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प्राचीन चीन की धार्मिक क्रिया कलापों

 प्राचीन चीन की धार्मिक क्रिया कलापों 

 प्राचीन चीन में शांग कालीन धर्म मुख्य रूप से पूर्वजों अथवा पितरों की पूजा से सम्बन्धित था। इसके मूल में शायद इनकी पितृसत्तात्मक पारिवारिक व्यवस्था ही थी। आगे चलकर चीन में कन्फ्यूशियसवाद, ताओवाद एवं बौद्ध धर्म विकसित अवश्य हुए पर तीनों में पितर-पूजा का विशिष्ट महत्व रहा। ये मानते थे कि मृत्यु के बाद प्राणी एक आत्मा का रूप ले लेता है, जिसकी शक्ति अपरिमित होती है। खेती, शिकार तथा युद्ध में सफलता इसकी कृपा पर ही निर्भर करती है। अप्रसन्न होने पर ये महामारी, अकाल, पराजय, मृत्यु आदि के कारक बनते हैं। ये लोग पितृ-पूजा के भय के साथ-साथ पितरों के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने के लिए भी करते थे । पूर्वजों के साथ-साथ ये अनेक देवी-देवताओं की भी उपासना करते थे। इनमें प्रधान शांग ती था। शांग ती का अर्थ है "ऊर्ध्वं लोक का शासक"। फसल, वर्षा, सौभाग्य आदि का प्रेरक एवं कारक यही देवता था। ये लोग पृथ्वी, सूर्य, नक्षत्र, चन्द्रमा, वायु आदि प्राकृतिक शाक्तियों की भी पूजा करते थे। पूर्वजों, देवताओं एवं प्राकृतिक शक्तियों को प्रसन्न करने के लिये पूजा, बलि, नृत्य, संगीत आदि का सहारा लिया जाता था इसे आमतौर पर पुरोहितों की सहायता से किया जाता रहा होगा। 


प्राचीन चीन को ( शांग कालीन) - धार्मिक मान्यताओं एवं विश्वासों में बलि एवं दिव्य वाणियों, को विशिष्ट महत्व मिला था ये देवताओं से यह जानने का प्रयास करते थे कि भविष्य में इसके साथ कौन सी घटना घटेगी शिकार करने, यात्रा पर जाने, युद्ध प्रारम्भ करने तथा बीमार होने पर देवताओं से जानना चाहते थे कि कब और क्या करने से, इन्हें सफलता मिलेगी तथा रोग से छुटकारा मिलेगा। ये देवताओं से वर्षा, ओला, कुहरा आदि के विषय में भी जानकारी प्राप्त करना चाहते थे। इस कार्य में पुरोहित तथा दिव्यवक्ता इनकी मदद करते थे। इनका विश्वास था कि ये देवताओं से धनिष्ठ रूप से जुड़े रहते हैं, अतः इन्हें उनकी इच्छा की भली-भाँति जानकारी रहती है। प्रश्नकर्ता इन दिव्य व्यक्ताओं से प्रश्न पूछता था तथा दिव्य वक्ता जानवरों की हड्डियों के माध्यम से प्रश्न का उत्तर देता था। इन हड्डियों में छेद कर दिये जाते थे जब इनसे आग की लपटें निकलती थीं तो हड्डियाँ कड़कती थीं। इसी से दिव्य वक्ताओं को प्रश्नों का उत्तर मिल जाता था दिव्य वक्ताओं का समाज में बड़ा मान सम्मान था। 


इस काल में बलि को भी विशेष महत्ता मिली थी। इनका विश्वास था कि बलि से पूर्वजों तथा देवताओं को भोजन मिलता है। बलि मुख्य रूप से शराब, गाय, बैल, भेड़, सुअर तथा कुत्ते की दी जाती थी। इसे खुले स्थानों पर मन्दिरों में दिया जाता था। आमतौर पर बसन्त बन्तु में फसल बोते समय तथा हेमन्त ऋतु में फसल काटते समय, इसे सम्पन्न करते थे। शराब को जमीन में गिरा कर तथा पशुओं को आग में जलाकर, ज़मीन में गाड़ कर अथवा पानी में डुबो कर बलि दी जाती थी। इस कार्य में खास किस्म के पुरोहित लगाये जाते थे। चीनी विद्वानों के अनुसार शांग काल में नरबलि की प्रथा प्रचलित नहीं थी, परन्त यह ठीक नहीं है। उपलब्ध साक्ष्यों से अमानुषिक होते हुए भी इस प्रथा के अस्तित्व में संदेह की तनिक भी गुंजाइश नहीं रह जाती । कभी-कभी तो एक सौ से तीन सौ तक व्यक्तियों को बलि पर चढ़ा दिया जाता था। आमतौर पर इसके लिये युद्ध-बंदियों का उपयोग किया जाता था। नरबलि में प्रायशः उपयोग की जाने वाली एक जाति चियांग थी। ये मूलतः पश्चिमी प्रदेशों के गड़ेरिये थे। ये लोग भेड़ पालते थे चीनियों के इनसे प्रायः संघर्ष होते रहते थे तथा ये युद्धबंदी के रूप में पकड़ कर लाये जाते थे। 


अन यांग के उत्खननों से उपलब्ध समाधियों से शांग कालीन मृतक संस्कार पर कुछ प्रकाश पड़ता है। ये मृतकों को पहले एक चटाई, फिर, कपड़े में लपेट कर जमीन में दफनाते थे। इनका विश्वास था कि मृतात्माएं अन्तरिक्ष में रहती हैं तथा उन्हें उन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है, जिन्हें वे लौकिक जीवन में चाहती है। इस विश्वास मृतकों के साथ अनेक प्रकार की वस्तुएं जैसे फर्नीचर, मिट्टी तथा कांसे के बर्तन, शिरस्वाण कारण ये तथा औजार दफनाते थे। इनकी संख्या तथा गुणवत्ता का निर्धारण मृतक के स्तर के मुताबिक किया जाता था। इस काल की समाधियाँ, यद्यपि मिस की समाधियों के समान विशाल न थीं, तथापि इनका बनाना कठिन काम था। कनों की दीवारों पर सुन्दर चित्रकारी की जाती थी तथा शव के साथ विविध सामग्री रख कर इसे मिट्टी से पूरी तरह से भर दिया जाता था। राजाओं के मृतक संस्कार में बलि देने की प्रथा भी प्रचलित थी।

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