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चाऊ कालीन सांस्कृतिक उपलब्धिया

 चाऊ कालीन सांस्कृतिक उपलब्धिया


1. शासन प्रणाली - चाऊ युग का शासन एक प्रकार का संघीय शासन या सम्राट के आधिपत्य में सामन्त स्वतन्त्र शासन करते थे। जब तक सम्राटों में शक्ति और उनका व्यक्तित्व आदरणीय था, जब तक नियंत्रण रहा किन्तु उनके आचरण प्रष्ट होने पर तथा क्षीण होने पर सामन्तों में अधिकाधिक स्वच्छन्दता और पारस्परिक कलह बढ़ गयी। 

चाऊ राजा बांग (आसमान) का पुत्र माना जाता था और उसी को महायज्ञ करने का अधिकार था। तत्कालीन विचार के अनुसार पुरखों की इच्छा, अपने गुणों तथा देव की इच्छा से ही किसी व्यक्ति को राजत्व प्राप्त होता था। जिस प्रकार धरती और आकाश का सम्बन्ध माना जाता था उसी प्रकार प्रकाश (देव) का राजा से सम्बन्ध स्वीकार किया गया था। छ: ऋतुओं की प्रतिमूर्ति छ: मन्त्रियों की नियुक्ति की जाती थी। ये केन्द्र द्वारा शासन का संचालन करते थे। व्योम मन्त्री को वित्त और अर्थ-विभाग, पार्थिव मन्त्री को शिक्षा एवं स्थानीय शासन, बसन्त मन्त्री को धर्म और योग, ग्रीष्य मन्त्री को युद्ध विभाग, शरद मन्त्री को दण्ड विभाग का कार्य सुपुर्द किया गया था। 


2. आर्थिक व्यवस्था - चाऊ शासन में कृषि का भी व्यवस्थित प्रबन्ध किया गया। एक वर्ग ली (1/3 मील) को नी भागों में बाँट कर आठ भाग प्रजा को दिये जाते थे और नवों भाग, जो प्रायः बीच का भाग होता था, राज्य के लिए सुरक्षित रहता था। इस प्रथा को 'निग ति ऐन. विधान कहते थे। चीन चिह्न के अनुसार क्षेत्र विभक्त किये गये थे। कृषक लोग बारी-बारी से राजा की भूमि की जुताई सिंचाई करते, फिर अपने खेतों का काम करते थे वृद्धों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी सम्भवतः राज्य की होती थी। असहायों, आशक्तों, गूंगों, बहरों और पागलों का भी भली प्रकार पालन-पोषण किया जाता था। चाऊ राजाओं ने दलदलों को सुखाकर नहरें खुदबाकर और बेकार जमीन को कृषि के योग्य बनाकर कृषि का अच्छा विस्तार किया। उसी युग में, धातु के सिक्कों के प्रचलन से व्यापार ने अच्छी उन्नति की जिससे नये-नये नगर स्थापित होते गये। चाऊ काल ने व्यवसाय में भी अच्छी उन्नति की। लकड़ी, धातु, चमड़े, रंगसाजी, लोहारी, स्थापत्य आदि के कामों में अधिक सफाई तथा उन्नति हुई। व्यवसायों की वृद्धि से नगरों की संख्या बढ़ने लगी। उद्योग धन्धे उस समय वंशानुगत थे। नागरिक जीवनचर्या के कारण शिष्टाचार और सभ्यता का विकास होने लगा क्रय-विक्रय में ताँबे के सिक्कों, रेशम के कपड़ों, सोने के टुकड़ों, मोती एवं रत्नों से काम लिया जाता था। 


3. सामाजिक संगठन - चीन का समाज प्राचीनकाल से ही वर्गों में बंटा हुआ था। इन वर्गों में सम्राट या राज्यों के स्वामियों का वर्ग सबसे ऊंचा समझा जाता था। शासक वर्ग के नीचे पाँच मुख्य वर्ग थे। ये बुद्धिजीवी, व्यापारी, कारीगर, किसान और दासों के वर्ग थे। भारत की भाति चीन में भी प्राचीन काल-बुद्धि में जीवियों या साहित्यकारों का बहुत आदर किया जाता था। भारत में ब्राह्मण की जन्म से उच्च स्थिति प्राप्त होती थी, किन्तु चीन में कोई भी शिक्षा के द्वारा इस उच्च स्थिति को प्राप्त कर सकता था। किन्तु यह स्थिति सिद्धान्त रूप से ही थी, बास्तविक स्थिति इससे भिन्न थी। सामाजिक समानता कभी भी विद्यमान नहीं रही। शिक्षा पर इतना अधिक व्यय होता था कि धनी जमींदार के अतिरिक्त किसी के लिए शिक्षा प्राप्त करना असम्भव था। इसका यह परिणाम हुआ कि समाज का वर्गों में विभाजन प्रायः स्थायी ही रहा। 


