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चीन में चिन वंश के प्रमुख शासकों एवं उनके कार्य

चीन में चिन वंश के प्रमुख शासकों एवं उनके कार्य


 चीनी सभ्यता का मध्य यु वाऊ राजवंश के अवसान से प्रारम्भ होता है। परन्तु इस वंश का अन्तर कोई आकस्मिक टना न होकर, शताब्दियों तक क्रमशः घटित होने वाले पतन की एक कहानी है। इस हास-काल में आन्तरिक विद्रोहों और बाह्य आक्रमणों के फलस्वरूप विभिन्न प्रान्त स्वतंत्र अथवा विद्रोहों राजवंशों के शासन में आते रहे थे। चाऊ बंश के पुराने सामन्त नाममात्र के ही सामन्त रह गये थे उन्होंने अपने अधिपति को कर एवं उपहार आदि देना भी बन्द कर दिया था। दुरवस्था के इस. पराकाष्ठा पर पहुँच कर बाऊ वंश का अन्तिम शासक 256 ई. प. में मारा गया और इस राजकत का अन्त हो गया। चाऊ वंश के अवसान के पूर्व ही चीन में स्वतंत्र राज्यों की कुल संख्या 170 पहुंच गयी थी. परन्तु 423 ई.पू. तक आते-आते आपसी संघर्ष और एक दूसरे की सता का उन्मूलन कर राज्य विस्तार की नीति के कारण उनकी संख्या घट कर केवल सात रह गयी । 


चिन-बंश और उसके क्रिया कलाप - इन्हीं सात राज्यों में एक का नाम चिन् या जिसके सिंहासन पर 221 ई.पू. में शिह-हांग-टी नामक एक शासक अभिषिक्त हुआ जिसने ‘प्रथम समाट' की उपाधि धारण की। उसकी यह उपाधि सर्वथा सार्थक थी, क्योंकि उसने अपने बाहुबल से चीन में एक ऐसे साम्राज्य का निर्माण किया था जिसमें समस्त संघर्षशील रियासतें आत्मसात हो गयी और बाऊ युग की विरासत सामन्तशाही भी अपनी सत्ता खो बैठी। पीत नदी के विशाल मोड़ से यांग-सी नदी के दक्षिण स्थित कुछ क्षेत्रों तक के इलाके को उसने 36 प्रशासकीय खण्डों में बाँट दिया और नवीन विजयों के फलस्वरूप प्राप्त भू. भाग को उसने पाँच या छः पृथक् प्रशासकीय मण्डलों में विभक्त कर दिया। इन प्रांतीय क्षेत्र का प्रबन्ध करने वाले कर्मचारी सीधे सम्राट के प्रति उत्तरदायी हुआ करते थे और साम्राट] क्षेत्रीय भावना को तिरस्कृत कर उन्हें एक से दूसरे प्रांतों में स्थानान्तरित करता रहता था देश के असंयत एवं कुख्यात व्यक्तियों को उसने सीमान्त प्रदेशों में बर्बर शत्रुओं से देश की सुरक्षा कार्य के निमित्त भेज दिया और साथ ही चीन की उत्तरी सीमा को मंगोलिया के आततायियों से संरक्षण के प्रयोजन से पहले की विश्रृंखल दीवारों को जोड़ कर एक बड़ा प्राचीर बनवाया जिसे चीन की विशाल भित्ति (दीवार) कहा जाता है। इस दीवार से शत्रु की निगरानी करने के लिए उसने इस पर बुर्ज तथा प्रहरी - कक्षों का निर्माण करवाया तथा खतरों के मौके पर दिन में धुएँ द्वारा और रात में प्रज्वलित अग्नि द्वारा राजधानी को संकेत देने की व्यवस्था भी कर दी। इस प्रकार अन्दर और बाहर दोनों ही ओर से उसने केन्द्रीय सत्ता को सुदृढ़ किया और शीर्ष-स्थान पर स्वयं ही होने के कारण वह चीन को सबसे शक्तिशाली सम्राट बन गया जिसका आतंक उसने शत्रुओं और कर्मचारियों पर एक जैसा ही था। यही कारण है कि उसकी तुलना मीत्से के अनुयायी बिस्मार्क से भी की जाती है जो न तो अपने अतिरिक्त किसी ईश्वर में विश्वास करता था और न ही अपने देश की एकता के लिए 'रक्त और लौह' की कठोर नीति अपनाने में हिचकता था।' 

रेने य्रुस्सेट ने उसे "चीन का सीजर कहा है। चीन के इतिहासकारों ने उसे दृढ़ संकल्प, अदम्य उत्साह तथा अभूतपूर्व क्षमता से सम्पन्न व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है। वह निर्भीक तथा शत्रुओं के लिये भय का एक सबल कारण था। उसके स्वरूप की प्रशंसा करते हुए एक समकालीन लेखक ने लिखा है कि उसकी आँखे चौड़ी एवं नेत्र विशाल थे तथा वाणी प्रभावोत्पादक थी। वह पीन क्ष एवं सिंह-विक्रान्त था। उसने शासन के वास्तविक अधिकारों को अपने हाथों में केन्द्रित कर लिया था। साम्राज्य का कोई भी महत्वपूर्ण कार्य उसकी इच्छा अथवा अनुमनि के अभाव में नहीं हो सकता था। इसका इतना आतंक एवं प्रभाव था कि उसके कर्मचारी उसकी आज्ञा का पूर्ण पालन करते थे और इसमें उन्हें किसी प्रकार का दृढ़ दिखाने का दुस्साहस नहीं हो सकता था। उसके दरबार में अनुशासन का वातावरण वर्तमान रहता था तथा उसके मंत्री एवं पदाधिकारी उसे श्रद्धा एवं शिष्टाचार दिखाते थे उसकी आज्ञा के अनुसार उसके वंशज द्वितीय सम्राट, तृतीय सम्राट तथा इस प्रकार की उपाधियाँ क्रमशः अनन्त काल तक धारण करते। इस प्रकार वह अपनी बंग-परम्परा को अक्षुण्ण बनाना चाहता था। 


एक सफल विजेता तथा साम्राज्य-निर्माता होने के अतिरिक्त वह एक योग्य शासन-कर्ता श्री था। वह चीन में इतिहास में एक सफल शासक के रूप में चित्रित किया गया है। उसने अपने साम्राज्य को सुसंगठित करने के लिये कई सुधार किये। उसे इस कार्य में अपने सुयोग्य मंत्री लि-सू से बहुत बड़ी सहायता उपलब्ध हुई थीं। उसके राजनीतिक विचार सम्राट के विचारों में मेल थाने थे। वह "लिगलिस्ट' विचारधारा का अनुयायी था। 


इस विचारधारा के दार्शनिक कन्फ्यूशियस के उस मत के विरुद्ध थे जिसके अनुसार राज्य का अस्तित्व वस्तुतः लोकमंगल के हेतु हुआ करता है, न कि सम्राट टिल के निपित। जो शासन जन-कल्याण की दिशा में असमर्थ सिद्ध होता है, यह सर्वथा निन्दलीय एवं हटा देने योग्य है। कन्फ्यूशियस ने शासक की आतंकवादी नीतियों एवं शक्ति-प्रयोग का खण्डन करते हुए जनता की मनोभावनाओं को आदर-पूर्ण दृष्टि से देखा था। परन्तु लिगलिस्ट' विचारकों ने उपर्युक्त दृष्टिकोण का खंडन किया। उसके अनुसार सपाट-हित प्रधान है। उसके निमित्त व्यक्ति-हित सर्वथा उपेक्षित किया जा सकता है। उन्होंने एक ऐसे एकछव सामज्य की कल्पना की, जिसमें सम्राट सर्वप्रभु था तथा उसके अधिकार असीमित एवं अनियंत्रित थे। वे क्रूर से क्रूर दण्ड-विधान, दमन-नीति साम्राज्यवादी दृष्टिकोण एवं युद्ध तथा शक्ति के पोषणा एवं समर्थक थे। लि-सू के पूर्वकालीन 'लिगलिस्ट विचारकों में कुअन चुंग, शेन-पु-हाई, हुन-फेई-जू एवं शेन-ताओ उल्लेखनीय है। ये प्रमुख विचारक सातवी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर चतुर्थ शताब्दी ईसा पूर्व के बीच आते थे इन सभी विचारकों को चीन किसी राज्य के प्रधान मंत्री अथवा मंत्री होने का अनुभव प्राप्त था। उन्होंने अपने ज्याकहार्क किसी न शासकीय अनुभवों के आधार पर ग्रन्थ-रचना भी की थी इनमें से कुछ प्रारम्भ में कन्फ्यूशियस मतावलम्बी थे, परन्तु कालान्तर में वे इससे पृथक हो गये। उनके बहुत कुल विचार कौटिल्य के मत से साम्य रखते हैं। 


लि-सू राजा के निरंकुश शासन एवं प्रजा के द्वारा उसकी आज्ञा के निर्धिरोध धालन में विश्वास करता था। अवस्था में वह शिह-हांग-टी से बड़ा या। इस कारण साम्राट उसकी मंत्रणा एवं सुझावों का काफी आदर करता था। कहा जाता है कि वह लि सु से इसमा अधिक प्रभावित था कि उसने उसके कुल के साथ अपना वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया। लि-सू ने सर्वदा एक शक्तिशाली केन्द्रीय शासन की स्थापना के निमित्त प्रयास किया था। यह स्थानीय परम्पराओं एवं रूढ़ियों का विरोधी था। वह चाहता था कि साम्राज्य का शासन एक लिखित एवं विचारपूर्ण संविधान के द्वारा किया जाय। उसके राजनीतिक विचार उस युग की आवश्यकताओं के सर्वथा अनुकूल थे। अधिकांश विद्वानों का कथन है कि चीन देश का नाम चिन्-वंश के नाम पर पड़ा था। पाश्चात्य देशों के निवासी चीन के लोगों को चिन्-भूमि का निवासी कहते थे। चीन शब्द इसी चिन् शब्द का अपभ्रंश है। 


शी ह्वांग टी एक शासक के रूप में :- चिन वंश का प्रतापी सम्राट और महान योद्धा शी हुआंग टी था। इसके नाम का अर्थ है प्रथम सम्राट। उसने 221 ई० पू० में अपने सम्राट घोषित किया। वह एक महान विजेता और कुशल प्रशासक था। उसकी गणना चीन के महानतम शासकों में की जाती है। शी हुआंग टी ने चीन को राजनीतिक एकता के सूत्र में आबद्ध किया और सुदृढ़ शासन प्रबन्ध स्थापित करने के उद्देश्य से योग्य व्यक्तियों को राजकीय पदों पर नियुक्त किया। सिकन्दर महान की तरह शी हुआंग टी भी विशाल साम्राज्य स्थापित करने का अभिलाषी था। विल इयूरेण्ट ने उसे लौहपुरुष तथा भयानक व्यक्तित्व वाला सम्राट कहा है और इस क्षेत्र में उसकी तुलना बिस्मार्क से की है। 


शी हुआंग टी ने अपनी राजधानी मेन यंग ने एक शासनदार महल का निर्माण कराया था। यह महल 500 फीट चौड़ा और 2500 फीट लम्बा था। विश्व के सात आश्चर्यों में से एक चीन की दीवार' उसी के द्वारा बनवाई गई थी। यह दीवार चीन की उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर हूणों के आक्रमणों से रक्षा करने के उद्देश्य से बनवाई गयी थी। यह 1500 मील लम्बी, 20 फीट चौड़ी तथा 22 फीट ऊंची हैं। इसमें 20 हजार गुम्बटे 23 हजार स्तम्भ और 10 हजार सुरक्षा चौकियां बनी हुई हैं यह दीवार दस वर्ष में बनकर तैयार हुई थी। इस पर अंकित शब्द इस प्रकार हैं -

"स्वर्ण के नीचे यह सबसे बड़ी सैनिक रोक है।" इस दीवार ने चीन की हुण और मंगोलों के आक्रमणों से रक्षा की, जिसके कारण चीन वासी हजारों वर्षों तक शांति का जीवन बिताने रहे। अपनी विशालता एवं बनवाट के कारण यह दीवार विश्व के महान आश्चर्यों में से एक मानी जाती है। विल डयूरेण्ट के अनुसार, "मिस्र के पिरामिड भी इस दीवार के पीछे तुच्छ है और चीन की सभ्यता एवं संस्कृति आज भी इस दीवार से झांक रही है। इस दीवार के कारण हूणों ने पश्चिम की ओर बढ़ना प्रारम्भ किया तथा रोम साम्राज्य का पतन सम्भव हो सका। वाल्टेयर ने भी इस दीवार की प्रशंसा करते हुए इसकी तुलना मिस्र के पिरामिडों से की है और कहा कि "वे तो इसके समक्ष खिलौने मात्र लगते हैं।" 


चिन वंश के समय व्यापार के क्षेत्र में भी बहुत अधिक विकास हुआ। सम्राट शी हुआंग टी ने व्यापार के विकास के लिये चीन में सड़कों का जाल बिछा दिया। यहां व्यापारियों के संघ बने हुये थे। मजदूरों की मजदूरी व कार्य के घण्टे निर्धारित थे। यहाँ से चाय, रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन, बारूद तथा ताश बाहर भेजे जाते थे और विदेशों से अफ्रीम, ऊन, तम्बाकू, शीशा और कमती पत्थर मंगवाये जाते थे। चीनी व्यापारी मलाया. तुर्किस्तान, भारत, ईरान, मेसोपोटामिया व रोम आदि देशों के साथ व्यापार करते थे। यहाँ सिक्कों का प्रचलन हो जाने से व्यापार में काफी सुविधा हो गई थी। 


चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस, के उदय के साथ ही चीन की सभ्यता का दार्शनिक युग आरम्भ हुआ। इस युग में लगातार पाँच बड़े दार्शनिक और राजनीतिक चिन्तक पैठा हुए। कन्फ्यूसियस, मोल्ज़ू, लाओत्से, मेशियस और सुनत्जू। इसके अतिरिक्त यहाँ विद्या का भी गहन विकास हुआ और दो प्रमुख विशेषताएँ उत्पन्ना हुई यिन-यांग, जिसने चीन के लोगों में भविष्य के प्रति आशा का संचार किया तथा कानूनवाद, जिसने राज्य को ठोस राजनीतिक आधार प्रदान किया और उसे आदर्शों के कठोर पालन से मुक्त कर दिया।

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