सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

तलाक का अर्थ एवं परिभाषा, कारण

तलाक का अर्थ एवं परिभाषा, कारण


तलाक का अर्थ एवं परिभाषा कानूनी रूप से वैवाहिक सम्बन्धों का टूट जाना ही तलाक कहलाता है। यह एक ऐसा विधान है जो समाज द्वारा स्वीकृत है तथा वैवाहिक असफलता से सम्बन्धित है। 'तलाक' को पारिवारिक विघटन का सूचक माना जाता है क्योंकि यह पारिवारिक संगठन में दरार का द्योतक होता है। वैवाहिक सम्बन्धों से सम्बन्धित होने के कारण इसे व्यक्तिगत घटना भी माना जाता है परन्तु यह मान्यता प्रत्येक दृष्टिकोण से उचित नहीं लगती है। इसका कारण यह है कि अत्यधिक तलाक की दर सामाजिक समस्या का रूप धारण कर लेती है। इसीलिए तलाक को पारिवारिक विघटन। का ही एक रूप स्वीकार किया जाता है। 


सामान्य अर्थों में यदि देखा जाय तो अंग्रेजी शब्द 'Divorce' का ही हिन्दी रूपान्तर "तलाक है। 'Divorce' शब्द लैटिन भाषा के 'Divortiom' (Dis + Vertere) शब्द से बना है जिसका तात्पर्य है 'अलग हो जाना'। यह विवाह-साथियों का एक दूसरे से अलग हो जाना है। इनसाइक्लोपीडिया बिटानिका में इसका अर्थ 'विवाह सम्बन्धों का टूट जाना' बताया गया है। यह उस जीवन का अन्त है जो विवाहित दम्पति अब तक व्यतीत कर रहे थे। शब्द के विशिष्ट अर्थ की दृष्टि से तलाक वैवाहिक (दाम्पत्य) बन्धन का पूरी तरह से सम्बन्ध-भंग है जिसमें तलाकशुदा व्यक्ति पुनः अपनी पहली वाली स्थिति में आ जाता है और विवाह के लिए स्वतन्त्र होता है। कानूनी भाषा में यह विवाह की कानूनी समाप्ति है तथा एक सरल घटना लगती है परन्तु व्यावहारिक जीवन में इसके परिणाम अत्यन्त विशाल होते हैं। सन्कचूरी एवं वाईटहड के शब्दों में, 'तलाक उन आशाओं की समाप्ति है जो दम्पति एक दूसरे के प्रति रखते थे, यह प्रमाण पत्र है कि उनका सम्बन्ध समाप्त हो गया है। 


हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 (1976 तक संशोधित) के अनुसार, "काई भी विवाह, जो चाहे इस अधिनियम के लागू होने से पहले या बाद में हुआ हो, पति या पत्नी द्वारा किए गए आवेदन के आधार पर तलाक के एक आदेश द्वारा तोड़ा जा सकता है।" तथा इसके लिए आधार अधिनियम में ही दिए गए हैं। 


तलाक की अवधारणा को और अधिक स्पष्ट करने के लिए इसे इससे मिलते-जुलते तीन शब्दों से पृथक् किया जाना जरूरी है। तीन ऐसे शब्द है जिनका प्रयोग कई बार तलाक के साथ ही किया जाता है। ये शब्द है-वियोजन ( पृथक्करण), परित्याग तथा रह करना (विलोपन) वियोजन शब्द का अर्थ तलाक की दिशा पहला चरण है जिसका लक्ष्य तत्कालीन संघर्ष को तुरन्त समाप्त करना है। अथवा यह बिना तलाक के अलग रहने सम्बन्धी कानूनी निर्णय है। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (1) व (2) में परगमन, क्रूरता, परित्याग, धर्म परिर्वतन, लाइलाज बीमारी तथा संसार को त्याग देने के आधार पर न्यायिक वियोजन का प्रावधान रखा गया है। परित्याग का अर्थ एक पक्ष को बिना तलाक दिए त्याग कर देना है। यह एक प्रकार से वैवाहिक दायित्वों से भाग जाना है। सामान्यतः अध्ययनों से पता चलता है कि निम्न वर्गों के लोगों में पनि अपनी पत्नी का परित्याग कर हैं। परन्तु यह केवल मात्र पति द्वारा पत्नी को त्याग देना नहीं है, अपितु इसमें पनी पनि को त्याग देना भी सम्मिलित किया जाता है। इलियट एवं मैरिल के शब परित्याग का अर्थ पति या पत्नी द्वारा गैर जिम्मेदार तरीके से घर को छोड़ देना है जिसके बाद शेष परिवार अपना अलग प्रबन्ध करता है। इसमें भी त्याग बिना तलाक के कर दिया जाता है। 


इस प्रकार, तलाक वियोजन, परित्याग तथा बिलोपन से अलग शब्द है तथा इसका अर्थ वैध विवाह सम्बन्धों को तोड़कर एक दूसरे को एकल स्थिति में लाना है ताकि वे अगर चाहें तो पुनः विवाह कर सकें। 


