सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

निर्धनता के दुष्परिणाम

निर्धनता के दुष्परिणाम 


भारत में निर्धनता एक प्रमुख समस्या बनकर हमारे सामने उपस्थित हुई जो समाज में अनेक कुरीतियों को जन्म दे रहा है। इसी कारण निर्धनता को सभी बुराईयों की जड़ कहा जाता है। निर्धनता से होने वाले प्रमुख प्रभाव अथवा दुष्परिणाम निम्नवत हैं - 


(1) परिवार का विघटन–निर्धनता का एक बड़ा दुष्परिणाम परिवारों का विघटन होना है। निर्धनता की स्थिति में परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे पर अविश्वास करने लगते हैं। घर में कलह का वातावरण बना रहता हैं और कभी-कभी परिवार अनैतिकता का भी केन्द्र बन जाता है। ऐसी स्थिति में सदस्यों में पारस्परिक प्रेम समाप्त हो जाता है और सभी लोग अपने-अपने स्वार्थों को पूरा करने में लग जाते हैं। परिवार में निर्धनता के कारण पति-पत्नी के बीच विवाह-विच्छेद हो जाने की सम्भावना भी बढ़ जाती है। 


(2 ) चरित्र का पतन - निर्धनता चरित्र को गिराने वाला सबसे प्रमुख कारण है। निर्धनता के कारण जब परिवार की आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं तो साधारणतया स्त्रियों को भी जीविका की खोज में घर से बाहर निकलना पड़ता है। बहुत-से व्यक्ति उनकी असमर्थता का लाभ उठाकर अथवा उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर अनैतिक कार्यों में लगा देते हैं। इस प्रकार समाज में अप्रत्यक्ष रूप से वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है। वेश्यावृत्ति में लगी अधिकांश स्त्रियों भी आर्थिक कठिनाइयों के कारण ही यह व्यवसाय आरम्भ करती हैं। 


(3) भिक्षावृत्ति को प्रोत्साहन - भिक्षावृत्ति निर्धनता का एक गम्भीर दुष्परिणाम है। कोई व्यक्ति जब किसी भी साधन से जीविका उपार्जित करने में असफल हो जाता है तो उसके सामने भीख मांगने के अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं रह जाता। अक्सर ऐसे परिवारों में बच्चों को भीख मांगने के लिए बाध्य किया जाता है। एक बार जो व्यक्ति भीख मांगने लगता है, वह भविष्य में भी कोई दूसरा कार्य करने योग्य नहीं रह जाता। इस प्रकार उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही विघटित हो जाता है। 


(4) दुर्व्यसनों में वृद्धि - निर्धनता की समस्या ने व्यक्ति में अनेक प्रकार के दुर्व्यसन उत्पन्न किये हैं। निर्धनता के कारण व्यक्ति जब अनेक प्रकार के तनावों और चिन्ताओं में फंस जाता है तो वह अक्सर मद्यपान करने लगता है। बहुत-से व्यक्ति जुआ खेलना आरम्भ कर देते हैं अथवा सट्टा लगाने लगते हैं जिससे वे जल्दी ही अधिक धन प्राप्त कर सकें. यद्यपि ऐसे लोभ से उनकी स्थिति पहले से भी अधिक दयनीय हो जाती है। निर्धनता से उत्पन्न तनाव वेश्यावृत्ति को भी प्रोत्साहन देते हैं क्योंकि इन तनावों के कारण व्यक्ति उचित और अनुचित का ध्यान नहीं रख पाता। 


(5) मानसिक प्रभाव - निर्धनता के कारण व्यक्ति का मानसिक पतन हो जाता है। वह सोचने-समझने की शक्ति खो बैठता हैं, इस स्थिति में वह कोई भी अच्छा. बुरा काम करने से नहीं चूकता। गरीबी के कारण व्यक्ति अपने आश्रित बच्चों की शिक्षा व्यवस्था नहीं कर पाता इस कारण उसकी आने वाली पीढ़ी भी मानसिक रूप से कमजोर होती है। 


(6) शारीरिक प्रभाव - निर्धनता और बीमारी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। निर्धनता के कारण अनेक रोग आ घेरते हैं और पैसे की कमी होने के कारण व्यक्ति सही से इलाज भी नहीं करा पाता। लम्बी बीमारी से उसका शरीर क्षीण हो जाता है और भर पेट भोजन न मिलने के कारण समय से पूर्व ही अकाल मृत्यु का शिकार हो जाता है। 


(7) सामाजिक प्रभाव - निर्धन व्यक्ति की समाज में कोई प्रतिष्ठा नहीं होती। निर्धन व्यक्ति चाहे ईमानदार ही हो परन्तु उस पर कोई भरोसा नहीं करता। समाज के अधिकतर अपराधी निर्धन वर्ग से ही होते हैं, क्योंकि निर्धनता के कारण वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सही अथवा गलत कोई भी मार्ग अपनाने से नहीं चूकते।  


(8) निर्धनता की संस्कृति का विकास - आधुनिक समाजंशास्त्रियों का मानना है कि निर्धनता का सबसे बड़ा दुष्परिणाम निर्धन समाज में निर्धनता की संस्कृति का विकसित हो जाना है। यह एक विशेष संस्कृति है जिसमें व्यक्ति अपने आपको अभाव की दशा में रहने के अनुकूल बना लेता है। आस्कर लेविस ने मैक्सिको के अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष दिया है कि निर्धनता की संस्कृति में व्यक्ति केवल वर्तमान के बारे में ही सोचने लगता है, वह भाग्यवादी हो जाता है, उसमें हीनता की भावना प्रबल बन जाती है तथा बच्चों को भी इन दशाओं में रहने का प्रशिक्षण दिया जाने लगता है। सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में इस संस्कृति के लोगों का कोई सहभाग नहीं होता। फलस्वरूप निर्धनता की समस्या एक स्थायी रूप ले लेती है। 


(9) आन्दोलन और वर्ग-संघर्ष - निर्धनता का एक बड़ा दुष्परिणाम समाज में बढ़ते हुए आन्दोलन और वर्ग-संघर्ष हैं। निर्धनता के कारण अधिकांश आन्दोलन किसानों, मजदूरों और जनजातियों, द्वारा ही चलाये जाते हैं। भारत में नक्सलवादी आन्दोलन वर्ग-संघर्ष का परिणाम है जिसने आज हिंसक रूप ले लिया है। 


(10) अपराधों में वृद्धि - निर्धनता से समाज में तरह-तरह के अपराधों में वृद्धि हुई है। साधरणतया कोई व्यक्ति जब ईमानदारी से पर्याप्त साधन प्राप्त नहीं कर पाता तो वह चोरी, डकैती, हत्या, जेवकटी आदि के द्वारा अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयत्न करता है। अपने बच्चों व अश्रितों को भूखे देखकर अच्छे से अच्छा व्यक्ति इन समाज-विराधी कार्यों की और प्रवृत्त हो सकता। है। निर्धनता मानसिक तनावों को बढ़ाकर भी व्यक्ति में अपराध की भावना पैदा करती है। 


(11) बाल-अपराधों में वृद्धि - निर्धन परिवारों में माता-पिता अपने बच्चों की प्रमुख आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाते। साधारणतया ऐसे बच्चे शिक्षा और स्वस्थ मनोरंजन से वंचित रह जाते हैं। अक्सर निर्धन परिवारों में बच्चों से कम आयु में ही नौकरी करवाई जाने लगती है। इसके फलस्वरूप बच्चे आरम्भ से ही अनुशासनहीन हो जाते हैं, उनकी संगति बिगड़ जाती है और इस प्रकार उन्हें अपराधी कार्य करने का प्रोत्साहन मिलता है। एक बार अपराधियों के गिरोह में फंस जाने के बाद ऐसे बच्चे कठिनता से उस वातावरण से बाहर निकल पाते हैं। 


निर्धनता को दूर करने के सुझाव - 


(अ) समाज द्वारा किये जाने वाले उपाय - निर्धनता को दूर करने के लिए समाज को निम्नवत् उपाय करना पड़ता है। 


(1) बेकारी को दूर करना – बेकारी निर्धनता का प्रमुख कारण हैं। सर्वप्रथम इसको के समाप्त किया जाना चाहिए। योजना आयोग अनुसार 8 से 10 प्रतिशत तक वेकारी भारत के नगरों में पाई जाती है। भारत में बेकारी को दूर करने के लिए बड़े प्रत्यन किये जा रहे हैं। 

(2) बेकारी बीमा योजना-समाज को बेकारी बीमा योजना भी लागू करनी चाहिए। क्योंकि इसके ही द्वारा हम बेकार लोगों को तत्काल सहायता कर सकते है। 

(3) उत्पादन में वृद्धि-उत्पादन में वृद्धि किये बिना निर्धनता को समाप्त नहीं किया जा सकता है। भारत में उत्पादन को बढ़ाने के लिए विशेष ध्यान दिया जा रहा है। (4) न्यूनतम मजदूरी का निश्चय-राज्य को न्यूनतम मजदूरी निश्चिय कर देना चाहिए। अधिकांश राज्यों में इसे निश्चित कर दिया गया है, परन्तु मिल मालिक इसे देने में अनेक बाधायें खड़ी करते हैं। सरकार को चाहिए कि इसे कार्यरूप में परिणत करने के लिए सख्त कदम उठाये। 

( 5) सामाजिक बीमा योजना-समाज का यह उत्तरदायित्व है कि वह प्रत्येक सदस्य की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रबन्ध करे यह सामाजिक वीमा योजना के द्वारा ही किया जा सकता है।

(6) मद्य निषेध-सरकार को मद्य निषेध अधिनियम पारित करना चाहिए और कड़ाई के साथ इसे लागू करना चाहिये। मद्यपान निर्धनता का एक बहुत बड़ा कारण है। कुछ राज्यों में इस कानून को पारित किया गया है परन्तु उसमें अनेक दोष हैं।

(7) रहने की समुचित व्यवस्था-निर्धनता को दूर करने के लिए रहने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिएँ। गन्दे पर्यावरण में रहते हुए मनुष्य भी सम्पन्न नहीं हो सकता। 


केन्द्रीय तथा अन्य राज्य सरकारें इस ओर ध्यान दे रही हैं।

टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam 1857 के महान विद्रोह (1857 के भारतीय विद्रोह, 1857 के महान विद्रोह, महान विद्रोह, भारतीय सेप्पी विद्रोह) को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। 1857 आंदोलन एक राष्ट्रीय उभर रहा था, जो भारतीयों के दिल में एक मजबूत आग्रह से प्रेरित था, जिससे देश मुक्त हो गया। यह ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय एकल घटना थी। यह भारत में सदी के पुराने ब्रिटिश शासन का नतीजा था। भारतीयों के पिछले विद्रोहों की तुलना में, 1857 का महान विद्रोह एक बड़ा आयाम था और यह समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की भागीदारी के साथ लगभग अखिल भारतीय चरित्र ग्रहण करता था। यह विद्रोह कंपनी के सिपाही द्वारा शुरू किया गया था। इसलिए इसे आमतौर पर 'सेप्पी विद्रोह' कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ सिपाही का विद्रोह नहीं था। इतिहासकारों ने महसूस किया है कि यह एक महान विद्रोह था और इसे सिर्फ एक सिपाही विद्रोह कहने के लिए अनुचित होगा। हमारे इतिहासकार अब इसे विभिन्न ना