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बाल अपराध की रोकथाम हेतु सरकारी प्रयत्नों

 बाल अपराध की रोकथाम हेतु सरकारी प्रयत्नों 

बाल अपराध एक गम्भीर समस्या है यही कारण है कि सरकार का मुख्य प्रयत्न आज बाल-अपराधियों का इस तरह सुधार करना है जिससे वे भविष्य में अपराधी न बन सकें। इसके लिए सरकार द्वारा एक और ऐसे कानून बनाये गये जिनके द्वारा बाल-अपराधियों के साथ सहानुभूति का व्यवहार करते हुए उन्हें भविष्य में अपराध करने से रोका जा सके तथा दूसरी और ऐसे प्रयत्न किये गये जिनके द्वारा आल-अपराधियों को दूसरे अपराधियों से पृथक रखकर उनके जीवन में सुधार किया जा सके। इस दिशा में सरकार द्वारा किये जाने वाले प्रमुख कार्यों का वर्णन निम्नवत् हैं - 

(1) परिवीक्षा अधिनियम - केन्द्र सरकार द्वारा सन् 1958 में अपराधियों के लिए परिवीक्षा अधिनियम पास किया गया। इस अधिनियम के द्वारा यह व्यवस्था की गयी कि यदि 21 वर्ष से कम की आयु के किसी बच्चे या किशोर को न्यायालय द्वारा कोई दण्ड दिया जाये तो परिवीक्षा की संतुति पर विचार अवश्य किया जाये। साधारणतया यदि कारावास की अवधि 6 माह तक हो तो उसे जेल न भेजकर परिवीक्षा अधिकारी की देख-रेख में छोड़ दिया जाता है। इसके लिए बाल-अपराधी को अच्छे आचरण का एक प्रतिज्ञा-पत्र देना होता है। यदि किसी विशेष अपराध के कारण न्यायालय द्वारा बाल-अपराधी या किशोर अपराधी को परिवीक्षा पर छोड़ना उचित नहीं माना जाता तो इसके लिए न्यायालय को कुछ निश्चित कारणों का उल्लेख करना आवश्यक होता है। बाल-अपराधियों के सुधार में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। 


(2) उत्तर-रक्षा संस्था की स्थापना - भारत के अधिकांश राज्यों में अब बाल अपराधियों का सुधार करने के लिए उत्तर-रक्षा संस्थाओं की स्थापना की जा चुकी है। इन संस्थाओं की प्रकृति एक बास औद्योगिक केन्द्र की तरह होती है। इनमें बच्चों को कताई, बुनाई, कपड़ा सिलने, लकड़ी का काम करने, दरी, टोकरी और कालीन बनाने आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है। इन संस्थाओं का संचालन स्वयंसेवी संगठनों द्वारा किया जाता है तथा पैरोल अधिकारी या किसी अन्य अधिकारी द्वारा बच्चे के आचरणी की देखभाल की जाती रहती हैं। कोई बाल-अपराधी किसी भी सुधार संस्था में जब कम-से-कम माह तक रह लेता है और जेल अथवा सुधार संस्था के मुख्य निरीक्षक को यह विश्वास हो जाता है कि बच्चे का आचरण अच्छा है तथा वह भविष्य में अपराध नहीं करेगा तो दण्ड की बची हुई अवधि के लिए उसे किसी उत्तर-रक्षा संस्था में भेजा जा सकता है। 


(3) बाल न्यायालयों की स्थापना - सन् 1960 में एक विशेष बाल अधिनियम पारित करके यह व्यवस्था की गयी कि आल-अपराधियों के मुकदमों को सुनवाई और उनके सुधार कार्य के लिए अलग से बाल-न्यायालयों की स्थापना की जायेगी। बॉल-अपराधियों का सुधार करना राज्यों का कार्य है, अतः विभिन्न राज्यों में इसके लिए अलग-अलग कानून बनाये गये हैं। फिर भी बाल-अपराधियों को अधिक सुरक्षा देने तथा उन्हें दूसरे अपराधियों से अलग रखने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा सन् 1986 में 'बाल न्याय अधिनियम पास किया गया। इस कानून के अनुसार सभी जिलों में बाल-अपराधियों के मामलों की सुनवाई केवल बाल न्यायालय में ही की जाती हैं। यहाँ मामूली अपराध के लिए चेतावनी देकर या मां-बाप से उसके अच्छे आचरण की गारण्टी लेकर उसे छोड़ दिया जाता है। यदि दण्ड देना आवश्यक भी हो तो भी बाल-अपराधी को जेल में न भेजवार किसी सुधार गृह में भेज दिया जाता है। जिससे उसे अपना सुधार करने का अवसर प्राप्त हो सके। 


(4) रिमाण्ड गृह की व्यवस्था - वर्तमान कानूनों में यह व्यवस्था है कि पकड़े गये। बाल-अपराधी को पुलिस की हिरासत में न रखकर एक विशेष गृह में रखा जायेगा जिसे रिमाण्ड गृह अथवा सम्प्रेषण गृह कहा जाता है। यहाँ लाये गये बच्चे को 24 घण्टे के अन्दर किसी न्यायाधीश के सामने प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। सम्प्रेषण गृह में निराश्रित, घर से भागे हुए अथवा किसी सामान्य अपराध में पकड़े गये बच्चों से परिवीक्षा अधिकारी द्वारा बहुत स्वाभाविक रूप से बातचीत करके अपराध के कारणों को ज्ञात करने का प्रयत्न किया जाता है। 


( 5 ) पोयण गृह तथा सहायक गृह - अनेक राज्यों में बहुत कम आयु के बाल अपराधियों के लिए पोषण गृहों तथा सहायक गृहों को स्थापित किया गया है पोषण गृहों में 10 वर्ष से कम आयु के उन बाल-अपराधियों को रखा जाता है जिन्हें प्रमाणित स्कूलों में नहीं रखा जा सकता। माता-पिता के परित्याग, तलाक, कैद या मृत्यु के कारण कम औयु के आवारा बच्चों को भी पोषण गृहों में रखकर उनका सुधार किया जाती है। 10 वर्ष से कम के बाल-अपराधियों को यहाँ कुछ समय तक रखकर, बाद में उन्हें किसी प्रमाणित स्कूलों में भेजा जाता है। जहाँ वे उचित प्रकार से शिक्षा प्राप्त कर सकें। 


(6) सुधार गृहों की स्थापना - सरकार द्वारा पारित सुधार गृह अधिनियम के अन्तर्गत सभी प्रमुख नगरों में बाल-अपराधियों के लिए सुधार गृह स्थापित किये गये। इनमें से 16 वर्ष तक के जिन बाल-अपराधियों को न्यायालय द्वारा कारावास का दण्ड दिया गया है, उन्हें रखने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य बाल-अपराधियों को पेशेवर अपराधियों से अलग रखना है। इन गृहों में बच्चों को भोजन, पानी, चिकित्सा और वस्चों की कहीं अच्छी सुविधाएँ दी जाती हैं। बच्चों को उनकी रूचि के अनुसार विभिन्न उद्योग-धंधों का भी प्रशिक्षणे दिया जाता है। जिससे दण्ड की अवधि पूरी करने के बाद वे कोई उपयोगी रोजगार कर सकें। 


(7) बोर्स्टल स्कूल की स्थापना -  बोर्स्टल स्कुल एक ऐसी सुधार संस्था है जिसमें 15 से 21 वर्ष तक के किशोर अपराधियों को रखा जाता है वार्टल स्कूल दो प्रकार के होते हैं-बन्द तथा खुले हुए। बन्द बोस्टल संस्था की प्रकृति काफी सीमा तक जेलों की तरह होती है। लेकिन इनमें किशोर अपराधियों से बहुत सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करने के साथ ही उन्हें औद्योगिक प्रशिक्षण, नैतिक शिक्षा तथा संगीत और व्यायाम आदि की सुविधाएँ भी दी जाती है। खुली बोरर्टल संस्था एक शिविर की तरह होती है। जिसमें किशोर अपराधियों को अपने आचरण में सुधार करने का पूरा अवसर दिया जाता है। 


(8) प्रमाणित स्कूल - यह वे स्कूल है जिनमें बहुत कम आयु के बाल अपराधियों को। रखकर उनका सुधार करने का प्रयत्न किया जाता है। विभिन्न राज्या में प्रमाणित स्कुल से सम्बन्धित। नियमों में कुछ भिन्नता है लेकिन साधारणतया इन स्कूलों में 10 वर्ष से 16 वर्ष तक की आयु के बाल-अपराधियों को ही रखा जाता है किसी बच्चे का अपराध प्रमाणित होने पर यदि उसे दो वर्ष से तीन वर्ष तक की सजा दी जाये तो परिवीक्षा अधिकारी की संतुति पर न्यायालय द्वारा उसे किसी प्रमाणित स्कूल में रखने का आदेश दिया जाता है।

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