सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जातिवाद का अर्थ,परिभाषा, कारण, दुष्परिणाम

जातिवाद का अर्थ,परिभाषा, कारण, दुष्परिणाम


जातिवाद का अर्थ - सामान्य शब्दों में जातिवाद से हमारा अभिप्राय उस मानसिकता, भावना व व्यवहार से हैं जिसमें कोई व्यक्ति विशेष या जाति समूह विशेष अपने ही जाति के सदस्यों को अन्य जातियों की तुलना में पूर्व धारणा के अनुसार ज्यादा महत्व देता है। 

जातिवाद की परिभाषा - 


डॉ. आर. एन. शर्मा के अनुसार -"जातिवाद जाति अथवा उपजाति के प्रति एक अंध समूह भक्ति है जो कि अन्य जातियों के हितों की चिन्ता नहीं करती है और अपने समूह के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं अन्य हितों को प्राप्त करने की चेष्टा करती है। श्री के. एम. पाणिकर के अनुसार-"राजनीति की भाषा में उपजाति के प्रति निष्ठा की भावना ही जातिवाद है।" 


काका केलकर के अनुसार -"जातिवाद एक अवाधित अन्ध और सर्वोच्च समूह भक्ति है, जो कि न्याय, औचित्य, समानतः और विश्व बन्धुत्व की उपेक्षा करती है।" डॉ. एन. प्रसाद के अनुसार-“जातिवाद राजनीति में परिणित जाति के प्रति निष्ठा है ।" 


जातिवाद के विकास के कारण - 


(1) जाति व्यवस्था - जाति की परम्परा स्वयं जातिवाद का सबसे बड़ा, मुख्य वआधारभूत कारण रहा है। जाति व्यवस्था समाज की व्यवस्था व आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाई गई थीं, परन्तु इसके दुष्प्रभावों का ध्यान नहीं रखा गया। ऐसी व्यवस्था से क्या लाभ जो बाद में स्वयं ही जहर बन जाये । भारतीय समाज की विशिष्ट संस्था जाति एवं स्वयं जातिवाद की जननी कही जा सकती है। वैसे जातिवाद आधुनिक भारत की देन है। 


(2 ) मानव प्रकृति - जाति प्रथा का विकास मानव प्रकृति के अनुरूप घटना है। मानव स्वाभावतः स्वार्थी वे अहंकारी जानवर है और इसी प्रवृत्ति की वजह से यह अपनी ही. जाति के अन्य लोगों के ऊपर शासन करने व शोषण करने से बाज नहीं आता है। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने जातिगत समूह की मदद लेता हैं और जातिवाद को बढ़ावा देता हैं। 


( 3 ) विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध - भारतीय समाज में विवाह सम्बन्ध केवल स्वजाति' में स्थापित करना अनुमोदित है इससे विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक व सांस्कृतिक दूरी बढ़ जाती है। इस कारण अतःक्रिया का अवसर कम मिल पाता है। प्रत्येक जाति की एक उप संस्कृति विकसित हो जाती है और अतंतः यह परिस्थितियां जातिवाद को बढ़ावा देती है। 


(4) राजनीतिक कारण - भारत में आज प्रजातन्त्र के बजाय जातितन्त्र का वातावरण बना हुआ है। भारत की प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था व आधुनिक राजनीति ने जातिवाद को बढ़ावा दिया है। आधुनिक राजनीतिज्ञों ने विभिन्न जातियों को वोट बैंक बना रखा है। अनुसूचित जाति तथा जनजाति की संरक्षण नीति के पीछे इसी बोट बैंक की भावना नि्हित है। 


( 5) यातायात व संचार की सुविधाएँ - आधुनिक समय में यातायात व संचार के साधनों में वृद्धि होने से जातिवाद को बढ़ावा मिला है। बिखरे हुई जातिगत समूहों के मध्य सम्पर्क स्थापित हो, गया है, जाति परिषद का दायरा विकसित हुआ है। इसके अतिरिक्त पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से जातियों ने अपनी विचारधारा को फैलाने का प्रयास किया है। 


जातिवाद के दुष्परिणाम - 


(1) जातिवाद से अन्य समस्याएँ जैसे सम्प्रदायवाद, सामाजिक विघटन, सामाजिक तनाव, भ्रष्टाचार, पक्षपात, अस्पृश्यता को बढ़ावा मिलता है। 

(2) जातिवाद कट्टरवाद व पिछड़ेपन का परिचायक होने के साथ-साथ देश की प्रगति व विकास में बाधक तत्व है।

(3) जातिवाद देश की एकता व अखण्डता के लिए खतरा उत्पन्न करता है। 

(4) जातिवाद औद्योगिक व प्रशासनिक कुशलता में भी बाधा डालता है।

(5) जातिवाद के बन्धन से व्यवसायों का खुलकर विकास नहीं हो पाता और प्रायः व्यवसाय के चयन में लोगों को पूर्ण आजादी नहीं मिल पाती है।

(6) जातिवाद से सामाजिक गतिशीलता में रुकावट आती है। 

(7) जातिवाद व्यक्तित्व के विकास में बाधक है।

(8) विदेशी कूटनीतिज्ञ जातिवाद व सम्प्रदायवाद के सहारे देश को प्रगति के मार्ग से हटाने का प्रयास करते हैं। 

