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होमरकालीन यूनान के आर्थिक जीवन, धर्म, दर्शन एवं सांस्कृतिक जीवन

होमरकालीन यूनान के आर्थिक जीवन, धर्म, दर्शन एवं सांस्कृतिक जीवन 


 आर्थिक जीवन : होमर कालीन आर्थिक व्यवस्था का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है - 


1. कृषि व पशुपालन -होमर युग में समाज के आर्थिक जीवन का आधार कृषि थी। कृषि भूमि राजा के अधीन होती थी। वह स्वेच्छा से इसे केवल जोतने बोने के लिए किसी को देता था। पर उस व्यक्ति को खरीदने तथा बेचने का अधिकार नहीं होता था। कृषि के साथ पशुपालन और आखेट का भी प्रचलन था कुछ छोटे कुटीर उद्योग भी विकसित हो रहे थे। परन्तु केवल सामान्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही कुटीर धन्धों का सृजन होता था। तलवार बनाने वाले, स्वर्णकार, कुम्भकार तथा गाड़ी बनाने वाले शिल्पी कार्य किया करते थे और समाज में उन्हें अच्छी दृष्टि से देखा जाता था। प्रो० बर्स के अनुसार प्रत्येक गृह स्वामी अपनी आवश्यकता के उपकरणों का निर्माण, भोजन तथा वस्त्र- निर्माण इतयादि स्वयं कर लेता था। 


पशुओं में गाय, बैल, भेड़, बकरी, घोड़े इत्यादि पाले जाते थे। व्यापार के क्षेत्र में युनानी लोगों ने अभी कोई विशेष उन्नति नहीं की थी। "मरचेण्ट' नामक कोई भी शब्द उनके कोष में नहीं था। सामान्य व्यवसाय का माध्यम विनिमय प्रथा थी। उस युग में श्रम की महत्ता थी। शारीरिक श्रम करना हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता था। सभी वर्ग के लोग परिश्रम करना आदर का कार्य मानते थे। अभिजात वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों को काम के लिए नियुक्त तो करते थे किन्तु वे अपना कार्य करने को हमेशा तत्पर रहते थे। राजा, सामन्त तथा उच्च वर्ग की स्वियां भी कार्य करने में हिचकती नहीं थीं। 


2. व्यापार -तत्कालीन यूनानी व्यापार-वाणिज्य से इतने दूर थे कि उनकी भाषा में व्यापार के लिये कोई पर्याय न था। व्यापार होता अवश्य था परन्तु उस पर फीनिशिअन व्यापारियों का एकाधिपत्य था। प्राकृतिक बन्दरगाहों से युक्त होने के कारण यूनान का विदेशी व्यापार पर्याप्त रूपेणा उन्नत था। विनिमय के लिये अदला-बदली की प्रणाली प्रचलित थी। मुद्रा लोहे, कांसे व सोने के पिण्डों के रूप में प्रचलित थी। 57 पाउण्ड के लगभग भार का स्वर्ण-पिण्ड 1 टैलेण्ट कहलाता था। गाय-बैल आदि का भी विनिमय के लिये प्रयोग होता था। जल-दस्युओं का प्राबल्य था। इसे असम्मानकारक नहीं समझा जाता था। राजा स्वयं भी जलदस्यु संगठनों का निर्माण करते थे। 


3. यातायात - अन्तर्देशीय यातायात के लिये घोड़ों, खच्चरो व चार पहिए, वाली गाड़ियों का प्रयोग किया जाता था। नदी-मार्ग उपयोगी न थे, परन्तु समुद्र-मार्ग से यातायात की सुविधा थी फलतः समुद्र यात्रा, औपनिवेशीकरण, जलदस्युता का विशेष प्रचार-प्रसार हुआ। 


4. दास -फिलिस्तीनी जो बेचे जाते थे उन्हें ये स्वरीदते थे। उन्हें दास बनाकर रखते थे। इससे घर में तथा उद्योगों में काम लेते थे बेगार नहीं लेते थे मजदूरी दी जाती थी। 


                             धर्म एवं दर्शन 


होमर के महाकाव्यों के अध्ययनोपरान्त तत्कालीन यूनानी धर्म के बारे में हमें परिज्ञान होता है-(1) तत्कालीन धर्म आध्यात्मवादी होने की अपेक्षा भौतिकवादी था और मनुष्य संसार को शाश्वत मानता था। साथ ही वह आशावदी था (2) मनुष्य समाधि की अपेक्षा सम्भोग में विश्वास रखता था और देवी को भी इसी से संपृक्त मानता था। (३) यद्यपि नैतिक मूल्यों के अनुपालन का कोई कठोर नियम नहीं था तथापि में माता-पिता तथा गुरूजनों के प्रति बड़े विनम्र थे। (4) आत्मा, परमात्मा, यम, नियम, प्राणायाम, लोक, परलोक, पाप और पुण्य के प्रति चिन्तनशील नहीं थे। (5) ये बहुदेववादी थे। इनका धर्म ओलिम्पियन धर्म कहलाता था। इसमें जीयस के नेतृत्व में ओलिम्पस पर्वत पर निवास करने वाले 12 देवताओं व 8 देवियों के देव मण्डल की कल्पना की गई थी। (6) इनका विश्वास था कि देवाराधना से वे प्रसन्न होते हैं और सुख-शान्ति प्रदान करते हैं। (7) पुजारी वर्ग का धर्म में कोई स्थान नहीं था। 


                          सांस्कृतिक जीवन 


1. कला -इलियड' में बेलेरफोन (ठमससमतवचीवदम) की कथा से लेखन-कला के अस्तित्व का ज्ञान होता है। कला के यथार्थ क्षेत्र में इस युग में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। होमर युगीन जीवन कला की दृष्टि से विपन्न एवं सक्रियता की दृष्टि से सम्पन्न था नक्काशी व उत्कीर्ण-कला का प्रचलन अवश्य था परन्तु चित्रकला आदि का कोई विशेष उल्लेख नहीं मिलता। 


2. साहित्य - साहित्य को वे विस्तारपूर्वक पौरूयहीन अधोगति के रूप में देखते थे। साहित्य केवल सामारिक अथवा युद्ध गीती और चारणों के अलिखित गीतों तक सीमित था। 


3. न्याय एवं विधि -होमर काल में भी अन्य प्राचीन सभ्यताओं के आदि-चरण की भाति कोई लिखित विधि व नियम नहीं थी। नियम व विधि जातिगत परम्परावादी थे जिनके अनुसार सामाजिक व वैयक्तिक जीवन निर्वाह करते थे न्यायिक क्षेत्र में पूर्ण निर्णयवाद के स्थान पर समन्वयवाद था जो तत्कालीन समाज के अनुकूल रहा होगा।

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