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शिष्टाचार के पतन (ह्रास) के कारण

 शिष्टाचार के पतन (ह्रास) के कारण


शिष्टाचार में हास (Degeneration in Manners) - शिष्टाचार तथा नैतिकता का अन्तर बहुत सीमान्त (marginal ) हे। नैतिकता तथा शिष्टाचार दोनों ही उचित और अनुचित के बोध से सम्बन्धित हैं लेकिन नैतिकता का क्षेत्र शिष्टाचार की तुलना में अधिक व्यापक है। नैतिकता का सम्बन्ध सम्पूर्ण सांस्कृतिक विरासत से हैं जबकि शिष्टाचार केवल वैयक्तिक व्यवहारों के क्षेत्र में समूह की प्रत्याशाओं को स्पष्ट करते हैं। एक विशेष संस्कृति में शिष्टाचार अथवा सदाचार व्यवहार का वह एक तरीका है जिसको व्यक्ति से एक विशेष आयु, लिंग, स्थिति अथवा वर्ग के व्यक्ति के प्रति प्रदर्शित करने की आशा की जाती है। सदाचार का उद्देश्य सभी वर्गों के लोगों के बीच पारस्परिक सद्भाव तथा स्नेह को बनाये रखना है। वर्तमान युग के सांस्कृतिक विघटन की एक प्रमुख अभिव्यक्ति शिष्टाचार के पतन अथवा अपकर्ष के रूप में देखने को मिलती है यह पतन दो रूपों में विद्यमान है-एक तो यह कि बहुत-से लोग शिष्टाचार को एक व्यर्थ का दिखावा अथवा बुर्जुआ-मनोवृत्ति मानकर इसका पालन करना आवश्यक नहीं समझते और दूसरा यह कि बहुत से व्यक्ति अपनी विघटित मनोवृत्ति के कारण शिष्टाचार को एक महत्वपूर्ण सामाजिक मूल्य के रूप में ही नहीं देखते। इन प्रवृत्तियों के कारण आज सांस्कृतिक आधार पर वैयक्तिक सम्बन्धों की मधुरता को बनाये रखने वाली शक्ति समाप्त हो गयी है तथा पारस्परिक संघरधो को प्रोत्साहन मिला है। भारतीय समाज के विशेष सन्दर्भ में शिष्टाचार के पतन की समस्या को अनेक क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 


शिष्टाचार में हास के विभिन्न रूप - 

(1) वर्तमान युग में आयु और शिष्टाचार के बीच समन्वय का नितान्त अभाव दिखाई देता है। परम्परागत भारतीय संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति की आयु में अपने से बड़े व्यक्ति तथा विशेषकर वृद्ध व्यक्तियों के प्रति शब्दों और व्यवहार द्वारा सम्मान प्रदर्शित करना आवश्यक था। आज इस प्रवृत्ति का तेजी से विकास हुआ है। कि केवल आयु ही सम्मान का आधार नहीं है। इसके फलस्वरूप परिवार में जीविका उपार्जित करने वाले युवा सदस्य सृद्ध माता-पिता अथवा दूसरे सदस्यों से शिष्ट व्यवहार करना आवश्यक नहीं समझते बल्कि अक्सर उनका अपमान भी कर देते हैं। कार्यालयों में युवा अधिकारी युद्ध चपरासी को निर्दयतापूर्वक डाँटना अपवैधानिक अधिकार समझता है। बृद्ध और असहाय व्यक्ति की सड़क चलते सहायता कर देना स्वयं एक अशिष्टता बन गई है और कभी-कभी तो वृद्ध व्यक्तियों के सामने अपनी नग्नता तथा उनके पिछड़ेपन का बखान करना एक गौरव की बात समझ ली जाती है। शिष्टाचार में इससे अधिक पतन और क्या हो सकता है? 