(9) जातिवाद विभिन्न संस्कृतियों के आदान-प्रदान में बाधक है। 


जातिवाद को दूर करने के उपाय - 


(1) नैतिक एवं राष्ट्रीय शिक्षा - जातिवाद की समस्या के समाधान हेतु सबसे उचित उपाय यह है कि लोगों की मानसिकता ही बदल दी जाय। इसके लिए नैतिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए कि लोगों में राष्ट्रीय चरित्र का विकास हो सके। राष्ट्रीय भावना का विकास इस प्रकार का होना चाहिए कि जाति जैसे समूह को लोग द्वैतीयक और राष्ट्र को प्राथमिक मानने लगे। 


(2) अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन - विडम्बना की बात है कि आज भी भारत में एक प्रतिशत अन्तर्जातीय विवाह नहीं होते हैं। जो होते भी है वह प्रेम विवाह होते हैं। लोग अन्य जातियों में विवाह इसलिए नहीं करते हैं कि वे जातिगत बन्धन को दूर करना चाहते हैं बल्कि इसलिए करते हैं। क्योंकि वे शारीरिक व अन्य पक्षों से आकर्षित होकर विवाह करते हैं और ये झूठा स्वांग रचाते हैं कि मैंने तो अन्तर्जातीय विवाह सम्बन्ध स्थापित किया है । आज इतना जरूर है कि प्रेम के सामने जाति के बन्धन को तोड़ने में लोग अब उतनी हिचकिचाहट व विरोध नहीं महसूस करते जितना कि आज से एक दशक पहले हुआ करता था। सही अर्थों में अन्तर्जातीय विवाह की प्रथा व पद्धति जातिवाद व जाति प्रथा को समूल नष्ट कर सकता है। सहशिक्षा इस प्रकार के विवाह के लिए सहायक पद्धति है। 


( 3 ) जाति संगठनों पर रोक - जाति संगठनों पर रोक लगना चाहिए, क्योंकि ये संगठन जाति की प्रथा एवं परम्परा को अनावश्यक रूप से तीव्रता के साथ क्रियान्वित करवाने का प्रयास करते हैं और जातिवाद को बढ़ावा देते हैं। 


(4) औद्योगीकरण व नगरीकरण - इन प्रक्रियाओं के कारण जातिगत दूरी, खाने पीने की पावन्दी, वैवाहिक प्रतिबन्धों में शिथिलता आयेगी और जातिवाद को रोका जा सकता हैं। 


(5) कानूनी उपाय-जातिवाद को रोकने के लिए उचित सामाजिक अधिनियमों को प्रतिपादित किया जाना चाहिए। जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। अनुसूचित जाति व जनजाति का आरक्षण जाति के आधार पर न करके आर्थिक स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए। अस्पृश्यता निवारण अधिनियम इस दिशा में सराहनीय कदम हैं। नौकरी के आवेदन पत्रों, विद्यालयों में प्रवेश आवेदन पत्रों में जाति का कालम समाप्त कर दिया जाना चाहिए। 


( 6) प्रचार - जातिवाद की बुराई से सामान्य जनता को अवगत कराया जाना चाहिए। मनोवैज्ञानिक व समाजशास्त्रियों की मदद से जातिवाद की कमियों तथा इसके निराकरण के लिए प्रचार किया जाना चाहिए। इसके लिए स्वस्थ्य जनमत का निर्माण किया जाना चाहिए। 


(7) शुद्ध राजनीति - आधुनिक भारत में राजनीति को अगर जातिवाद का एक मात्र निर्णायक कारण माना जाए तो कोई अतिशोक्ति नहीं होगी। भ्रष्टं व मूल्यविहीन राजनेताओं ने जातिगत भावनाओं को शोषित कर अपनी कुर्सी को सुनिश्चित करने का प्रयास किया हैं। जब तक देश की राजनीति में नैतिकता की भावना नहीं आयेगी, जातिवाद जैसी समस्याएँ हमारे लिए सिरदर्द बनी रहेंगी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत  राज्य की उत्पत्ति के ऐतिहासिक विकासवादी सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं। परन्तु गंभीर विवेचना से स्पष्ट होता है कि अन्य सभी सिद्धान्त गलत हैं और उन्होंने राज्य की उत्पत्ति की सही व्याख्या नहीं की है। इस सम्बन्ध में गार्नर का कहना ठीक है कि, "राज्य न तो ईश्वर की कृति है, न किसी उच्च शक्ति का परिणाम, न किसी प्रस्ताव या समझौते की सृष्टि है, न परिवार का विस्तारमात्र" अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राज्य की उत्पत्ति का सबसे अच्छा सिद्धान्त कौन है। इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि राज्य विकास का परिणाम है। इसका निर्माण मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ था और अच्छे जीवन के लिए अब भी चल रहा है। राज्य की उत्पत्ति का सबसे सही और वैज्ञानिक सिद्धान्त विकासवादी या ऐतिहासिक सिद्धान्त को ही कहा जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति एक विकास का परिणाम है। यह विकास धीरे-धीरे क्रम: चलता रहता है। इसी विकास के परिणामस्वरूप राज्य ने वर्तमान का रूप धारण किया है। राज्य की उत्पत्ति और व

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और