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युवा अति सक्रियता के कारण

 युवा अति सक्रियता के कारण


भारत में भी युवा अति सक्रियता को बहुत कुछ विचलनकारी व्यवहारों के सन्दर्भ में समझा जा सकता है। वास्तविकता यह है कि भारत में युवा अति सक्रियता आज अनेक परिस्थितियों का परिणाम है। इसे किसी एक सिद्धान्त अथवा दो-तीन दशाओं के आधार पर ही स्पष्ट नहीं किया जा सकता। यदि इन सभी परिस्थितियों पर विचार किया जाये तो युवा अति सक्रियता अथवा युवा असन्तोष के कारणों को शैक्षणिक, पारिवारिक, राजनीतिक तथा पर्यावरण सम्बन्धी चार मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है। 


(I) दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली (Defective System of Education) - शिक्षा प्रणाली के दोषों तथा युवा अति सक्रियता से उसके सम्बन्ध को निम्नांकित रूप समझा जा सकता है : 


(1) अनुपयोगी शिक्षा (Futile Education) - भारत में शिक्षा प्रणाली आज न तो सैद्धान्तिक रूप से उपयोगी है और न ही व्यावहारिक रूप से। शिक्षा में वर्तमान सामाजिक मूल्यों तथा परिवर्तनशील विशेषताओं का अभाव होने के कारण यह तो उपयोगी प्रतीत होती है और न विद्यार्थी वर्ग इसमें कोई रुचि ही महसूस करता है। इस शिक्षा में युवा वर्ग की आकांक्षाओं तथा रुचियों कोई समावेश न होने के कारण इसका आन्तरीकरण करना बिल्कुल भी आवश्यक नहीं समझा जाता। हमारे यहाँ शिक्षा का विस्तार तो बहुत तेजी से हुआ लेकिन कारखानों, कार्यालयों तथा औद्योगिक प्रतिष्ठानों में रोजगार के अवसर उस अनुपात में नहीं बढ़ सके। इसी कुण्ठा के फलस्वरूप कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नकल की प्रवृत्ति अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी है इसके लिए अनुशासनहीनता, धमकी और हिंसा को भी एक साधन के रूप में प्रयुक्त करना बुरा नहीं समझा जाता। 


(2) शिक्षा का व्यापारिक स्वरूप (Commercialized Character of Education) - शिक्षा भी आज व्यक्तिगत व्यापार की तरह एक सार्वजनिक, व्यापार बन चुकी है। सरकार के लिए शिक्षा एक अवांछित दायित्व है और शिक्षण संस्थाओं की समस्याओं को उनकी आन्तरिक समस्याएं समझकर छोड़ दिया जाता है। कक्षाओं में कितनी ही भीड़ हो, प्रयोगशालाओं के उपकरण कितने ही पुराने और अपर्याप्त हों, शिक्षकों की कितनी ही कमी हो लेकिन कार्य-पद्धति तथा नियमों में इसलिए परिवर्तन नहीं किये जाते कि इसके लिए सरकार को कुछ अधिक आर्थिक सुविधाओं का प्रबन्ध करना होगा। स्वाभाविक है कि इस स्थिति में शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश लेने वाले अधिकांश विद्यार्थी वे होते हैं जिनका उद्देश्य मनोरंजन करना, दोस्त बनाना, चुनाव लड़ना अथवा शिक्षा ग्रहण करने के बहाने अपने माता-पिता को सन्तुष्ट करना होता है। ऐसे विद्यार्थी आन्तरिक रूप से तरह-तरह के तनावों में रहते हैं, अवसर मिलने पर अपने तनावों की अभिव्यक्ति आन्दोलनों के रूप में करते हैं। तथा अन्य साथियों को भी उसी रास्ते पर ले जाने का प्रयत्न करते हैं। 


( 3 ) शिक्षक -विद्यार्थी सम्बन्धों में दूरी (Formation in Teacher Student Relationship) - शिक्षण संस्थाओं में युवा विद्यार्थियों के लिए शिक्षक ही उसका मॉडल और आदर्श होता है। दूसरी ओर, भीड़ से भरी कक्षाओं में विद्यार्थी केवल इस कुण्ठा से ही ग्रसित नहीं रहते कि उनका शिक्षक उनका नाम तक नहीं जानता बल्कि अपनी सम्पूर्ण असुविधाओं का कारण भी शिक्षकों की उदासीनता ही समझते हैं। शिक्षकों तथा छात्रों के बीच बढ़ रही निरन्तर दूरी का ही परिणाम है कि आज शिक्षा संस्थाओं में गरीब विद्यार्थियों को शुल्क-मुक्ति नहीं मिल पाती, मेधावी छात्रों के साथ न्याय नहीं हो पाता, छात्र-असुविधाओं का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता तथा उद्दण्ड विद्यार्थियों को कोई दण्ड नहीं मिलं पाता। ये सभी दशाएँ युवा असन्तोष में वृद्धि करती हैं। 


(II) पारिवारिक तनाव ( Family Tensions)- वर्तमान परिस्थितियों में हमारी परिवार व्यवस्था संक्रमण के एक ऐसे स्तर से गुजर रही है जिसमें बच्चे के प्रति परिवार की आकांक्षाएँ बहुत अधिक हैं लेकिन समाजीकरण की प्रक्रिया में स्वयं परिवार का योगदान सबसे कम हैं। इस परिवर्तन ने युवा वर्ग में अनेक तनावों को बढ़ाकर उसके असन्तोष में वृद्धि की है। 


(1) परिवार के नियन्त्रण में हास (Decline in Family Control) - वर्तमान युग में समानता तथा स्वतन्त्रता की मांग इतनी तेजी से बढ़ी हैं कि इसके सामने परिवारों का परम्परागत नियन्त्रण बहुत दुर्बल पड़ गया। इसके फलस्वरूप परिवार में ही युवा वर्ग आज तक एक-असहनशील, विरोधपूर्ण तथा उग्र मनोवृत्ति को प्रदर्शित करने लगा है। जैसे-जैसे परिवार में युवा वर्ग को पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्रता और अधिकार दिये जाने लगे, युवा वर्ग इस भ्रान्ति का शिकार हो गया कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन को तोड़ने और विरोध करने से ही प्रत्येक सुविधा प्राप्त की जा सकती है। इस प्रवृत्ति ने युवा अति सक्रियता को बढ़ाने में मदद की। 


(2) परिवार की उदासीनता (Indifferent Attitudes of the Family) - आज आर्थिक रूप से निम्न और मध्यमवर्गीय परिवारों में माता-पिता बच्चों के समाजीकरण, शिक्षा, सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति और भावनात्मक सुरक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दे पाते। इस स्थिति में बच्चा पहले माता-पिता के स्नेह से वंचित होता है, फिर उसमें आयु बढ़ने के साथ तरह-तरह के तनाव बढ़ते हैं और बाद में बह विरोध अथवा माता-पिता की अवहेलना करके अपने असन्तोष को व्यक्त करने लगता है। स्वाभाविक है कि इससे बच्चे के प्रति माता-पिता और अधिक उदासीन हो जाते हैं। 


(3) पीढ़ियों का द्वन्द्व (Conflict of Generations) - लगभग सभी समाजों में पुरानी पीढ़ी के मूल्य युवा पीढ़ी के मूल्यों से कुछ भिन्न होते हैं। पुरानी पीढ़ी जहाँ सामाजिकु असमानता, व्यवहार के पुराने नियमों नौकरशाही द्वारा स्थापित नियन्त्रण तथा वर्गवाद को सहज ही स्वीकार कर लेती है, वहीं, नयी पीढ़ी समानता, उदारता तथा परिवर्तन के प्रति अत्यधिक उत्साही होती है। इसका परिणाम यह होता है कि पुरानी व्यवस्थाओं का जो लोग समर्थन करते हैं, युवा वर्ग उनका विरोध करना आरम्भ कर देता है। 


(III) राजनीतिक कारक (Political Factors) - अनेक विद्वानों ने वर्तमान युवा असन्तोष के मूल में राजनीतिक कारकों के प्रभाव को स्पष्ट किया है इनमें से कुछ प्रमुख कारक निम्नांकित हैं: 


(1) युवा पीढ़ी की राजनीतिक सहभागिता (Political Participation of Young Generation) - भारत में युवा पीढ़ी और विशेषकर छात्रों ने स्वतन्त्रता के पहले भी राजनीति में सक्रिय हिस्सा लिया था और आज भी ले रहे हैं। एक बार युवा पीढ़ी जव प्रदर्शनों, आन्दोलनों और राजनीतिक उग्रता की अभ्यस्त हो जाती है तो बाद में वह इन साधनों का उपयोग अपनी मांगों को मनवाने और विद्यमान राजनीतिक सत्ता का विरोध करने के लिए करने लगती है। युवा पीढ़ी को आज एक ओर वोट देने, चुनाव लड़ने और सक्रिय कार्यकर्ता बनने के अधिकार प्राप्त हैं और दूसरी ओर, उनसे कहा जाता है कि वे राजनीति से दूर रहें। आलबैच (Albatch) का कथन है कि छात्रों के ये आन्दोलन एक तरह के परीक्षणवादी आन्दोलन हैं जिनसे समय-समय पर वे स्वयं अपनी शक्ति का भी मूल्यांकन करते रहते हैं। इसके पश्चात् भी युवा पीढ़ी की राजनीतिक सहभागिता जिस रूप में विकसित हो रही है, उसने युवा-तनाव में और अधिक वृद्धि कर दी हैं। 


