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भारत में सामाजिक विघटन के कारण

 भारत में सामाजिक विघटन के कारण


भारत में सामाजिक विघटन की समस्या को विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न आधारों पर स्पष्ट किया है। डॉ. राधाकमल मुकर्जी ने औद्योगीकरण के असन्तुलित विकास को सामाजिक विघटन का कारण मानते हुए कहा है कि भारत में औद्योगीकरण हमारे सम्बन्धी के सम्पूर्ण प्रतिमान को परिवर्तित कर रहा है जबकि जाति और संयुक्त परिवारों के सम्बन्ध औद्योगिक जीवन के अनुकूल नहीं है। इसके फलस्वरूप आज अस्समंजरव तथा उत्पीड़न समाज-विरोधी मनोवृत्तियों का आधार बन गया है। इसका तात्पर्य है कि औद्योगीकरण ने विवाह, परिवार तथा जाति जैसी सामाजिक संस्थाओं में परिवर्तन उत्पन्न करके सांस्कृतिक मूल्यों तथा मनोवृत्तियों को नया स्वरूप देकर, प्रथाओं. एवं परम्पराओं के प्रभाव को कम करके तथा सांस्कृतिक मूल्यों के स्थान पर हितवादी सम्बन्धी में वृद्धि करके भारत में सामाजिक विघटन की समस्या उत्पन्न की है। केवल मोटवानी (K. Morwani) का कथन कि जनसंख्या का विस्फोट: जनसंख्या का असन्तुलन, सांप्रदायिक, राजनीतिक क्षेत्रीय तथा धार्मिक ननाव: आधुनिक वैज्ञानिक प्रविधियां तथा अति औद्योगीकरण, इन सभी के संयुक्त प्रभाव से एक गम्भीर स्थिति उत्पन्न हो गई है। भारत की आत्मा आज पूर्णतया बन्दी है और इसके निकट भविष्य में नष्ट हो जाने का खतरा बना हुआ है।" डॉ. गोविन्दस्वामी (M. V. Govinda--Swamy) ने भी पाश्चात्य विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी को भारतीय सामाजिक विघटन के मूल कारण के रूप में स्पष्ट किया है। 


भारत में सामाजिक विघटन के कारण - इसके प्रमुख कारण निम्न है - 


(1) जाति-व्यवस्था तथा अस्पृश्यता (Caste System and Casteism) - भारत में जाति-व्यवस्था एक लम्बे समय से सामाजिक विघटन का कारण रही है। जाति व्यवस्था विभिन्न जातीय समूहों के बीच खान-पान, विवाह, सामाजिक सम्बन्धों और व्यवसाय की दूरी पर बल देती हैं और विभिन्न जातियों को परस्पर विरोधी समूहों में विभाजित करती है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति अपने सम्पूर्ण समाज के लिए उतना बफादार नहीं रहता जितना कि अपनी जाति के लिए। जाति-व्यवस्था विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक अधिकारों को लेकर तनाव की स्थिति भी उत्पन्न करती है। सामाजिक भेदभाव, कुछ जातियों के विशेषाधिकारों और असमानता की नीति पर आधारित होने के कारण भी जाति-व्यवस्था ने सामाजिक संगठन को अपार क्षति पहुँचाई है। अस्पृश्यता भी जाति-व्यवस्था की ही उपज है इसने भारतीय समाज के करोड़ों लोगों को सभी प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक अधिकारों से वंचित करके समाज के सामने अनेक गम्भीर समस्याएं उत्पन्न की हैं। ये सभी परिस्थितियां घृणा, फूट और शोषण के बीज बोकर भारतीय समाज को विघटित कर रही हैं। 


(2) सामाजिक कुरीतियाँ (Social Evils)- भारत में आज सामाजिक कुरीतियों की संख्या इतनी अधिक है कि समाज का पूरा सन्तुलन लगभग नष्ट हो चुका है। ऐसी कुरीतियों में दहेज-प्रथा, स्त्रियों का शोषण, बाल-विवाह, धार्मिक कर्मकाण्डौं की बहुलता, अन्धविश्वासों का प्रचलन, अन्तर्विवाह, कुलीन विवाह तथा विवाह विच्छेद पर नियन्त्रण आदि हमारी प्रमुख समस्याएँ हैं। इनमें से प्रत्येक समस्या व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन को विघटित करके सामाजिक विघटन में वृद्धि करती है। दहेज प्रथा के कारण समाज की संरचना को बहुत क्षति पहुंची है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति आर्थिक रूप से धन की बचत करता रहता है। इसके अतिरिक्त धार्मिक कर्मकाण्डों तथा अन्धविश्वासों के कारण भी हमारे समाज में ऋणग्रस्तता की समस्या बहुत उग्र रूप धारण कर चुकी है। बाल-विवाह के कारण पति और पत्नी के बीच असमंजस्य और तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है। अन्तर्विवाह और कुलीन विवाह ने समाज में व्यक्ति के सम्बन्धों का क्षेत्र इतना सीमित कर दिया है कि एक स्वस्थ राष्ट्रीय जीवन का विकास ही नहीं हो पाता। विधवाओं की निम्न स्थति तथा विवाह विच्छेद पर सामाजिक नियन्वषा होने के कारण पुरुषों को स्त्रियों का मनमाना शोषण करने की खुली छूट मिल गई है। इसके फलस्वरूप समाज में वेश्यावृत्ति तथा अनैतिकता में भी वृद्धि होती है। ये सभी परिस्थितियों सामाजिक विघटन का कारण और परिणाम दोनों ही हैं। 


(3) सांस्कृतिक असन्तुलन (Cultural Ambivalence)- सामाजिक संगठन के लिए भौतिक और अभौतिक संस्कृति में सन्तुलन बने रहना आवश्यक होता है। भारत में आज अभौतिक संस्कृति अपने परम्परागत रूप में ही है जबकि भौतिक संस्कृति में बहुत तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं। एक ओर हमारा समाज भौतिक उपलब्धियों और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया है लेकिन दूसरी ओर तरह-तरह के अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीतियाँ, धार्मिक कर्मकाण्डा, छुआछूत की भावना और शकुन-अपशकुन के विचार हमारी सामाजिक प्रगति में गम्भीर बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। 


(4) परस्पर-विरोधी सामाजिक मनोवृत्तियाँ (Conflicting Social Attitudes)-भारत में आज अनेक ऐसे नए मूल्यों का विकास हुआ है जो हमारी संस्कृति से मेल नहीं खाते। उदाहरण के लिए, समाज के बड़े वर्ग द्वारा अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति के प्रति सन्तुष्ट न रहना, अष्ट साधनों के द्वारा आर्थिक साधन एकत्रित करने को महत्व देना, श्रमिकों द्वारा हड़ताल को ही अपनी सफलता का एकमात्र साधन समझना, अपने व्यक्तिगत स्वार्थी के लिए सार्वजनिक सम्पत्ति का कुछ व्यक्तियों द्वारा दुरुपयोग करना, युवकों द्वारा सामाजिक व्यवस्था में अधिक से अधिक अधिकारों की मांग करना, आदि कुछ ऐसी मनोवृत्तियां है ज हमारी सामाजिक व्यवस्था को गम्मीर रूप से हानि पहुँचा रही हैं।

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