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हड़प्पा सभ्यता की आर्थिक व्यवस्था

हड़प्पा सभ्यता की आर्थिक व्यवस्था 

आर्थिक जीवन सैन्धव सभ्यता का आर्थिक जीवन अत्यन्त विकसित अवस्था में था। आर्थिक जीवन के प्रमुख आधार कृषि, पशुपालन, शिल्प और व्यापार थे। कृषि सैन्धव वासी जाड़े (नवम्बर दिसम्बर) में फसल बोते थे एवं मार्च-अप्रैल में काट लेते थे। यहाँ कोई फावड़ा या फाल तो नहीं मिला है लेकिन कालीबंगा की प्राक-हड़ण्या अवस्था में कुंड (हलरेखा) के प्रमाण मिले हैं। हड़प्याई लोग शायद लकड़ी के हलों का प्रयोग करते थे तथा फसल काटने के लिए पत्थर के हेसियों का प्रयोग होता था। मोहनजोदड़ों एवं बनवाली से मिट्टी के हल के खिलौने का प्रारूप मिला है। इसी प्रकार पाकिस्तान के वर्तमान चोलिस्तान (भूतपूर्व बहावलपुर रियासत) के विकसित हड़प्पन पुरास्थल के अन्वेषण के परिणाम स्वरूप खेत जीतने में प्रयुक्त मिट्टी के बने हल के खिलौने के टूटे हुए अवशेष मिले हैं।

सिन्धु सभ्यता के किसी भी पुरास्थल से नहरों या नालों से सिंचाई के प्रमाण नहीं मिले हैं। कृषि कार्य के लिए नदियों के जल, वर्षा के जल एवं कुओं का उपयोग किया जाता रहा होगा। हड़प्पाई लोगों को कुल नौ फसलें ज्ञात थी - गेहूँ की तीन किस्में, जौ की दो किस्मे, कपास, खजूर, तरबूज, मटर, राई, सरसों एवं तिल। बनावली से बढ़ियां किस्म की जौ प्राप्न हुआ है। चावल के भी प्रमाण हैं जैसे लोथल से चावल के अवशेष एवं रंगपुर से धान की भूसी प्राप्त हुई है। ये दोनों स्थल वर्तमान गुजरात में हैं। हरियाणा से भी चावल के प्रमाण प्राप्त हुये हैं। मोटे अनाजों की छः किस्में उगाई जाती थी। रागी, कोदो, सांवा, ज्वार, मटर और फलियों की भी खेती की जाती थी। अन्य फसलों में खजूर, विभिन्न प्रकार की फलियाँ, तिल और सरसों शामिल हैं। मोहनजोदड़ों और अन्य स्थलों पर पाये गये सूती कपड़े के टुकड़ों से इस बात का पता चलता है कि कपास की खेती भी की जाती थी। इस सभ्यता की परिपक्वता के चरण के से कम से कम दो हजार वर्ष पहले के मेहरगढ़ पुरास्थल पर कपास पाई गई है। यह संसार भर के कपास के अस्तित्व का प्राचीनतम साक्ष्य है। कपास सैन्धव लोगों की मूल फसल थी। इसी कारण यूनानी सिन्ध क्षेत्र को सिण्डन कहने लगे, जो सिन्धु शब्द से निकला है। सिन्धु सभ्यता के लोगों को गन्ना ज्ञात नहीं था। रोजदी के निचले स्तरों से छोटी ज्वार एवं रागी, सौराष्ट्र में बालाकोट से बाजरा एवं वहीं से कुछ परवर्ती काल मे ज्वार तथा सारगम के प्रमाण मिले हैं जिन्हें सम्भवतः हड़प्या से स्नाकर यहाँ प्रचालित किया গया होगा।

अनाज सम्भवतः कर के रूप में वसूला जाता था, क्योंकि प्रमुख नगरों में अन्नागार शान हुए है। हडप्पा के अन्नागारों के समीप ही अनाज की सफाई, कुटाई, पीसाई आदि के मिले है और मजदूरों के निवास के लिए बनी हुई श्रमिक बस्ती के साक्ष्य मिले हैं। से आटा पीसने की पत्थर की चक्की के दो पाट मिले हैं सिन्धु सभ्यता के मिट्टी बर्तनों तथा मोहरों पर अनेक पेड़ पौधों का अंकन मिलता है। इसमें प्रमुख पीपल, खजूर, नीम, नीबू केला आदि थे।

पशुपालन -हड़प्पाई लोग बहुत सारे पशु पालते थे वे बैल गाय, भैंस, बकरी, अंड, सुअर, कुत्ते, बिल्ली, गधे, ऊँट, हाथी, गडे, बाघ, हिरन, मोर, खच्चर आदि से परिचित थे। परन्तु उन्हें कूबड़ वाला सांड़ अधिक प्रिय था। सामान्यतः हढ़प्या संस्कृति में घोड़े के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जाता है परन्तु गुजरात के सुरकोटडा से घोड़े के अस्थिपंजर, बलूचिस्तान के रानाधुंडई से घोड़े के दाँत, मोहनजोदड़ों की एक कपरी सतह से घोड़े के अस्तित्व का संकेत था घोड़े की हड्डियाँ लोथल, सुरकोटडा, कालीबंगा आदि स्थलों से प्राप्त हुयी है। ऊँट की हड्डियों भी अनेक पुरास्थलों से बड़ी संख्या में पायी गयी है लेकिन किसी मुद्रा पर ऊँट का चित्र नहीं मिला है। लोथल और नौसारी से घोड़े की मिट्टी की आकृतियां पायी गयी हैं, लेकिन घोड़ें का अंकन किसी मुद्रा पर नहीं मिला है। गाय के प्रमाण यद्यपि मिले हैं, परन्तु आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस महत्वपूर्ण पशु का अंकन मृण्मृतियों, मृद्भाण्डों आदि पर नहीं हुआ है।

शिल्प एवं उद्योग धन्धे हड़प्पा सभ्यता का सबसे प्रमुख उद्योग वस्त्र उद्योग था। सूत की कताई और सूती वस्त्रों की बुनाई के धन्धे अत्यन्त विकसित थे। मोहनजोदड़ों से मजीठ रंग से लाल रंग में रंगे हुए लाल कपड़े के अवशेष चाँदी के बर्नन में पाए गए हैं। मोहनजोदड़ों से ताँबे के दो उपकरणों में लिपटा हुआ सूती कपड़ा एवं सूती धागे भी प्राप्त हुए है। कालीबंगा से प्राप्त मिट्टी के बर्तन के एक टुकड़े पर सूती वस्त्र की छाप मिली है और यही से सूती वस्त्र में लिपटा हुआ एक उस्तरा भी मिला है। लोथल से प्राप्त मुद्रांकों (Sealings) पर सूती वस्त्रों की छाप मिली है आलमगीरपुर से प्राप्त मिट्टी की एक नॉँद पर बुने हुए दो एवं तीन छेद वाले तकुए सैन्धव बस्तियों के प्रायः अधिकांश घरों से मिले हैं। मोहनजोदड़ों से प्राप्त पुरोहित की प्रस्तर मूर्ति तिपतिया अलंकरण युक्त शाल ओढ़े हुए है। इससे स्पष्ट है कि वस्त्रों पर कढ़ाई भी होती थी। मेसोपोटामिया को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सूती वस्त्र संभवतः प्रमुख व्यापारिक सामग्री थी।

हड़प्पा संस्कृति काँस्य युग की है। अतः वे काँसें के निर्माण और प्रयोग से भली भांति परिचित थे। ताँबा, खेतड़ी (राजस्थान) की खानों तथा बलूचिस्तान से मंगाया जाता था। टिन अफगानिस्तान से आता था। हड़प्पाई स्थलों से जो कांसे के औजार मिले हैं, उसमें टिन की मात्रा कम है क्योंकि टिन बाहर से मंगाया जाता था। अतः कहा जा सकता है कि हड़प्पा समाज के शिल्पियों में कसेरों के समुदाय का महत्वपूर्ण स्थान था ।

हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त विशाल इमारतों से स्पष्ट है कि स्थापत्य (राजगीरी) महत्वपूर्ण शिल्प था। हड़प्पाई लोग नाव बनाने का कार्य भी करते थे। वे मिट्टी की पुतलिया भी बनाते थे। मिट्टी के बर्तन बनाने का शिल्प अत्यन्त विकसित था। ईटों के भट्ठ़ो के भी प्रमाण  है जो शहर के बाहर स्थित होत सिन्ध सभ्यता के नगरों के ध्वंशारशेषों के उत्खनन से प्राप्त सोने-चांदी के आभूषणों, ताँबे एवं टिन के बने बतनो उपकरणों तथा औजारों से ज्ञात होता है कि सिन्धु सभ्यता के लोग थातू की बन्द हलाई और मधुणच्छीष्ट (Lost-wax) हलाई की तकनीक से भली भांति परिचित थे आभृषणो के निर्माण मे स्वर्णकार दक्ष थे। शंख, सीप एवं हाथी दांत से विविध प्रकार की वस्तुऐं बनाई जाति है।

चन्दड़ो तथा लोबल से मनके बनाने के कारखाने प्राप्त हुए हैं। हड़प्पाई लोगी के मृगाः की खास विशेषताएँ थी- भाण्डों का चिकना और चमकीला होना। इस सभ्यता में कुम्हार चाक था खूब प्रचलन था।

सैन्धव लोगों को फुट (37.6 सेमी) और क्यूविट (51.8 सेमी. से 53.6 सेमी.) । जानकारी थी। घनाकार बकचक के बाट निचले स्तर पर द्विभाजन प्रणाली (बाइनरी सिला में है और ऊपर के स्तर पर दशमलव प्रणाली में । सर्वेक्षण के लिए एक सीपी का प्रयुक्त होता था, जो लोथल और मोहनजोदड़ों दोनों जगह मिला है चक्राकार और सामान आसियान तथा सूक्ष्म नलिकाकार बर्मे भी मिले हैं। हड़प्याई लोग कई नरह के औजार हथियार भी बनाते थे जैसे -कुल्हाड़, आरी, छूरा और बरछा। ये उपकरण सरल कोटि के क्योंकि भालों में मध्य शलाका नहीं है जो उनकी मजबूती बढ़ा सके। व्यापार और वाणिज्य सिन्धु सभ्यता के लोगों के जीवन में व्यापार और याि। का बड़ा महत्व या। इसकी पुष्टि हड़प्पा, मोहनजोदड़ों और लोथल से प्राप्त अन्न कोटा बड़े भू भारा में देर सारी मिट्टी की मुहरों, एक रूप लिपि और मानकी कृत माप-तोलो अस्तित्व से ही है। हैप्पी और मोहनजोदड़ों से प्राप्त मृद्भाण्ड पर और कुछ मुद्राओं जहाजों तथा नौकाओं के चित्र पाये गये है। एक जलयान या नौका का मिट्टी का य मॉडल लोथल से मिला है। हड़प्पा संस्कृति के बाटो की सबसे प्रमुख विशेषता उनमें घनाकार और 16 के गुणकों में प्रयुक्त होना था। सिन्धु सभ्यता के काल में पोत निर्माण एवं नावों द्वारा समुद्री व्यापार होने की पुष्टि लोकत से प्राप्त बन्दरगाह से होती है। पश्चिमी भारत एवं मकरान के तटवर्ती क्षेत्रों से ज्ञात सिम्ध सभ्यता की वस्तियाँ सम्भवतः समुद्र तटी व्यपारिक पड़ाव के रूप में स्थित बन्दरगाह थी। सौर नट पर विम नदी के किनारे स्थित भगतराव, नर्मदा तट पर मेघम, हिरण्य नदी के किनारे अमार पाठन. भगवा एवं साबरमती के संगम पर स्थित लोथल मकरान तट पर सुत्कागेण्डोर एवं सोत्काकोह इत्यादि तटवर्ती व्यपारिक केन्द्र थे।

सिन्धु सभ्यता का आंतरिक व्यापार अत्यन्त विकसित अवस्था में था। कृषि उत्पादों का तैयार माल से विनिमय प्रायः नगरों एवं अन्य व्यापारिक केन्द्रों पर होता था गाँवों से ख सामग्री आती थी और उसके बदले में सूती वस्त्र एवं धातु की बनी हुई वस्तुएं - उपकरण बर्तन आभूषण आदि बदले में दी जाती थी। उद्योग-धन्धों एवं शिल्पकाय्यों के लिए कच्च माल गुजरात, सिन्ध, राजस्थान, दक्षिण भारत, बलूचिस्तान आदि के आन्तरिक क्षेत्रों के अतिरिक्त अफगानिस्तान, तुर्कमेनिया, ईरान तथा मेसोपोटामिया आदि से मंगाया जाता मनके बनाने के लिए गोमेद गुजरात से आता था। फिलण्ट एवं चर्ट के प्रस्तर ख (लोडुलस) पाकिस्तान सिन्ध क्षेत्र में स्थित रोड़ी तथा सक्खर की खादानों से प्रायः अचिका सैन्थव नगरी को लेड एवं फलकों के निर्माण के लिए भेजे जाते थे। ताँबे के प्रधान सेन राजस्थान के झुंझनू जिले में स्थित खेतड़ी खानें थी। 