(2) राजनीतिक दलों के स्वार्थ (Vested Interests of Political Parties) - भारत का युवा वर्ग पहले से ही अनेक अभावों में घिरा हुआ है। ऐसे किसी भी वर्ग को थोड़ा-सा प्रलोभन देकर, भविष्य की आशा दिलाकर अथवा सुरक्षा का नारा देकर सरलता से किसी भी दिशा में ले जाया जा सकता है। राजनीतिक दल अब यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि आन्दोलन अथवा प्रदर्शन करने या हिंसा को भड़काने के लिए छात्रों को आगे करके चलाना सबसे अधिक सुविधाजनक है। 


(3 ) दोषपूर्ण विद्यार्थी नेतृत्व (Defective Student Leadership) - साधारणतया विद्यार्थियों का नेतृत्व आज वे युवक करते हैं जिनकी न तो अध्ययन में कोई रुचि होती है और न ही विद्यार्थियों की समस्याओं में। साधारणतया कोई भी युवा विद्यार्थी जो अलंकारिक भाषा के साथ कुछ जोशीले वाक्यों को बोलने में प्रवीणता प्राप्त कर लेता है अर्थवा बिना किसी संकोच के प्रशासन, शिक्षकों या अधिकारियों के लिए अपशब्द कहने की क्षमता रखता है, जल्द ही विद्यार्थियों का नेता बन जाता है। विद्यार्थी नेताओं के लिए उन विद्यार्थियों का साधारणतया कोई मूल्य नहीं होता जो उत्तेजित करने वाली क्रियाओं की तुलना में शिक्षा के विकास को अधिक महत्वं देना चाहते हैं। इन सभी परिस्थितियों के फलस्वरूप आज अधिकांश कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के परिसर व्यापक असन्तोष तथा तनाव के केन्द्र बन चुके हैं। 


(4) प्रशासनिक उदासीनता (Administrative Indifference) - युवा वर्ग जब अधिकारियों, व्यापारियों और जनसाधारण में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखता है तो उसका उत्साही मन इस व्यवस्था के प्रति विद्रोह के लिए आतुर हो जाता है। फलस्वरूप अपने विरोध को वह पहले शिक्षा संस्थाओं में, फिर बाजारों में और अन्त में पुलिस और प्रशासन से संघर्ष में आकर व्यक्त करने लगता है। यह विरोध जब तक शिक्षा संस्थाओं और बाजारों में युवा-आक्रोश के रूप में व्यक्त किया जाता रहता है, प्रशासन चुप रहता है लेकिन जब यह आक्रोश बढ़कर प्रशासन में बाधा डालने लगता है तो अचानक उसे कठोरता से दबाने का प्रयत्न किया जाने लगता है। विद्यार्थियों पर लाठी चार्ज, बड़े पैमाने पर उनकी गिरफ्तारियाँ या फायरिंग इसी मनोवृत्ति का परिणाम हैं। 


(IV) पर्यावरण सम्बन्धी (Environmental Tensions) - सक्रियता की वर्तमान प्रकृति बहुत बड़ी सीमा तक एक नवे सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण से प्रभावित है। यह नया पर्यावरण युवा पीढ़ी की मानसिकता को अत्याधक प्रतिकूल रूप से प्रभावित करके तरह-तरह के तनावों को जन्म देता है । 


(1) नये वे पुराने मूल्यों में संघर्ष (Conflict in New and Oid Values) - पुरानी मान्यताओं और परम्परागत व्यवहार-प्रतिमानों को महत्व देने वाले परिवार में रहने वाले किशोर तथा युवा जब नयी सभ्यता से प्रभावित परिवारों के सम्पर्क में आते हैं। तो अक्सर वे अपने आप को कुछ पिछड़ा हुआ अथवा हीन समझने लगते हैं। यह स्थिति अक्सर उन्हें अपने परिवार के मूल्यों और विश्वासों का विरोध करने की प्रेरणा देती है। ऐसे विरोध को स्वयं उनके परिवार में एक अनैतिक व्यवहार के रूप में देखा जाने लगता है। इसके फलस्वरूप युवा पीढ़ी को या तो एक दोहरा व्यक्तित्व प्रदर्शित करना पड़ता है अथवा वह परिवार के बाहर अपने असन्तोष को व्यक्त करना. आरम्भ कर देती है। मूल्यों और मान्यताओं के परस्पर विरोध की स्थिति युवा पीढ़ी में तरह-तरह के तनाव उत्पन्न कर रही है। 


( 2 ) संस्कृतियों की बहुलता (Multiplicity of Cultures) - आज का युवा वर्ग शिक्षा ग्रहण करने, जीविका उपार्जित करने तथा जीवन की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए एक-दूसरे से भिन्न संस्कृतियों वाले विभिन्न समूहों के सम्पर्क में आता है ।

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