सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वैयक्तिक विघटन के प्रकार

 वैयक्तिक विघटन के प्रकार


वयक्तिक विघटन के प्रकार - वैयक्तिक विघटन मूल रूप से व्यक्ति के जीवन में असामंजस्य तथा असन्तुल की स्थिति को स्पष्ट करता है लेकिन विभिन्न समाजी अथवा एक ही समाज में विघटित व्यक्तित्व वाले लोगों की स्थिति में बहुत अन्तर देखने को मिलता है। इस आधार पर वैयक्तिक विघटन के भी अनेक प्रकारों का उल्लेख किया जा सकता है। डॉ. कुमार ने एक विपटित व्यक्ति को चार ऐसी विशेषताओं का उल्लेख किया है जिनके आधार पर वैयक्तिक विपटन के विभिन्न प्रकारों को समझा जा सकता है - 


(1) सर्वप्रथम विघटित व्यक्ति का व्यवहार स्वीकृत आदर्श-नियमों से भिन्न होता है;

(2) ऐसे व्यक्ति का व्यवहार जन-सामान्य के द्वारा स्वीकृत नहीं होता। यद्यपि यह अस्वीकृति साधारण भी हो सकती है और गम्भीर भी;

(3) जन-सामान्य की अस्वीकृति के फलस्वरूप विघटित व्यक्ति का व्यवहार या तो सकारात्मक हो जाता है अथवा नकारात्मक;

(4) सकारात्मक व्यवहार का उद्देश्य कभी सम्पूर्ण समाज का कल्याण करना होता है तो कभी अपने ही सुखों में वृद्धि करना जबकि नकारात्मक व्यवहार व्यक्ति को अक्सर यह प्रेरणा देता है कि वह स्वयं को अपनी ही एक अकेली दुनिया में बन्द कर लें । 

इन विशेषताओं से स्पष्ट होता है कि कुछ विशेष परिस्थितियों व्यक्ति में जैसी मनोदशा उत्पन्न करके उसे व्यवहार के एक विशेष ढंग को प्रदर्शित करने का प्रोत्साहन देती हैं, उसी के अनुसार विघटित व्यक्ति का चरित्र भी एक- दूसरे से कुछ भिन्न हो जाता है। उपर्युक्त आधार पर मॉरर (Mowrer) ने वैयक्तिक विघटन के दो प्रमुख रूपों को स्पष्ट किया -

(1) सृजनात्मक वैयक्तिक विघटन तथा (2) व्याधिकीय वैयक्तिक विघटन 


यह वर्गीकरण किसी व्यवहार के प्रति समाज की अस्वीकृति की प्रकृति तथा उससे उत्पन्न होने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। साथ ही यह वर्गीकरण इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति में सृजनात्मक तथा व्याधिकीय व्यक्तित्व की विशेषताएँ साथ-साथ विद्यमान रहती हैं लेकिन यह व्यक्ति को सामाजिक परिस्थितियों एवं मानसिक दशा पर निर्भर होता है कि उसका वैयक्तिक विघटन सूजनात्मक श्रेणी का होगा- अथवा व्याधिकीय श्रेणी का इसके लिए आवश्यक है कि वैयक्तिक विघटन के सन्दर्भ में सृजनात्मक व्यक्तित्व तथा व्याधिकीय व्यक्तित्व को अवधारणा एवं विशेषताओं को स्पष्ट कर लिया जाये। 


(अ) सृजनात्मक व्यक्तित्व (Creative Personality ) - संवेदनशीलता मनुष्य का एक विशेष गुण है। संवेदनशीलता व्यक्ति को कभी-कभी अनोखी सूझ-बूझ देकर समाज से उसके अभियोजनों को सरल बनाती हैं लेकिन अति संवेदनशीलता व्यक्ति को कुछ ऐसे कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं जिसे जन-सामान्य के द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की सृजनात्मकता (creativeness) उसे वैयक्तिक विघटन की ओर लें जाती हैं। सृजनात्मक व्यक्तित्व वाला व्यक्ति जीवन के अनेक क्षेत्रों में अन्य व्यक्तियों से सहमत नहीं होता। समाज की अनेक परम्पराएँ, मूल्य अथवा व्यवहार के ढंग उसे अनुपयोगी और सड़े-गले प्रतीत होते हैं। ऐसी स्थिति में वह एक ऐसी मनोवृत्ति विकसित कर लेता है जो उसे अन्य व्यक्तियों से पृथक कर देती है। इसके फलस्वरूप एक और बह प्रचलित मान्यताओं के अनुसार व्यवहार करने में स्वयं को असमर्थ पाता है तो दूसरी ओर अन्य व्यक्ति उसे सहयोग न देकर कभी-कभी उसकी आलोचना आरम्भ कर देते हैं। यह स्थिति उसे अन्य व्यक्तियों से पृथक कर देती हैं और अकेलेपन की भावना धीरे-धीरे उसे विघटन की ओर ले जाती है । 


सृजनात्मक रूप से विघटित व्यक्तित्व में अहम् अपनी चरम सीमा पर होता है। ऐसा व्यक्ति यह समझने लगता है कि उसके द्वारा बनाये हुए सिद्धान्त, व्यवहार की नीतियाँ तथा कार्यक्रम सर्वोत्तम है और इस प्रकार वह प्रचलित विचारधाराओं तथा जन-सामान्य के व्यवहारों का विरोध करना आरम्भ कर देता है। बहुधा ऐसे व्यक्ति स्वयं को एक अद्भुद और विलक्षण क्षमताओं से युक्त प्राणी समझने लगते हैं। उनका यह विश्वास बन जाता है कि केवल उन्हीं के द्वारा अनहोनी घटनाओं को साकार रूप दिया जा सकता है। ऐसे व्यक्ति समझौतावादी प्रकृति के नहीं होते बल्कि प्रत्येक स्थिति में अपनी इच्छाओं को ही प्राथमिकता देते है। यह आदत धीरे-धीरे उनमें एक ऐसी प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देती है जिसके अन्तर्गत व सामाजिक मान्यताओं का जानबूझकर उल्लंघन करने लगते हैं । इसका उद्देश्य एकाएक प्रसिद्धि प्राप्त की लेना अथवा दूसरों को नीचा दिखाना भी हो सकता है। सृजनात्मक कार्य में लगे हुए अनेक शिक्षाविद, लेखक, संगीतकार, कलाकार तथा समाज सुधारक इसी श्रेणी के अन्तर्गत आने हैं। ऑचित्य-प्रदर्शन तथा आन्त सकों के द्वारा अपने कथन को पुष्ट करना कभी-कभी इस बुर्ग की विशेषता बन जाती है। इन्हें समूह के एक छोटे से बर्ग का भी समर्थन मिल जाता है तो यह एकाएक बहुत प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन विरोध या अस्वीकृति की स्थिति में उन्हें गहरा मानसिक आघात पहुँचता है। 


सृजनात्मक प्रकार का विघटित व्यक्तित्व मुख्यतः तीन रूपों में देखने को मिलता है - 

(1) असहयोगी व्यक्ति - इस श्रेणी में आविष्कारक तथा नवाचारों को जन्म देने वाले वे व्यक्ति आते हैं जो अपनी वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट नहीं होते और इसलिए पहले अपनी स्थिति तथा बाद में सम्पूर्ण समाज में परिवर्तन लाने का प्रयन करते हैं। यद्यपि आविष्कारकों को कभी-कभी बहुत लोकप्रियता भी मिल जाती हैं लेकिन एक विशेष कार्य में ही लगे रहने के कारण वे स्वयं में सन्तुष्ट नहीं होते। परम्परागत कार्य- पद्धतियों का विरोध करके नये विचारों और नये व्यवहारों का प्रतिपादन करने वाले व्यक्तियों का वैयक्तिक विघटन इसलिए और अधिक बढ़ जाता है कि साधारणतया उन्हें जन-सामान्य के विरोध का भी सामना करना पड़ता है। 