(2) आतिथ्य सत्कार में ह्वास शिष्टाचार के पतन की दूसरी प्रमुख अभिव्यक्ति है। परम्परागत रूप से अतिथि से शिष्ट व्यवहार करना हमारी संस्कृति का एक विशेष गुण था। आज घर में किसी अतिथि का आ जाना एक आकस्मिक विपत्ति समझी जाने लगी हैं । अनेक परिवारों में आतिथ्य सत्कार के स्थान पर अतिथि की योजनाबद्ध रूप से उपेक्षा की जाती है। उसके सामने बढ़ते हुए खर्चे की बातें करना, स्थानाभाव की कठिनाइयां बताना व्यवहार में उदासीनता दिखाना तथा बच्चों के माध्यम से उसका अपमान करना साधारण-सी बाते कन गयी है। भारतीय संस्कृति के सन्दर्भ में यह शिष्टाचार में होने वाला एक गम्भीर पतन है। 


(3) परिवार में शिष्टाचार का अभाव वर्तमान युग का एक अन्य सांस्कृतिक संकट हैं। पहले के समय में परिवार के संस्तरण को शिष्टाचार के द्वारा ही सुरक्षित रखा जाता था। आधुनिक युग में परिवार पूर्णतया एक औपचारिक इकाई के रूप में बदलता जा रहा है। परिवार में वृद्ध और प्रौढ़ सदस्यों के सामने युवा सदस्यों द्वारा सिगरेट पीना सिनेमा के डायलॉग बोलना नग्नता प्रदर्शित करना, अपने विवाह की बात को लेकर भद्दा विरोध प्रकट करना तथा माता-पिता के लिए अशिष्ट वाक्यों का प्रयोग करना आधुनिकता का अंग समझा जाने लगा है। परिवार में विधवाओं तथा अनाथ सदस्यों को आश्रयं और सहानुभूति देने के स्थान पर उन्हें बोझ समझा जाने लगा है। सदाचार के एक प्रतीक के रूप में परिवार के सम्मानित. सदस्यों से आज्ञा लेकर कोई कार्य करना अथवा माता-पिता के चरणों का स्पर्श करना पिछड़ेपन की निशानी मान ली जाती है। वास्तव में हैलो' और 'डियर की कल्चर नें सदाचार की गरिमा ही समाप्त कर दी है। 


(4) शिक्षा संस्थाओं में बढ़ती हुई अशिष्टता इस पतन का एक अन्य पक्ष है। विद्या को न तो पैसों से खरीदा जा सकता है और न ही इसे बलपूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए गुरु की सहानुभूति तथा स्नेह की आवश्यकता होती है। इसी सहानुभूति तथा स्नेह की प्राप्ति के लिए शिक्षा संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा शिष्टाचार अथवा सदाचार प्रदर्शित करना आवश्यक समझा जाता है। वर्तमान युग में विद्या को भी एक खरीदी जा सकने योग्य वस्तु' समझा जाने लगा है। फलस्वरूप विद्यार्थियों में सदाचार का तेजी से हास हो रहा है। शिक्षकों से अभद्र व्यवहार करना, अनुशासन के नियमों को भंग करना, सस्ता नेतृत्व स्थापित करने के लिए साथियों के साथ मार-पीट करना, कक्षाओं से गायब रहना, लड़कियों का भड़कीली वेश-भूषा में रहना, विद्यार्थियों का शिक्षकों के सामने सिगरेट पीना तथा अनुशासन की बात करने पर शिक्षकों को धमकाना सदाचार के पतन की गम्भीर स्थिति को स्पष्ट करता है। 


