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फारसी जरथुश्त्र धर्म की विशेषताओं का वर्णन

फारसी जरथुश्त्र धर्म की विशेषताओं का वर्णन 

धर्म - पारसीकों की सबसे स्थायी देन धर्म सम्बन्धी थी। यद्यपि वे अर्धवर्बर को जाते हैं किन्तु उसकी धार्मिक व्यवस्था प्राचीन थी। यह धर्म भारतीय वैदिक धर्म के समान था और ऋग्वेद की भाँति बहुदेववाद की धारणा प्रचलित थी। उनके देशों में मिथू (मित्र), अहुर (करूण), अर्त (रितु), विम (यम) और गन्दरेव (गन्धर्व) आदि प्रमुख थे। ये अग्नि को अतर तथा जल को अपाम नपात कहते थे। ये एक मातृ देवी की पूजा करते थे जिसे अनहिता कहा जाता था। इन देवों की शक्ति और समृद्धि का स्रोत माना जाता था। बहुदेववाद के कारण पुरोहिती का प्रभाव रहना स्वाभाविक था। धार्मिक आडम्बरों में आस्था रखी जाती थी। देवताओं की प्रसन्नता के लिये पशु की बलि दी जाती थी तथा धार्मिक उत्सवों में होम (सोम) पान किया जाता था। 


जरथुश्त्र मत - जरथुस्त्र मत पारसीकों की स्थायी देन है। जब उन्होंने विजय प्राप्त की उसके पूर्व ही धर्म संस्थापित हो चुका था। यह इतना ग्राह्य और परिपक्व धर्म था कि उसका प्रचार पश्चिमी एशिया के विभिन्न भागों में शीघ्र ही हो गया यह धर्म सुधारवादी था। बुद्ध की भाँति आडम्बरों के प्रति घृणा और अनास्था प्रगट की गई है। जरथुश्त्र ने पुजारियों के अत्याचार की तीन आलोचना की। क्योंकि बाहरी उपादान आध्यात्मिक लाभ के लिये साधक नहीं बाधक थे। यही कारण है कि इस धर्म को प्रारम्भिक नारसीक धर्म की प्रतिक्रया माना जाता है। सादगी के कारण यह धर्म निर्धनों द्वारा भी अनुसरण करने योग्य था। जरथुश्व की जीवनी-जरथुश्व का जन्म अजरबेजान के उर्मिया नामक स्थान में हुआ था। इनका वास्तविक नाम स्पितमा था। गौतम बुद्ध की भाँति उन्हें भी तपस्या द्वारा सिद्धि प्राप्त हुई। जरथुश्त्र का शाब्दिक अर्थ स्वर्ण प्रभा से मण्डित है। 

जरत त्र स्वर्ण, उश्त्र त्र प्रभामंडित। प्रभामंडित। इनकी जन्म तिथि के बारे में पर्याप्त मतभेद है। यूनानी विद्वान इन्हें प्लेटों से भी 6 हजार वर्ष पूर्व मानते हैं। बाइबिल के अनुसार जरथुश्च ई.पू. 1920 में हुए थे। बेबीलोन का इतिहासकार बेरोसस भी उन्हें दो हजार ई.पू. में उत्पन्न मानता है। कवरदीन यष्ट के 16वें प्रकरण में लिखा है कि पारसीक धर्म का प्रवर्तक जरथुश्व महात्मा गौतम बुद्ध से पहले हुआ था। गौतम का जन्म छठवीं शताब्दी ई.पू.में हुआ था। अतः जरथुश्व उससे पहले हुआ होगा। पाश्चात्य इतिहासकार विलियम जैक्सन यह समय 660 से 583 ई.पू. मानते है। विल दूरेन्ट का मत इसी से कुछ मिलता है उसका कथन है कि राजा विश्तास्प के दरबार में जरथुश्त्र रहते थे। यदि विश्तास्प को दारा प्रथम का पिता मान लिया जाय तो जरयुग का समय ई.पू.छठी शती में मानना चाहिये। वर्नस् महोदय के अनुसार यद्यपि जरथुश्त्र मत के मूल सवरूप 1500 वर्ष ई.पू.में ही प्राप्त होते हैं किन्तु इसका वास्तविक संस्थापक जरथुश्व है जो पारसीक साम्राज्य की स्थापना के एक सौ वर्ष पहले हुआ था। साम्राज्य स्थापना के समय तो यह फारस का प्रमुख धर्म बन चुका था और ईरानी लोग इसके कट्टर अनुयायी बन चुके थे। इस धर्म की नैतिकता पारसीक शासन प्रबन्ध में दृष्टिगत होती है। दारा प्रथम अपने बेहिस्तून के अभिलेख में लिखता है कि 'अहूरमज्द ने मुझे सहायता दी है। क्योंकि न तो में क्रूर हूँ, न झूठ बोलता हूँ न निरंकुश हूँ, न तो मेरे वंश में ही ऐसा कोई है। मैं सदाचार के अनुसार शासन करता हूँ। 


अवेस्ता-जरथुश्त्र धर्म से सम्बन्धित परम्परायें और कथानक पारसकों के प्राचीन ग्रन्थ अवेस्ता में प्राप्त होते हैं। यह आकार में यूनानी महाकाव्यों -इलियड और ओडेसी के मिले स्वरूप से दुगुना था, इसका मौलिक रूप अवश्य कम रहा होगा। इसके प्राचीन कथानकों का यह संग्रह ईसा काल में हुआ होगा। सर विलियम जोम्स का कथन है कि जब मन अवेस्ता में शब्दों का अनुशीलन किया तो मुझे जान कर यह आश्चर्य हुआ कि उसके दस शब्द में से सात शब्द शुद्ध संस्कृत के हैं डॉ० हॉग का कथन है कि चाहे वेद और जेन्द अवेस्ता एक प्रकार के न हों तथापि उनमें इतना साम्य है कि जो व्यक्ति संस्कृत का थोड़ा भी ज्ञान रहता वह उसे सरलता से समझ सकता है। जेन्द अवेस्ता की छन्द रचना का वेदों से घनिष्ट सम्बन्ध है। वैदिक हिन्दू आर्य थे और अवेस्ता के अनुयायी भी आर्य कहे जाते थे। अवेस्ता के निम्न भाग हैं - 


1. यस्न और गाथा (Yasna and Gathas)

2. विस्पेरेद (Viaparad) 

3. यश्त (Yast)

4. न्यायिश-गह (Nyaise Gah)

5. हिन्दी दाद (Vendidad)

6. हादोख्न नस्क (Aadhokht Nosk) आदि 


(1) यस्न और गाथा में पुरोहितों के मन्त्रों एवं जरथुश्व के सिद्धान्त संग्रहीत हैं। (2) विस्पेरेद-इसमें देव वंदना में हैं। (3) बेन्दीदाद इसमें धार्मिक विधि निषेध संग्रहीत है तथा (4) द्वितीय सर्ग में न्यायिश गह और गाथा है। इसे खोर्द या लघु अवेस्ता नाम दिया गया है। न्यायिश में प्रतिदिन पाठ के मन्त्र हैं। यार में देवदूतों के प्रति बन्दनाओं से संकलन है। हादोख्त नासिक में शब्दकोश तथा अनुक्रमणिका है। पारसीकों के अनुसार अवेस्ता में जरथुस्त्र और उसके प्रमुख अनुयायियों के उपदेश संकलित है। 


जरथुश्त्र मत की विशेषतायें-जरथुश्त ने संसार से मोह को दूर करने के लिए गीतम बुद्ध की भाँति उपदेश देना आरम्भ किया। उसने यद्यपि शुभ और ज्योति स्वरूप अग्नि को स्वीकार किया। परन्तु इसके विपरीत उसने प्राचीन ईरानी धर्म के बहुदेववाद, पशुहिंसा और पुरोहितवाद के प्रति पूर्णरूप से विवाह किया। मूर्ति-पूजा का विरोध किया जिससे न तो मन्दिर ही थे न मूर्तिपूजा होती थी। जरथुरा में इन्हें धर्म का दोष बताया था। इसी प्रकार धर्म के अन्य आडम्बरों को भी निकालने की चेष्टा की। 


