सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

चीनी सभ्यता का सामाजिक एवं आर्थिक जीवन

चीनी सभ्यता का सामाजिक एवं आर्थिक जीवन 


 सामाजिक संगठन होगही तट के अनेक प्रस्थिति के उखाने से पुरातत्ववेत्ताओं को दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. की बहुत सौ समाधियाँ मिली है जिनमें मृतकों के साथ आवश्यक उपकरण सहित दसियों और कभी-कभी तो सैकड़ों लोगों को दफना दिया गया था। ऐसे लोगों के सिर काट लेने के बाद हाथ-पैर बाँधकर दफनाया जाता था उनका विश्वास था कि वे मृतात्मा की सेवा करेंगे एक हड्डी की पट्टी पर यह लिखा मिला है कि दास को इस लिये जलाया जा रहा है ताकि वर्षा हो। ये लिखित तथा भौतिक सामप्रियों इसकी साक्षी हैं कि इस युग में समाज में शोषक तथा शोषित दो वर्ग थे। शोषक वर्ग में शासक, राजपरिवार के सदस्य, पुरोहित, योद्धा आदि आते थे. तथा शीषित वर्ग में श्मिक तथा दास थे। पहले वर्ग का दूसरे पर पूर्ण नियन्त्रण था। 


कुछ विद्वानों का विचार है कि दासों के सिर गोद दिये जाते थे। इससे उनकी पृथक पहचान बनी रहती थी तथा भागने पर उन्हें सरलतापूर्वक पकड़ लिया जाता था। दासी के साथ स्वतंत्र लोग किस प्रकार का बर्ताव करते थे स्पष्टतः ज्ञात नहीं है, पर लगता है कि उनके साथ कठोरता का व्यवहार नहीं किया जाता था क्योंकि वे सेना में भरती किये जाते थे। इस प्रकार उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध नहीं थी। शांग कालीन सामाजिक गठन कौटुम्बिक था। इस मान्यता को पितरपूजा के कारण विशेष महत्ता मिली थी। उनका विश्वास या कि पूर्वज अथवा पितर मनुष्य को सुखी एवं समृद्ध बना सकते हैं परिवार की शक्ति व प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए लोग अपने प्राणों तक की बलि दे देते थे। उनका विश्वास था कि ऐसा करके वे अपना स्थान अपने पूर्वजों में सुरक्षित कर लेंगे। परिवार के साथ विश्वासघात करने तथा वंश समाप्त करने को महापराध समझा जाता था। परिवार में किसी की मृत्यु होने पर परिवार का स्वामित्व उसके भाई और भाई के अभाव में पुत्र को मिल जाता था। समाज में, विशेष कर उच्च वर्ग में, स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी। स्वियां, शकुन विचार तथा भविष्यवाणा भी करती थीं। बहुविवाह प्रचलित था पर अत्यन्त मर्यादित ढंग से। शांग काल में दासियों के होने की साक्षियाँ भी मिली है। दासियाँ युद्धबंदी के रूप में आती थी। मालिक इनसे घरों में हल्का-फुल्का काम लेने के साथ अपनी कामवासना भी शान्त करते थे। 


शांग कालीन चीनी मनोरंजन-प्रिय थे। शिकार का खूब प्रचलन था। इसे आनन्द मनाने के साथ-साथ युद्धाभ्यास के लिये भी किया जाता था। ये लोग सिले हुये कपड़े पहनते थे. जिनमें बाहें होती थी। प्रारम्भ में सन के कपड़े पहने जाते थे पर शांगि काल में रेशम के कपड़े पहनने का रिवाज बढ़ गया था। सर्दियों में बालदार खालों का प्रयोग करते थे। ये लोग कई प्रकार के गहने पहनते थे। इनका निर्माण सुअर व हार्थी दांत, शंख, सीपी आदि की सहायता से किया जाता था। बालों में पिन खोसने का रिवाज भी था। उत्खननों से कुछ वाद्ययंत्र भी मिले हैं जिससे इनकी संगीत के प्रति अभिरूचि का पता चलता है। 


