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साम्प्रदायिकता का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषतायें

साम्प्रदायिकता का अर्थ, परिभाषा  एवं विशेषतायें 


साम्प्रदायिकता का अर्थ एवं परिभाषा - स्मिथ (Smith) ने साम्प्रदायिकता को परिभाषित करते हुए कहा है कि "एक साम्प्रदायिक व्यक्ति अथवा समूह वह है जो अपने धार्मिक या भाषा-भाषी समूह को एक ऐसी पृथकू राजनीतिक तथा सामाजिक इकाई के रूप देखता है जिसके हित दूसरे समूहों से पृथक् होते हैं और जो अक्सर उनके विरोधी भी हो सकते हैं।" 


श्रीकृष्णदत्त भट्ट के अनुसार, "अपने धार्मिक सम्प्रदाय से भिन्न अन्य सम्प्रदाय तथा सम्प्रदायों के प्रति उदासीनता, उपेक्षा, हेय दृष्टि, घृणा, विरोध और आक्रमण की वह भावना साम्प्रदायिकता है जिसका आधार यह वास्तविक या काल्पनिक भय या आशंका है कि उत्त सम्प्रदाय हमारे अपने सम्प्रदाय और संस्कृति को नष्ट कर देने या हमें जान-माल की. क्षति पहुँचाने के लिए कटिबद्ध है।" 


विशेषतायें - इन दोनों परिभाषाओं से साम्प्रदायिकता की कुछ प्रमुख विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं जिन्हें निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है : 


(1) सर्वप्रथम, साम्प्रदायिकता एक विशेष धर्म अथवा धार्मिक सम्प्रदाय की वह उग्र भावना है जिसके अन्तर्गत दूसरे धर्मों अथवा धार्मिक सम्प्रदायों के प्रति घृणा और विरोध का प्रदर्शन किया जाता है। 


(2) साम्प्रदायिकता चरमवादी होती है जिसमें अनुकूलन और समझौते का कोई स्थान नहीं होता। 


(3) साम्प्रदायिकता का आधार वह काल्पनिक या वास्तविक भय है जिसके अन्तर्गत एक विशेष धार्मिक समूह इस आशंका से घिरा रहता है कि दूसरे धार्मिक समूह उसके विरोधी हैं तथा उसे नष्ट करने के लिए तुले हुए हैं। 


(4) साम्प्रदायिकता की मानसिकता तभी सन्तुष्ट होती है जब तिरस्कार, विरोध अंथवा हिंसा के द्वारा अन्य धार्मिक समूहों को दबाने में सफलता प्राप्त कर ली जाये। 


(5) साम्प्रदायिकता का आधार धार्मिक विश्वास है, इसलिए धार्मिक कट्टरता में होने वाली वृद्धि तथा कमी के साथ ही साम्प्रदायिकता के प्रभाव में भी वृद्धि अथवा कमी होती रहती हैं। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारत में धर्म के नाम पर हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच होने वाले संघर्ष ही साम्प्रदायिकता का उदाहरण नहीं हैं बल्कि हिन्दुओं में ही वैष्णवों और शैवों के बीच होने वाले संघर्ष, मुसलमानों में शिया और सुन्नियों के बीच होने वाले संघर्ष अथवा सिक्खों में अकालियों और निरंकारियों के पारस्परिक संघर्ष भी साम्प्रदायिकता के उदाहरण हैं। वर्तमान युग में साम्प्रदायिकता की धारणा में धार्मिक अन्धभक्ति के साथ राजनीतिक उद्देश्य भी जुड़ते जा रहे हैं। यही कारण है कि आज साम्प्रदायिकता का उपयोग खुलकर राजनीतिक स्वार्थों को पूरा करने के लिए किया जाने लगा है। इस दृष्टिकोण से साम्प्रदायिकता की वर्तमान प्रकृति के आधार पर यह कहा जा सकता है कि, साम्प्रदायिकता एक ऐसी संघर्षपूर्ण मनोवृत्ति हैं जिसके अन्तर्गत एक विशेष धर्म अथवा सम्प्रदाय के अनुयायी अपने धार्मिक तथा राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए अपने समूह को अन्य धार्मिक समूहों के विरुद्ध संगठित करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उग्र प्रदर्शनों तथा हिंसा के लिए भड़काते हैं। 


सम्प्रदायवाद के कारण (Cause of Communalism) - भारत में साम्प्रदायिकता की वर्तमान समस्या इतनी जटिल है कि इसे केवल एक या दो कारणों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इन सभी कारणों को संक्षेप में निम्नांकित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है 


(1) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ( Historical Background) - साम्प्रदायिकता के इतिहास का अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि अतीत में धार्मिक आधार पर जो साम्प्रदायिक संघर्ष हुए हैं, उससे भारत के दो सबसे बड़े धार्मिक समूहों में अनेक पूर्वाग्रहों का विकास हो गया। इन पूर्वाग्रहों के कारण आज न केवल साम्प्रदायिक आधार पर धर्म और भाषा का नारा बुलन्द किया जाता है बल्कि अकारण ही विभिन्न धार्मिक समूह एक-दूसरे को अविश्वास की दृष्टि से देखते रहते हैं। यह स्थिति साम्प्रदायिक तनाव के लिए एक अनुकूल वातावरण का निर्माण करती हैं। 