नैतिक धर्म - इस धर्म की एक विशेषता यह है कि सदाचार का इसमें स्थान है। जरथुश्व के अनुसार सद्गुणों के विकास के कारण ही मनुष्य धर्म में गुढ़ तत्वों से अपना परिचय बढ़ा सकता है। समकालीन मेसोपोटामिया आदि धर्म में नैतिकता और सदाचार को स्थान नहीं दिया गया था। जबकि सदाचार जरथुश्त्र धर्म का अभिन्न अंग था। इसके अनुसार सदाचार के तीन स्थूल रूप हैं, अमित को मित्र बनाना, दुष्टों को शिष्ट बनाना और मूढ या अज्ञानी को ज्ञानी बनाना। जरथुख ने मनुष्य के व्यक्तिगत गुणों का सम्बन्ध समाज से बताया है। उसके अनुसार नैतिकता के पथ के प्रतिकूल चलने वाला व्यक्ति न केवल अपराध करता है अपितु समाज का भी अहित करता है। सदाचार से ही सम्बन्धित सहिष्णुता भी है। इस उपदेश की महत्ता सम्भवतः इस बात में भी थी कि बेबीलोन आदि विजित देशों में असहिष्णुता की नीति पुनः न दुहराई जा सके। इस धर्म में स्पष्ट निर्धारण है कि सभी धर्म में गुण और दोष वर्तमान हैं। इन्हीं गुणों के कारण ही विश्व के सभी धर्म एक दूसरे के समकक्ष आते हैं। धार्मिक असहिष्णुता को अपराध घोषित किया गया है। पारसीक नरेशों में दारा प्रथम ने जो धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई उस पर सम्भवतः जरथुस्त्र मत का प्रभाव था। 


आर्ष धर्म - यह धर्म आर्ष धर्म माना जाता है इस धर्म के अनुयायियों के अनुसार इसके संस्थापक ऋषि (जरथुश्त्र) थे। जरथुश्व को यह धर्म अहुरमज्द की अनुकम्पा से सहसा प्रकाशित हुआ था। जरथुश्व ने निर्दिष्ट किया कि देवता से सम्बन्धित होने के कारण इस धर्म के सिद्धान्तों का खण्डन नहीं किया जा सकता। 


द्वैतवाद - इस धर्म का विशेषता दोहरी प्रवृत्ति है। जरधुश्त्र के अनुसार विश्व में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ क्रियाशील रहती है। सद्-असद, विवेक-अविवेक, पुण्य-पाप, शुभ-अशुभ और धर्म-अधर्म। इन दोनों प्रवृत्तियों का सम्बन्ध दो दैवी शक्तियों से हैं। सदृप्रवृत्तियों का सम्बन्ध जिस शक्ति से है उसे अहुरमज्द की संज्ञा दी गई है। यह सद्विवेक और धर्म का प्रतीक था। इनका सम्बन्ध प्रकाश, सद्बुद्धि, कल्याण और अमरत्व से स्थापित किया गया है। इसके विपरीत असत् प्रवृत्तियों का सम्बन्ध अहिरीमन से है. जो अन्धकार, पाप आदि असद् प्रवृत्तियों का प्रतीक है। 


एकेश्वरवाद - जरथुश्त्र के अनुसार इन दोनों शक्तियों में सत्ता के लिये सनातन द्वन्दु । चलता है। अन्त में शुभ प्रवृत्तियों से सम्बद्ध होने के कारण अहुरमज्द की विजय होती है। इस धर्म में इन्हीं कारणों से अहुरमज्द को सर्वशक्तिमान देव माना गया है। उसकी व्यापक सत्ता में मिथू (सूर्य), इन्द्र, अग्नि, पृथ्वी, जल और वायु सन्निहित किये गये हैं अहुरमज्द की ही अनुकम्पा से अग्नि में उष्णता, जल में शीतलता और हवा में गति प्राप्त होती है। इसकी पुष्टि सूसा और नक्श रूस्तम के अभिलेखों से की जा सकती है। इस लेख में स्पष्ट रूप से घोषित किया गया है कि अहुरमज्द आकाश, पृथ्वी एवं प्राणिमात्र का सटा है। उन्हीं की अनुकम्पा से पारसीकों को दारा प्रथम जैसा सुयोग्य और सफल शासक प्राप्त हुआ है। अभिलेख की दूसरी पंक्ति में अहुरमज्द विश्व का स्रष्टा, नियामक और संहारक माना गया है। अहुरमज्द के इन दिव्य गुणों का उपदेश देकर जरथुश्त्र ने एकेश्वरवाद पर जोर दिया। इस प्रकार अनेक शताब्दियों से बहुदेववाद के पचड़े में पड़े हुए पारसीकों को अपनी सादगी के कारण यह मत नितान्त उपयुक्त प्रतीत हुआ। हखमनी सम्राट उस धर्म से अधिक प्रभावित हुए। दारा महान् जरथुस्त्र का कट्टर अनुयायी था। नक्शे रूस्तम के अभिलेख की पहली पंक्ति में दारा ने अपनी विजयों का कारण जरथुएन की अनुकम्पा बताया है। दूसरी पंक्ति में शासन-संगठन की सफलता का आधार अहरमब्द की कृपा मानता है। लेख में स्पष्ट रूप से कहता है कि अहुरमज्द की कृपा से अशक्त और निर्बलों को सशक्तों से सुरक्षित किया। अन्त में यह स्वीकार करता है कि उसका तथा उसके परिवार के सदस्यों का सुख अहुमज्द की कृपा पर ही निर्भर है। 


सुखवादी - इस धर्म की अन्य विशेषता सुख की कल्पना है। इस धर्म के प्रवर्तकों ने सुख का कारण अहुरमज्द की कृपा मानी है। जिस समय अहरीमन और अहरमज्द का संपर्ष समाप्त होगा, अहुरमज्द की विजय होगी उसी समय संसार में अन्तिम सुख की स्थापना होगी। कत्रों में मुर्दै जीवित हो उठेंगे और जीवन ज्योति प्रकाशित होगी इस धर्म की अन्य विशेषता रागात्मकता है। उसने स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट किया है कि संसार में रह कर ही शान्ति की स्थापना हो सकती है। संसार के प्रति विराग की कसौटी संसारिक बन कर रहना होता है। इसी प्रवृत्ति को रागात्मकता कहते हैं। 


परलोकवादी - स्वर्ग और नरक के अस्त्वि में भी विश्वास था। इसके अनुसार स्वर्ग सुकृतों का निवास स्थान है जिसका संरक्षण अहरमज्द करने हैं । स्वर्ग में धार्मिकी को ही प्रवेश मिलता है। इसके विपरीत नरक दुराचारियों का स्थान है जिसका संरक्षक अहिरीभन है। नरक में स्वर्ग के विपरीत पापी लोग प्रवेश पाते हैं। जिस समय उनके पापों का क्षय हो जाता है स्वर्ग में अहुरमज्द के संरक्षण उनको आवास मिलता है। 


कर्मवादी - स्वर्ग और नरक की व्यवस्था से कर्म का सिद्धान्त निर्धारित होता है। जस्थुश्व के अनुसार मनुष्य का भावी जीवन उसके कार्यों पर निर्भर है सत्क्मों का परिणाम शुभ होता है। 


आत्मवादी - भारतीय दार्शनिकों की तरह उसने भी आत्मा पर विश्वास किया था। लौकिक शरीर आत्मा के लिए बन्धन है। मृत्यु के समय केवल शरीर का ही विनाश होता है। सृष्टि पाँच तत्वों की अपेक्षा क्षिति, जल, अग्नि और हवा इस चार तत्वों से क्रियाशील है। उसके अनुसार इन्हीं चार तत्वों में पृथ्वी का भी विलय होता है। जरथुएन पृथ्वी की पविवता में विश्वास करते थे। फलतः शव विसर्जन की विधि ने पासरीकों को नया मार्ग दिखाया। पृथ्वी को अपवित्रता से बचाने के लिये शव को ऊँचे स्थान में रखा जाना था जिससे पृथ्वी दूषित न हो। 


पुरोहित वाद - जरथुश्त्र के धर्म में मागियों का महत्वपूर्ण स्थान था। ईसानी धर्म के पुजारियों को मारगी कहा जाता था। इसमें मागियों को पशुओं को मारकर और यज्ञ के सोमरस (सोम) निचोड़ने का अधिकार था जरथुस्त्र मत पारसी सत्यता की महत्वपूर्ण देन है।

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