आर्थिक संगठन - शांग काल में चीनी कांस्यकालीन सभ्यता भौतिक दृष्टि से उन्नति पर पहुंच गयी थी। समृद्धि मुख्यतः कृषि, पशुपालन तथा शिकार पर निर्भर थी हांगहो की उर्वर घाटी कृषि के लिए अत्यन्त उपयोगी थी, जिससे खेती इनका मुख्य व्यवसाय बन गया था। फसल बोने में शकुन देखते थे तथा पूर्वजों की पूजा करते थे। मुख्य रूप से जार तथा बाजरा की खेती की जाती थी। आगे चलकर गेहूँ तथा धान भी बोया जाने लगा। अनाज के साथ-साथ ये जूट (सन) की खेती करते थे इससे कपड़ा बनाया जाता था। ये लोग रेशम के कीड़े पालते थे। सिंचाई करना जानते थे तथा इसके लिए आँध बनाते थे। 

अभी तक बैलों से खींचे जाने वाले हल की जानकारी शायद इन्हें नहीं थी। अतः कुदाल से गोड़कर खेती की जाती थी। खेती अधिकतर परूष करते थे। केवल रेशम उत्पादन में स्त्रियाँ लगती थीं। कृषि के बाद दूसरे स्थान पर पशुपालन था। ये लोग हाथी, घोड़े, कुत्ते, बैल, सुअर, भेड़, बकरी, हिरण, सि तथा बन्दर पालते थे। गाय, बैल, सुअर, भेड़, कुत्ता तथा मुर्गी का मांस खाया जाता था। कुत्तों, भेड़ों तथा बकरियों की बलि भी चढ़ाई जाती थी। शांग कालीन चीनी कुत्ते का मांस खाने के बड़े शौकीन थे। घोड़ो, बैल तथा भसि का उपयोग माल ढोने में किया जाता था। प्रसंगतः इस बात का उल्लेख किया जा सकता है कि शांग कालीन चीनी इन पशुओं के मांस का उपयोग तो बड़े चाव से करते थे लेकिन इनसे मिलने वाले अमृत रूपी दूध तथा उनसे बनी चीजों के उपयोग से वंचित थे। शांग काल में चीन से चारागाह बहुत अधिक पाये जाते थे। व्यापार का प्रचलन प्रायः नहीं था। शहर तथा गाँव के निवासी आम तौर पर अपनी-अपनी आवश्यकता की वस्तुयें उत्पादित कर लेते थे। इस प्रकार शहर तथा गाँव दोनों अपने-अपने में आत्म-निर्भर थे। विनिमय के माध्यम से थोड़ा बहुत व्यापार प्रचलित था। 

विनिमय में घोड़े, गाय बैल तथा अनाज का प्रयोग किया जाता था सिक्कों के रूप में कौड़ियाँ प्रयुक्त की जाती थी। शांग काल में युद्धोपयोगी उपकरण, रथ, नाब तथा भाण्ड बनाने के धंधे प्रचलित थे। ये लोग मिट्टी के अच्छे बर्तन बना लेते थे। इसके लिए साधारण मिट्टी तथा उजली मिट्टी का उपयोग किया जाता था उजली मिट्टी के बर्तनों का उपयोग प्रायः श्रीमन्त करते थे गीले बर्तनों पर नक्काशी करके उन्हें पकाया जाता था ये बर्तन शीशे की तरह चमकते रहते थे। इनके कुछ बर्तन 4.5 मीटर उळचे तथा लगभग 2.19 मीटर चौड़े मिले हैं। इसका उपयोग समान रखने तथा पानी इकट्ठा करने के लिए किया जाता था। मिट्टी के साथ-साथ ये लोग कासे के बर्तन भी बनाते थे जिन पर अनेक प्रकार की आकृतियाँ बनी रहती थीं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे