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असीरियन सभ्यता के लोगों का धार्मिक जीवन

असीरियन सभ्यता के लोगों का धार्मिक जीवन  


असीरियन लोगों के धार्मिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

देव-मण्डल :- क्रूर एवं हिंसा के वातावरण में असीरियन सभ्यता में न तो धार्मिक मान्यताएँ अधिक विकसित हुई न उनका राजनीतिक जीवन पर कोई विशेष प्रभाव ही पड़ा। बेबिलोनियन देवी-देवताओं को यहाँ अपनाया अवश्य गया लेकिन बेबिलोनियन राष्ट्रीय देव मा्दुक का स्थान असीरिया के अशुर नामक देवता को मिला। प्रारम्भ में यहाँ अशुर को अन्य देवताओं के समान महत्व मिला था और उसकी प्रसिद्धि एक सौर देवता के रूप में थी। सपक्ष सूर्य-चक्र उसका प्रतीक था। बाद में जब अशुर नामक नगर को असीरिया साम्राज्य की राजधानी बनने का सुयोग मिला तो अशुर को विशेष प्रतिष्ठा मिली। इसे राष्ट्रीय देवता का पद दे कर भारतीय इन्द्र की भाँति युद्धदेव स्वीकार कर लिया गया। अशुर युद्ध एवं शान्ति दोनों में राष्ट्र का कल्याण करता था।

 वास्तव में अशुर एक ऐसा राष्ट्रीय देवता था जिसका शक्ति शाली हाथ असीरियनों को विजय दिलाता था तथा जिसकी अक्षय उदारता मनुष्य को समृद्धियाँ प्रदान करती थी। अशुर के अन्य व्यक्तिगत गुणों एवं चरित्र के विषय में अधिक ज्ञात नहीं है। अशुरनजिरपाल द्वितीय के शासनकाल में एक प्रस्तर चित्र में युद्ध बन्दियों को अशुर के समक्ष बलि देते हुए दिखाया गया है। अशुरबनिपाल अपने एक लेख में सगर्व कहता है कि "असुर के विद्रोहियों एवं मेरे विरूद्ध षड्यन्त्र करने वाले इन सैनिकों को मनि देवताओं के सम्मुख हवन कुण्डों में बलि दे दी। इससे मैने देवताओं को प्रसन्न किया।" इसमें यह पता लगता है कि अशुर बलि से सन्तुष्ट होता था। 

अशुर का आवास अशुर नगर का मन्दिर था। इसकी पत्नी के रूप में निनलिल प्रतिष्ठित थी। अशुर एवं निनलिल के अतिरिक्त एआ, अनु, एनलिल, सिनु, शमश, बेल, मार्दूक, नाबु, इनुर्त, नर्गल आदि की उपासना भी की जाती थी। उनकी अधिष्ठात्री देवी निन्ना प्रेम की प्रतीक थी। असीरियनों के धार्मिक जीवन में शासक को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान मिला था। तत्कालीन मान्यता के अनुसार शासक देवताओं का प्रतिनिधि था और देवताओं की इच्छा के मुताबिक शासन करता था। यदि किसी देश के निवासी अशुर के प्रति आस्था नहीं प्रकट करते थे अथवा एक बार आस्था प्रकट कर उसका अनुपालन नहीं करते तो असीरियन शासक उस देश पर आक्रमण कर उसे जीत कर वहाँ के निवासियों को दण्डित करता था। राष्ट्र के पुरोहित के रूप में शासक देवता की उपासना करता था। 

अन्धविश्वास एवं परलोकवाद :- असीरियन धर्म अविश्वास एवं अभिचारपरक था। इस धर्म में अशुभकारी एवं आभिचारिक शक्तियों को विशेष महत्व मिला था। असीरियनों को इन शक्तियों से उतना ही भय था जितना उन्हें अपने विराधियों से। विल यूनिट ने उचित ही कहा है कि असीरियन धर्म का मुख्य उद्देश्य भावी नागरिकों में देशभक्तिपूर्ण विनय उत्पन्न करना तथा अभिचार एवं अलि के माध्यम से देवताओं की कृपा प्राप्त करने की कला की शिक्षा देना था। अशुभकारी एवं आभिचारिक शक्तियों से बचने का एकमात्र उपाय मंत्र-तंत्र था जिस पर पुजारियों का एकाधिकार था। इन मंत्रों को ताबीजों पर उत्कीर्ण कर दिया जाता था। कभी-कभी मंत्रों के साथ-साथ अनेक प्रकार की आकृतियाँ भी उत्कीर्ण की जाती थी। इन तावीजों को यहाँ बालक से वुद्ध तक सभी धारण करते थे। अंधविश्वास एवं अभिचार की प्रबलता का प्रभाव पुजारियों पर पड़ा और अन्हें आगे बढ़ने का अवसर मिला। यहाँ पुजारियों के कई वर्ग थे। 

अभिचारविशेषज्ञ, संगीत द्वारा देवना को प्रसन्न करने वाले, स्तुति करने वाले तथा धार्मिक कार्यों के समय देव मूर्तियों का जलाभिषेक करने वाले पुजारी अलग-अलग थे। वे घटनाओं के कार्य- कारण पर विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि क्रम से घटित होने वाली दो धटनाओं में पहली दूसरे का कारण होती है। इसका प्रभाव शकुन विचार पर पड़ा और यहाँ भी बेबिलोनिया की भौति शकुन विचारकों का एक वर्ग अस्तित्व में आ गया। ग्रह-नक्षत्रों का अध्ययन करके शकुन विचारक भविष्यवाणी करते थे। इससे ज्योतिष के अध्ययन को बढ़ावा मिला। इसका लाभ बाद में यूनानियों को मिला। असीरियनों को पारलौकिक मान्यताओं के विषय में अधिक ज्ञात नहीं है। हम केवल इतना जानते हैं कि वे एक ऐसे अन्धलोक का अस्तित्व मानते थे जहाँ मृतात्मा को जाना पड़ता था। वहाँ उसे लौकिक कर्मों की जाँच की जाती थी इस जांच में जो दुष्कर्मी सिद्ध होता था उसे पोर यातना मिलती थी। मृतकों के विषय में असीरियन उदास दिखाई पड़ते है। पहले सामान्य रूप से जमीन में दफनाने की परम्परा थी किंतु आगे चलकर जलाने लगे।

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