सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्षेत्रवाद का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति एवं दुष्परिणाम

 क्षेत्रवाद का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति एवं दुष्परिणाम 


क्षेत्रवाद का अर्थ एवं परिभाषा - क्षेत्रवाद से आशय किसी एक क्षेत्र विशेष के व्यक्तियों की उस धारणा से है जिसके अन्तर्गत उनमें विशेष प्रेम तथा पक्षपात् की भावना होती है। क्षेत्रवाद में एक क्षेत्र के लोगों में सामूहिक हितों, की भावना होती है। क्षेत्रवाद में एक क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र से अपने को श्रेष्ठ समझते हैं तथा वे अपने आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करते हैं क्षेत्रबाद को विभिन्न विद्वानों ने निम्न प्रकार परिभाषित किया है, "क्षेत्रवाद एक क्षेत्र विशेष के व्यक्तियों के विशेष अनुराग तथा पक्षपातपूर्ण धारणाओं से सम्बद्ध है।" - हैंडविंग हिंट्ज 


"क्षेत्रीयतावाद ऐसे क्षेत्रों को परिभाषित करने का एक प्रयत्न है जो कि सामाजिक भावना की इकाइयाँ हैं, और जहाँ तक सम्भव है वे आर्थिक जीवन के क्षेत्र में भी हैं और वे प्रशासकीय कार्यों की इकाइयों के रूप में भी उपयुक्त हैं ।" - जी डी. एच. कोल 


क्षेत्रीयतावाद की प्रकृति - 


(1) क्षेत्रीयतावाद एक भावना है। 

(2) इसमें क्षेत्र विशेष के लोग अपने क्षेत्र व संस्कृति से अनुराग रखने के साथ अन्य क्षेत्र व संस्कृति से घृणा करते हैं। 

(3) क्षेत्रीयतावाद से समाज तथा राष्ट्र के प्रगति व विकास में बांधा पहुँचती है।

(4) प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट संस्कृति व जीवन प्रतिमान होते हैं जिनका क्षेत्रीय लोगों के लिए विशिष्ट अर्थ होता है। 

(5) क्षेत्रवाद की भावना से प्रेरित व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह राष्ट्रीय हितों की तुलना में क्षेत्रीय हितों को ज्यादा महत्व प्रदान करते हैं। 

(6) क्षेत्रवाद अन्य मानवीय व्यवहार प्रतिमानों की तरह एक व्यवहार है, जो परिस्थिति विशेष में सीखा जाता है।

(7) क्षेत्रीयतावाद की तीव्रता सांस्कृतिक व भौगोलिक विभिन्नता के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है।

(৪) क्षेत्र विशेष में सामान्य संस्थाओं का प्रादुर्भाव होता है।

(9) क्षेत्रीयता की भावना पूर्वजों से प्राप्त होती है। यह कोई आकस्मिक घटना न होकर सीखी हुई संकीर्ण मनोवृत्ति और पक्षपात होती है। 

(10) क्षेत्रीयतावाद की एक अन्य विशेषता यह भी है कि प्रीयः प्रत्येक क्षेत्र के व्यवसाय व पेशे भिन्न-भिन्न होते हैं।

(11) जनसंख्या का घनत्व तथा आकार प्रत्येक क्षेत्र में एक समान नहीं होता है। 

(12) क्षेत्रों के मध्य ईर्ष्या व प्रतिस्पर्धा की भावना पाई जाती है। प्रत्येक क्षेत्र अपने क्षेत्र को अन्य क्षेत्रों की तुलना में श्रेष्ठ व प्रगतिशील सिद्ध करने का प्रयत्न करता है। 

(13) सामान्यतः क्षेत्रों में राजनैतिक चेतना का अभाव पाया जाता है परन्तु आज के युग में प्रत्येक क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियों स्थान सुनिश्चित कर चुकी हैं। क्षेत्रीय राजनैतिक दलों की संख्या में वृद्धि हुई है। 

(14) प्रायः क्षेत्रीय व्यक्तियों के अन्दर स्वशासन का अहम पाया जाता है, क्षेत्रीय राजनीतिक दल इसी अहं के मूर्तरूप हैं। क्षेत्र विशेष के सभी नागरिकों का जीवन समान होता है। 


क्षेत्रवाद के बहुआयामीय प्रकृति की ओर संकेत करते हुए हेडविड हिट्ज ने लिखा है क्षेत्रवाद एक क्षेत्र विशेष के व्यक्तियों के विशेष अनुराग तथा पक्षपातपूर्ण धारणाओं से सम्बद्ध है, और इसलिए इसके अन्तर्गत आधुनिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक जीवन की विविध समस्याओं जैसे अल्पसंख्यकों की समस्या, प्रशासनिक विकेन्श्वकरण, स्थानीय स्वशासन, स्वदेश पूजा तथा स्थानीय देश भक्ति आदि का समावेश होता है। 


