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सामाजिक विघटन का अर्थ एवं परिभाषा

सामाजिक विघटन का अर्थ एवं परिभाषा 


सामाजिक विघटन का अर्थ -सामाजिक विघटन वह अवस्था है जिसमें समाज अथवा किसी अन्य समय की विभिन्न इच्छाओं में परस्पर सामंजस्य समाप्त हो जाता है तथा सामाजिक संगठन को बनाये रखने वाले सांगठनिक सम्बन्ध या तो शिथिल हो जाते हैं या पूरी तरह से नष्ट हो जाते. हैं। साधारण शब्दों में सामाजिक विधटन बह अवस्था है जिसमें समाज अथवा किसी अन्य समग्र की विभिन्न इच्छाओं में परस्पर सामन्जस्य समाप्त हो जाता है। तथा सामाजिक संगठन को बनाये रखने वाले सामाजिक सम्बन्ध या तो शिथिल हो जाते हैं या पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। 

परिभाषा - प्रमुख समाजशास्त्रियों ने सामाजिक विघटन की परिभाषा निम्नलिखित प्रकार से दी हैं -

1. फ्रेरिस के अनुसार-"सामाजिक विघटन व्यक्तियों के बीच प्रकार्यात्मक सम्बन्धों के उस मात्रा में टूट जाने को कहते हैं जिससे समूह के र्वीकृत। कार्यो को पूरा करने में बाधा पड़ती है।" 


2. इलियट तथा मैरिट के अनुसार-"सामाजिक विघटन वह प्रक्रिया है, जिसके कारण समूह के सदस्यों के बीच पाये जाने वाले सम्बन्ध टूट जाते हैं अथवा नष्ट हो जाते हैं।" 

3. लैण्डिस के अनुसार-"सामाजिक विघटन अनिवार्य रूप से समाज में नियन्त्रण की व्यवस्था के भंग होने को कहते हैं, जिससे समाज में अव्यवस्था और गड़बड़ी उत्पन्न होती है। 

4. फेयरचाइल्ड के अनुसार"सामाजिक व्यवहार के प्रतिमानों, संस्थाओं तथा नियन्वरणों की स्थापित व्यवस्थाओं की अव्यवस्था और गलत क्रियात्मकता को सामाजिक विघटन कहते हैं।" 

सामाजिक विघटन के कारण-सामाजिक विघटन उस परिस्थिति या दशा का परिचायक है जिसमें विभिन्न इकाइयां अपनी प्रस्थिति एवं कार्यों के अनुकूल अपना काम नहीं कर पाती और उसमें परस्पर सामन्जस्य एवं सन्तुलन समान हो जाता है। इस दशा को लाने में अनेक कारण सहयोग देते हैं जिन्हें हम सामाजिक विघटन के कारण बह सकते हैं। इन कारणों को मुख्यतः हम दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं 


(A) सामाजिक कारण-सामाजिक विघटन के प्रमुख सामाजिक कारण निम्न प्रकार हैं - 


1. सामाजिक मनोवृत्तियाँ-सामाजिक धारणाओं एवं मनोवृत्तियों का बदलता स्वरूप भी सामाजिक विघटन का कारण माना जाता है सामाजिक मनोवृत्तियाँ कार्य करने की प्रवृत्तियाँ होती हैं। थॉमस और जैनेनिकी के अनुसार, 'सामाजिक मनोवृत्ति वैयक्तिक चेतना की वह प्रक्रिया है, जो समाज में व्यक्ति की वास्तविक और सम्भव क्रियाओं को निश्चित करती है। " 


2. सामाजिक परिवर्तन-सामाजिक विघटन का प्रमुख कारण सामाजिक सम्बन्धों में तीव्र परिवर्तन है इलियट तथा मैरिल के अनुसार, "प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के फलस्वरूप समाज में परिवर्तन आता है, किन्तु सभी पक्षों की गति समान होने के कारण आपसी सामन्जस्य विघटन हो जाता है।" 


3. सामाजिक संकट-संकट भी सामाजिक विघटन का प्रमुख कारण बताया जाता है। थॉमस के अनुसार, "संकट यह घटना है जो सुचारू रूप से चलने वाली आदतों के पालन में बाधा उपस्थित करती है, सारा ध्यान संघर्ष की स्थिति पर केन्द्रित करती।" 


ये संकट दो प्रकार के होते हैं -

(i) आकस्मिक संकट - आकस्मिक संकट चे संकट हैं जो कि अचानक ही समाज पर टूट पड़ते है तथा जिनकी आशा नहीं होती। इन संकटों का सामना करने के लिए व्यक्ति तत्पर नहीं होते। इसलिए सम्पूर्ण समाज में अचानक ही अव्यवस्था बढ़ जाती हैं।

(ii) संचयी संकट - संचयी संकट से तात्पर्य उस संकट से हैं कि, "एक जो अकस्मात न होकर धीरे-धीरे आता है। इस सम्बन्ध में इलियट तथा मेरिल ने लिखा है कि "एक संचयी संकट बह संकट है जो धीरे-धीरे काफी समय तक घटनाओं के साँचे के रूप में बढ़ता है। 

4. सामाजिक मूल्य - सामाजिक मूल्य व्यक्तियों के लिए उद्देश्य व अर्थपूर्ण आदर्श होते हैं तथा व्यवहार को निर्धारित करने में विशेष महत्त्व रखते हैं। इलियट और मैरिल के अनुसार, 'सामाजिक मूल्य वे सामाजिक वस्तुए होती हैं जो हमारे लिए कुछ अर्थ रखती हैं और जिन्हें हम जीवन की योजना के लिए महत्वपूर्ण समझते हैं।" 


5. युद्ध - युद्ध भी सामाजिक विघटन का एक बहुत बड़ा कारण है। युद्ध के कारण समाज के आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्रों में तीव्र गति से परिवर्तन होने लगता है, वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं और लोगों के रहन-सहन का स्तर गिर जाता है। 


6. सामाजिक संरचना में तीव्र परिवर्तन - सामाजिक संरचना में तीव्र परिवर्तन भी सामाजिक विघटन की दशा उत्पन्न कर देता है। संरचनात्मक परिवर्तन के कारण व्यक्ति अपनी प्रस्थितियों के अनुसार अपनी भूमिकाओं को निष्पादित नहीं कर पाते। इलियट तथा मेरिल के अनुसार, "आज के गतिशील समाज में सामाजिक संरचना में तीव्र परिवर्तन से कई बार प्रस्थिति तथा कार्य स्पष्ट नहीं हो पाते तथा बहुत से व्यक्ति स्वयं को ऐसी दशा में पाते हैं जिसमें समाज द्वारा स्थापित व्यवहार प्रतिमानों का अस्तित्व नहीं रह पाता। 

(B) आर्थिक कारण - सामाजिक विघटेन के अनेक आर्थिक कारण भी हो सकते है जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित प्रकार से हैं - 


1. औद्योगीकरण तथा नगरीकरण - औद्योगीकरण तथा नगरीकरण जहाँ पर एक तरफ आर्थिक विकास एवं समृद्धि में सहायक हैं, वहीं पर इन्हें सामाजिक विघटन के लिए उत्तरदायी भी बताया गया। 

2. व्यापार अपकर्ष या अवनति - व्यापार अपकर्ष भी सामाजिक विघटन को बढ़ावा देता है। व्यापार अपकर्ष से आर्थिक चक्र में अनिश्चितता आ जाती है और तीव्र गति से उतार-चढ़ाव आने लगते हैं। 

3. बेकारी - बेकारी आधुनिक युग में सामाजिक विघटन का महत्वपूर्ण कारक कहीं जा सकती हैं। आज भारत ही नहीं, वरन् सभी अविकसित एवं कुछ विकसित देशों में बेकारी की समस्या बढ़ती जा रही है।

4. गतिशीलता - आधुनिक युग में यातायात के साधनों के विकास एवं औद्योगीकरण के फलस्वरूप व्यक्ति को अपने घर से बाहर रहकर जीविकोपार्जन करना पड़ता है। इसके कारण व्यक्ति परिवार से अधिक समय के लिए बाहर रहता है, जिससे उसमें अलगाव की प्रवृत्तियों बढ़ जाती हैं और सामाजिक विघटन होने लगता है। 


5. श्रम समस्यायें - आधुनिक समाज में श्रम समस्यायें भी सामाजिक विघटन का कारण कही जा सकती है। श्रमिक क्षेत्रों में अशान्ति सामाजिक सुरक्षा का अभाव, श्रमिक आवास समस्या, वर्ग संघर्ष आदि अनेक समस्यायें उत्पन्न कर देते हैं।

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