सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आतंकवाद का अर्थ, स्वरूप, तकनीक, दुष्परिणाम एवं कारण

आतंकवाद का अर्थ, स्वरूप, तकनीक, दुष्परिणाम एवं कारण


आतंकवाद का अर्थ - आतंकवाद एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें समाज के ही कुछ व्यक्ति या समूह हथियारों के सहायता से जन सामान्य में डर का वातावरण पैदा करते हैं। इनका उद्देश्य हिंसा के द्वारा लोगों में भय उत्पन्न करना होता है जिससे कि सम्बन्धित. क्षेत्र, समस्त व्यवस्था जातिहीन हो जाये और वे अपने उद्देश्यों की पूर्ति आसानी से कर सकें। 


इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आतंकवाद का आधार अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बल प्रयोग में निहित है। जब कोई छोटा समूह या कुछ व्यक्ति यह अनुभव करने लगते हैं कि अपने उद्देश्यों की पूर्ति शान्तिपूर्वक तथा संवैधानिक तरीकों से नहीं कर पायेगे तब वह अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बल प्रयोग, शक्ति तथा हिंसा का सहारा लेते हैं। संगठित शक्ति का प्रयोग करने में वह व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह अनेक कारणों से अक्षम होते हैं। ऐसी स्थिति में वह व्यक्तिगत स्तर पुर अथवा छोटे गुट के रूप में अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शक्ति का प्रयोग करने लगते हैं और इस प्रकार आतंकवाद का जन्म होता है। 


लॉगमैन माडर्न इंग्लिश डिक्शनरी के अनुसार, "शासन करने या राजनीतिक विरोध प्रकट करने के लिए भय को एक विधि के रूप में उपयोग करने की नीति को प्रेरित करना आतंकवाद कहलाता है। 


आतंकवाद का स्वरूप - 


स्वतन्त्रता के पूर्व भी भारत में आतंकवाद उपस्थित था परन्तु तब इसका उद्देश्य भारत से ब्रिटिश शासन को समाप्त करना था। आतंकवाद अपने वर्तमान स्वरूप में भारत में स्वतन्त्रता की प्राप्ति के साथ ही उपस्थित हो गया था इसके प्रथम लक्षण स्वतन्त्रता की प्राप्ति के साथ ही तब उजागर हुए जब तेलंगाना में साम्यवादियों ने हिंसक विद्रोह कर दिया। बाद में तेलंगाना आन्दोलन असफल हो गया लेकिन देश के अन्य भागों में और विशेषकर भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में आतंकवाद उभरने लगा। संगठित रूप से आतंकवाद नागालैण्ड में सामने आया जब फिजो ने 'नागा राष्ट्रीय परिषद का गठन किया और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रशिक्षित गुरिल्ला दस्तों का गठन किया। अपने इस कार्य में नागाओं को अनेक सीमावर्ती विदेशी राज्यों, से सुविधायें तथा साधन प्राप्त हुए। इसी प्रकार बाद में मिजोरम में लालडेगा ने 'मिजो नेशनल फ्रंट' तथा विश्वेसर सिंह ने मणिपुर में पीपुल्स लेबरेशन आर्मी के रूप में आतंकवादी संगठनों की स्थापना की। हाल के वर्षों में मिजोरम को भारत का अंग माना तथा भारतीय संविधान के अन्तर्गत कार्य करने का निश्चय किया। 


