सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

साम्प्रदायिकता के दुष्परिणाम

 साम्प्रदायिकता के दुष्परिणाम

साम्प्रदायिकता के दुष्परिणाम (Evil Consequences of Communalism) - भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या ने राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक एकीकरण तथा सामाजिक प्रगति के मार्ग में गम्भीर बाधाएँ उत्पन्न की हैं। इस स्थिति की गम्भीरता को समझने के लिए साम्प्रदायिकता के दुष्परिणामों का मूल्यांकन करना आवश्यक है। 


(1) राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा (Danger to National Integration) -एक स्वस्थ और संगठित राष्ट्रीयता के विकास में आज साम्प्रदायिकता की समस्या सबसे बड़ी बाधा सिद्ध हुई हैं। (क) सर्वप्रथम, राष्ट्रीय एकता के लिए, सभी समूहों द्वारा पारस्परिक हितों का ध्यान रखते हुए एक-दूसरे की सहायता करना आवश्यक होता है, जबकि साम्प्रदायिकता के कारण सभी धार्मिक समूह इतने आत्म-केन्द्रित हो जाते हैं कि वे केवल अपने हितों को सर्वोच्च मानते हैं। (ख) साम्प्रदायिकता से उत्पन्न संघर्ष तथा विरोधी भावनाएँ एक ऐसे वातावरण का निर्माण करती हैं जिसमें सभी समूह एक-दूसरे को धृणा और अविश्वास से देखने लगते हैं। इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण राष्ट्र एक-दूसरे से पृथक् अनेक छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित हो जाता है। (ग) राष्ट्रीय एकता के लिए भावनात्मक एकीकरण तथा चरित्र की दृढ़ता का विशेष महत्व है। साम्प्रदायिकता के फलस्वरूप धर्म व्यक्ति के विकास का साधन न रहकर चारित्रिक पतन का माध्यम बन जाता है। (घ) साम्प्रदायिकता के फलस्वरूप राष्ट्रीय जीवन असुरक्षित बन जाता है। जब प्रत्येक समूह दूसरे के प्रति शंकालु हो तथा दूसरे से अपनी रक्षा करने के भ्रम में अपनी सम्पूर्ण रचनात्मकता को नष्ट कर रहा है तो आन्तरिक संगठन तथा बाहरी देशों से रक्षा करने की दृढ़ता की कल्पना भी कैसे की जा सकती हैं ? यह सभी वे परिस्थितियाँ हैं जो प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय एकता के लिए गम्भीर खतरा उत्पन्न कर देती हैं। 


(2) पारस्परिक तनाव (Mutual Distrust and Tension) -  समाज में विभिन्न समूहों के बीच पारस्परिक घृणा, अविश्वास तथा द्वेष उत्पन्न करके साम्प्रदायिकता एक तनावपूर्ण स्थिति को जन्म देती है। यह तनाव केवल आन्तरिक शान्ति को ही भंग नहीं करता बल्कि अक्सर इसके फलस्वरूप हिंसा और मारकाट भी भड़क उठती हैं। एक बार उत्पन्न हुई हिंसा भविष्य में पहले से भी अधिक गहरे तनाव को जन्म देती है। कभी-कभी यह तनाव प्रतिशोध की भावना में परिवर्तित होकर एक बड़े क्षेत्र को साम्प्रदायिक संघर्ष में उलझा देते हैं। 


(3) सार्वजनिक धन-जन की हानि (Loss of Public Property and Life) - आज एक ओर हम आर्थिक और सामाजिक नियोजन के द्वारा देश को समृद्ध बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं और दूसरी ओर, साम्प्रदायिकता के कारण करोड़ों-अरबों रुपये की सम्पत्ति कुछ ही घण्टों में आग की लपटों में भस्म हो जाती है। साम्प्रदायिक संघर्षों के समय दुकानों को जलाना, सार्वजनिक इमारतों को नष्ट करना, रेलों और बसों में आग लगाना तथा कारखानों के उत्पादन को रोकना सामान्य-सी घटनाएँ बन जाती हैं। इस समय कितने ही व्यक्तियों की हत्याओं के कारण परिवार विघटित हो जाते हैं । भारत में साम्प्रदायिक संघर्षों के कारण होने वाली आर्थिक हानि का यदि कोई निष्पक्ष अनुमान लगाया जाय तो, यह हानि निश्चय ही इतनी बड़ी राशि के रूप में सामने आयेगी जिससे अनेक पंचवर्षीय योजनाओं को पूरा किया जा सकता था। 


(4) राजनीतिक अस्थिरता तथा अविश्वास (Political Instability and Distrust) - भारत जैसे प्रजातन्त्र की सफलता के लिए विभिन्न राजनीतिक में स्थिरता तथा सरकार के प्रति जनता का विश्वास होना आवश्यक है। साम्प्रदायिक संघर्षों के कारण सभी राजनीतिक दलों को सरकार पर कीचड़ उछालने का अवसर मिल जाता है, राजनीतिक दलों के दुष्पचार से साम्प्रदायिक तनाव और अधिक उभरने लगते हैं, कानून और व्यवस्था को बनाये रखने में करोड़ों रुपये का अनावश्यक व्यय होने लगता है, जनता का सरकार में विश्वास नहीं रह जाता तथा जनसाधारण अपने जीवन को असुरक्षित समझने लगता है। साम्प्रदायिक आधार पर दलबदल की घटनाएं सामने आती हैं और सरकार का विरोध करने के लिए निकम्मे और आदर्श रहित राजनीतिक दलों की शक्ति बढ़ने लगती है। ये सभी दशाएं देश में राजनीतिक अव्यवस्था और अस्थिरता उत्पन्न करके साम्प्रदायिकता की समस्या को और भी गम्भीरं बना देती हैं। 


(5) औद्योगिक विकास में बाधा (Obstacle in Industrial Development) - साम्प्रदायिक भावनाओं के कारण न केवल मिलों और कारखानों में श्रमिक अनेक दलों में विभाजित रहते हैं बल्कि साम्प्रदायिक तनावों के कारण कभी-कभी तो सम्बन्धित स्थान पर एक लम्बी अवधि के लिए उत्पादन कार्य पूर्णतया बन्द हो जाता है। यह सर्वविदित है कि साम्प्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन होने के पश्चात् अनेक कुटीर उद्योगों तथा लघु उद्योगों को इसलिए बहुत हानि हुई कि इनसे सम्बन्धित आनुवंशिक कारीगरों ने स्थान-परिवर्तन कर लिया था अथवा साम्प्रदायिक संघर्षों के कारण उनके परिवार छिन्न भिन्न हो गये थे आज भी साम्प्रदायिक तनाव की दशा में इन छोटे कारीगरों गी ही सबसे अधिक हानि होती है जिसके फलस्वरूप देश अनेक उपयोगी उत्पादनों से वंचित रह जाता है। 


(6) अराजक तत्वों की वृद्धि (Increase of Anti-social Elements) -  साम्प्रदायिक तनाव के समय जब पारस्परिक घृणा और हिंसा बढ़ जाती है तो कितने ही व्यक्ति लूटपाट, आगजनी तथा हत्या को एक सामान्य व्यवहार के रूप में देखने लगते हैं। संकीर्णता, कट्टरता और प्रतिशोध की मनोवृत्तियाँ इस समय इतनी शक्तिशाली बन जाती हैं कि इनके अधीन व्यक्ति तरह-तरह के अपराध करना आरम्भ कर देता है। यह स्थिति केवल साम्प्रदायिक संघर्ष के समय ही नहीं बल्कि बाद में स्थायी रूप से सामाजिक प्रगति के मार्ग में एक बड़ी बाधा बन जाती है। 


(7) सांस्कृतिक एकीकरण में बाधक (Obstacle in Cultural Integration) - एक स्वस्थ राष्ट्रीयता के विकास के लिए यह आवश्यक है कि देश में रहने वाले सभी समूहों तथा समुदायों के बीच सांस्कृतिक एकीकरण की प्रक्रिया क्रियाशील हो भारत में आज विभिन्न कल्याण कार्यक्रमों, सांस्कृतिक आयोजनों तथा शिक्षा के द्वारा सांस्कृतिक एकीकरण के सभी प्रयास साम्प्रदायिकता की समस्या के कारण धूमिल पड़ जाते हैं। जब कभी साम्प्रदायिक तनाव बढ़ते हैं तो वर्षों से विकसित हो रहा साम्प्रदायिक सद्भाव एकाएक लुप्त हो जाता है और उसके स्थान पर फिर वही अविश्वास और घृणा हमारे जीवन को विषाक्त करने लगते हैं। 


वास्तविकता यह है कि साम्प्रदायिक तनाव अथवा सम्प्रदायवाद आज एक स्थायी प्रक्रिया के रूप में हमारे सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक जीवन को विघटित कर रहा है। सम्प्रदायवाद अपने दुष्प्रभावों से देश को दुर्बल बनाता है और देश की प्रत्येक दुर्बलता सम्प्रदायवाद में और अधिक वृद्धि करती है।

टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam 1857 के महान विद्रोह (1857 के भारतीय विद्रोह, 1857 के महान विद्रोह, महान विद्रोह, भारतीय सेप्पी विद्रोह) को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। 1857 आंदोलन एक राष्ट्रीय उभर रहा था, जो भारतीयों के दिल में एक मजबूत आग्रह से प्रेरित था, जिससे देश मुक्त हो गया। यह ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय एकल घटना थी। यह भारत में सदी के पुराने ब्रिटिश शासन का नतीजा था। भारतीयों के पिछले विद्रोहों की तुलना में, 1857 का महान विद्रोह एक बड़ा आयाम था और यह समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की भागीदारी के साथ लगभग अखिल भारतीय चरित्र ग्रहण करता था। यह विद्रोह कंपनी के सिपाही द्वारा शुरू किया गया था। इसलिए इसे आमतौर पर 'सेप्पी विद्रोह' कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ सिपाही का विद्रोह नहीं था। इतिहासकारों ने महसूस किया है कि यह एक महान विद्रोह था और इसे सिर्फ एक सिपाही विद्रोह कहने के लिए अनुचित होगा। हमारे इतिहासकार अब इसे विभिन्न ना