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हड़प्पा सभ्यता के उद्भव संबंधी क्रमिक सिद्धांत पर प्रकाश

हड़प्पा सभ्यता के उद्भव संबंधी क्रमिक सिद्धांत पर प्रकाश 

हड़प्पा सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में एक थी तथा चह भाग्नीय उपमहाद्वीप में प्रथम नगरीय क्रांति को अवस्था को दर्शाती है। इसका व्यापक क्षेत्रीय विस्तार, नगर निर्माण योजना तथा इसकी सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता सभी इसे एक विशिष्ट सभ्यता के रूप में स्थापित करती है। अब जबकि हड़प्पा सभ्यता के बहुत सारे स्थलों का उत्खनन हो चुका है, इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि यह एक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई सभ्यता थी। परंतु विस्तृत खोजों के बावजूद इस सभ्यता के उद्भव तथा विकास के संदर्भ में कोई टोस जानकारी नहीं मिल पाई है, क्योंकि सामान्यतः जब भी और जहाँ भी इस सभ्यता के अवशेषों का पता लगा है, उससे इस सभ्यता की विशेषताओं खासकर शहरीकरण, नगर निर्माण योजना व्यापार तथा धर्म के विभिन्न स्वरूपों का ही पता चलता है और उपरोक्त गिनाई गई सारी विशेषताएँ किसी भी संस्कृति के विकसित चरण की ओर संकेत करता है। अव प्रश्न उठता है कि हड़प्पा सभ्यता की इस विकसित अवस्था तक पहुंचाने वाले कौन थे? क्या वे स्थानीय थे या विदेशी। अगर विदेशी थे तो उनका मूल क्या था ? अथवा क्या वे आक्रमणकारी थे? अगर उत्पत्ति का यह तत्व स्थानीय था तो इस विकसित सभ्यता से उनका तारतम्य क्या था? इन्हीं प्रश्नों के आलोक में सिंधु सभ्यता के उद्भव को समझा जा सकता है।

हड़प्पा सभ्यता के उद्भव की व्याख्या में सबसे बड़ी समस्या है आवश्यक साक्ष्यों का अभाव। जैसा कि हम जानते हैं कि साहित्यिक स्त्रोत अनुपलब्ध है तथा पुरातात्विक स्त्रोत अपर्याप्त सूचना प्रदान करता है। पुरातात्विक साक्ष्य के अपर्याप्त होने के कारण है- क्षैतिज उत्खनन का न होना। यही वजह है कि इसके उद्भव की व्याख्या में कई मत उभर कर आए हैं।

विदेशी उद्भव सम्बन्धी मतत्पत्ति के संदर्भ में एक मत अकस्मात् उद्भव का है जिसमें मेसोपोटामियाई लोगों को हड़प्पा सभ्यता का जनक माना गया है। इसके अनुसार, हड़प्पा सभ्यता, मेसोपोटामियाई सध्यता तथा मिश्र की सभ्यता के जनक एक ही मूल के लोग थे। इस मत के पक्ष में कुछ तक भी प्रस्तुत किये गये, जैसे अन्नागारों के निर्माण में तथा गढ़ी के निर्माण में प्रयुक्त मकड़ी की शहतीर की समानता मेसोपोटामिया संरचना से की गई। उसी प्रकार बलूचिस्तान प्राप्त मिट्टी के ढेरों की तुलना मेसोपोटामिया से प्राप्त जिगुएट (मंदिर) से की गई। परंतु उपरोक्त तर्क के विरूद्ध अनेक तथ्य सामने आ जाते हैं, जैसे दोनों सभ्यताओं के नगरीकरण स्वरूप में अंतर था क्योंकि हड़प्पा सभ्यता का नगरीकरण ग्रीड प्रणाली पर आधारित तथा व्यवस्थित था जबकि मेसोपोटामियाई नगर अव्यवस्थित रूप में बसे हुए थे। 