भारत में आतंकवाद का सबसे भयावह स्वरूप पंजाब में खालिस्तान के समर्थकों प्रस्तुत किया। सिख आतंकवाद प्रारम्भ करने का श्रेय जरनैल सिंह भिंडरवाले को दिया जा सकता है। भिंडरवाले की गतिविधियों के कारण सिखों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल अमृतसर का स्वर्ण मंदिर उग्रवादियों का गढ़ बन गया और वहाँ से हिंसा की कार्यवाहियों का संचालन होने लगा। इसे नियंत्रित करने के लिए जून, 1984 में भारत सरकार को बाध्य होकर सेना का उपयोग करना पड़ा। 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' नामक इस कार्यवाही में उग्रवादियों की संगठित शक्ति को समाप्त कर दिया गया परन्तु उसके बाद उग्रवादी छोटे-छोटे गुटों में बँट गये और उन्होंने अनेक व्यक्तियों की हत्यायें की। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी की हत्या भी उग्रवादियों के समर्थकों ने 30 अक्टूबर 1984 को कर दी। इन्दिरा गाँधी की हत्या के विरोध में अनेक स्थानों पर हुए दंगों में सिखों को जन-धन की हानि उठानी पड़ी जिसके कारण हिन्दू सिख सम्प्रदाय के मध्य विद्वेष की भावना बढ़ गयी। मई 1985 को दिल्ली तथा कुछ अन्य स्थानों पर 'ट्रांजिस्टेर बम काण्ड' हुए जिनके कारण अनेक व्यक्ति मारे गये तथा घायल हुए। इन्हीं परिस्थितियों में शांति तथा सद्भावना की स्थापना के उद्देश्य से प्रधानमंत्री राजीव गाँधी तथा अकाली दल के नेता संत हरचन्द सिंह लोगोंवाल का एक समझौता 24 जुलाई, 1985 को हुआ लेकिन 20 अगस्त, 1985 को सन्त लोगोंवाल की हत्या कर दी गयी और इस प्रकार 'राजीव लोगोंवाल' समझौते को प्रथम आघात लगा। अकाली दल की नवगठित सरकार मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला के नेतृत्व में आतंकवादियों से निपटने के पूर्ण प्रयत्न करती रही और केन्द्र से उसे पूर्ण सहयोग तथा सहायता प्राप्त होती रही। लेकिन सिख आतंकवाद सीमित भले ही हुआ हों, इसके पूर्णरूपेण समाप्त होने के आसार भविष्य में नजर नहीं आते। 


भारत में आतंकवाद की चर्चा नक्सलवादी आन्दोलन की चर्चा किए बिना समाप्त नहीं हो सकती। छठे दशक में नक्सलवाद एक शक्ति बनने लगा था और इसका प्रभाव बढ़ने लगा था परन्तु अपनी फूट और मतभेदों तथा जनसमर्थन के अभाव में नक्सलवादी आन्दोलन धीरे-धीरे बिखर गया। 


आतंकवाद की तकनीक - 


आतंकवाद वह विचारधारा अथवा कार्य पद्धति है जो बल प्रयोग द्वारा आतंक कर सरकारों को अपनी मांगों की पूर्ति के लिए बाध्य करते हैं। इस दृष्टि से आतंकवाद में अग्रलिखित तकनीकं पायी जाती है 


1. आतंकवाद अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हिंसा और बल प्रयोग में विश्वास रखता है। 


2. आतंकवाद का उद्देश्य हिंसा के द्वारा सामान्य जनता में भय और असुरक्षा की भावना उत्पन्न करना है। 


3. असुरक्षा की भावना के द्वारा आतंकवाद समाज में अस्थिरता उत्पन्न करनाचाहता है। जिससे शासन के प्रति अविश्वास की भावना उत्पन्न हो सके। 


4. सरकार के प्रति असन्तोष उत्पन्न कर आतंकवाद ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देता है जिसमें वह स्वयं ही अपने उद्देश्यों की पूर्ति कर सके अथवा सरकार कमजोर होकर उसकी मांगों को स्वीकार कर ले। 


आतंकवाद के कारण - 


भारत में आतंकवाद की उत्पत्ति और विकास के अनेक कारण हैं। इस पर हम नीचे विस्तार से वर्णन करेंगे - 


1. भारत में आतंकवाद के बीज ब्रिटिश शासन की विरासत हैं अंग्रेजों की 'विभाजन करो और शासन करो' की नीति ने भारत में अनेक असंतुष्ट गुटों को जन्म दिया। स्वतन्त्रता के पश्चात् जब यह असंतुष्ट गुट शान्तिपूर्ण संवैधानिक तरीकों से अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हुए और उन्हें जन समर्थन प्राप्त नहीं हुआ तो इन्होंने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आतंकवाद का सहारा लिया। 


2. विदेशी शक्तियों के प्रोत्साहन के कारण भी भारत में आतंकवाद को पनपने और विकसित होने में सहायता प्राप्त हुई। उत्तर पूर्वी अंचलों में चीन ने आतंकवादियों को न केवल सहायता पहुँचाई। अपितु इन्हें साधन भी उपलब्ध कराये हैं। इसी प्रकार पंजाब में पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने तथा साधन उपलब्ध कराने के प्रमाण भी स्पष्ट हैं। अमेरिका और कुछ अन्य पश्चिमी देशों ने पंजाब के आंतकवादियों के प्रति न केवल सहानुभूतिपूर्ण रूपं अपनाया है अपितु प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उन्हें प्रोत्साहित किया है। 


3. समाज के विभिन्न वर्गों में व्याप्त आर्थिक तथा सामाजिक असंतोष भी भारत में आतंकवाद का एक कारण है। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत ने प्रगति की है इस सम्बन्ध में दो राय नहीं हो सकती। लेकिन इस तथ्य को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि इस प्रगति का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पाया है। इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र में भी न्याय की स्थापना में सफलता प्राप्त नहीं हुई हैं। परिणामस्वरूप असंतुष्ट वर्ग यदि आतंकवाद की ओर आकर्षित होता है तो वह स्वाभाविक है। 


4. दलगत राजनीति भी आतंकवाद को प्रोत्साहन प्रदान कर रही है। सत्ता की होड़ में विभिन्न दल और राजनीतिज्ञ कभी-कभी तो आतंकवादियों की सहायता प्राप्त करते हैं इसके साथ ही निर्वाचनों में मतदाताओं का समर्थन प्राप्त करने के लिए भी राजनीतिक दल और राजनीतिज्ञ हितों की उपेक्षा कर आतंकवाद के प्रति कठोर रुख नहीं अपनाते। 


5. धार्मिक संकीर्णता भी भारत में आतंकवाद की उत्पत्ति तथा विकास में एक सहायक तत्व रहा है। धर्म के नाम पर आतंकवादी जनता की सहानुभूति तथा समर्थन प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। पंजाब में तो आतंकवाद का मुख्य आधार ही सिख धर्म से सम्बन्धित भावनाओं को गलत ढंग से उभारा जाना है। 


दुष्परिणाम - 


उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि आतंकवादी वह विचारधारा अथवा कार्यपद्धति है जो बल प्रयोग द्वारा आतंक उत्पन्न कर सरकारों को अपनी माँगों की पूर्ति के लिए बाध्य करते हैं जिससे जनता को अनेक दुष्परिणाम सहन करने पड़ते हैं जो निम्न हैं, जैसे 


1. आतंकवाद अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हिंसा और बल प्रयोग में विश्वास रखता है। जिससे लाखों निर्दोषों की जाने जाती हैं। 


2. आतंकवाद का उद्देश्य हिंसा के द्वारा सामान्य जनता में भय और असुरक्षा की भावना उत्पन्न करना है। इससे आम जनता में असुरक्षा की भावना रहती है तथा वह अपने किसी भी कार्य को सुचारुरूप से नहीं कर पाते हैं। इस कारण पूरे राष्ट्र के विकास की गति धीमी पड़ जाती है। 


3. असुरक्षा की भावना के द्वारा आतंकवाद समाज में अस्थिरता उत्पन्न करना चाहता है। जिससे शासन के प्रति अविश्वास की भावना उत्पन्न हो सके इस उद्देश्य में काफी हद तक आतंकवादी सफल हो जाते हैं क्योंकि सरकारें आतंकवाद का पूर्ण रूप से निराकरण नहीं कर पाती हैं। 

निवारण -

 आतंकवाद का निवारण कोई सरल कार्य नहीं है। यह तो निश्चित है कि केवल सैन्य शक्ति अथवा बल प्रयोग के द्वारा आतंकवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता, यह भी स्पष्ट है कि आतंकवाद को थोड़े समय में ही समाप्त नहीं किया जा सुकता। इसके लिए लम्बी अवधि में एक साथ ही अनेक क्षेत्रों में प्रयत्न करने पड़ेंगे। राष्ट्रीय चेतना को जागृत कर ऐसी स्थिति उत्पन्न करनी पड़ेगी जिसमें आतंकवादियों को सहानुभूति प्राप्त नहीं हो सके। यह निश्चित है कि आतंकवाद के विरुद्ध बनाई गयी कोई भी योजना तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक उसे जनसमर्थन प्राप्त नहीं, केवल सरकारी आधार पर शक्ति प्रयोग द्वारा ही आतंकवाद समाप्त नहीं हो सकता। आर्थिक असंतोष, सामाजिक अन्याय, धार्मिक असुरक्षा आदि को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने पड़ेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह. हैं कि आतंकवाद के विरुद्ध प्रबल जनशक्ति संगठित करनी पड़ेगी और तभी इसके समाप्त होने की आशा बंधेगी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे