सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भारत में मादक द्रव्य व्यसन के कारणों एवं परिणाम

भारत में मादक द्रव्य व्यसन के कारण एवं परिणाम 


मद्यपान - नशाखोरी से हमारा आशय उस स्तर से हैं जिसमें व्यक्ति नशा के न मिलने पर स्वयं को बेकार सा महसूस करने लगता है अर्थात सेना के जवान द्वारा उत्साह हेतु या थकान मिटाने हेतु शराब लेना नशाखोरी नहीं है। नशाखोरी तो वह आदत है जों व्यक्ति के जीवन को ही समाप्त कर देती है। यथा प्रसिद्ध फिल्म नायिका मीनाकुमारी शराब की अत्यन्त आदी थीं और ऐसा कहा जाता है कि शराब ही उनकी मौत का कारण बनी। आज नशाखोरी शराब तक ही सीमित नहीं। इसमें भाँग, चरस, गाँजा, अफीम, सुल्कफा, कोकीन आदि का सेवन भी सम्मिलित है। मादक द्रव्य व्यसन एक फैशन का रूप लेता जा रहा है और व्यक्तिक विघटन को जन्म दे रहा है। 


1. फेयर चाइल्ड के अनुसार-"शराब की असामान्य एवं बुरी आदत ही मद्यपान है। 


2. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार-"मद्यपान नशे की वह स्थिति है जो किसी भी रूप में मादक पदार्थ के निरन्तर सेवन से उत्पन्न होती है, जिससे थोड़ी देर के लिए नशा चढ़ता हैं या मनुष्य सदा ही नशे में चूर रहता है और जो व्यक्ति एवं समाज दोनों के लिए हानिकारक है।" 


3. टेक चंद अध्ययन दल के अनुसार-"शराब पीने अथवा किसी भी मादक पदार्थ का सेवन करने से उत्पन्न बुरी आदत अथवा बीमारी ही मद्यपान है। यह वह स्थिति है जो मनुष्य की आत्मा, मन और शरीर को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करके पतन की ओर ले जाती है।" 


स्पष्ट है कि थोड़ी मात्रा में और कभी-कभी शराब पीना मद्यपान नहीं है वल्कि एक समस्या के रूप में अत्यधिक मात्रा में शराब पीना ही मद्यपान है। 


मद्यपान/नशाखोरी के कारण - 


नशाखोरी के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं - 


(1) अज्ञानता - नशाखोरी का प्रमुख कारण मानवीय अज्ञानता या कमजोरी है। परिणामतः व्यक्ति नशाखोर बन जाता है। सबसे बड़ी विडम्वना तो यह है कि व्यक्ति नशे के बुरे परिणामों को जानते हुए भी नशे का सेवन शुरू कर देता है। आरम्भ में थोड़ा-थोड़ा नशा लेते हैं और बाद में वही उनकी आवश्यकता बन जाती है। 


(2 ) दवा के रूप में - प्रायः लोग शराब आदि का प्रयोग दबा के रूप में करते हैं। कुछ समय के पश्चात् यही दवा उनके लिए दर्द बन जाती है अर्थात् वे शराब के गुलाम बन जाते हैं। सर्दी को खत्म करने, सर्प विष को खत्म करने, प्रमेह, स्लेरिया, टी०वी० आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। 


(3 ) आय व मित्र मण्डल - प्रायः देखा जाता है कि अत्यधिक आय वाले व्यक्ति दवा के रूप में शराब का अल्प सेवन करते हैं। गरीब वर्ग के लोग शराब को दवा के रूप में प्रयोग न कर, शराब के आदी बन जाते हैं। मजदूर वर्ग मलिन बस्तियों में नशाखोरी ज्यादा मिलती है। मित्रों के प्रभाव से भी व्यक्ति नशा सेवन में व्याप्त हो जाता है। कालेज, क्लब, बैंक आदि स्थानों पर लोग मित्रों के प्रभाव में आकर मादक द्रव्यों का सेवन करना प्रारम्भ कर देते हैं और आदती बन जाते हैं। प्रायः ऐसा भी देखा गया है कि निम्न आयु वर्ग वाले जब अच्छी आय वर्ग में पहुँच जाते हैं तो शराब, जुआ आदि को अपना लेते हैं क्योंकि उनके विकास के अनुरूप उनके संस्कार में विकास नहीं हो पाता है। 