उसी प्रकार सोपोटामिया की मुहर बेलनाकार है जबकि हड़प्पा सभ्यता की वर्गाकार तथा आयताकार है। इसके अलावा दोनों सभ्यताओं की लिपि में भी अंतर है। सिन्धु सभ्यता कीलिविचित्राक्षर रूप है तो मेसोपोटामिया की लिपि कीलनुमा है दोनों सभ्यता की इंटों के निर्माण में भी अंतर या गया है। हड़प्पा सभ्यता के अन्तर्गत पकाई गई ईटों का प्रयोग होता था। तो सोपोटामिया में इंटो का कच्चे रूप में ही प्रयोग किया गया है । दोनों सभ्यता के मृदभांडों भी असमानता है। इस प्रकार दोनों सभ्यता में समानता से अधिक असमानता ही देखने को मिलती है। फिर परीक्षण करने पर ऐसा ज्ञात होता है कि मेसोपोटामिया उत्पत्ति का सिद्धांत विसरणवादी सिद्धांत से प्रेरित है । अतः इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

हड़प्पा सभ्यता के उद्भव की व्याख्या क्रमिक उद्भव के सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में की जाती है। एक दृष्टिकोण के अनुसार यह सोथी संस्कृति से क्रमिक विकास को दर्शान तो एक दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार यह ईरानी-बलूची ग्रामीण संस्कृति से क्रमिक विकास परिणाम है। पहले दृष्टिकोण के पक्ष में ऐसा सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि हड्य सभ्यता बीकानेर में स्थित सोथी संस्कृति का विकसित रूप है। इस मत के पक्ष में दोनों क मृदभांडो की समानता दिखाई गई। फिर इस दृष्टिकोण के अनुसार भी वह सिद्ध किया । सकता है कि सभ्यता का विकास दीर्घकालिक प्रक्रिया का परिणाम होता है। वस्तुतः सिथध सभ्यता का विकास भी उस आंतरिक देशी प्रक्रिया का अंग है, जो मेहरगढ़ में अनुमानत 6000 ईसा पूर्व में प्रारम्भ हो गया था। किली गुल मुहम्मद, सना घुन्डई, कोट दिजी आदि स्थलों के उत्खनन से प्राप्त स्तर इस बात के साफ संकेत देते हैं कि इस स्थान पर सभ्यता का विकास हो रहा था। बलूचिस्तान पहाड़ियों के ग्रामीण स्थल जिसे नाल संस्कृति के रूप में पहचाना गया है तथा सिंधु से मकरान तट तक की कुल्ली संस्कृति को प्राक् हड़मा सभ्यता के रूप में स्वीकार किया गया है।

विकासक्रम

विश्लेषण करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि हड़प्पा सभ्यता के उद्भव की व्याख्या उन ग्रामीण संस्कृतियों के परिप्रेक्ष्य में ही की जा सकती है जो उत्तर पश्चिम के एक बड़े क्षेत्र में 6000 ईसा पूर्व एवं 4000 ईसा पूर्व के मध्य अस्तित्व में आई। वस्तुतः इस काल में इस क्षेत्र में कुछ समृद्ध ग्रामीण बस्तियां स्थापित हुई। उदाहरण के तौर पर बलूचिस्तान में मेहरगढ़ तथा किली गुल मुहम्मद, अफगानिस्तान में मुंडीगाक एवं पंजाब में जलीलपुर आदि। इस काल में लोगों ने सिंधु नदी की बाढ़ पर नियंत्रण करना सीख लिया और इस जल का उपयोग सिंचाई के लिये होने लगा। यह तकनीकी विकास को दर्शाता है। फिर लोगों ने आसपास के खदानों का उपयोग करके पत्थर के बेहतर उपकरणों का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार कृषि के क्षेत्र में अधिशेष जैसी स्थिति उत्पन्ना हो सकी। इस अधिशेष ने समाज के स्तरीकरण को प्रोत्साहन दिया। 

इस क्षेत्र में कृष्क समूह के साथ खानबदोदा समूह भी रहता था। सिंधु का कछारी मैदान ब्लूचिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र के माध्यम से ईरानी पठार से जुड़ता था। खानबदोश समूहों ने इन रास्तों के माध्यम से व्यापार में रूचि दिखाई। इसके परिणामस्वरूप पश्चिम एशिया एवं हड़प्पा क्षेत्र के मध्य संपर्क सूत्र जुड़ने लगे। फिर 3500-2600 ईसा पूर्व के बीच के काल में, जो प्राक हड़प्पा सभ्यता के नाम से जाना जाता है, तांबे का प्रयोग तथा हल का प्रयोग आरम्भ हुआ। इसी काल में बड़ी-बड़ी रक्षात्मक दीवारों का निर्माण हुआ तथा सुदूर व्यापार को प्रोत्साहन मिला। इस प्रकार नगरी सभ्यता की पृष्ठ भूमि निर्मित हो गयी। पुनः ग्रामीण क्षेत्र के शिल्पी एवं पूरोहित परोहितों के व्यापक समूह के अंग बन गये। इसके अलावा हड़प्पाई लोगों ने कुछ ऐसे प्रतीकों के विकास कर लिया जो उन्हें पूर्ववर्ती काल के लोगों तथा अन्य समकालीन लोगों से पृथक करते थे। यद्यपि हम मेसोपोटामिया के प्रभाव को अस्वीकार नहीं कर सकते परन्तु क पारस्परिक सांस्कृतिक तथा व्यापार के माध्यम से ही संभव हुआ होगा।

उत्तर पश्चिम के विस्तृत क्षेत्र में प्राक् हड़प्पाई स्थलों से हड़प्पा सभ्यता के उद्भव का साक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, दक्षिणी अफगानिस्तान के मुंडीगक नामक स्थान से कुछ शिल्प कृतियाँ प्राप्त हुई हैं। इन शिल्प कृतियों के विश्लेषण से ऐसा प्रतीत होता है कि इस स्थल का संपर्क ईरान तथा बलूचिस्तान से रहा था। इस स्थल से में सुखायी गई ईंटों को वर्गाकार बुर्ज मिला है। यहाँ एक विशाल भवन भी प्राप्त हुआ है। उसी प्रकार क्वेटा घाटी से प्राप्त एक स्थल देब सादत से बड़े-बड़े ईंटों के घर मिले हैं। यहाँ से चित्रकारी किए मिट्टी के बर्तन भी प्राप्त हुए हैं। फिर एक दूसरे स्थल राणा घुंडई से प्राप्तबर्तनों पर कुबड़ वाले बैल के चित्र मिले है। उसी प्रकार पेरियानों घुंडई नामक स्थल से लियों की छोटी मछली से प्राप्त हुई हैं। 

दक्षिण बलूचिस्तान के बालाकोट नामक स्थान से एक विशाल इमारत का अवशेष मिलता है। सिंधु में भी कई स्थलों से प्राक हड़प्पाई चरण के अवशेष मिले हैं। यथा,ली से पत्थर एवं मिट्टी की ईंटों के मकान मिले हैं यहाँ से अनाज का एक कोठार भी मान हुआ है तथा यहां से प्राप्त बर्तन पर कूबड़ वाले बैल का चित्र मिला है। उसी प्रकार कोची नामक स्थल से सुरक्षात्मक दीवार का अवशेष मिला है। बलूचिस्तान में मेहरगढ़ नाम वतन पर लाजवर्द मणि मुहरों तथा ठप्पों के प्रयोग का साक्ष्य मिलता है यहाँ से की बनी हयो की मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई है रहमान ढेरी नामक स्थल से नियोजित ढंग में बने पर गतियों एवं सड़कों का साक्ष्य मिला है। यहाँ से रक्षात्मक दीवार का भी साक्ष्य उसी तरह उत्तर-पश्चिम में तरकाई किला नामक स्थल से किलेबंदी का प्रमाण फिर मोबान से पत्थर बनाने वाले कारखाने का साक्ष्य मिला है। 

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