खेतड़ी क्षेत्र में स्थित गणेश्वर उत्खनन से हड़प्पन प्रकार के बाणों की खोज महत्वपूर्ण है। खेतड़ी के अतिरिक्त बलूचिर्ल तथा अफगानिस्तान से ताँबा प्राप्त किया जाता था सोना कर्नाटक स्थित कोलार की हदय की खानों से मिलता था। कार्नेलियन मनके गुजरात तथा सिंध से, सीसा दक्षिण भारत लाजवर्द मणियों कश्मीर और अफगानिस्तान से, फिरोजा और हरिताश्म मध्य एशिया ईरान से, अम्बु मणि महाराष्ट्र से तथा गोमेद सिक्थस्फटिक (कैल्सीडोनी) और इन्द्र (कार्नेलियन) सौराष्ट्र से आता था। सिन्धु सभ्यता के नगरों का मध्य एवं पश्चिम एशिया के देशों के साथ पनि व्यापारिक सम्बन्ध था। अफगानिस्तान, फारस की खाड़ी क्षेत्र में स्थित देशों, ईरान ईराक से व्यापारिक सम्पर्क के प्रमाण मिले हैं। लाजवर्द मणि (lapis Lazuli) एवं च। अफगानिस्तान से आयात की जाती थी अफगानिस्तान का बदख्शा क्षेत्र लाजवर्द मणि के लिए प्रसिद्ध था। सैन्धव लीगीं के उत्तरी अफगानिस्तान में अपनी वाणिज्यिक वस्ती स्थापित  की थी। 

इसलिए अफगानिस्तान के शुर्तगई की मध्य व्यापारिक वस्ती माना जा सकता है। सोवियत रूस के दक्षिण तुर्कमेनिस्तान तथा बहरीन द्वीप के रस अल कला और कुवैत के समीप स्थित फैलका से सैन्धव व्यापार के प्रमाण मिले हैं। जहाँ अफगानिस्तान में सैन्धव लोगों ने अपने उपनिवेश बसाए, वहीं बहरीन सिन्धु और मेसोपोटामिया के बीच होने वाले व्यापार में बिचौलिए का कार्य करता था। ईरान से संगयशव अथवा हरिताश्म (Jade) फीरोजा (Turquoise) टिन तथा चांदी आयात की जाती थी। फारस की एक मुहर के प्रमाण लोथल से प्राप्त हुए हैं। सिन्धु सभ्यता के नगर इन क्षेत्रों को सूती वस्त्र, हाथी दांत की बनी हुई वस्तुएं एवं इमारती लकड़ी आदि निर्यात करते थे। सिन्धु और मेसोपोटामिया के बीच व्यापार सबसे उन्नत अवस्था में था। इस व्यापार के पुरातात्विक एवं अभिलेखीय साक्ष्य भी मिले हैं। पुरातात्विक साक्ष्य के अन्तर्गत सैन्धव नगरों से आयात एवं निर्यात की जाने वाली वस्तुओं का उल्लेख किया जा सकता है। निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सूती वस्त्र, इमारती लकड़ी, हाथी दाँत एवं पशु-पक्षी प्रमुख कथे । सिन्धु सभ्यता की लगभग एक दर्जन मुहरें मेसोपोटामिया के उर किश, लगश, निष्पुर, टेलअस्मर, टेपेगावरा, हमा आदि नगरों से प्राप्त हुई है। व्यापारी अपने माल को गाँठों के में भेजकर अपनी मुहर की छाप अंकित करते थे। रेखांकित कर्केतन के मनके (Eched Cornelian Beads) जड़ाऊ काम वाले सीप और हड्डियों द्वारा निर्मित वृक्क के आकार के भनक (Kidney Shapped Beads) आदि सिन्धु सभ्यता के प्रमुख पुरावशेष व्यापार के माध्यम से मेसोपोटामिया पहुँचें।

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