(2) साम्प्रदायिक संगठन ( Communal Organization) - हमारे देश में आरम्भ में मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा ही दो ऐसे साम्प्रदायिक संगठन थे जो हिन्दुओं तथा मुसलमानों को एक-दूसरे के विरुद्ध भड़काते रहते थे आज हिन्दुओं और मुसलमानों के अतिरिक्त सिक्खों में भी ऐसे संगठनों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। ये संगठन अपने धर्म अथवा सम्प्रदाय के लोगों को संगठित करते हैं, अन्य धर्मों और सम्प्रदायों के प्रति घृणा और विद्वेष का प्रचार करते हैं, अक्सर अपने सदस्यों में अवैध रूप हथियारों का वितरण करते हैं तथा अपने अस्तित्व के लिए झूठी अफवाहें फैलाकर अपने सदस्यों को दूसरों के विरुद्ध भड़काते हैं। इन संगठनों का प्रयत्न यह होता है कि एक स्थान पर यदि साम्प्रदायिक झगड़े हों तो दूसरे स्थान पर उसका तुरन्त बदला लिया जाये। 


(3) मनोवैज्ञानिक कारक (Psychological Factors) - अनेक प्रकार के मनोवैज्ञानिक दबाव भी हमारे देश में साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न कर देते हैं इन मनोवैज्ञानिक दबावों का आधार अनेक प्रकार के सन्देह, भय, अविश्वास तथा हीनता की भावनाएँ हैं। उदाहरण के लिए, भारत का मुस्लिम समूह अकारण ही हिन्दुओं की प्रगति को अपने शोषण का कारण मानकर असन्तुष्ट महसूस करता है। वह इसका कारण अपनी धार्मिक कट्टरता और शैक्षिक पिछड़ेपन के रूप में नहीं देखता। उनकी हीनता उनमें तनाव उत्पन्न करती है, जबकि हिन्दू वर्ग इस स्थिति से उसकी राष्ट्रीय निष्ठा में अविश्वास करने लगता है। यही स्थिति विस्फोटक बनकर साम्प्रदायिक तनाव को बहुत बढ़ा देती है। सन् 1983 में अकालियों और निरंकारियों के बीच होने वाले साम्प्रदायिक संघर्ष भी सन्देह और भय के मनोवैज्ञानिक दबाबों का ही परिणाम थे। 


(4) राजनीतिक स्वार्थ (Political Interests) - साम्प्रदायिक संघर्षों को बढ़ाने में बोटों पर आधारित दूषित राजनीति ने सबसे सक्रिय भूमिका निभाई है। सच तो यह है कि चुनाव के समय साम्प्रदायिकता अपने खुले रूप में सामने आती है और कुछ ही समय वाद इसकी परिणति साम्प्रदायिक संघर्ष में देखने को मिलने लगती है। विभिन्न दलों द्वारा चुनाव के लिए अक्सर ऐसे प्रत्याशी, को खडा किया जाता है जो उस क्षेत्र के सबसे बड़े धार्मिक समूह का सदस्य होता है। स्वाभाविक है कि फिर धर्म के नाम पर लोगों को संगठित किया जाता है। अनेक प्रत्याशी तो नियोजित रूप से चुनाव के समय साम्प्रदायिक दंगे करवाने का प्रयल करते हैं। जिससे परिस्थिति के अनुसार वे इसका पूरा लाभ उठा सकें। 


(5) सांस्कृतिक भिन्नता (Cultural Differences) - भारत में हिन्दुओं, मुसलमानों, सिक्खों, ईसाइयों तथा पारसियों के रीति-रिवाज एक-दूसरे से बहुत भिन्न हें। उनके उत्सवों और त्यौहार मनाने के ढंग अलग-अलग हैं; वेश-भूषा तथा धार्मिक विश्वासों में कोई समानता नहीं है; यहाँ तक कि एक राष्ट्र का अंग होने के बाद भी उनके लिए बनाये गये अनेक सामाजिक विधान भी एक-दूसरे से भिन्न हैं। कभी ऐसा प्रयत्न नहीं किया गया कि नियोजित रूप से सभी समूहों को सांस्कृतिक आधार पर एक-दूसरे के निकट लाया जाये। इसके फलस्वरूप विभिन्न धार्मिक समूहों तथा सम्प्रदायों के बीच बनी खाई घटने के स्थान पर ज्यों की त्यों बनी रही है। 


(6) धार्मिक कट्टरता ( Religious Intolerance) - यदि जाये तो सभी धर्मों की शिक्षाएं और विश्वास समान हैं। इसके पश्चात् मूल रूप से देखा प्रत्येक धर्म के नेता और प्रचारक अपने धर्म को सर्वोच्च मानते हैं और दूसरे धर्मों को हेय दृष्टि से देखते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर सभी मुल्ला, मौलवी, महन्त, मठाधीश और पादरी अपने अनुयायियों को धार्मिक कट्टरता की और दूसरे धर्मावलम्बियों से अपनी रक्षा करने की सीख देते हैं। ऐसे उदाहरणों की भी कमी नहीं है जब अतीत में एक विशेष धर्म के प्रतिनिधियों द्वारा दूसरे धर्म के अनुयायियों की हत्या करने को भी एक पुण्य-कर्म कहा गया। इस कार्य, के पीछे धार्मिक प्रतिनिधियों के अपने निजी स्वार्थ होते हैं लेकिन इसके फलस्वरूप अन्दर ही-अन्दर विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच तनाव बढ़ता रहता है। 


(7) अराजक तत्वों के स्वार्थ (Vested Interests of Anti-Social Elements) - प्रत्येक समाज में कुछ ऐसे अराजक अथवा समाज-विरोधी तत्व अवश्य होते हैं जिनका कार्य ही विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष उत्पन्न करना और संघर्ष की स्थिति में अपनी स्वार्थ-साधना करना होता है।

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