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पारसीक कला की प्रमुख विशेषतायें

पारसीक कला की प्रमुख विशेषतायें  

पारसीक कला की विशेषताएं-पारसीक कला में विभिन्न कलाओं का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। ईरानी काफी शौकीन और सुन्दर वस्तुओं को पसन्द करने वाले थे। उनके मकान बहुत सुन्दर होते थे। वे अपने शरीर पर बहुमूलय वस्तुओं और आभूषणों को पहनते थे तथा अपने घरों को फर्नीचर, रंग-बिरंगे दरियों और तरह-तरह के बर्तनों से सजाते थे। वे फूलदान का प्रयोग भी करते थे। आभूषणों का प्रयोग स्त्री और दोनों ही करते थे। उनके आभुषण उनकी कला के सुन्दर नमूने हैं। मुख्य आभूषण थे टायरा, पुरुष कर्णफूल और पायजेब इन आभुषणों के निर्माण लिये वह दूर देशों से नीलम और अन्य पत्थर मँगाते थे। सामन्त लोगों की अंगूठियाँ 'टरकोप' पत्थर की बना होती थी जो फारस की खानों से प्राप्त होता था। उनके आभूषणों पर कुछ सुन्दर और कुछ भद्दी आकृतियाँ होती थीं। फारस में विभिन्न सभ्यताओं का प्रभाव देखने को मिलता है। इस सम्बन्ध में उदाहरण प्रस्तुत हैं- 


(1) वहाँ की समाधियों पर लीडिया की समाधियों की छाप है।

(2) पींपोलिस और सूसा के भवनों का आधार मिस्र की कला है।

(3) कृत्रिम चबूतरों और सीढ़ियों पर असीरिया की छाप है। 

(4) ईंटों का प्रयोग मेसोपोटामिया की प्राचीन परम्परा की भांति है।

(5) स्तम्भों के शीशे के नीचे के भाग का अलंकरण यूनानी प्रभाव से रहित नहीं कहा जा सकता। 


अतः यह कह सकते हैं कि विभिन्न कलाओं का सम्मिश्रित रूप ही ईरान की राष्ट्रीय सम्पत्ति बन गया। पारसीक कला असाम्प्रदायिक कला है। वह कला धर्म के आश्रय में न पनप कर राजाओं के आश्रय में पनपी है। प्रसिद्ध विद्वान हुआर्ट ने इस कला का वर्णन करते हुए लिखा है, "पारसीक कला एक सम्मिश्रण पूर्ण (Composite) कला थी। उसका उद्भव राजा की कल्पना से हुआ था- उस कल्पना में, जिसने साम्राज्य की भाँति ही, असीरिया, मित्र और एशियायी यूनान में प्राप्त अपने को प्रभावित करने वाली प्रत्येक कला शैली का एक कृत्रिम सबल एकता के सूत्र में संगठिन कर दिया था। वह विशालता अनुरागी सर्वशक्तिमान सम्राट की आसक्ति का प्रतिरूप थी। 


ईरानी कला का सुन्दरतम रूप उसकी वास्तुकला में निहित है, साइरस, डेरियस महान् और अन्य खामोशी सम्राटों ने अनेक महलों और समाधियों का निर्माण करवाया जो अपनी सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। 


पेसरगेड (Pasrgade )-ईरानी कला में मन्दिरों आदि का निर्माण न होकर राजमहलों और समाधियों आदि का निर्माण हुआ था। पेसरगेड हखास्दायों के प्रान्त फर्स (पारसिस) की राजधानी थी। यहाँ सम्राट साइरस की एक समाधि प्राप्त हुई थी। सात चबूतरों पर 140 फीट लम्बा, 116 फीट चौड़ा और 35 फीट ऊँचे एक भवन था जिसकों छोटे-छोटे धातु के टुकड़ों और पत्थर से बनाया गया। ऐसा विश्वास है कि यूनानी कारीगरों द्वारा निर्माण किया गया था। इसके सब ओर उळंचे-उळचे खम्भे थे जो अब नष्ट हो चुके हैं। फारस के लोग प्राचीन काल में इसे "माशशद-ई-महारसुलेमान" के नाम से पुकारते थे। 


इसके अतिरिक्त 300 फीट लम्बा एक चबूतरा भी मिला जो पत्थर का बना हुआ है एवं जिसमें धातु के टुकड़ों का भी प्रयोग हुआ है। यह 'तखे-सुलेमान' के नाम से पुकारा जाता है। साइरस की समाधि के समीप एक स्तम्भ बना हुआ है जिस पर एक पंख वाली मूर्ति बनी हुई है। यह 'सम्राट सारईस की पंख वाली मूर्ति के नाम से प्रसिद्ध है। इसमूर्त में विभिन्न कलाओं का सम्मिश्रण परिलक्षित होता है। मूर्ति के मुकुट और सिर पर मिल की कला, पोशाक और पंखों पर असीरियन कला और चेहरे पर भारतीय कला की छाप है। ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन इतिहासकारों द्वारा इस मूर्ति के नीचे 'मैं कुरूप हखम्शी राजा हूं लिखा हुआ पाया गया था। परन्तु अब वह मिट गया है। 


पर्सीपोलिस - पर्सीपोलस के खण्डहर भी ईरानी कला की सुन्दरता का गुणगान कर रहे है। यह साम्राज्य की राजधानी थी अतएव इस युग के सभी प्रमुख शासकों ने यहाँ अपने महलों का निर्माण कराया। इसमें सबसे प्रसिद्ध भवन, 'तख्ते-जम-द' हैं जो चूने और पत्थर से बनया गया था। इसके दोनों और सीढ़ियाँ बनी हैं जो इतनी चौड़ी हैं कि उन पर धुडसवार आसानी से चल सकते थे। इसकी निर्माण-कला पर भी असीरिया कला का प्रभाव प्रतीत होता है। सीढ़ियों को मिलने वाले स्थान पर अन्दर घुसने का रास्ता है जिसके दोनों और पंख वाले बैलों की मूर्तियां बनी है। बैलों के सिर मनुष्य जैसे हैं। सम्राट जेरक्सीज के एक महल का क्षेत्रफल 15000 वर्गफीट है। इस महल में 62 खम्भे हैं। हाल के सभी भाग संगमरकर या पत्थर के हैं। इन खम्भों में से 13 खम्भे आज भी विद्यमान है। खम्भों के नीचे के खम्मे पर उल्टे कमल और घण्टे की आकृति बनी है और शीशे पर यहाँ की कला की छाप है। इस कक्ष के पीछे एक और कक्ष है जिसके द्वार मण्डप पर बने चित्र सजीव और सुन्दर हैं। 


जेस्क्सीज के महलों के पश्चात् सपाट डेरियस के महत्व परिलक्षित होते हैं। जारक्सस की 'चेल्सिमीनार' के पूर्व में 100 खम्भों वाला एक विशाल हाल है। कहा जाता है कि जब सिकन्दर ने ईरान पर आक्रमण किया था उसने इस हाल में बैठ कर भोजन किया था। हाल के उत्तर के एक पोर्टिकों में एक मनुष्य की मूर्ति बनी हुई है, जो ईरानी कला की निश्चित रूप से हमारे सामने रखती है। यहाँ पर डेरियस महान् की मूर्ति मिली हैं जिसमें उसे सिंहासन पर बैठा हुआ दिखाया गया है। 


सूसा और एकबटना - हखाम्शी राजाओं ने एकबटना में जो महल बनवाये के काठ के बने हुए थे। अतः पूर्णरूप से विलुप्त हो गये है। सूसार सम्राट जारक्सस द्वितीय ने जो महल बनवाये उसके अवशेष अब भी प्राप्त होते हैं। सूसा का साम्राट जारक्सस के महल सुनदर था। इस महल में दो चित्र बने हुए थे जिनमें पहला चित्र बहुत प्रसिद्ध है। यह चित्र 5 फीट ऊँचा है जिसमें सम्राट के अमर सैनिकों को चित्रित किया गया है। यह सैनिक दरबायों के रूप में एक कतार में खड़े हुए चित्रित किये गये थे। दूसरा चित्र Eirez of the Achers भी अति सुन्दर है। इस चित्र में शिकार के लिये तैयार सिंहों का चित्रण किया गया है दोनों ही चित्र पेरिस संग्रहालय में अब भी देखे जा सकते हैं । मकबरे-डेरियस महान् और उसके उत्तराधिकारियों ने पर्वतों को काटकर अनेक मकबरे बनवाये। इन मकबरों में कुरूप द्वितीय और डेरियस महान् द्वारा बनवाये हुए मकबरे अधिक प्रसिद्ध है। डेरियस महान् का मकबरा 60 फीट लम्बा और 20 फीट चौड़ा है। इस मकबरे में एक सिंहासन है जिस पर डेरियस महान् धनुष-बाण लिये बैठा है। वह अपना बायाँ हाथ अहुरमज्दा के नमस्कार के लिये ऊपर उठाये है। इन मकबरों की कला में मिस्र की कला की छाप स्पष्ट प्रतीत होती है। 


मुहरों की खुदाई (Glyptic Art) - इस काल में भी पारसी बहुत अधिक पटु थे। इस युग में सील एवं मुहरों का प्रयोग बहुत अधिक होता था। आज भी उनकी कला यथावत् बनी है। ईरान की बनी हुई मुहरें-आज भी बहुत सुन्दर मानी जाती हैं। सोने के आभूषण बनवाने की रूचि भी हँखाम्शी सम्राटों को थी। इन आभूषणों में नीलम का भी प्रयोग होता था। इस कला के कुछ नमूने प्राप्त हुए हैं जिनमें से मुख्य हैं पारसीक रथ को एक नमूना “चाँदी का एक चक्र और सोने का एक पात्र।" चाँदी का चक्र तो देखते ही बनता है। इस चक्र पर सोने की पतर चढ़़ी हुई। और उसके चारों किनारों पर शिकारियो के चित्र बने हुए हैं। सोने के पात्र की मूठ बहुत सुन्दर है और उस पर एक शेर का मस्तक अंकित किया गया है। पुनश्च उपरोक्त विवरण के आधार पर यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि हखाशी शासकों का युग ईरानी कला की समुन्नति और विकास की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण था।

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