यह बात बड़े महत्व की है कि तत्कालीन समाज में योद्धाओं की स्थिति नीची थी। सेना में संदिग्ध चरित्र के व्यक्ति ही भरती होते थे। चिन वंश के सम्राट ने आक्रमणकारी बर्बर जातियों को सेना में भरती होने के लिए प्रोत्साहित किया। साधारणतया उन्हें दास होकर ही मजदूरी करनी पड़ती थी और वे सड़क बनाने या भवन निर्माण के कार्य में लगाये जाते थे। 


4. शिक्षा - चाऊ युग में शिक्षा के प्रचार के लिए अच्छा प्रयत्न किया गया। पच्चीस ग्रामीण कुटुम्बी के लिए एक प्रारम्भिक पाठशाला थी। माध्यमिक शिक्षा के लिए एक पाठशाला प्रति पाँच सौ कुटुम्ब के लिए स्थापित की गयी थी। उच्च शिक्षा के लिए उत्तरोत्तर महत्व को तीन प्रकार की पाठशालाएं स्थापित की गयी थी। ढाई हजार कुटुम्बियों के नगरों में एक शिक्षालय था। बड़े नगरों में उच्च और राजधानी में सर्वोच्च शिक्षा के विद्यालय प्रतिष्ठित थे। छः से आठ वर्ष तक की उम्र से बालक की शिक्षा का आरम्भ होता था और पच्चीस वर्ष की उम्र तक वह चलती रहती थी। सबसे पहले विनय, आचरण, शिष्टाचार तथा नैतिकता की शिक्षा दी जाती थी बालिकाओं की शिक्षा दस वर्ष से बीस वर्ष तक होती थी, किन्तु वह घरों में ही दी जाती थी। उसका घर के बाहर जाना अनुचित माना जाता था। 


5. साहित्य - चाऊ युग में पटा और गद्य के रूप में साहित्य की सृष्टि हुई थी। कविता में व्यंग्य, प्रेम भावना, उत्सवों और विशेष अवसरों पर गाने योग्य गीत आदि का शइचिंग नामक संग्रह अब तक विद्यमान है। इनमें अनुश्रुतियां, गाथाएँ, राजकीय कारनामें, कानूनी फैसले, भूमिदार के पट्टे आदि मिलते हैं। शासन सम्बन्धी समाचार, आज्ञाएँ वित्त सम्बन्धी, भौगोलिक विवरण एवं राजनीति सिद्धान्त भी गद्य में लिखे जाते ये उनका भी संग्रह शुचिंग नामक ग्रन्थ में विद्यमान है। लेखक सामयिक घटनाओं को कालक्रम, तिथि तथा व्यक्तियों के नाम सहित लिपिबद्ध करते थे। इनसे हमें तत्कालीन इतिहास का थोड़ा-बहुत ज्ञान प्राप्त होता है। इस युग में गणित तथा ज्योतिष की ओर चीनियों की उत्सुकता बढ़ने लगी थी। 


6. धर्म - चीनियों का विश्वास था कि जगत दैवी शक्तियों से भरा हुआ है। अनेकानेक प्रकार के देवता एवं देवियाँ विश्व में विद्यमान हैं । गृह, खेत, नदी, नाले, जल-थल-नभ जहाँ देखो उनकी सत्ता दिखायी देती हैं। उनके अतिरिक्त पुरखों की भी अदृश्य रूप में सत्ता है । चाऊ युग में धार्मिक विश्वास और धारणाएँ मूलतः एक सी होते हुए भी कल्पनात्मक एवं व्यावहारिक दृष्टि से परस्पर भिन्न और विविध प्रकार की थी देवी-देवताओं की शक्तियों और क्षेत्रों के विषय में भी भिन्नता थी। कोई देवता बहुत बड़े और कोई छोटे गिने जाते थे। यद्यपि बड़ी महत्वशासली दैवी शक्तियों में पृथ्वी और आकाश की गिनती थी तथापि सर्वोपरि शक्तिमान तीतिएन अथवा शांगती माना जाता था। लोगों का विश्वास था कि बिना दैविक शक्तियों की सहायता के मनुष्य की सफलता और सुख नहीं प्राप्त हो सकता। इसलिए उनको तुष्ट करने के लिए योग एवं कर्मकाण्ड प्रचलित हुए। पूजा में अन्न, मांस और नर की भी बलि दी जाती थी। चीनियों में लिंग पूजा भी प्रचलित थी। 


चीन में पुरोहितों का अस्तित्व नहीं था। गृहपति अथवा राज्याधिपति पूजा करवाता था। उसकी सहायता के लिये उच्च कुल के व्यक्ति जो विधि - विधानों से अच्छी तरह परिचित होते थे. बुला लिये जाते थे। कभी-कभी देवी या देवता किसी व्यक्ति पर चाहे पुरुष हो अथवा स्त्री चढ़ आता था जिससे उसके भविष्य का आभास हो जाता था और उसे वह घोषित कर देता था।

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