सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भारत में नैतिक पतन के कारण

 भारत में नैतिक पतन के कारण 


भारत में नैतिक पतन के उत्तरदायी कारक (Factors Responsible for Moral Degeneration in India) - भारत में बढ़ते हुए नैतिक पतन के कारणों की कोई निश्चित सूची बनाना कठिन है। मूल रूप से हमारी संस्कृति का विघटन तथा असन्तुलित सामाजिक परिवर्तन ही इस समस्या के मुख्य कारण रहे हैं। इसके पश्चात् भी इस समस्या के लिए उत्तरदायी कुछ महत्वपूर्ण कारणों का उल्लेख इस प्रकार किया जा सकता है - 


(1) सुख सम्बन्धी विचारधारा - वर्तमान युग में यह विचारधारा बहुत प्रभावपूर्ण बन गयी है कि सुख प्राप्त किया जाना चाहिए, इसका साधन चाहे कुछ भी हो तथा यह कि धन एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु खरीदी जा सकती है। इसी विचारधारा के फलस्वरूप धूसखोरी, गवन, विश्वासघात. मद्यपान अनुशासनहीनता तथा अपराध को प्रोत्साहन मिला है। 


(2) नीति-निरपेक्ष मनोवृत्तियाँ - आज समाज के एक बड़े वर्ग में ऐसा जीवन व्यतीत करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है जो नैतिक आचरणों से स्वतन् तथा परम्परागत मान्यताओं के बन्धनों से मुक्त हो। ऐसे व्यक्ति समाज के सभी नियमों तथा मान्यताओं को पिछडापन मानते हैं। इस मनोवृत्ति की स्पष्ट अभिव्यक्ति हि जीवन में देखने को मिलती है। यौनिक उन्मुक्तता तथा नशीली वस्तुओं का सेवन इसी मनोवृत्ति का परिणाम है। 


(3) औद्योगीकरण - औद्योगीवारण ने स्नेह व बन्धूत्य के स्थान पर दिखावटी और हित-प्रधान सम्बन्ध को प्रधानता दी है इन औपचारिक सम्बन्धों के बीच व्यक्ति उचित और अनुचित का निर्धारण अपने स्वार्थों के दृष्टिकोण से करता है। लाभ प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का अन्तिम लक्ष्य होता है, चाहे इसके लिए उसे किसी भी तरह का साधन अपनाना पड़े। 


(4) आधुनिकीकरण तथा पश्चिमीकरण -आधुनिकीकरण (modernization) वह प्रक्रिया है जो प्रत्येक व्यवहार को तर्क के आधार पर देखने का प्रोत्साहन देती है। इससे मानवीय मूल्यों, त्याग और सेवा का महत्व कम हो जाता है। ह प्रक्रिया नवीन विचारों, फैशन तथा स्वतन्त्र सम्बन्धों में वृद्धि करके भी नैतिक पतन को बढ़ाती है। पश्चिमीकरण की प्रक्रिया ने पश्चिमी ढंग की जीवन शैली को व्यवहार का आदर्श बना दिया जो भारत के परम्परागत सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों के विरुद्ध है। इसके फलस्वरूप दाम्पत्य जीवन, पारिवारिक जीपन, शिक्षा, संस्थाओं तथा आर्थिक जीवन से सम्बन्धित नैतिक मूल्य कमजोर, पड़ गये। 


(5) व्यक्तिवादिता - वर्तमान युग में व्यक्तित्यादिला अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई हैं। यहाँ तक कि माता-पिता तथा भाई-बहिनों से सम्बन्धों की स्थापना में भी व्यक्तिगत लाभ की आकांक्षा प्रबल बनी रहती है। इस प्रवृत्ति ने व्यक्तिगत निराशा, घुटन तथा तनाबों में अभूतपूर्व वृद्धि कर दी। व्यक्ति की यह निराशा और तनाव धीरे-धीरे उसे नैतिक मूल्यों को छोड़कर अपनी अनैतिक आवश्यकताओं को पूरा करने की प्रेरणा देते हैं। 


(6) विघटित राजनीति -हमारे समाज में कुर्सी की राजनीति नैतिक पतन का एक मुख्य कारण सिद्ध हुआ है। बाटोमोर ने यह स्पष्ट किया है कि भीतिक नियमों तथा राजनीतिक सिद्धान्तों के बीच एक घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजनीति जब दलबन्दी, जातिवाद, স्रष्टाचार तथा स्वार्थपरता का शिकार हो जाती है, तब नैतिक नियम अपने आप प्रभावहीन होने लगते हैं। आज छोटे-बड़े नेता जिस प्रकार अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए युव्की में जागरूकता और चेतना के नाम पर उन्हें प्रदर्शनों तथा अनुशासनहीनता की ओर प्रेरित कर रहे हैं, उससे इस स्थिति को सरलतापूर्वक समझ जा सकता है। समाज के अन्य वर्ग भी नेताओं के व्यवहारों का ही अनुकरण करते हैं। 


(7) धार्मिक दुराचरण - नैतिक नियमों को धर्माचरण से शक्ति प्राप्त होती है लेकिन जब कुछ व्यक्ति धर्म को अपना व्यवसाय बना लेते हैं, धर्म के नाम पर धर्मपरायण भोले-भाले लोगों का शोषण करते हैं तथा धर्म की व्याख्या व्यक्तिगत लाभ के लिए करने लगते हैं तो नैतिक नियमों के प्रति भी एक प्रमपूर्ण स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसी स्थिति में एक नई आचार संहिता का विकास होता है जिससे अक्सर नैतिक पतन की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे