सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कैल्डियन सभ्यता में कला एवं विज्ञान

कैल्डियन सभ्यता में कला एवं विज्ञान 

कैल्डियन कला 

धर्म एवं दर्शन के अतिरिक्त कल्टियनों की प्रगति काला एवं विज्ञान में दिखाई पड़ती है। कैल्डियनों ने वास्तुकला में विशेष उन्नति की थी। कैल्डियन शासकों में नेवोपोलस्सर, नेबुकद्रेज्जर द्वितीय तथा नेबू-नैद निर्माता के रूप में विशेष प्रसिद्ध है। इनके द्वारा बनवाये गये भवनों, प्राचीरों तथा झूलते हुए बाग के कारण बेबिलोन समस्त विश्व में प्रसिद्ध हो गया । यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस बेबिलोन के वैभव से अत्यधिक प्रभावित था। उसके अनुसार बेबिलोन का क्षेत्रफल 5,17,996 हेक्टेयर था। संभवतः इसमें नगर के अतिरक्त चारों ओर स्थित कृषि-भूमि को भी सम्मिलित कर लिया गया था।

 नगर को चारों ओर से एक दीवार से घेर दिया गया था जिसकी लम्बाई 90.16 किलोमीटर तथा चौड़ाई इतनी थी कि इस पर चार घोड़े द्वारा खींचा जाने वाला स्थ सरलतापूर्वक चल सकता था। हेरोडोटस के विवरण के आधार पर हम बेबिलोन नगर की समृद्धि का अनुमान लगा सकते हैं। केल्डियन युग के भवन नेबोपोलस्सर के समय से बनने प्रारम्भ हुए। इस शासक ने एक राजप्रासाद निर्मित कराया तथा बेबिलोन नगर के पुनर्निमाण की योजना बनायी । लेकिन संभवतः ये कार्य इसके समय में पूर्ण नहीं हो सके थे, अतएव इसके पूर्ण करने का महत्वपूर्ण कार्य इसके उत्तराधिकरी नेबुकद्रेज्जर द्वितीय ने किया। इसने राजप्रासाद को पूर्ण कर नगर के नव निर्माण की योजना को साकार रूप दिया। प्राचीन प्राचीर को पूरा कर एक नई प्राचीर बनवायी गई जिसकी लम्बाई हेरोडोटस के अनुसार 90.16 किलोमीटर थी। दोनों दीवालों के बीच में एक उपयुक्त एवं सुरक्षित स्थान चुना गया। वहाँ इंट का एक विस्तृत चबूतरा बनाया गया और उसी पर एक विशाल दुर्ग। नेबुकदेज्जर द्वितीय ने विशाल प्राचीरों के अतिरिक्त अन्य कई दीवारें तथा खाइयाँ बनवायी थीं जिससे बेबिलोन नगर पूर्णतया सुरक्षित हो गया था नेबुकद्वेज्जर द्वितीय द्वारा निर्मित विशाल जिगुरत की, जिसे टॉक ऑफ बाबेल' के नाम से प्रसिद्धि मिली है, ऊँचाई पिरामिड से भी अधिक बी। इसमें सात मंजिलें थीं। सबसे उळपरी मंजिल में एक चबूतरा बनाया गया था। 

इसके पास एक अलंकृत शय्या थी। इस पर प्रति रात्रि ईश्वर की कृपाकांक्षी कोई स्त्री विश्राम करती थी। टावर ऑफ बावेल' से 546 मीटर उत्तर कल (Kasra) का टीला था। इसी पर नेबुकद्रेज्जर द्वितीय ने अपना विशाल राजप्रासाद बनवाया था। राजप्रासाद की दीवारें आकर्षक पीली ईंटों से बनायी गई थीं। फर्श बढ़िया श्वेत पत्थरों से अलंकृत थी। द्वारा पर भीमाकार सिंह की मूर्तियाँ बनायी गई थीं। राजप्रासाद के निकट नेबुकद्रज्जर द्वितीय का 'झूलता हुआ उपवन' (Hanging Garden) स्थित था। यह उपवन स्तम्भों पर बनी एक छत पर टिका था छत पर कई मीटर मोटी मिट्टी डाली गई थी इस पर पुष्प-वृक्षों के अतिरिक्त अनेक प्रकार के गहरी जड़ वाले वृक्ष भी लगाये गये थे। इन वृक्षों की सिंचाई फरात नदी के जल द्वारा की जाती थी। जल को स्तंभों में लगे पाइपों की सहायता से ऊपर चढ़ाया जाता था। इसकी ठळंचाई धरातल से लगभग 22.5 मीटर थी। इसी उळंचाई पर बेबिलोनिया की राजघराने की महिलाषं कृक्ों की शीतल छाया में विहार करती थीं यह स्थान घरातल से इतना अधिक ठळंना था कि किसी की दृष्टि वहां तक नहीं पहुंच पाती थी कहा जाता है कि मेबुकद्रेज्जर द्वितीय ने इस उपवन का निर्माण अपनी मीडियन रानी (उवक्ष्र की पुत्री) के लिए करवाया था। क्योंकि आकर्षक एवं शीतल हवाओं से युक्त पहाड़ियो के बीच रहने वाली मीडियन रानी का कोमल शरीर वेविलोन की तड़पती धूप में झुलस जाता था झूलते हुए उपवन की गणना यूनानियों ने विश्व के सात आश्चर्यों (Seven Wonders of the World) में की है। बेबिलोन के अतिरक्त अन्य नगरों में भी नेवूवादेज्जर द्वितीय द्वारा भवन बनवाए गये। बारसिण्या में ए-जिया मंदिर का निर्माण इसी ने किया था नेब्कद्वेष्जर द्वितीय के बाद भवन निर्माण का कार्य नेबु नैद के शासनकाल में सम्पन्न हुआ तथा बेबिलोन, सिप्पर एवं हरन में कई मंदिर बनवाए गये। 

विज्ञान 

दजला-फरात-घाटी के निवासियों में कैल्डियन सबसे बड़े वैज्ञानिक थे। लेकिन दुर्भाग्य से उनका यह जान केवल ज्योतिष एवं खगोलशास्त्र तक ही सीमित रह गया। कैल्डियनों के पराभाव के आठ सौ वर्ष बाद भी रोम के निवासी उन्हें एक कशल वैज्ञानिक के रूप में स्मरण करते रहें। इस क्षेत्र में उनकी प्रसिद्धि इतनी अधिक थी कि कभी-कभी कैल्डियन तथा ज्योतिषी को पर्याय मान लिया जाता था।1 न्यू टेस्टामेण्ट' में पूर्व के जिन बुद्धिजीवियों का उल्लेख किया गया है वे सम्भवतः कैल्डियनज्योतिर्विद ही थे कैल्डियनो समय- विभाजन की प्राचीन पद्धति में कतिपय संशोधन कर सप्ताह को सात दिन, दिन को बारह पंटों तथा घंटे को एक सौ बीस मिनटों में विभाजित किया इनकी ग्रहण विषयक भविष्यवाणी बहुत सटीक उतरती थी। कैल्डियन वैज्ञानिकों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। ग्रहण विषयक भविष्यवाणी के प्राचीनतम प्रमाण 2283 ई.पू. के हैं। लेकिन इस प्रकार की गणना आकस्मिक एवं अटकल पर आधारित थी। वास्तव में इस गणना को वैज्ञानिक रूप नेबोपोलस्सर के समय में ही मिला। इस समय से इसका सुव्यवस्थित रिकार्ड रखा जाने लगा। यद्यपि हमें इनके ग्रहण विषयक गणना का पूरा-पूरा विवरण नहीं मिला है लेकिन इनमें प्राचीनतम गणना 568 ई.पू. की है। कैल्डियन ग्रहण विषयक गणना इनके अधःपतन के 360 वर्ष बाद तक प्रचलित रहीं जिससे हेलेनेस्टिक युग के वैज्ञानिक लाभान्वित हुए थे। कैल्डियन जयोतिषियों में सर्वाधिक ख्याति नेबु-रिमन्नु (Nabu-Rimannu) एवं किडिन्नु (Kidinnu) ने अर्जित की। रिमन्नू ने सूर्य एवं चन्द्र की गति का पता लगाया सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण की जानकारी दी। एक वर्ष की अवधि 365 दिन, 6 घंटे, 15 मिनट तथा 41 सेकेण्ड बतायी। इसमें एवं आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा निर्धारित वर्ष की अवधि में केवल 26 मिनट 55 सेकेण्ड का अन्तर है। सम्भवतः वर्ष का निकटतम अवधि इसके पहले कभी नहीं प्राप्त की जा सकी थी। किडिन्नु ने पृथ्वी की धुरी के वार्षिक झुकाव का पता लगाया। ब्रेस्टेड ने दोनों वैज्ञानिकों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। फादरिगम (1.K. Fotheringham) के अनुसार इन दोनों वैज्ञानिकों की गणना विश्व के महान् वैज्ञानिकों में जानी चाहिए।        

ज्योतिष एवं खगोल शास्त्र के अतिरिक्त विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में कैल्डियनों ने कोई प्रगति न की। सम्भवतः वे शून्य से परिचित थे तथा उन्हें धोड़ा बहत बीजगणित का भी ज्ञान था। इसी प्रकार औषधिशास्त्र में भी इन्होंने कोई प्रगति न की। प्रश्न है कैस्डियन विज्ञान ज्योतिष एवं खगोल शास्त्र तक ही क्यों सीमित रह गया? इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन नहीं है। वास्तव में नक्षत्रिय धर्म के कारण कैल्डियन धर्म तथा ज्योतिष एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ थे। आकाश के विभिन्न नक्षत्र एवं ग्रह उनके लिए देव-तुल्य थे। इनकी गतिविधियों का अध्ययन कर वे भविष्यवाणियाँ करते थे। ऐसी स्थिति में इसका विकास सहज एवं स्वाभाविक था।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam

1857 के विद्रोह का कारण, प्रकृति, महत्व, परिणाम 1857 ke Vidhroh ka karaan,prakriti,mahattv aur parinaam 1857 के महान विद्रोह (1857 के भारतीय विद्रोह, 1857 के महान विद्रोह, महान विद्रोह, भारतीय सेप्पी विद्रोह) को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत का स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। 1857 आंदोलन एक राष्ट्रीय उभर रहा था, जो भारतीयों के दिल में एक मजबूत आग्रह से प्रेरित था, जिससे देश मुक्त हो गया। यह ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय एकल घटना थी। यह भारत में सदी के पुराने ब्रिटिश शासन का नतीजा था। भारतीयों के पिछले विद्रोहों की तुलना में, 1857 का महान विद्रोह एक बड़ा आयाम था और यह समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों की भागीदारी के साथ लगभग अखिल भारतीय चरित्र ग्रहण करता था। यह विद्रोह कंपनी के सिपाही द्वारा शुरू किया गया था। इसलिए इसे आमतौर पर 'सेप्पी विद्रोह' कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ सिपाही का विद्रोह नहीं था। इतिहासकारों ने महसूस किया है कि यह एक महान विद्रोह था और इसे सिर्फ एक सिपाही विद्रोह कहने के लिए अनुचित होगा। हमारे इतिहासकार अब इसे विभिन्न ना