(4) पारिवारिक वातावरण तथा फैशन - परिवार में यदि माँ बाप शराबी हैं, अन्य मादक पदार्थ का सेवन करते हैं तो बच्चों में नशाखोरी की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाती है। घर में आने जाने वालों का प्रभाव भी बच्चों में देखा जा सकता है। आज के युग में सिगरेट, हीरोइन आदि का सेवन फैशन माना जाता है। इसे प्रायः स्मार्टनेश का प्रतीक माना जाता है। क्लबो, उत्सवों पर शराब का प्रयोग प्रचलित फैशन का अंग माना जाता है। 


(5) आपत्ति - व्यक्तियों पर अनेक आपत्ति के आने की परिस्थिति में व्यक्ति तनाव व चिन्ता से छुटकारा पाने हेतु नशा का सहारा लेते हैं। डॉ० बोगेर का विश्वास है कि लोग आपत्तियों से मुक्ति हेतु शराब का प्रयोग करते हैं। 


(6) सामाजिक व पारिवारिक तनाव - मित्रों में तनाव व संघर्ष, आफिस में अधिकारी से तनाव, पति-पत्नी में तलाक या योन सन्तुष्टि का अभाव, अत्यधिक श्रम आदि शराब के सेवन के लिए परिस्थितियां उत्पन्न करते हैं। इन नशाओं में व्यक्ति प्रायः नशा के साथ इनको भुलाने का प्रयास करते हैं और इस प्रकार कुछ समय के बाद नियमित नशाखोर बन जाते हैं। 


(7) औद्योगिकरण एवं नगरीकरण आजकल कारखानों में श्रमिक आठ घण्टे कार्य करता है, घर पर एकाकी जीवन व्यतीत करता है। श्रम के बाद दिन भर के गम को भुलाने हेतु मादक द्रव्यों की सहायता लेता है। औद्योगिक केन्द्रों व नगरों में सम्बन्ध भी औपचारिक और द्वैतीयक होते हैं अत: आत्मिक शान्ति नहीं मिल पाती है। व्यक्ति का जीवन अत्यन्त एकाकी हो जाता है। कभी-कभी व्यापार या रोजगार में सफलता की खुशी भी मादक द्रव्यों के सेवन का माहौल तैयार करती है। इलियट तथा मैरिल लिखते हैं कि - 'मुख्यतयः औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात अनेक व्यक्तियों के लिए शराब 'संकट पेय" बन चुकी है। काम के लम्बे घन्टे, अपर्याप्त भोजन, आर्थिक अस्थिरता, काम का भारी बोझ, आवास की बुरी स्थिति, अज्ञानता आदि के कारण बहुत से लोग इस संकट पेय के शिकार बनते हैं। 


(8) मनोवैज्ञानिक कारक - हर्टन महोदय ने अनेक जनजातियों के अध्ययन के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जिस संस्कृति में असुरक्षा एवं तनाव की मात्रा अधिक होती है वहाँ मादक द्रव्यों का उपयोग उतना ही अधिक होता है। इलियट एवं मैरिल लिखते हैं कि 'वे लोग जो बहुत संकोची, भावुक, सामाजिक दृष्टि से असुरक्षित तथा कठिनाइयों का सामना करने में असमर्थ होते हैं, मद्यपान को 'एक विकल्प के रूप में स्वीकार करते हैं।' 


(9) चारित्रिक पतन - आज चारित्रिक पतन व नैतिक मूल्यों का हनन हुआ है। लोग सामाजिक जिम्मेदारी नहीं महसूस करते हैं, व निर्मुक्त, स्वछन्द जीवन जीना पसन्द करते हैं, अश्लील साहित्य का अध्ययन करते हैं । प्रेम का स्वांग रचते हैं। इससे उनमें नशाखारी की प्रवृत्ति जन्म लेती हैं। 


(10) सरकारी नीतियाँ, युद्ध आदि - इसके अतिरिक्त सरकार प्रायः राजनीतिक दबाव तथा धन (उत्पादन कर) के लॉलच में मादक द्रव्यों पर पूर्ण पाबन्दी नहीं लगाती है, समाज में मादक द्रव्यों की उपलब्धता स्वयं में नशाखोरी का सबसे बड़ा कारण है। युद्ध के समय समाज के गैर जिम्मेदार तत्व स्मगलिंग आदि के माध्यम से मादक द्रव्यों का जाल फैला देते हैं, लोग युद्ध के तनाव से असित रहते हैं। सरकार भी नियन्त्रण में शिथिल हो जाती है ये सब परिस्थितियाँ नशाखोरी को जन्म देती है। 


मादक द्रव्य व्यसन के प्रभाव अथवा दुष्परिणाम - मादक द्रव्यों के प्रयोग के परिणाम बहुत खतरनाक होते हैं। इससे होने वाली हानियों एवं दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं - 


(1) निर्धनता तथा बेरोजगारी - मद्यमान और मादक द्रव्य-व्यसन ऐसी समस्या है। जो स्वयं ही निर्धनता और वेरोजगारी में वृद्धि करती है। मद्यपान के प्रभाव से व्यक्ति की कार्यकुशलता कम होने लगती है तथा अनेक प्रकार की बीमारियों के कारण व्यक्ति अपने परिवार का भरण-पोषण करने के योग्य नहीं रह जाता। 


(2) नैतिक मूल्यों का पतन - मद्यपान का एक अन्य दुष्परिणाम वैयक्तिक और पारिवारिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन है। मद्यपान और नशीला दवाओं के सेवन से व्यक्ति का विवेक इतना कम हो जाता है कि वह उचित और अनुचित में भेद नहीं कर पाता| मानसिक असंतुलन की दशा में कितने ही व्यक्ति परिवार की स्त्रियों को अनैतिक व्यवसायों के लिए बाध्य करने लगते हैं। एक सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हुआ कि घर से भागकर आने वाली अनेक वेश्याओं ने यह पेशा इसलिए आरम्भ किया कि आरम्भ में उनके शराबी पतियों ने ही उन्हें अनैतिक जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य किया था। 


(3) स्वास्थ्य पर प्रभाव - मद्यपान तथा मादक द्रव्यों के सेवन से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे आंतों, लीवर, किडनी और हृदय आदि के गम्भीरं रोग हो जाते हैं जो सही और समय पर इलाज न होने से मनुष्य की जीवन लीला भी समाप्त कर देते है। 


(4) अपराधी व्यवहार - मादक पदार्थों के उपयोग का एक प्रमुख दुष्परिणाम अपराधी व्यवहारों में वृद्धि होना है मद्यपान या मादक द्रव्यों के सेवन से जब व्यक्ति आर्थिक कठिनाइयों से घिर जाता है तथा किसी काम के योग्य नहीं रह जाता, तब पहले वह घर के समान बेचता है और इसके बाद जेब काटने, चोरी करने, जुआ खेलने और दूसरे तरह के अपराधों में लग जाता है। सम्पत्ति के विरुद्ध होने वाले अपराध, जैसे-हत्या, डकैती, अपहरण, अभद्रता तथा बलात्कार आदि भी मादक पदार्थों के विभिन्न परिणाम हैं। 


(5) लैगिक दुष्प्रभाव - अनेक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ हैं कि मद्यपान और नशीली दवाओं का सेवन पुरुषों तथा स्त्रियों की लैंगिक विशेषताओं को बहुत, प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। संतानें भी बहुत कमजोर और दुर्बल मस्तिष्क की होती है जिन समुदार्यों में स्त्रियाँ मद्यपान करती हैं, उनमें गर्भपात और बच्चों की मृत्यु-दर अधिक होती है। 


(6) पारिवारिक विघटन - मादक पदार्थों का उपयोग मनुष्य में स्नेह, प्रेम और त्याम की भावनाओं को समाप्त कर देता है। मद्यपान तथा मादक द्रव्यों के सेवन के प्रभाव से बच्चों को अपने पिता से स्नेह और आवश्यक सुविधाएं नहीं मिल पातीं, पति-पुत्नी के बीच विश्वास बढ़ने लगता है। तथा परिवार में कलह का वातावरण उत्पन्न हो जाता है जो परिवार को विघटन की ओर ले जाता है। 


(7) सामाजिक विघटन - सामाजिक जीवन को विघटित करने में भी मादक द्रव्यों - के सेवन की एक प्रमुख भूमिका होती है इस सम्बन्ध में बेंगलड्फ का कथन है। कि 'केवल मद्यपान के कारण जितने लोगों की मृत्यु हुई है, लोग दुर्घटना के जितने अधिक शिकार हुए है, जितने लोगों को अपराधों में पकड़ा गया है, जितने विवाह टूटे हैं और औद्योगिक उत्पादन पर जितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है उतनी हानि दूसरी सभी बुराइयों को मिलाकर भी नहीं हुई है। 


भारत में मद्यनिषेद्य के कार्यक्रम - 


लोगों में नशा के प्रभाव के प्रति चेतना पैदा किया जाना चाहिए। ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए कि मादक द्रव्य सामान्य रूप से उलपब्ध न हो सके तथा मद्यपान पर पूर्ण नियन्त्रण लगा देना चाहिए। स्कूल एवं कालेजों में मानसिक स्वास्थ्य की शिक्षा प्रदान की जाय। लोगों को पर्याप्त व स्वस्थ्य मनोरंजन उपलब्ध कराये जाये। अत्यधिक नशाखोरों को चिकित्सकों के पास भेजना चाहिए। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि विटामिन 'सी' की मात्रा, अधिक देने, भोजन में प्रोटीन की कमी एवं चर्बी और कार्बोहाड्रेटस की मात्रा बढ़ाने से शराब पीने की आदत छुड़ाई जा सकती है। मद्यपान के सम्बन्ध में गाँधी जी लिखते हैं-'मुझे सम्पूर्ण भारत का यदि एक घण्टे के लिए तानाशाह बना दिया जाय तो मैं पहला कार्य शराब की सभी दुकानें बन्द कराने का करूंगा।' 


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 46 के अनुसार राज्य अपनी जनता का पोषण और जीवन स्तर उठाना तथा जन स्वास्थ्य सुधारना अपना एक प्राथमिक कर्तव्य मानेगा और विशेषतः स्वास्थ्य के लिए औषधीय प्रयोजनों के अतिरिक्त नशीले पेय और मादक पदार्थों को रोकने का प्रयास करेगा। शराब के अतिरिक्त अफीम, गाँजा, चरस, मारीजुआना, भाँग, कोकीन, माजून, मान, पैथीडीन आदि का सेवन पूर्णतः बन्द किया जाना चाहिए। विद्यालयों, तकनीकी एवं मेडिकल कालेजों में इन मादक द्रव्यों का प्रयोग अधिक बढ़ गया है इसके लिए इन परिपक्व छात्र-छात्राओं में विशेष रूप से चेतना लाने की आवश्यकता है। इन संस्थाओं में मनोचिकित्सक की नियुक्ति, मनोरंजन के उपयुक्त साधनों का प्रबन्ध, नैतिक एवं चारित्रिक शिक्षा, अध्यापक अभिभावक सम्पर्क आदि सराहनीय कदम होंगे। 


नशा निषेध - नशा निषेध समाज में प्रकार्यात्मक तत्वों के विकास में सहायक है। इससे व्याभिचार, अपराध आदि घटते हैं यह वैयक्तिक जीवन को संगठित सम्मानपूर्ण बनाता है। नशा निषेध भावी पीढ़ी के लिए स्वस्थ समाज की आधारशिला तैयार करता है। इससे जनस्वास्थ्य एवं कार्यकुशलता का स्तर ऊँचा उठेगा तथा पारिवारिक जीवन ज्यादा सुखमय होगा। नशा निषेध श्रमिक वर्ग तथा मध्यम वर्ग के लिए वरदान है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे