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बाल अपराध के कारण और उसके रोकथाम

 बाल अपराध  के कारण और उसके रोकथाम 


बाल अपराध की अवधारणा - "बाल अपराध के अन्तर्गत हम एक स्थान एवं समय विशेष के कानून के द्वारा निर्धारित उम्र के नीचे के बालक एवं बालिकाओं के त्रुटिपूर्ण व्यवहार को शामिल करते हैं। इसके अतिरिक्त आपने उन समस्त बालकों को भी अपराध के अन्तर्गत ही सम्मिलित किया है जो कि अब सुधार से परे हैं। ऐसे बालक या बालिकायें अपने माता-पिता की आज्ञा की अवहेलना करते हैं। सेथना ने तो यहाँ तक लिखा है कि जो विद्यार्थी अपने समय का सदुपयोग नहीं करते, विद्यालय नहीं जाते या कक्षा से भागते हैं, गन्दी गालियां बकते हैं, अश्लील साहित्य पढ़ते हैं, किसी प्रकार की यौन तृप्ति के शिकार हो चुके हैं और पान, बीड़ी, सिगरेट या अन्य मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं, बाल अपराधी ही कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त भीख मांगने वाले बालक तथा जूतों में पालिश करने वाले छोकरों को तथा पान की दुकानों या सस्ते होटलों पर नौकरी करने वाले कम उम्र के वालकों को भी आपने बाल अपराधियों की ही कोटि में सम्मिलित किया है। बाल अपराध को परिभाषित करते हुए मार्टिन न्यूमेयर मे लिखा है-"बाल अपनाधी एक निश्चित आयु से कम का वह व्यक्ति है जिसने समाज विरोधी कार्य किया है तथा जिसका दुर्व्यवहार कानून को तोड़ने वाला हो।" 


बाल-अपराध के कारण - बाल अपराध के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं- 


(1) पैतृकता - बाल अपराध का एक प्रमुख कारण पैतृकता है। यदि आलक की माता-पिता अपराधी प्रवृत्ति के हैं तो उसका, प्रभाव बच्चे पर पड़ता है और बह भी आपराधिक कार्य करने लगता है। 


(2) दोषपूर्ण आवास व्यवस्था - भारत के नगरों में मकानों की कमी के कारण निम्न आय के अधिकांश लोग एक ही कमरे वाले मकान अथवा झुग्गी-झोपड़ियों में निवास करते हैं। इन मकानों में बच्चों को सभी तरह की दशाओ को देखने और सुनने का अवसर मिलने के कारण उनमें उत्तेजना पैदा होने लगती है। बहुत-से बच्चे इसी उत्तेजना के कारण अश्लील व्यवहार यौनिक अपराधों तथा मारपीट जैसे अपराधों के शिकार हो जाते हैं। 


(3) बच्चों का तिरस्कार - जिन परिवारों में माता-पिता का जीवन बहुत व्यस्थ होता है अथवा अपनी सुख-सुविधाओं में पड़े रहने के कारण मे बच्चों को अपनी स्वतंत्रता में बाधा समझने लगते हैं, वहाँ बच्चों का जीवन बहुत तिरस्कृत हो जाता है। इस दशा में बच्चों का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है इसी के फलस्वरूप उनमें अपराधी व्यवहार की प्रवृत्ति उत्पन्न होने लगती है। 


(4) बिखरे परिदार – परिवार के सदस्यों में हमेशा कलह बनी रहने से मानसिक स्तर पर परिवार टूटने लगता हटे परिवारों में एक और बच्चे में ऐसी अनिवार्य आवश्यकताएँ पूरी नही हो पाती तथा दूसरी ओर परिवार के वातावरण से बच्चे में ऐसी उतेजनाएं पैदा होने लगती है। जिनके प्रभाव से वह बचपन से ही समाज-विरोधी कार्य करना आरम्भ कर देता है। 


(5) दोषपूर्ण अनुशासन - अत्यधिक कठोर अनुशासन अथवा बच्चों को दी जाने वाली आवश्यकता से अधिक स्वतंत्रता भी ऐसी दशाएँ हैं जो बच्चों को अपराध की ओर ले जाती है। छोटी-छोटी बात पर बच्चों को शारीरिक दण्ड देने से बच्चे स्वयं ही क्रूर व्यवहार के अभ्यस्त होने लगते हैं। यही प्रवृत्ति उन्हें साथियों से मार-पीट करने और हिंसक व्यवहार करने की प्रेरणा देती है। अधिक लाड़-प्यार से बच्चों में जुआ, खेलने, शराब पीने तथा यौनिक अपराध करने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है। 


(6) पक्षपातपूर्ण व्यवहार - परिवार में यदि किसी बच्चे को अधिक प्यार दिया जाये तथा किसी दूसरे बच्चे के साथ हमेशा कठोर व्यवहार किया जाये तो स्वाभाविक है कि ऐसे कठोर व्यवहार से बच्चे के मन में ईर्ष्या और बदले की भावना उत्पन्न होने लगती हैं और वे गलत संगत में पड़कर अपराधी बन जाते हैं। 


(7) अधिक सुख की इच्छा - मनोवैज्ञानिक रूप से बाल-अपराधियों में यह भावना बहुत प्रबल होती है कि उच्च वर्ग के लोगों की तरह उन्हें भी अधिक-से-अधिक सुख सुविधाएं मिलनी चाहिए, इसका साधन चाहे कुछ भी हो। मादक द्रव्यों का उपयोग और उनसे उत्पन्न होने वाले अपराध भी अधिक सुख की इच्छा का ही परिणाम होते हैं। 


(8) हीनता की भावना - जो बच्चे आरम्भ में ही पढ़ने में बहुत कमजोर होते हैं, अपने साथियों की तुलना में शारीरिक रूप से विकारयुक्त होते हैं अथवा जो किसी भी काम को कुशलतापूर्वक नहीं कर पाते, वे इस हीन भावना का शिकार हो जाते हैं और अपराध की ओर अग्रसर हो जाते है। 


(9) मानसिक अस्थिरता - यह पाया गया है कि मनोवैज्ञानिक रूप से अधिकांश बाल अपराधियों में मानसिक अस्थिरता पायी जाती है। साधारणतया बच्चे की जब सामान्य इच्छाओं और अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती तो उसके मन में अनेक प्रकार के तनाव उत्पन्न होने के साथ ही वह हर समय अपने आपको असंतुष्ट अनुभव करने लगता है। ऐसी दशा में वह अपराध को ओर उन्मुख हो जाता है। 


(10) बुद्धि का निम्न स्तर - बच्चों द्वारा किये जाने वाले यौन अपराध कम बुद्धि का ही परिणाम होते हैं। बुद्धि के निम्न स्तर के कारण बहुत-से बच्चों में तर्क शक्ति का अभाव होता है जिसके फलस्वरूप उनके संगी-साथी उन्हें जल्दी से अपराध की ओर ले जाने में सफल हो जाते है। 


(11) अस्वस्थ मनोरंजन - वर्तमान युग में मनोरंजन के अधिकांश साधन बच्चे का चरित्र-निर्माण न करके उनमं उत्तेजना और तनाव उत्पन्न करते हैं। टेलीविजन अधिकांश कार्यक्रमों तथा चलचित्रों में हत्या, डकैती, अपहरण, सेक्स तथा तस्करी के दृश्य बच्चों में उत्तेजना पैदा करते हैं। अश्लील पत्र-पत्रिकाएं बच्चों के जीवन को अनैतिक बनाने लगती हैं। 


(12) जाति-विभेद - भारतीय दशाओं में उच्च और निम्न जातियों के बीच पाये जाने वाले विभेद भी बाल अपराध का एक प्रमुख सामाजिक कारण है। अनेक अध्ययनों से स्पष्ट है कि उच्च जातियों के बच्चे जब निम्न जातियों के बच्चों के साथ भेदभाव का व्यवहार करते हैं तथा उन्हें अपने से दूर रखने का प्रयत्न करते हैं तो निम्न जातियों के बच्चे अपराधी व्यवहारों के द्वारा इसका विरोध करने लगते हैं। 


(13 ) अन्य कारण - यह सच है कि बाल अपराधों के लिए पारिवारिक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक दशाएं अधिक उत्तरदायी होती हैं । लेकिन कुछ बाल अपराध इनके अतिरिक्त अनेक दूसरी दशाओं के भी परिणाम होते हैं। गरीबी, उद्देश्यहीन शिक्षा, दोषपूर्ण सीख, युद्ध की स्थिति तथा आर्थिक मन्दी आदि अन्य प्रमुख दशाएं हैं ।

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