क्षेत्रीयतावाद के दुष्परिणाम - 


(1) राष्ट्रीय एकता के लिए घातक - क्षेत्रीयतावाद के दुष्परिणाम का सबसे बुरा स्वरूप देश की एकता व अखण्डता खतरे में है। क्षेत्रीयतावाद की भावना से प्रेरित होकर क्षेत्रीय लोग राष्ट्रीय धारा से अलग-थलग हो जाते हैं और प्रायः राष्ट्रीय प्रभुसत्ता को मानने से इन्कार कर देते हैं। वे लोग क्षेत्रीय स्वार्थों तक ही सीमित रहते हैं, उनका प्राथमिक सम्बन्ध क्षेत्र से और राष्ट्र से द्वैतीयक सम्बन्ध होता है। 


(2 ) आर्थिक प्रगति में बाधक - क्षेत्रीयतावाद की भावना से क्षेत्रों में प्रतियोगितात्मक अन्तः क्रिया होती है, सहयोग की भावना नहीं रह जाती है, मानव शक्ति का सदुपयोग नहीं हो पाता है। अन्तक्षेत्रीय संसाधनों का भी उचित उपयोग नहीं हो पाता है। ऐसी परिस्थिति में गरीबों, बेरोजगारों और असंतुलित विकास को बढ़ावा मिलता है। 


(3) राजनैतिक अस्थिरता व तनाव - क्षेत्रीयतावाद के फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में तुनाव के साथ-साथ राज्य सरकारों तथा केन्द्रीय सरकार के मध्य तनाव की स्थिति पायी जाती है। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में विशेष कर जब नेता चमत्कारिक होता है यथा तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, मिजोरम में अस्थिरता का भय बना रहता है। स्पष्ट है कि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में तनाव, विभिन्न राज्यों में तनाव, राज्य व केन्द्र में तनाव, राज्य की राजनीतिक अस्थिरता बहुत कुछ क्षेत्रीयतावाद की उपज मानी जा सकती है। 


(4) भाषावाद, प्रान्तीयतावाद - क्षेत्रीयतावाद की भावना ने भाषावाद एवं प्रान्तीयतावाद को बढ़ावा दिया है। इसने इन समस्याओं को और तीव्र किया है। 


(5) राष्ट्रभाषा के विकास में बाधा - इसी का दुष्परिणाम है इसके अतिरिक्त क्षेत्रीयतावाद की भावना ने अल्पसंख्यकों की समस्या व माँग को बढ़ावा दिया है। इसके कारण सामाजिक शान्ति में भी बाधा उत्पन्न होती है। अवसरवादी व स्वार्थी नेताओं की संख्या में वृद्धि हुई है। 


क्षेत्रीयतावाद को रोकने के उपाय - 


क्षेत्रीयतावाद एक संकीर्ण मनोवृत्ति है। मानव जाति स्वभावतः स्वार्थी होती है, अतः स्वार्थ से प्रेरित होकर क्षेत्रीयतावाद को अपना बैठता है। क्षेत्रीयतावाद के जन्म व विकास के पीछे अनेकों कारक हैं। अतः इनका निराकरण भी बहुमार्गीय होना स्वाभाविक है। 


(1) उच्च व नैतिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना चाहिए, लोगों में संकीर्ण मनोवृत्ति न जन्म ले सके। उचित और अनुचित का निर्णय संवेगात्मक रूप से न करके तर्क आधार पर करें।

(2) शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए कि छात्रों में तथा समाज में राष्ट्रीय चरित्र जैसी चीज जन्म ले सके। 

(3) राष्ट्र के प्रत्येक क्षेत्र को राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक विकास के समान अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। 

(4) किसी क्षेत्रीय भाषा व संस्कृति के साथ भेदभाव का व्यवहार नहीं अपनाना चाहिए। अल्पसंख्यकों की संस्कृति के सुधार पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। 

(5) भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को क्षेत्रीय जनमानस के शोषण से रोकना चाहिये। क्षेत्रीय समस्याओं का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए जैसे गोरखालैण्ड व पंजाब की समस्या प्रारम्भ में कांग्रेस (आई) द्वारा बढ़ाई गई थी जो बाद में राष्ट्र के लिए खतरा सिद्ध हुई है। 

(6) विभिन्न क्षेत्रों के मध्य सांस्कृतिक आदान- प्रदान का कार्यक्रम होना चाहिए।

(7)केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों के मध्य सम्बन्ध मधुर, सौहार्दपूर्ण तथा तार्किक होने चाहिए। किसी राज्य के साथ विभेद नीति नहीं अपनाना चाहिए। 

(8) स्वास्थ्य साहित्य, आवागमन के साधनों की वृद्धि, अन्तर्राज्यी भाषा आदि क्षेत्रीयतावाद को रोकते हैं। 

(9) क्षेत्रीयतावाद को बढ़ाने वाले व्यक्तियों व संस्थाओं को दण्ड दिया जाना चाहिए।

(10) सामाजिक स्तरीकरण को यथासम्भव कम करना चाहिए। 

(11) राष्ट्रीय संस्थाओं व संगठनों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

(12) समाज में दलित, शोषित व पिछड़े वर्ग के विकास को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 

(13) विभिन्न क्षेत्रों के साहित्य को अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जाना चाहिए।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे