या समझौते की सृष्टि है, न परिवार का विस्तारमात्र" अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राज्य की उत्पत्ति का सबसे अच्छा सिद्धान्त कौन है। इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि राज्य विकास का परिणाम है। इसका निर्माण मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ था और अच्छे जीवन के लिए अब भी चल रहा है। राज्य की उत्पत्ति का सबसे सही और वैज्ञानिक सिद्धान्त विकासवादी या ऐतिहासिक सिद्धान्त को ही कहा जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति एक विकास का परिणाम है। यह विकास धीरे-धीरे क्रम: चलता रहता है। इसी विकास के परिणामस्वरूप राज्य ने वर्तमान का रूप धारण किया है। राज्य की उत्पत्ति और व

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और