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लाओत्से कौन था उसके प्रमुख दार्शनिक सिद्धान्त

लाओत्से कौन था उसके प्रमुख दार्शनिक सिद्धान्त

कन्ययूशियस के बाद चीनी संस्कृति तथा इतिहास को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला दार्शनिक लाओत्से था। वह कन्फ्यूशियस का समकालीन था जब वह पचास वर्ष का था, तब कन्फ्यूशियस का जन्म हुआ था। लाओत्से का जन्म 604 ई.पू. में होनान नामक प्रान्त में हुआ था। उसका मूल नाम 'ली' था, जिसका अर्थ होता है 'बैर। बाद में उसने 'लाओ' की उपाधि धारण की, जिसका अर्थ है, पुराना आचार्य (वध गुरू)। अतः जिस प्रकार ज्ञान प्राप्त होने पर सिद्धार्थ बुद्ध कहलाये, उसी प्रकार कीर्ति प्राप्त होने पर 'ली' 'लाओत्से' कहलाया। 

लाओत्से ने वृद्धावस्था में ताओ-ते-चिंग' नामक ग्रन्थ लिखा। ताओ का अर्थ मार्ग और ते का अर्थ सदगुण। अतः इस ग्रन्थ का अर्थ 'मार्ग तथा सद्गुण का ग्रन्थ' हुआ। इस अन्य के आधार पर ही चीन में ताओवाद नामक एक नये पंथ की स्थापना हुई। उसने मनुष्य और ईश्वर के बीच सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया। सका मानना था कि वह गहन चिन्तन एवं प्रार्थना के माध्यम से परमात्मा के विषय में जानकारी प्राप्त हो सकती है। उसने लालच को दुख का मूल कारण बताया। लाओत्से ने स्थान-स्थान पर भ्रमण कर अपने ताओवाद का प्रचार किया। रूसो के भाँति वह भी यह मानता था कि प्रकृति ने मनुष्य के जीवन की सरल और शांतिपूर्ण बनाया था, परन्तु मनुष्य ने ज्ञान प्राप्त करके इसे जटिल कर दिया। अगर मनुष्य प्रकृति के जाल को काटकर प्राकृतिक जीवन अपना ले, तो फिर से सूखी हो सकता है।" उसके अनुसार प्रकृति चुपचाप अपना कार्य सम्पन्ना करती है। अतः मानव को भी अपनी प्रकृति के अनुकूल कार्य करते रहना चाहिए। लाओत्तो के अनुसार मनुष्य को भोगविलास को छोड़कर पवित्र सरल एवं शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए। उसका कहना था कि "जो भले हैं, उनके लिए म भला हूँ, और जो भले नहीं हैं उनके लिए भी में भला हूँ। 


ताओवाद के सिद्धान्त - ताओवाद के सिद्धान्त निम्न थे- 


1. शिक्षा के प्रसार का विरोध-लाओत्से ने शिक्षा के प्रसार का विराध किया। उसके अनुसार शिक्षित व्यक्ति स्वार्थी होता है और यह राज्य तथा समाज के लिए संकट पैदा करता है। इसलिए अशिक्षित मनुष्य ही सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है। उसका कहना था-"शिक्षा के प्रसार के साथ मूखों की संख्या बढ़ती है। मान जन राज्य के संकट का कारण बन जाते हैं।" चीन में उसका दर्शन 'अज्ञान के नाम से प्रसिद्ध है। क्योंकि इससे सैकड़ों अशिक्षित लोग उसके अनुयायी बन गये। कहा जाता है कि जब कन्फ्यूशियस कुछ सीखने की अभिलाषा से लाओत्से के पास पहुँचा, तो लाओत्से ने उससे कहा था. "जाओ, अपना अहंकार, वासनाएँ, भोगवृत्ति और महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर दो। ये तुम्हारे लिए हानिकारक हैं। बस मुझे यही कहना है। 


2. प्रकृति के बारे में विचार-लाओत्से और उसके अनुयायी प्रकृति पूजा में विश्वास करते थे। लाओत्से का यह मानना था कि मनुष्य को प्रकृति के नियम के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए. जिससे उसे सुख एवं शान्ति प्राप्त हो सके। वह जीवन की सादगी के लिए शहरी जीवन भी घृणास्पद समझता था लाओत्से राज्य, समाज और कानून को व्यर्थ समझता था। वह राज्य की लुप्ती चाहता था। उसका कहना था कि लोगों के जीवन में राज्य की ओर से कम हस्तक्षेप किया जाय और उन पर कम से कम नियम लागू किया जाए। लाओत्से नैनिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विचारों में कम्प्यूशियस का विरोधी था। सामाजिक उत्थान तथा सभ्यता के विकास में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह मनुष्य को अपनी नैसर्गिक आदिम अवस्था में लौटने का उपदेश देता था । 


3. प्रेम व दयापूर्ण व्यवहार पर बल-लाओत्से ने जनसाधारण को प्रेम और दया का उपदेश दिया, और कहा-"यदि तुम किसी से झगड़ा न करो, तो संसार में किसी को भी तुमसे झगड़ा करने का साहस न हो और यदि तुम्हें कोई चोट पहुँचाए, तो उसका उत्तर दवालुता से दो। संसार में सबसे कोमल वस्तु सबसे कठोर वस्तु से टकराकर उसे परास्त कर देती है।" लाओत्से के अनुसार मनुष्य को आधात का बदला दयालुता से देना चाहिए। डॉ गोयल के अनुसार, "ईसा मसीह के समान लाओत्से का कहना था कि जो तुम्हारे मार्ग में काटे बोये उनके मार्ग में तुम फूल बोओ, क्योंकि दुनिया में क्षमा, प्रेम, धैर्य और शान्ति से बड़ा कोई शस्त नहीं है।" 


4. शान्तिपूर्ण जीवन में विश्वास लाओत्से शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करने में विश्वास करता था। वह समाज व कानून को आवश्यक नहीं मानता था। उसकी रहस्यमय विचारधारा थी और वह भाग्य में विश्वास रखता था। उसका यह मानना था कि यदि भाग्य में लिखा हुआ है, तो हर वस्तु अपने आप मिल जाएगी, उसके लिए काम करने की आवश्यकता नहीं है। उसकी इस विचारधारा से चीन के विकास का मार्ग अवरूद्ध हो गया। वह शान्तिपूर्ण किसान जीवन का पक्षपाती था, जहाँ कम से कम आवश्यकताएँ हो। उसका मानना था कि मनुष्य की बढ़ती हुई आवश्यकताएँ उसके सुन्दर जीवन का अन्त कर देती है। उसका नारा था कि "आन्तरिक शान्ति महान वस्तु है, और 'मनुष्य को सदाचारी होना चाहिए, 'प्राकृतिक जीवन की ओर होना चाहिए।" 


लाओत्से के उपदेश से चीन में ताओवाद नामक एक नया पंथ चल पड़ा। इस धर्म का चीन में काफी प्रचार हुआ। इसमें पुरोहित, मंदिर और मूर्तियाँ भी थी। लाओत्से युद्ध का विरोधी था। उसका मानना था कि युद्ध में व्यक्ति अकारण ही मारे जाते हैं। प्लेट व जीन के अनुसार-"लाओत्से का मानना था कि लोगों को शान्त होना चाहिए कि जब उन पर आक्रमण भी किया जाए, तब भी लड़े नहीं।" 


लाओत्से धन तथा सम्पत्ति को महत्व नहीं देता था। अतः चीन के तमाम दरिद्र और अशिक्षित लोग उसके अनुयायी बन गये। एक अंग्रेज सेनापति ने चीन में युद्ध के मैदान में बैठे-बैठे समस्त चीनी दर्शन पढ़ लिया था। उसने लिखा है "मैं चीनी दर्शन में इतना टूवा उभा था कि मदो तोपों की आवाज तक का पता नहीं चला।" 


लाओत्से की मृत्यु के बाद उसे एक देवता मान लिया गया और उसकी शिक्षाओं में जादू टोने का समन्वय कर दिया गया। प्रो. टर्नर के अनुसार लाओत्से की विचारधारा शहरी सभ्यता की अशान्ति के विरुद्ध किसान प्रतिक्रिया की प्रतीक थी।" एच. जी. वेल्स ने उसके सम्बन्ध में लिखा है, "उसके उपदेशों को भी लोगों ने कथाओं आदि से मिलाकर भ्रष्ट कर दिया और उस पर पेचीदा एवं अनोखे आचारों और मिथ्या धार्मिक विश्वासों को कलई चढा दी। परिणामस्वरूप ताओवाद मार्गभ्रष्ट हो गया।

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