तलाक के कारण-तलाक के प्रमुख कारण अधोलिखित हैं - 


(1) स्त्रियों को समानता के अधिकार का ज्ञान - वर्तमान समय में स्वियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं, किन्तु उन्हें अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं है। अतने अपने अधिकारों के प्रति सजग रहकर अपने दाम्पत्य जीवन की कटताओं से मुक्ति पाने के लिए तलाक का सहारा लेना सीख चुकी हैं। 


(2) शिक्षा का प्रसार - ज्ञान के अभाव में किसी वस्तु या लाभ को प्रा नहीं किया जा सकता है। वर्तमान समय में देश में शिक्षा का प्रचार एवें प्रसार बड़ी ही सीव गति से हो रहा है। जिसके कारण स्त्री एवं पुरुषों के मन में और मस्तिष्क में परिपक्वटा आयी है। वे अच्छे और बुरे का ज्ञान कर सकती है तथा अपनी कटता को ममाप्त करने के लिए तलाक को अपनाना इन्होंने सीख लिया है क्योंकि शिक्षा से उन्हें अपने अधिकारी को भी शान हो गया है। 


(3) वैवाहिक सम्बन्धों की दृढ़ता का अन्त - हिन्दू समाज में विवाह को एक धार्मिक कृत्य माना जाता है और इसका अपना एक विशेष महत्चव है। जिसके कारम वि को तोड़ना एक गलत एवं दुष्कर कार्य माना जाता है। लेकिन आज किमी के मन में विवाह के प्रति दृढ़ता नहीं रह गयी है। पति-पत्नी में जरा सा विवाद होने पर लोग तलाक का रास्टा अपना लेते हैं। (4) पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव-तलाक के कारणों में पाश्चात्य सभ्यता विशेष महत्व रखती है। जब से हमारे देश में ब्रिटिश राज्य की स्थापना हुई तब से यहां पर उनकी नई सभ्यता का उदय हुआ जो धीरे-धीरे समस्त देश के जन-जीवन पर छाने लगी। इस पश्वात्य सभ्यता ने हमारे अन्दर से तलाक को गलत मानने वाली विचारधारा को निकाल फेंका। 


(5) कानूनी प्रोत्साहन - भारत सरकार द्वारा तलाक के लिए अनेकों अधिनियम पारित कर दिए गए हैं जिनके माध्यम से पति-पत्नी आपस में तलाक ते सकते हैं। इस प्रकार कानूनी सहारा पाकर तलाक की सम्भावनाओं में वृद्धि हुई है। 


(6) महिलाओं के आन्दोलन - पुरुषों द्वारा महिलाओं पर अनैतिक अत्याचार क्रिया जाता है। इस आन्दोलन के माध्यम से महिलाओं को पुरुषों के विरुद्ध आवाज उठाने का पूर्ण अवसर प्राप्त हुआ। इसके साथ ही साथ उन्होंने समाज के सामने अपने अधिकारों की भी मांग की। पुरुषों की भांति महिलाओं ने भी आवश्यकता पड़ने पर तलाक लेने का अधिकार प्राप्त कर लिया। 


(7) औद्योगीकरण का प्रभाव - भारतीय समाज को निरन्तर बढ़ने औद्योगीकरण ने भी प्रभावित किया है। लोगों के विचारों में परिवर्तन होने लगा है । स्त्रियाँ पुरुषों की भांति बाहर निकलकर कार्य करने लगी हैं, जिसके कारण वे आत्मनिर्भर हो गयी है। अतः आपसी मतभेद के कारण तलाक को आसानी से प्रोत्साहन देती थी कोंकि तलाक के बाद पुराने समय की तरह उनके सामने जीविका चलने का अब प्रश्न नहीं उठता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत  राज्य की उत्पत्ति के ऐतिहासिक विकासवादी सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं। परन्तु गंभीर विवेचना से स्पष्ट होता है कि अन्य सभी सिद्धान्त गलत हैं और उन्होंने राज्य की उत्पत्ति की सही व्याख्या नहीं की है। इस सम्बन्ध में गार्नर का कहना ठीक है कि, "राज्य न तो ईश्वर की कृति है, न किसी उच्च शक्ति का परिणाम, न किसी प्रस्ताव या समझौते की सृष्टि है, न परिवार का विस्तारमात्र" अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राज्य की उत्पत्ति का सबसे अच्छा सिद्धान्त कौन है। इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि राज्य विकास का परिणाम है। इसका निर्माण मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ था और अच्छे जीवन के लिए अब भी चल रहा है। राज्य की उत्पत्ति का सबसे सही और वैज्ञानिक सिद्धान्त विकासवादी या ऐतिहासिक सिद्धान्त को ही कहा जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति एक विकास का परिणाम है। यह विकास धीरे-धीरे क्रम: चलता रहता है। इसी विकास के परिणामस्वरूप राज्य ने वर्तमान का रूप धारण किया है। राज्य की उत्पत्ति और व

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और