(2) विद्रोही तथा क्रान्तिकारी - आविष्कारों तथा नवाचारों का प्रतिपादन करने वाले व्यक्तियों के विपरीत, विद्रोही तथा क्रान्तिकारी लोगों को सामाजिक मान्यता बहुत कम मिल पाती है। यह व्यक्ति यदि अधिक सुख पाने की इच्छा से व्यवहार के नये ढंग अपनाते हैं तो साधारणतया ऐसे व्यवहारों को अपराध की श्रेणी में रख दिया जाता है। यदि इनका लक्ष्य सम्पूर्ण समाज का कल्याण करना होता है तो इससे या तो युवा-असन्तोष का जन्म होता है अथवा इन्हें उग्र-सुधारवादी मानकर इनका बहिष्कार किया जाने लगता है। 


(3) सुधारक - सामाजिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन चाहने वाले विद्रोही अथवा क्रान्तिकारी व्यक्तियों की तुलना में सुधारक की स्थिति इसलिए कुछ भिन्न हैं कि वह प्रचलित लोकाचारों से अधिक दूर न हटकर वर्तमान व्यवस्था के अन्तर्गत ही सामाजिक दशाओं में सुधार लाने का प्रयत्न करता है। इसके अतिरिक्त सुधारक का प्रयत्न सामाजिक व्यवस्था के किसी एक विशेष अंग में ही सुधार करना होता है। सुधारक सदैव यह प्रयत्न करता है कि -परम्परागत सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति तथा समूह की क्रियाओं में ऐसा सामंजस्य स्थापित किया जाये जिसे समाज द्वारा सैद्धान्तिक रूप से तो स्वीकार किया जाता रहा है लेकिन व्यवहार में उसे लागू न किया जा सका हो। इसके पश्चात् भी एक सुधारक धीरे-धीरे संवेदनशील प्राणी बन जाता है। यदि इसके कार्यक्रमों को समूह अपनी स्वीकृति प्रदान नहीं करता तो आन्तरिक निराशा, वैयक्तिक महत्वाकांक्षाएँ तथा अकेलेपन की भावना उसे वैयक्तिक विघटन की ओर ले जाती हैं। 


इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सृजनात्मक वैयक्तिक विघटन एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति अपनी सृजनात्मक क्षमता का उपयोग सामाजिक परिवर्तन के लिए करना चाहता है लेकिन उसके विचारों तथा कार्यक्रमों को समूह की स्वीकृति न मिल पाने के कारण अधिक संवेदनशीलता के प्रभाव से उसका व्यक्तित्व विघटित हो जाता है। 


(ब) व्याधिकीय व्यक्तित्व (Pathological Personality ) - व्याधिकाय व्यक्तित्व से मॉरर का तात्पर्य एक ऐसे व्यक्तित्व से है जिसका शारीरिक दुर्बलताओं, मानसिक दोषों अथवा स्नायुविक विकारों के कारण विघटन हो जाता है। दूसरे शब्दों में, व्यक्तित्व का विघटन जब बाह्या दशाओं का परिणाम न होकर, स्वयं व्यक्ति की जीव-रचना में विद्यमान शारीरिक एवं मानसिक दोषों से उत्पन्न होता है, तब इसे हम व्याधिकीय व्यक्तित्व कहते हैं। शारीरिक दुर्बलता का तात्पर्य व्यक्ति की शरीर- रचना में असामान्यता का होना है। उदाहरण के लिए, व्यक्ति का अधिक मोटा. या लम्बा होना, साधारण से अधिक शारीरिक शक्ति होना, अत्यधिक कुरूप होना अथवा अंग की खराबी होना आदि शारीरिक दुर्बलताओं के अन्तर्गत आते हैं। इस प्रकार किसी व्यक्ति का अन्धा, काना, बहरा, लूला, लंगड़ा या कुबड़ा होना शारीरिक विकार के ही उदाहरण हैं। शारीरिक विकार के कारण अक्सर ऐसे व्यक्ति का समूह के अन्य सदस्यों से उचित अभियोजन नहीं हो पाता। सामान्य व्यक्ति उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं और कभी-कभी उसे समाज में वह प्रेम और स्नेह नहीं मिल पाता जो व्यक्तित्व के सामान्य विकास के लिए आवश्यक है। इसके फलस्वरूप शारीरिक दुर्बलताओं बाला व्यक्ति धीरे-धीरे हीन भावना का शिकार हो जाता है। यही भावना उसे समाज-विरोधी कार्य करने और सामाजिक मूल्यों को तोड़ने का प्रोत्साहन देती है। इसका परिणाम अन्ततः वैयक्तिक विघटन होता है। 


