सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सुमेरियन सभ्यता के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन

 सुमेरियन सभ्यता के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन 


अर्थ व्यवस्था -सुमेर की सभ्यता का आधार कृषि-कार्य था। सुमेरियन श्रमिकों - ने दलदली भूमि को सुखाकर खेती योग्य बनाने में महारत हासिल की थी। कृषि के साथ पशुपालन का भी महत्व था। उनके पालतू पशुओं में गाय, भेड़, बकरी, सुअर, गधा, खच्चर और बैल उल्लेखनीय हैं। कृत्रि योग्य जमीन अधिकांश भाग अभिजात वर्ग और राजपरिवार के लोगों के अधिकार में था जिसमें उच्चाधिकारी और पुरोहित शामिल थे। शेष भूमि राज्य के सामान्य स्वतंत्र नागरिकों के पास थी। कुछ धनी और प्रभावशाली परिवारों के पास बड़ी भूसम्पदा थी लेकिन साधारण लोगों के पास भी छोटे खेत, बगीचे, घर और पशु थे। राज्य में किसानों, पशुपालकों और दासों की संख्या अधिक थी। पितृसत्तात्मक संयुक्त परिवारों में संगठित लोगों की खेती योग्य जमीन बेचने पर कुछ प्रतिबन्ध धे किन्तु व्यक्तिगत सम्पत्ति की अवधारणा के विकसित स्तर पर जमीन की बिक्री होने लगी थी। मन्दिरों के लिये निश्चित भूमि निगेनिया. कुर्रा और उरुलल तीन कोटियों की थी।

जमीन का लगान प्रायः वस्तुओं के रूप में वसूल किया जाता था इसी राजस्व से अधिकारियों और कर्मचारियों को वेतन दिया जाता था युद्धों में विजय के बाद अपनी वीर सरदारों को राजा करमुक्त जमीन देता था।

सुमेर की कृषि व्यवस्था का विवेचन करने के प्रसंग में सिंचाई व्यवस्था के विशेष महत्व की ओर ध्यान देना आवश्यक प्रतीत होता है। सुमेर के निवासियों ने बाँधों, जनाशयों और नहरों की एक जटिल प्रणाली का विकास कर लिया था जो उनके वैज्ञानिक ज्ञान और उत्कृष्ट अभियन्त्रण क्षमता का परिचायक है। इस महान कार्य में सर्वेक्षण, समतलीकरण, योजना निर्माण और मानचित्र निर्माण से संबंधित यन्बों और मापकों का विकास किया गया एवं कृषि संहिता की भी रचना की गई थी। इस कार्य में बड़े पैमाने पर श्रम का सहयोग और संगठन हुआ तथा दास प्रथा की वृद्धि हुई। इस सिलसिले में जनता से बेगार भी ली जाती थी। नगर-राज्यों की गतिविधियों में मात्रात्मक और गुणात्मक विकास के जो प्रमाण मिलते हैं उसे अन्तिम विश्लेषण में सिंचाई व्यव्या का ही परिणाम समझा जा सकता है। सुमेर के मन्दिरों, कुलीनतन्त्र और व्यापारी समुदाय के रख-रखाव में इसकी भूमिका निर्विवाद थी। कई प्राचीन आख्यानों में (जैसे तुमुजि) सिंचाई की प्रतिवनि भी गूंजती है। डॉ. आर, जे. फोर्स ने सुमेर की अर्थव्यवस्था में सिंचाई के महत्व का मूल्यांकन करते हुए लिखा है कि "सुमेर के नगर-राज्य वास्तव में सिंचाई की इकाई (क्षेत्र) थे और उनके बीच होने वाले अधिकांश युद्धों का कारण सिंचाई से सम्बद्ध समस्याओं में द्रष्टव्य है। कृषि का अनुरक्षण और असल में पूरा सामाजिक ढांचा जल के नियन्त्रण पर आधारित था। सुमेर की अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका के कारण व्यापारी, मल्लाह, मछुआरे, लिपिकर, वैद्य, स्थपति, बढ़ई, सुनार, लुहार और कुम्हार भी उल्लेखनीय है । यतायात एवं परिवहन में बैलगाड़ी एवं नौकाचालन का महत्व था। आन्तरिक व्यापार के अतिरिक्त विदेशी व्यापार भी विकसित था। व्यापारिक श्रेणियों (करूम) का उदय हो रहा था। ये स्वायत्तशासी संगठन के रूप में विकसित हो रही थी। भारत और मित्र तक व्यापार विस्तृत था। अनाज और वस्त्र के बदले में दूसरे देशों से इमारती सामानों और खनिज पदार्थों का व्यापार करते थे। शिल्पी अपने हस्तकौशल से निर्मित वस्तुओं को मुक्त बाजारों में बेचते थे वस्तु विनिमय के अतिरिक्त चांदी का भार मानक (शेकिल) प्रचलित था। जल और स्थल मार्ग से कुछ व्यापारी घूम-घूमकर वस्तुयें बेचते थे इनमें मन्दिरों और राजमहलों के प्रतिनिधियों की भूमिका भी उल्लेखनीय थी। ब्याज की दर लगभग 2.0 प्रतिशत थी।

श्रमिक जन प्रधानतः कृषि कार्य में लगे हुये थे। सभी कठोर श्रम साध्य कार्यों में दासी के श्रम को नियोजित किया जाता था। ज्यादातर मजदूर मन्दिरों और राजकीय जमीन पर काम करते थे, जो अलग थे उनसे भी बेगार ली जाती थी गरीब स्वतंत्र नागरिक भी उत्पादने के संसाधनों से वंचित होने की हालत में दासों की तरह होते जा रहे थे। 


