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कन्फ्यूशियस कौन था उसकी प्रमुख शिक्षाओं का लोगो पर प्रभाव

कन्फ्यूशियस कौन था उसकी प्रमुख शिक्षाओं का लोगो पर प्रभाव 


 चाऊकालीन दर्शन - कन्फ्यूशियस सम्प्रदाय -

चाऊ कालीन चीनियों ने बौद्धिक क्षेत्र में सर्वाधिक प्रगति दर्शन के क्षेत्र में की। इसका विकास छठवीं शती ई.पू. के बाद हुआ यह शती चीन में ही नहीं, अपितु विश्व इतिहास में धार्मिक आन्दोलन एवं दार्शनिक प्रगति की दृष्टि से प्रसिद्ध है। भारत, ईरान, यूनान आदि देशों में भी इसी शती में दार्शनिक विचारधारा प्रवाहित हुई थी। परवर्ती चाउळ काल इस दृष्टि से विशेष प्रसिद्ध है। इसमें कई दार्शनिक सम्प्रदायों का आविर्भाव हुआ था जिनमें सर्वाधिक महत्ता कन्फ्यूशिस-सम्प्रदाय को मिली थी। 


कन्फ्युशियस का जीवनचरित्र - छठवीं शती ई.पू. के दार्शनिकों में कन्फ्यूशियस (Confusias 551-479 B.C. ) का स्थान महत्वपूर्ण है। कन्फ्यूशियस अभिधान कुंग-तु-जे (Kung-Tu-Tze) का लैटिन रूप है। कुंग उपाधि थी तथा तु-त्जे इसका मूल अभिधान इसका आदि पूर्वज कुंग फांग्त्सी (Kung Faungtsi) था। जिससे इसने कुंग उपाधि धारण की थी। बाद में इसे कन्फ्यूशियस नाम से ही प्रसिद्धि मिल गई और इतिहास में इसका उल्लेख इसी नाम से किया जाने लगा। कन्फ्यूशियस का जन्म लू राज्य (वर्तमान शान्तुंग) के कुन्यफु (Chu-fu) में हुआ था। इनके पिता हो (Ho) एक प्रतिष्ठित परिवार से सम्बन्धित थे। माता येन (Yen) परिवार की थी।

 कहा जाता है कि माता ने निचुई (Nichui) की पहाड़ियों में प्रार्थना करके वरदान रूप में कन्फ्यूशिस को जन्म दिया था। जन्म के समय इनके पिता वृद्ध हो चुके थे। अतः तीन वर्ष की अवस्था में कध्ध्वलोकगामी होने के फलस्वरूप इन्हें पितु वियोग का असह्य कष्ट सहना पड़ा। पिता की मृत्यु के बाद कन्फ्यूशियस के लालन-पालन की जिम्मेदारी माता पर आयी। जिससे इनका प्रारम्भिक जीवन संकट एवं दारिद्रय में व्यतीत हुआ। कन्फ्यूशियस बचपन से ही धार्मिक अनुष्ठानों, खेलों तथा अध्ययन में रूचि रखते थे। वयस्क होने पर विद्याध्ययन के साथ-साथ इन्हें धनार्जन भी करना पड़ता था। किन्तु इस बीच इन्होंने धनुर्विद्या तथा संगीत की अच्छी जानकारी प्राप्त कर ली। संगीत में तो इनकी इतनी अधिक रूचि थी कि इसके लिए एक बार इन्होंने तीन माह तक 'मांस नहीं ग्रहण किया। कन्प्यूशिस इससे असहमत थे। कि दार्शनिक चिन्तन एवं विवाह में विसंगति हैं, कन्फ्यूशियस ने उन्नीस वर्ष की अवस्था में विवाह किया तथा शीघ्र ही एक पुत्र एवं पुत्री के पिता बन गये। किन्तु चार वर्ष बाद ही पत्नी को तलाक देने से वैवाहिक सम्बन्ध टूट गये। कन्फ्यूशियस ने पुनर्विवाह नही किया। 


गृहस्थ जीवन से विरत होने के बाद कल्फ्यूशिस ने एक स्वतंत्र विद्यालय की स्थापना कर विद्यार्थियों को शिक्षा देना प्रारम्भ कर दिया। यह विद्यालय इनका अपना ही घर था। पाठ्यक्रम में इतिहास, काव्य एवं नीतिशास्त्र का समाहार किया गया था। विद्याथी। अपनी अच्छानुसार इन्हें शुल्क देते थे। शिक्षण-विधि की सरलता तथा विषय प्रतिपादन की सुगम शैली के कारण धीरे-धीरे कन्फ्यूशियस के शिष्यों की संख्या बढ़ती गई। कन्फ्यूशियस ने सगर्व कहा था कि इन्होंने तीन हजार विद्यार्थियों को शिक्षित किया जो इनके विद्यालय से निकलकर विश्व के विभिन्न भागों में उच्च पद प्राप्त करने में सफल रहे। कन्फ्यूशियस की शिष्य-परम्परा बहुत लम्बी थी। कुछ इनके अन्यतम शिष्य थे। इनमें से लू राज्य के मंत्री मांग हि (Mang Hi) का पुत्र भी था। 

इसी के माध्यम से कन्फ्यूशियस लू शासक के संपर्क में आये थे। लेकिन अन्त में उसकी गड़बड़ी तथा नागरिक विद्रोही से उळव कर ये पड़ोसी रसी (Tsi) राज्य में चले गये। कहा जाता है कि जिस समय ये एक पर्वतीय मार्ग से जा रहे थे इन्हें आतंस्वर में विलाप करती हुई एक महिला दिखलाई पड़ी। कन्फ्यूशियस से अपने साथ चलने वाले शिष्य को उसके विषय में जानने के लिए भेजा तो उसने बताया कि उसके श्वसुर, पति तथा पुत्र को एक चीते ने मार डाला इसी लिये वह दुःखी हैं कन्प्यूशियस ने उससे पूछा कि इस प्रकार के असुरक्षित स्थान में वह क्यों रहती है? उसने उत्तर दिया कि “यहाँ कोई अत्याचारी सरकार नहीं है, इसलिए म यहाँ रहती हैं।" इस पर कन्फ्यूशियस ने अपने शिष्यों से कहा कि अत्याचारी सरकार चीते से भी अधिक कठोर होती है। कहा जाता है कि त्सी के शासक ने इनके एक उत्तर से होकर इन्हें लिन-क्यू (Lin Keu) नामक नगर की आमदनी खर्च के लिए देने का प्रस्ताव रखा था किन्तु कन्फ्यूशियस ने उसे अस्वीकार कर दिया था। सी का शासक कन्फ्यूशियस को अपना सलाहकार बनाना चाहता था, किन्तु मंत्री की परामर्श पर उसने ऐसा. नहीं किया। इसके बाद कन्फ्यूशियस लू राज्य वापस आकर विद्यार्थियों को शिक्षा देने लगे पन्द्रह वर्ष बाद कन्फ्यूशियस को लू राज्य में चुंग-तू (Chun-Tu) नगर का मुख्य नगर अधिकारी बना दिया गया। इस पद का निर्वाह इन्होंने अत्यनत कुशलता से किया। 

कहा जाता है कि इनका शासन इतना कठोर चा कि यदि मार्ग में किसी की कोई वस्तु गिर जाती थी तो, या तो वह पड़ी रहती थी या उसे उसके स्वामी के पास पहुँचा दिया जाता था। इसके बाद कन्फ्यूशियस सार्वजनिक निर्माण विभाग के कार्यवाहक अधीक्षक, तदन्तर अपराध विभाग के मंत्री बने। किन्तु अन्तिम पद पर ये अधिक दिन तक बने न रह सके। सी के शासक ने लू राज्य के शासक के पास एक नर्तकी भेजी। वह राजकार्य की परवाह किये बिना ही उसके साथ, तीन दिन तक पड़ा रहा । इसे देखकर कन्फ्यूशियस का मन विक्षुब्ध हो गया तथा उन्होंने अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया। इस समय कन्फ्यूशियस की अवस्था लगभग 35 वर्ष की थी। इसके बाद कन्फ्यूशियस एक गाज्य से दूसरे राज्य में इस आशय से भ्रमण करते रहे कि इन्हें कोई शासक मिल जाय जो इनके सिद्धान्तों को कार्य रूप में परिणत करने में सहायता करे किन्तु अन्त तक ये असफल ही रहे। इनके जीवन के अन्तिम वर्ष लू राज्य में व्यतीत हुए। इस बीच कन्फ्यूशियस ग्रन्थों का अध्ययन एवं उनकी व्याख्या करते रहे। यहीं 479 ई.पू. में उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय कम्यूशियस ने कहा था कि "मै अपने सिद्धान्त को प्रशासन में कार्यरूप में परिणत न कर सका।" 


कन्फ्यूशियस के सिद्धान्त - कन्फ्यूशियस परम्परावादी धर्मनिष्ठ तथषा आचार के पोषक थे। अतीत के सिद्धान्त तथा विचार इनके लिए श्रद्धेय थे और उन्हीं के आचरण से समाज, राज्य एवं राष्ट्र का कल्याण सम्भव था। पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने तथा उनकी उपासना को ये परम कर्तव्य समझते थे। कन्फ्यूशियस की कल्पना का समाज मनुष्य निर्मित नहीं बल्कि देवनिर्मित था। अतः इनका विश्वास था कि इसका शासक भी देवता की हो सकता है। इनका कथन था कि समाज का निर्माण शासक प्रजा, पति-पत्नी, पिता-पुत्र अग्रह-अनुज एवं मित्र-मित्र के पारस्परिक सम्बन्धों द्वारा होता है कोई समाज नभी उन्नति कर सकता है जब इन सम्बन्धों में परस्पर माधुर्य हो। यदि सम्बन्धों में परस्पर माधुर्य नहीं है तो समाज भ्रष्ट हो जायेगा। 

इस प्रकार समाज अधिक दिन तक चल नहीं सकता। उसका अन्त सुनिश्चित है। कन्फ्यूशियस समाज की इकाई परिवार तथा परिवार की इकाई शक्ति को मानते थे। अतः समाज के सुधारने के लिए स्वयं को सुधारना आवश्यक था। कन्फ्यूशियस की दृष्टि में आदर्श मनुष्य यही है जो अपनी उन्नति के साथ समाज की उन्नति का भी प्रकृष्ट प्रयत्न करें। व्यक्तिगत उन्नति नैतिक आचरण से ही हो सकती है। कन्फ्यूशियन वर्गवाद के समर्थक थे। ये मानने थे कि शासक अधिकारी, सामन्त, कृषक तथा श्रमिक को अपने अपने र वर्ग में रहकर अपने अपने कर्तव्य का समुचित निर्वाह करना चाहिए। ये कहते थे कि कौन व्यक्ति ऊँचा है, कौन नीचा है, इसका निर्णय जन्म के आधार पर नहीं वल्कि कर्म के आधार. पर करना चाहिए। कम्पयूशियस की दृष्टि में मनुष्य का चरम लक्ष्य अपनी परिधि में रहकर अपने कर्तव्य का समुचित पालन करना है वर्ग के अतिक्रमण से सामाजिक व्यवस्था बिगड़ जाती है। किन्तु कन्फ्यूशियस वर्ग परिवर्तन के विरोधी नहीं थे। वे कहते थे कि वर्ग परिवर्तन किया जा सकता है किन्तु मनुष्य जिस वर्ग से जाय उसे उसी के अनुसार आचरण करना चाहिए। कन्फ्यूशियस मानते थे कि व्यक्ति समाज से पृथक होकर उन्नति नहीं कर सकता। 


प्रश्न है, उन्नति से कन्फ्यूशियस का तात्पर्य क्या था? यह उन्नति आर्थिक भी हो सकती है, बौद्धिक तथा नैतिक भी। किन्तु कन्फ्यूशियस इन तीनों में नैतिक उन्नति के समर्थक थे। बौद्धिक ज्ञान की अपेक्षा वे सदाचार को अधिक महत्व देते थे। उनका विश्वास था कि नैतिक बल के समक्ष शस्त्र बल भी निर्बल पड़ जाता है। नैतिक उन्नति के लिये वे बुद्धिमता, साहस परोपका भावना को आवश्यक मानते थे। वे कहते थे कि जब कोई मनुष्य किसी को अपने से अधिक गुणी देखता है तो वह उसके समान बनने की चेष्टा करता है। इसी प्रकार दोष देखकर अपनी में दोष दूंढने का प्रयत्न करता है। इनकी दृष्टि में कोई व्यक्ति सदाचारी तभी हो सकता है जब उसमें दया, करूणा, ईमानदारी विवेक, नम्रता तथा आत्मसम्मान की भावना कूट कूट कर भरी हो। वे कहते थे कि मनुष्य को छोटी-छोटी बातों जैसे उठने-बैठने, खाने-पीने, पहनने इत्यादि में शिष्टाचार का पालन करना चाहिए। मुनष्य अपने अधिकार की रक्षा करे किन्तु कर्तव्य का समुचित निर्वाह करते हुए ही। कन्फ्यूशियस कहते थे कि जिस प्रकार के आचरण की अपेक्षा हम दूसरों से नहीं करते हमें वैसा आचरण नहीं करना चाहिए। कन्फ्यूशियस लौकिकवादी थे। पारलौकिक चिन्तन में वे तनिक भी रूचि नहीं लेते थे। आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नरक इत्यादि जैसे गम्भीर विषयों के विवाद से वे सदैव अपने को बचाने की चेष्टा करते रहे। गौतम बुद्ध की भाँति वे भी देवताओं के विषय में नहीं पड़ना चाहते थे। जब एक बार कन्फ्यूशियस के किसी शिष्य ने मृत्यु के विषय में उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि "जब तुम जीवन के विषय में नहीं जानते तो मृत्यु के विषय में कैसे समझ सकते हो।" 


कन्फ्यूशियस के राजनीतिक विचार भी आचार शास्त्र पर आधारित थे। वे मानते थे कि जो व्यवस्था विश्व तथा प्रकृति का नियन्त्रण करती है वहीं समाज एवं व्यक्ति को भी नियंत्रित करती है। जैसे ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति पर ति एन का शास्न है वैसे समाज पर उसके प्रतिनिधि का। शासक, मी तथा अधिकारियों की स्थिति विश्व-व्यापार के अनुरूप है। वे मानते थे कि कोई भी शासन शस्व-बल पर नहीं चल सकता। इसके लिए लोकमत आवश्यक है। लोकमत तभी मिल सकता है जब शासक चरित्रवान तथा प्राचीन अनुष्ठानों का पालन करने वाला हो। दुराचारी होने पर शासक शासन की दैवी अनुमति खो देता है। शासक के सदाचारी होने पर ही राज्य की सार्वभौमिक उन्नति होती है। शासक के साथ-साथ अधिकारियों के चरित्रवान एवं अनुशासित होने के ये समर्थक थे। राजा के अनैतिक कार्यों से उळब कर ही कन्फ्यूशियस ने अपना पद छोटा था।

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