व्याधिकीय व्यक्तित्व में अनेक मानसिक तथा स्नायुविक दोषों का समावेश होता हूँ। मानसिक तथा स्नायुविक दोषों का तात्पर्य व्यक्ति में मानसिक अस्थिरता, संवेगात्मक संघों, पातक की भावना (feeling of guilt), कामोत्तेजना तथा आवश्यकता से अधिक प्रेम अथवा মृणा की प्रवृत्ति का होना है। इन दोषों के कारण व्यक्ति स्वभाव से ही अत्यधिक लापरवाह, जल्दबाज, क्रोधी, ईष्यालु तथा प्रतिशोधी बन जाता है। ऐसी प्रत्येक दशा में व्याधिकीय यक्तित्व का व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसकी उपेक्षा अथवा आलोचना की जा रही है। यह भावना उसे एक ओर समूह के अन्य व्यक्तियों से दूर रहने की प्रेरणा देती है तो दूसरी ओर व्यक्तिगत प्रतिशोध को प्रोत्साहन देती हैं। यही स्थिति उसके जीवन में वैयक्तिक विघटन की समस्या उत्पन्न कर देती है। 


इस प्रकार स्पष्ट होता है कि व्याधिकीय व्यक्तित्व का तात्पर्य मानसिक तथा शारीरिक विकारों से युक्त एक ऐसे व्यक्ति से है जो स्वयं अपने दोषों के कारण समाज, से अधियोजञन नहीं कर पाता। इस दृष्टिकोण से व्याधिकीय व्यक्तित्व में उन सभी व्यक्तियों को सम्मिलित किया जा सकता है जो अद्धरोगी (pseudo- l) स्नायुरोगी (nteurotic), मानसिक रोगी (psychotic), कामोत्तेजक अथवा मद्यपान करने वाले होते हैं तथा विभिन्न परिस्थितियों में जो व्यक्ति दोहरी भूमिका, संघर्षपूर्ण भूमिका अथवा अस्थिर व्यवहारों को प्रदर्शित करते व्याधिकीय व्यक्तित्व के लोग समाज द्वारा मान्यता प्राप्त ढंग से संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में समायोजन स्थापित नहीं कर पाते और फलस्वरूप समाज-विरोधी व्यवहार की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत  राज्य की उत्पत्ति के ऐतिहासिक विकासवादी सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं। परन्तु गंभीर विवेचना से स्पष्ट होता है कि अन्य सभी सिद्धान्त गलत हैं और उन्होंने राज्य की उत्पत्ति की सही व्याख्या नहीं की है। इस सम्बन्ध में गार्नर का कहना ठीक है कि, "राज्य न तो ईश्वर की कृति है, न किसी उच्च शक्ति का परिणाम, न किसी प्रस्ताव या समझौते की सृष्टि है, न परिवार का विस्तारमात्र" अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राज्य की उत्पत्ति का सबसे अच्छा सिद्धान्त कौन है। इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि राज्य विकास का परिणाम है। इसका निर्माण मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ था और अच्छे जीवन के लिए अब भी चल रहा है। राज्य की उत्पत्ति का सबसे सही और वैज्ञानिक सिद्धान्त विकासवादी या ऐतिहासिक सिद्धान्त को ही कहा जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति एक विकास का परिणाम है। यह विकास धीरे-धीरे क्रम: चलता रहता है। इसी विकास के परिणामस्वरूप राज्य ने वर्तमान का रूप धारण किया है। राज्य की उत्पत्ति और व

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और