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राष्ट्रीय एकता का अर्थ

राष्ट्रीय एकता का अर्थ 


भारत में राष्ट्रीयता का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। इसके विकास के मार्ग में आज निम्न कठिनाइयां है। इन्हें दूर किये बिना राष्ट्रीयता की भावना का विकास असम्भव है। 


1. प्रान्तीयता - आज भारत में प्रान्तीयता अथवा क्षेत्रीयता का बोलबाला है। प्रत्येक राज्य अपने को श्रेष्ठ समझता है और अन्य राज्यों को घृणा की दृष्टि से देखता है। प्रत्येक राज्य अपने लिए विशेष अधिकार चाहती है तथा केन्द्रीय शासन स्तर पर अपनी सत्ता चाहता है और यह चाहता है कि देश का शासन एवं नीति का निर्माण उसकी इच्छा के अनुसार हो। भाषा एवं संस्कृति के आधार पर नये प्रान्तों की मांग का, अभी तक अन्त नही हुआ है। हमें कश्मीर चाहिए, हमें पंजाब चाहिए, हमें बुन्देखण्ड चाहिए, इस प्रकार की मांग बढ़ती जा रही है। क्यों इन्हें भारत नही चाहिए? नये राज्यों की स्थापना के हेतु आये दिन विस्फोट होते रहते हैं। इस संकुचित प्रान्तीयता की भावना के कारण राज्यों के बीच वैमनस्य की वृद्धि हो रही है और केन्द्र को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है। इसके फलस्वरूप देश की एकता पर कुठाराघात हो रहा है। 


2. सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति - राष्ट्र का उत्थान सामाजिक एवं आर्थिक दशा पर निर्भर करता है परन्तु हमारे देश की सामाजिक एवं आर्थिक दशा खराब है। समाज में अनेक कुरीतियां एवं अन्धविश्वास फैले हुए है जो सामाजिक उन्नति में बाधक है और राष्ट्र को पतन के गर्त में ढकेल रहे हैं। यही दशा हमारी आर्थिक स्थिति की है। देश में चारों ओर गरीबी फैली हुई है। नागरिकों के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या जीविकोपार्जन की है और इसके लिए वे अनैतिक कार्य करने से नहीं चूकते। इन बातों में उलझे रहने के कारण व्यक्ति के पास राष्ट्र के सम्बन्ध में सोचने का समय ही नही है। अतः देश में राष्ट्रीयता की भावना की कमी के कारण देश की गरीबी तथा सामाजिक दोष है। जब तक इन दिशाओं में सुधार नहीं होगा तक तक राष्ट्रीयता के विकास का लक्ष्य पूर्ण नही हो सकता। 


3. साम्प्रदायिकता - भारतवर्ष में विभिन्न साम्प्रदाय है, जैसे- हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी आदि। इन सम्प्रदायों के भी उपसम्प्रदाय है। एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को हेय एवं निकृष्ट समझता है और इसके अनुयायियों को हीन दृष्टि से देखता है। एकता और समानता के भावों का अभाव होने के कारण ये सम्प्रदाय लड़ाई-झगड़ों में व्यस्त रहते हैं और अपने सम्प्रदायों की उन्नति के लिए साम्प्रदायिकता के आधार पर कार्य करते हैं । इसके कारण हमारे देश में राष्ट्रीयता की भावना नही पनप पा रही है अतः राष्ट्रीयता की भावना के विकास के लिए हमें अपना साम्प्रदायिक दृष्टिकोण त्यागना होगा और राष्ट्रीयता के आधार पर कार्य करने होंगे। 


4. भाषावाद - यद्यपि हमारे संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है परन्तु इसके साथ अनेक क्षेत्रीय भाषाओं को भी मान्यता दी गयी है। इस कारण हमारे देश के नागरिक क्षेत्रीय भाषाओं की संकीर्णता में फंसे हुए है और राष्ट्रभाषा की अवहेलना कर रहे हैं। भाषा के नाम पर दिन-प्रतिदिन झगड़े हो रहे हैं। पंजाब, आसाम, आंध्र तथा मद्रास में अनेक घृणित घटनायें हुई है। दुःख की बात यह है कि कुछ स्वार्थी पुरूषों ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए भाषा के प्रश्न को अत्यन्त जटिल बना दिया है। 


अतः इस सम्बन्ध में कुछ भी निर्णय लेना कठिन हो गया है। इस प्रकार भाषा का प्रश्न अथवा भाषावाद हमारी राष्ट्रीय एकता को निर्वल बना रहा है। यदि हम ऐसी स्थिति से बचना चाहते हैं और राष्ट्रीय एकता प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें भाषा सम्बन्धी विरोधं को समाप्त करना होगा और राष्ट्र भाषा की शिक्षा समस्त नागरिकों को अनिवार्य रूप से देनी होगी। यदि ऐसा न किया गया तो राष्ट्रीयता की भावना का विकास यदि असम्भव नही तो कठिन अवश्यक है। स्पष्ट है कि भावना का विकास एक राष्ट्रभाषा द्वारा ही हो सकता है। 


