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जून, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्राचीन यूनान के कृषि, उद्योग व अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

प्राचीन यूनान के कृषि, उद्योग व अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार  1. कृषि व उद्योग :- होमर युग में समाज के आर्थिक जीवन का आधार कृषि थी। कृषि भूमि राजा के अधीन होती थी वह स्वेच्छा से इसे केवल जोतने बोने के लिए किसी को देता था पर उस व्यक्ति को खरीदने तथा बेचने का अधिकार नहीं होता था। कृषि के साथ पशुपालन और आखेट का भी प्रचलन था। कुछ छोटे कुटीर उद्योग भी विकसित हो रहे थे। परन्तु केवल सामान्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये ही कुटीर धन्धों का सृजन होता था। तलवार स्वर्णकार, कुम्भकार तथा गाड़ी बनाने वाल शिल्पी कार्य किया करते थे और समाज में उन्हें अच्छी दृष्टि से देखा जाता था। प्रो० बन्स के अनुसार प्रत्येक गृह स्वामी अपनी आवश्यकता के उपकरणों का निर्माण, भोजन तथा वस्त्र निर्माण इत्यादि स्वयं का लेता था। पशुओं में गाय, बैल, भेड़, बकरी, घोड़ा इत्यादि पाले जाते. थे। व्यापार के क्षेत्र में - यूनानी लोगों ने अभी कोई विशेष उन्नति नहीं की थी। 'मर्चेण्ट' नामक कोई भी शब्द उनके कोष में नहीं था। सामान्य व्यवसाय का माध्यम विनियम प्रथा थी। उस युग में श्रम की महत्ता थी। शारीरिक श्रम करना हेय दृष्टि से न

यूनान के प्रमुख दार्शनिकों का वर्णन

यूनान के प्रमुख दार्शनिकों का वर्णन   धर्म :-पेरिक्लीज युग के एथेन्स की धार्मिक व्यवस्था एक प्रकार से परम्परागत पूर्व प्रचलित धार्मिक व्यवस्था ही थी। जन-जीविन पर धर्म का पूर्ण प्रभाव था। यूनानी अपने प्रत्येक कार्य का प्रारम्भ देव-वन्दना से करते थे। उनके देवता, प्राकृतिक शक्तियाँ तथा मानवीय प्रवृतियाँ तथा काम-क्रोध, लोभ, घृणा आदि के प्रतीक थे। देवताओं का मानवीयकरण प्रचलित था। पेरिक्लीज युगीन धार्मिक व्यवस्था की सर्वप्रमुख विशेषता यह भी कि इस युग में अन्ध-विश्वास तथा इसी प्रकार की अन्य धार्मिक कुरीतियों का अन्त करने का प्रयास किया गया था। मन्दिर तथा पुरोहित धार्मिक संस्थाओं के प्रमुख अंग होते थे परन्तु यूनान में धर्म के प्रतीक न कोई मन्दिर थे और न किसी प्रकार का मत ही प्रचलित था। पुरोहितों का दायित्व मात्र धार्मिक क्रियाओं तक ही सीमित होता था। वे धर्म को राज्य में कोई विशेष गौरव नहीं प्रदान कर सकते थे। केवल धार्मिक क्रियाएँ कराने का ही पुराहितों का अधिकार या। यूनानियों ने देवी-देवताओं के रूप में काम, क्रोध, लोभ घृणा इत्यादि मनोवृत्तियों को भी प्रतिष्ठित किया, जिसके फलस्वरूप यूनान में देव

पेराक्लीज कालीन विज्ञान एवं साहित्य की उपलब्धिया

पेराक्लीज कालीन विज्ञान एवं साहित्य की उपलब्धिया 1. चिकित्सा शास्त्र -पेरिक्लीज-काल के यूनानियों में चिकित्सा-शास्त्र में सर्वाधिक प्रगति की। 425 ई.पू. में एकरागास के एम्पिडोक्लीज से इस शास्त्र का इतिहास प्रारम्भ होता है। उसने यह प्रमाणित किया कि त्वचा के सूक्ष्म छिद्र श्वास प्रक्रिया में पूरक होते हैं तथा रक्त हृदय से उसकी ओर प्रवाहित होता है। यूनानी चिकित्सा शास्त्र में जन्मदाता क्रोटोन ने मस्तिष्क को विचारों का केन्द्र बताया। उसने निद्रा-प्रक्रिया का अनुसाधान किया, 'ऑण्टिक नर्व' की खोज की तथा ओन नेचर' नामक पुस्तक की रचना की। उसने पशुओं की शल्य-चिकित्सा भी प्रारम्भ की। सम्भवतः उसी युग में यूराईफ्रोन ने एशिया माइनर में फेफड़ों की बीमारी का कारण प्लूरिसी बताया और कब्ज को अनेक रोगों का मूल बताया। हिप्पोक्रेटिज इस युग का सबसे बड़ा चिकित्साशास्त्री था। यह काँस का निवासी था तथा गणीतज्ञ हिप्पोकेटिज से भिन्न था। इसमें धर्म एवं दर्शन से चिकित्सा-शास्व को अलग किया। उसने दैवी शक्तियों के स्थान पर रोगों का मूल-प्राकृतिक कारणों को बताया, शल्य चिकित्सा का विकास किया तथा संक्रामक रोगों

होमरकालीन यूनान के आर्थिक जीवन, धर्म, दर्शन एवं सांस्कृतिक जीवन

होमरकालीन यूनान के आर्थिक जीवन, धर्म, दर्शन एवं सांस्कृतिक जीवन   आर्थिक जीवन : होमर कालीन आर्थिक व्यवस्था का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है -  1. कृषि व पशुपालन -होमर युग में समाज के आर्थिक जीवन का आधार कृषि थी। कृषि भूमि राजा के अधीन होती थी। वह स्वेच्छा से इसे केवल जोतने बोने के लिए किसी को देता था। पर उस व्यक्ति को खरीदने तथा बेचने का अधिकार नहीं होता था। कृषि के साथ पशुपालन और आखेट का भी प्रचलन था कुछ छोटे कुटीर उद्योग भी विकसित हो रहे थे। परन्तु केवल सामान्य जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही कुटीर धन्धों का सृजन होता था। तलवार बनाने वाले, स्वर्णकार, कुम्भकार तथा गाड़ी बनाने वाले शिल्पी कार्य किया करते थे और समाज में उन्हें अच्छी दृष्टि से देखा जाता था। प्रो० बर्स के अनुसार प्रत्येक गृह स्वामी अपनी आवश्यकता के उपकरणों का निर्माण, भोजन तथा वस्त्र- निर्माण इतयादि स्वयं कर लेता था।  पशुओं में गाय, बैल, भेड़, बकरी, घोड़े इत्यादि पाले जाते थे। व्यापार के क्षेत्र में युनानी लोगों ने अभी कोई विशेष उन्नति नहीं की थी। "मरचेण्ट' नामक कोई भी शब्द उनके कोष में नहीं था। सामान्य व्य

होमर युगीन सभ्यता पर निबन्ध

होमर युगीन सभ्यता पर निबन्ध  1. समाज का संगठन-होमर के काव्यों में उन संस्थाओं व संगठनों का प्रारम्भिक चित्रण मिलता है जिन्हें आगे चलकर चूनानियों, रोमनों व जर्मनों ने प्रहण किया, अर्थात् शासनाध्यक्ष राजा परामर्थ के लिये समुदाय के प्रमुखजनों की परिषद बूले (Boule) व जनसभा अगोरा (Agora) थी। परन्तु प्राचीन काल में जिसका होमर के काव्यों में वर्णन है, समय की शक्ति राज्य में निहित ने होकर वस्तुतः परिवार में निहित थी। ग्रामीण एवं स्थानीय समाज अभी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में थे।  2. सामाजिक व्यवस्था-समाज रूढ़िवादी था। होमर की कथा राजाओं, सरदारों व सामन्तों की कथा है। इलियड के विषय में कहा गया है कि वह 'बलिष्ठतम जनों की सरलतम कथा है। इस प्रकार के समाज को विल करंट ने क्रीट व माइसानी के समाजों की अपेक्षा प्राथमिक एवं विधि विहीन समाज कहा है। वित दुरेन्ट के ही शब्दों में, "होमरयुगीन जीवन कला की दृष्टि से विपन्न व सक्रियता की दृष्टि से सम्पन्न हैं। उनके शिष्टाचार व दर्शन का उल्लेख करना उपयुक्त प्रतीत नहीं होता। वे योद्धा थे तथापि उनमें स्नेहभाव भी विद्यमान था। खेलकूद के प्रति उनमें असीम उत्साह

पारसीक समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन

पारसीक समाज की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन  सामाजिक संगठन -प्राचीन पारसीक समाज चार वर्गा में विभाजित था। प्रथम वर्ग के अन्तर्गत शासक तथा उसके कुल के सदस्यों की गणना की जाती थी। इनका स्थान सर्वोत्कृष्ट था। द्वितीय वर्ग में वंशानुगत भू-स्वामी तथा पदाधिकारी आते थे। तृतीय वर्ग पुरोहितों का था किन्तु समाज में इन्हें विशेष प्रतिष्ठा मिली थी। चतुर्थ वर्ग में साधारण जन समुदाय था जैसे कृषक, व्यापारी, श्रमिक इत्यादि। इनकी सामाजिक स्थिति बहुत अच्छी नही थी। इन पर द्वितीय वर्ग के भू-स्वामियों का सदैव अंकुश बना रहता था। सामाजिक गठन कौटुम्बिक धा पर यह कहना कठिन है कि यह पितृसत्तात्मक था अथवा मातृसत्तात्मक। किन्तु हम इतना जानते हैं कि माता के रूप में यहाँ स्थरयों को विशेष प्रतिष्ठा मिली थी। विवाह को समाज में विशेष महत्व मिला था। सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए विवाह एवं सन्तान दोनों को आवश्यक माना गया था। वर-कन्या दोनों को ये अधिक दिन तक अविवाहित नहीं रख सकते थे। इसे धर्म-विरुद्ध माना गया था विवाह का निर्णय माता-पिता करते थे। कम से कम लोगों में भाई-बहन, पिता-पुत्री एवं माता-पुत्र के बीच वैवाहिक सम