(5) आर्थिक जीवन में अशिष्टता भी निरन्तर बढ़ती जा रही है विभिन्न दफ्तरों तथा औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कर्मचारी-संघों की स्थापना हो जाने से अधीनस्थ कर्मचारी आश्वस्त हो गये हैं कि कितना भी अभद्र व्यवहार करने पर उन्हें कोई हानि नहीं पहुँच सकती। इसके फलस्वरूप उद्योगों के मालिक और प्रवन्धक के साथ अशिष्ट व्यवहार करना. कार्यालयों में कर्मचारियों द्वारा निर्धारित समय से देर में आना, बार-बार अपनी सीट से उठकर चले जाना ग्राहकों की शिकायत पर उनसे अशिष्ट व्यवहार करना तथा कायालय के अधिकारी से असम्मानजनक व्यवहार करना एक फैशन-सा बनता जा रहा है। अनेक महत्वपूर्ण और सीमित पूर्ति बाले सामान को बेचने वाले दुकानदारों का व्यवहार भी ग्राहकों के साथ साधारणतया अशिष्टता का ही होता हैं। 


(6) स्त्रियों में शिष्टाचार की कमी ने हमारे परम्परागत सांस्कृतिक संगठन को बिल्कुल झकझोर कर रख दिया है। आज परिवारों में स्वियों द्वारा अपने बुद्ध सास व श्वसुर से अक्सर नौकरी के समान व्यवहार किया जाने लगा है। उनके सामने पति के लिए अथवा अन्य नातेदारों के लिए अपशब्द कहना आधुनिकता का आधार बन गया है। घर में आधुनिक सहेलियों को आमन्त्रित करके उनके साथ भहे मजाक करना, अंग्रेजी न जानने वाले बुद्ध सदस्यों से अंग्रेजी के शब्द बोलना, अशिष्ट वेश-भूषा धारण करना, बच्चों को गालियां देना तथा अपनी सुख-सुविधा के लिए वृद्ध सदस्यों को उनकी सुविधाओं से वंचित करना स्वियों में शिष्टाचार के पतन के उदाहरण हैं। 


शिष्टाचार के पतन के लिए उत्तरदायी कारण - 


वर्तमान भारतीय समाज में जहाँ तक शिष्टाचार में पतन के कारण का प्रश्न है, यह ध्यान रखना चाहिए कि वे सभी कारण जो नैतिकता के पतन के लिए उतरदायी है. शिष्टाचार में भी हास उत्पन्न करते हैं। इसके पश्चात् भी कुछ ऐसे अन्य कारणों का उल्लेख किया जा सकता है जिन्होंने शिष्टाचार में अपकर्ष की समस्या उत्पन्न की है। 


(1) सर्वप्रथम, नैतिक मूल्यों का ह्वास (decline of moral values) इस स्थिति का एक महत्वपूर्ण कारण है। नैतिकता के द्वास से छोटे बड़े, भूले-बुरे, उचित-अनुचित का बोध समाप्त हो गया जिससे अशिष्ट व्यवहारों को प्रोत्साहन मिला। 


(2) तेजी से बढ़ता हुआ सामाजिक विघटन (wide-spread Social disorganization) इस दशा का दूसरा कारण हैं इस स्थिति ने व्यक्तिगत विषटन तया पारिवारिक विघटन में वृद्धि करके सामाजिक नियन्त्रण को कमजोर बना दिया। इसी के फलस्वरूप वैयक्तिक स्वतन्त्रता का रूप दोषपूर्ण हो गया। 


(3) आधुनिक युग की व्यापारिक प्रवृत्ति (Commercialized attitudes) के प्रभाव से भी त्याग सहानुभूति तथा स्नेह के बे आधार समाप्त हो गये जो शिष्टाचार को बनाये रखने में सहायक थे। इस प्रवृत्ति के कारण शिष्टाचार केवल उन्हीं व्यक्तियों तक सीमित रह गया जिनसे हमें कुछ लाभ होने की आशा होती है। 


(4) प्राथमिक सम्बन्धी के हास (Decline of primary relationships) भी शिष्टाचार में हार हुआ है। साधारणतया आज सभी व्यक्ति द्वितीयक अधया दिखावटी सम्बन्धों द्वारा ही अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं जिसमें शिष्टाचार को एक आवश्यकता के रूप में नहीं देखा जाता।

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