सुमेरियन सामाजिक व्यवस्था :- सुमेरियन सभ्यता की सामाजिक व्यवस्था का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है

समाज का स्वरूप -सुमेर की सभ्यता के बारे में विद्वान गवेधक आई0 एम० दिकोनोफ लिखते हैं कि समाज में चार प्रधान वर्ग थे पहला अभिजातवर्ग था जिसमें राजसत्ता से प्रत्यक्षतः सम्बन्धित लोग और प्रमुख पुरोहितगण शामिल कथे यें सार्वजनिक और व्यक्तिगत दोनों प्रकार की भूसम्पदा से लाभान्वित होते थे। वृद्ध जनों की परिषद इसी वर्ग की थी। दूसरा वर्ग स्वतन्त्र नागरिकों और सैनिकों का या। इस वर्ग के लोग सामान्य सभा के सदस्य थे और इनके पास सामुदायिक जमीन का पारिवारिक स्वामित्व था। तीसरा व्ग अनुयायी जन का था-जो सामान्यतया उच्चवर्ग पर आश्रित थे। मन्दिरों और शिल्प कार्य से सम्बन्धित छोटे लोग भी इसी श्रेणी में आते थे चौथा वर्ग दासों और दासियों का था जो मन्दिरों तथा राजमहलों की जमीन पर श्रम करते थे और अन्य उद्योगों से भी जड़े थे। व्यक्तिगत रूप से भी कुछ सम्पन्न लोग दास रखते थे समाज में धनी और गरीब के बीच काफी अन्तर था। सुमेरियन समाज में दासों के श्रम का शोषण किया जाता था दासों में, दूसरे देशों के युद्धबन्दी और सुमेरवासी दोनों सम्मिलित थे। भयंकर अपराध कर्ज और विवशता जैसे तध्य दास-प्रथा की वृद्धि में सहायक हो रहे थे दास लोग अपने स्वामी की चल सम्पत्ति थे- पशुओं की तरह दासों से अमानुषिक व्यवहार किया जाता था और भागने की कोशिश करने पर क्र दण्ड के लिये उनके चमड़े को (पहचान के लिये भी) दागा जाता था धन की व्यवस्था करके वे दासता से मुक्त हो सकते थे, व्यापार करने की छूट थी और सक्षम हो सकते पर अपनी 'मुक्ति' खरीद सकते थे। यदि दास का विवाह स्वतंत्र नागरिक से हो जाय तो उनके बच्चे दासता से आजाद हो जाते थे। विभिन्न नगरों में दासों का विक्रय मूल्य अलग-अलग था। औसतन एक दास की कीमत् 20 शेकिल थी, और विडम्बना यह थी कि उस समाज में एक गधे को मूल्य भी इससे अधिक था।

परिवार को, समाज की आधारभूत इकाई के रूप में मान्यता प्राप्त थी परिवार के सदस्य प्रेम, आदर और पारस्परिक कर्तव्य के धागे में गुंथे हुए थे। विवाह, मां-बाप तय करते थे जिसे मिट्टी की पट्टिका पर अनुबन्धित किया जाता था। विवाह से पहले का गुप्त प्रेम अज्ञात नहीं था। सिद्धान्ततः एक पत्नी प्रथा के कारण महिलाओं की सामाजिक हैसियत पुरूष के बराबर थी। मन्दिरों की वेश्याओं (देवदासियों की तरह) के पास गमन होता था। रखैल प्रथा थी और कुछ दासियाँ भी भोग्या थीं। कुछ महिलायें शिक्षित होती थीं। समाज में नैतिका का मानदण्ड दुहरा था। सामान्य कारणों पर भी पत्नी को, पति तलाक दे सकता था अथवा सन्तान के अभाव में दूसरा विवाह कर सकता था गोद लेने की प्रथा प्रचलित थी सन्तान को सम्पत्ति का पूर्ण उत्तराधिकार प्राप्त था। उच्चवर्ग की महिलाओं को भी कुछ साम्पत्तिक और न्यायिक अधिकार प्राप्त थे समाज, मन्दिरों और राजमहलों के लोगों द्वारा किये जाने वाले अन्याय, अत्याचार और भ्रष्टाचार से अज्ञात नहीं था। महिलायें आभूषण और श्रृंगार के प्रति भी सजग थीं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत  राज्य की उत्पत्ति के ऐतिहासिक विकासवादी सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं। परन्तु गंभीर विवेचना से स्पष्ट होता है कि अन्य सभी सिद्धान्त गलत हैं और उन्होंने राज्य की उत्पत्ति की सही व्याख्या नहीं की है। इस सम्बन्ध में गार्नर का कहना ठीक है कि, "राज्य न तो ईश्वर की कृति है, न किसी उच्च शक्ति का परिणाम, न किसी प्रस्ताव या समझौते की सृष्टि है, न परिवार का विस्तारमात्र" अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राज्य की उत्पत्ति का सबसे अच्छा सिद्धान्त कौन है। इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि राज्य विकास का परिणाम है। इसका निर्माण मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ था और अच्छे जीवन के लिए अब भी चल रहा है। राज्य की उत्पत्ति का सबसे सही और वैज्ञानिक सिद्धान्त विकासवादी या ऐतिहासिक सिद्धान्त को ही कहा जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति एक विकास का परिणाम है। यह विकास धीरे-धीरे क्रम: चलता रहता है। इसी विकास के परिणामस्वरूप राज्य ने वर्तमान का रूप धारण किया है। राज्य की उत्पत्ति और व

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और