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सैन्धव सभ्यता कालीन धर्म की प्रमुख विशेषता

सैन्धव सभ्यता कालीन धर्म की प्रमुख विशेषता 

सन् 1922-23 ई. में होसिम पाटी की सभ्यता का पता चलाया को खोजने का श्रेय राखलदास बनर्जी और दयाराम पानी को जोडणार मोहनजोदड़ों में खुदाई करवाकर इस प्राचीन सभ्यता की जानकारी [संमार] क से लाये। यह अब तक ज्ञात भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता थी। इससे पूर्व आर्या की सताही भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता माना जाता था खुदाई से प्राप्त सामत्रियो विशेष गतियों, ताबीजों, खिलौनों व अन्य सामानों से हमें सैन्धव सभ्यता के सामाजिक, आर्थिक व पार्मिक जीवन के विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है ।

सैन्धव कालीन धर्म की विशेषताएँ

सैन्धववासी प्रकृति के पुजारी थे। थे अग्नि, वृक्ष, जल, अणु एवं मानृदवी की आराधना करते थे। इस बात का प्रमाण सैन्धव सभ्यता के पुरास्थता के उत्मनन में प्रप्त मूर्तियों एवं मुहरों से मिलती है। इन प्राप्त मुहरों मूर्तियों एरव अन्य तित्रात्मक वस्तुओं का अध्ययन करने के पश्चात सैन्धव सभ्यता की जा रूपरेखा हमारे सामने आती है, सका

विवरण इस प्रकार है- 1. मातृदेवी की अराधना- सैन्धव समाज मातृ सतात्मक था। यहाँ देवी की अराधना की जाती थी। जिसका प्रमाण हड़प्पा, मोहनजोदड़ों एवं अन्य पुरास्थलों से प्राप्त मात्देवी क. संख्य मूर्तियों से मिल जाता है। सिन्धु सभ्यता से प्राप्त मृण्मूर्तियों में शिशु को दूध पिलाने हु नारी को दिखाया गया है। मातृदेवी को सृष्टिकर्ती एवं बनस्पतियों की अधिष्ठात्री के कर में भी दिखाया गया है, एक मुर्ति में स्त्री के गर्भ से एक पौधे को निकलता हआ दिखाया गया है, जो मातृदेवी को उर्वरता के प्रतीक के रूप में दिखाता है। मोहनजोदड़ों से प्राप्त एक मूर्ति में मातृदेवी के सिर पर एक पक्षी पंख फैलाये वैठा है इससे पता चलता है कि मातृदेवी का आधिपत्य पशु-पक्षियों पर भी था। एक मुहर पर प्राप्त चित्र को देखने से पता लगता है कि सम्भवतः मातृदेवी को प्रसन्न करने के लिए नरबलि भी दी जाती थीं। मातृदवी सिन्धु-सभ्यता की प्रमुख देवी के रूप में विभिन्न स्वरूपों में वृषिगोपर होती है। 

2. शिव आराधना-सैन्धव सभ्यता में शिव की अराधना की जाती थी। विभिन्न रूपों की मूर्तियों एवं मोहरों में चित्र प्राप्त हुए है। इन मूरया में सबसे प्रमुख की मुद्रा में बैठे हुए विभूति का चित्र है। एक महर पर तीन गुण और दो सांगोवाले योग मुमा अंकित है, जो पासणी मारकर बैठा हुआ है। इसके चारों तरफ क्रमशः हाथी, पाप तथा भस खड़े हैं। योगी के आसान के नीचे दो मृगों की आकृतियों है। ये जानवर देव वाहन के रूप में रहे होंगे। इस मूर्ति को पुरातत्येता योगीश्वर एवं पशुपत शिव की मानते हैं।

3. वृक्ष की आराधना- वृक्ष की आराधना भी सैन्धव सभ्यता में विद्यमान थी। गृक्षों में पीपल और नीम की सर्वाधिक अराधना की जाती थी। क्योंकि अनेक मुहरों पर वृक्षों के तथा इनसे सम्बद्ध देवी-देवताओं के चित्र उत्कीर्ण किये गये थे मोहनजोद प्राप्त एक मुहर में दो जुड़वा पशुओं के सिरों पर पीपल की पत्तियाँ दिखायी गयी है। अन्य मुहर में पीपल की डालों के बीच एक देवता का भी चित्र है, जिसकी आराधना के स्खो मूर्तियों कर रही है। इनमें एक पशु का भी चित्र है जिसकी आकृति बैल और बकरी मिलती-जुलती है। यह सम्भवतः पीपल-देवता का चित्र है तथा सात स्त्री मूर्तियाँ, शीला माता एवं उनकी बहनों की प्रतीक है।

4. पशु एवं नाग की आराधना- सैन्धववासी नागों एवं पशुओं को भी आर मानते थे। प्रायः इनकी आराधना डर से या इन्हें देवताओं का वाहन मानकर की जाती है मुहरों पर अनेक पशुओं के चित्र मिले हैं। कुछ पशुओं की मूर्तियाँ भी मिली है। मानव । पशुओं की आकृतियों को मिलाकर अनेक मूर्तियाँ बनायी जाती थीं। इससे स्पष्ट होता है सिन्धुवासी इनमें देवत्व के अंश की कल्पना कर इनकी पूजा करते थे। पशुओं में सब प्रमुख कूबड़ और साड था। शिव के साथ दिखाये गये पशुओं (बाघ, भैंस, गैंडा) की भी पू की जाती थी। नागपूजा की प्रथा भी प्रचलित थी।

5. जल एवं प्रतीक पूजा- सैन्धव सभ्यता में लोग जल की भी अराधना करते नदियों ने प्राचीन सभ्यताओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, अतः इनकी प्र असम्भव नहीं लगती। स्नान को धार्मिक अनुष्ठान का दर्जा दिया गया था। मोहनजोदड़ों विशाल स्नानागार इसी उद्देश्य से बनवाया गया था। इनके अतिरिक्त श्रृंगस्तम्भ अ स्वस्तिक के चित्र भी मुहरों पर मिले हैं. जो सम्भवतः किसी देवी-देवता के प्रतीक-रूप । पूजे जाते होंगे। लोयल और कालीबंगा से यज्ञ-वेदिकाएं भी मिली है। इनसे अग्निपुजा अलि की प्रथा का प्रमाण मिलता है।

6. लिंग एवं योनि पूजा- लिंग एवं योनि की आराधना भी सैन्धववासी किया का दे। इसके द्वारा वे ईश्वर की सार्वजनिक शक्ति के प्रति अपनी शक्ति की भावना प्रकट का थे। यह भी सम्भव है कि लिंग-पूजा का सम्बन्ध शिव-पूजा से रहा हो। हडप्पा मोहनजोदड़ों से बड़ी संख्या में पत्थर, चीनी मिट्टी तथा सीप के बने लिंग मिले हैं। नि छोटे और बड़े दोनों आकारों में पाये गये हैं। बड़े लिंगों को किसी निश्चित स्थान प्रतिष्ठित कर पूजा जाता होगा तथा छोटे लिंगों को ताबीज के रूप में साथ रखा जाता होम इनसे वरी शक्तियों सुरक्षा होती होगी। पत्थर की बनी योनियों भी निली है जिनकी होनी थी। इन प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिन्धुघाटी वाले सम्भव मूर्ति-पूजा में भी विश्वास रखते थे।

7. अन्त्येष्टि क्रिया की प्रथा- सिन्धु सभ्यता की निवासियों की शव विस प्रणाली पर भी खननों से कुछ प्रकाश पड़ता है। 

प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर यह कहा  है कि प्रकार से मृतकों का संस्कार करते थे। वे तीन विधियां निम्नलिखित है। 

(1) पूर्ण समाधिकरण की प्रथा- इस प्रथा के अनुसार शव को जमीन में दफनादिया जाता था। मृतकों के साथ उनके प्रयोग की आवश्यक वस्तुएँ भी रख दी जाती थीं।

 (2) आंशिक समाधिकरण- इस विधि में शव को कुछ समय तक किसी खुले स्थान पर रख दिया जाता था। पशु-पक्षियों के खाने के पश्चात् बचा हुआ अवशेष दफना

(3) दाह-कर्म की प्रथा- इस व्यवस्था के अनुसार शव को अग्नि के सुपुर्द कर दिया पाला भरमावशेषों को मिट्टी के पात्रों में रखकर कभी-कभी दफना भी दिया जाता था। इस प्रकार सिन्धु घाटी के निवासियों की धर्म पर बहुत आस्था थी। यद्यपि इस सभ्यता या धान्त बहुत पहले ही हो गया था तथापि इस सभ्यता की धार्मिक मान्यताओं को कुछ परिवर्तित रूप में वर्तमान हिन्दू धर्म में देखा जा सकता है।

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