5. धर्म एवं जाति - भारतवर्ष में अनेक धर्मों एवं जातियों का देश है। भिन्न-भिन्न धर्म को मानने वाले तथा विभिन्न जातियों के व्यक्ति अपने धर्म और जाति को दूसरों के धर्मों एवं जातियों से उच्च मानते हैं तथा उनके लिए सब कुछ करने को तैयार रहते हैं। दूसरे शब्दों में अपने धर्म और जाति के नाम पर वे पक्षपात करने से नहीं चूकते जिससे राष्ट्र का अहित होता है। आजकल चुनाव भी धर्म एवं जाति के नाम पर लड़े जा रहे हैं। अच्छे पदों पर नियुक्त एवं पदोन्नति में भी जाति और धर्म का विशेष ध्यान रखा जाता है । ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार और विकास कैसे सम्भव हो सकता है? 


6. राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का अभाव - हमारे देश में राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का अभाव है। शिक्षा को राज्य का विषय माना गया है। इस नियम के अनुसार प्रत्येक राज्य अपनी-अपनी आवश्यकता एवं शक्तियों के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था करता है। इससे बालकों के विचार तथा भावनाएं राष्ट्र की ओर प्रेरित न होकर राज्य तक सीमित रह जाती है। अतः उनके अन्दर राष्ट्रीय भावनाएं विकसित नही हो पाती है जिसके फलस्वरूप राष्ट्रीय एकता की भावना को बल नहीं मिलता। 


7. राजनैतिक दल - एक प्रजातन्त्रीय शासन में राजनैतिक दलों का होना आवश्यक है, क्योंकि ये ही दल जनमत का निर्माण करते हैं और नागरिकों में राजनैतिक चेतना का विकास करते हैं और ये दल राजनैतिक विचारधाराओं के आधर पर बनते हैं। परन्तु खेद का विषय है कि हमारे देश में ये दल जाति एवं धर्मों के आधार पर बनते हैं और जाति, धर्म तथा क्षेत्र के आधार पर वोट मांगी जाती है इस प्रकार ये राजनैतिक दल जनता में क्षेत्रीयता, जातीयता एवं साम्प्रदायिकता फैलाते हैं। ये दल कभी नये प्रान्त की मांग करते हैं और कभी किसी प्रान्त के लिए स्वायत्त शासन की मांग करते हैं। इनकी मांगे राष्ट्रीय एकता पर कुठाराघात कर रही है। देश को बिखराव से बचाने के लिए हमें शीघ्र कुछ कदम उठाने होंगे। 


उपाय - शिक्षा द्वारा राष्ट्रीय एकता की बाधाओं को दूर करने के उपाय- राष्ट्रीय एकता अथवा भावात्मक एकता की बाधाओं को शिक्षा द्वारा निम्नलिखित कार्यों से दूर किया जा सकता है - 


(1) विद्यालयों की पाठ्यचर्या में परिवर्तन किया जायें और उसे देश की वर्तमान स्थिति एवं उनकी आवश्यकताओं के अनुकूल बनाया जाये। 


(2) पाठ्य पुस्तकों में आवश्यक संशोधन किये जायें और उनकी सामग्री को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाये कि वे भावात्मक एकता के विकास में सहायक हों। 


(3) पाठ्यचर्या में सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्व की पाठ्यचारी क्रियाओं को विशेष रूप से स्थान दिया जाये। वर्ष में कम से कम चार बार राष्ट्रीय भावना पर नाटक खेले जाने चाहिए। 


(4) विश्वविद्यालयी स्तर पर विभिन्न सामाजिक विज्ञान, भाषाएं, साहित्य संस्कृति और कला के अध्ययन की व्यवस्था की जाये। 


(5) प्राथमिक स्तर की पाठ्यचर्या में कहानी, कविता और राष्ट्रीय गीतों को स्थान दिया जाये और सभी स्तरों पर सामाजिक विषयों के अध्ययन पर बल दिया जाये। 


(6) अहिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी को लोकप्रिय बनाया जाये और इसके लिए हिन्दी पुस्तकें क्षेत्रीय लिपियों में तैयार की जाये और समस्त भारतवर्ष में अन्तर्राष्ट्रीय अंकों का प्रयोग किया जाये। 


(7) छात्रों को देश-भ्रमण और अन्तर संस्कृति विकास के अवसर दिये जाये। 


(8) शिक्षकों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर अन्य नगरों से ट्रांसफर किया जाये जिससे उनका ध्यान अपने अध्यापन कार्य और छात्रों के हित की ओर केन्द्रित हो जाये। 


(9) प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक और माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापकों के लिए समान देश में समान वेतन की व्यवस्था की जाये। 


(10) विद्यालयों में राष्ट्रीय पर्वो, 26 जनवरी, 15 अगस्त और 2 अक्टूबर को बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाये। 


(11) युवक कार्यक्रमों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए अखिल भारतीय युवक समिति की स्थापना की जाये। 


(12) विद्यालयों में समय-समय पर भावात्मक एकता पर भाषणों का आयोजन किया जाये। 


(13) विश्वविद्यालयों में आपस में शिक्षकों का आदान-प्रदान किया जाये।

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