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अपराधी जन्मजात नहीं होते वरन् बनाये जाते हैं

 "अपराधी जन्मजात नहीं होते वरन् बनाये जाते हैं" 

"अपराधी जन्मजात नहीं होते वरन् बनाये जाते हैं"।अनेक समाजशास्त्रियों का मानना है कि अपराधी जन्मजात नहीं होते हैं बल्कि बनाये जाते हैं। बच्चा अपने जन्म के समय निर्दोष होता है। जन्म के समय बच्चे का अन्तःकरण शुद्ध तथा निर्मल होता है। अपराध के बीज तो सामाजिक परिस्थितियों में छिपे हुए होते हैं। जैसे ही इन बीजों को उपजाऊ भूमि प्राप्त होती है उनमें अंकुर फूटकर निकलने लगते हैं। अपराध जन्म की देन नहीं है बल्कि सामाजिक परिवेश की देन है। दूषित सास्कृतिक प्रतिमान ही अपराध के जन्मदाता होते हैं। इस सम्बन्ध में कुछ विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किये है 


दुर्खीम के अनुसार, “मनुष्य समाज की उपज हैं और जैसा समाज होगा वैसे मानव होंगे।' सदरलैण्ड के अनुसार, अपराधी जन्म से नही होते वरन् अपराधी बनाने का काम समाज करता है।" 


समाजशास्त्रियों का मानना है कि अपराध भी एक सीधा व्यवहार है। अपराध को व्यक्ति पारस्परिक सम्पर्क और अन्तः क्रिया द्वारा प्राप्त करता है। अपराध के बीज एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरित कर दिये जाते हैं। अपराध का जन्म निम्नलिखित चार परिस्थितियां निभाती हैं -(1) आयु (2) पुनरावृत्ति (3) अवधि (4) तीव्रता। 


अपराध का मुख्य कारण कुसंगति है और समाज का दृषित पर्यावरण, समाज की भूमिका अपराधी बनाने में अधिक महत्वपूर्ण है। समाज में अपराध के कारण आर्थिक, सांस्कृतिक, मानसिक, राजनीतिक तथा शैक्षिक क्षेत्रों में छिपे हुए हैं। जब किसी व्यक्ति पर इनमें से कोई कारण प्रभावी हो जाता है तब व्यक्ति अपराध में संलिप्त हो जाता है इस सम्बन्ध में सदरलैण्ड का मानना है कि व्यक्ति अपराधी इसलिए बनते हैं क्योंकि वे अपने दैनिक जीवन में अपराधियों या अर्ध-अपराधियों के सम्पर्क में गैर अपराधियों की तुलना में अधिक आते हैं। इस प्रकार सिद्ध होता है कि अपराध कुसंगत और सीख का परिणाम है। 


अपराध के कारण - अमेरिका के प्रसिद्ध समाजशास्त्री के अनुसार सामाजिक संरचना प्रमुख रूप से असामाजिक व्यवहार के लिए उत्तरदायी है जो कि निम्नलिखित है 


(क) घर का वातावरण-अपराधी बनने का प्रमुख कारण घर का वातावरण है। घर में विभिन्न प्रकार की ऐसी परिस्थितियों हो सकती हैं जिनकी बजह से व्यक्ति अपराध करने के लिए मजबूर हो जाता है। यह परिस्थितियाँ हो सकती हैं।(1) निर्धनता। (2) घर में अनैतिकता तथा निर्दयता का वातावरण (3) परिवार के सदस्यों की अधिक संख्या तथा घर में स्थान की कमी (4) घर में सादक द्रव्यों का प्रयोग। (5) बेरोजगारी। (6) बच्चों के प्रति अत्यधिक प्यार अथवा प्यार में कमी। (7) अपराधी माता-पिता के बड़े भाई बहन। (8) माता-पिता के पक्षपातपूर्ण व्यवहार। (9) विघटित घर, मृत्यु, तलाक अथवा अन्य अपराधी प्रवृत्तियों के कारण जेल आदि। (10) संवेगात्मक असुरक्षा, माता-पिता में कलह तथा संवेगात्मक अस्थिरता। 


(खह) विद्यालय का वातावरण बालक को अपराधी बनाने में विद्यालय का वातावरण भी प्रमुख भूमिका अदा करता है। विद्यालय में यदि बालक को उसकी योग्यता के अनुसार वातावरण नहीं मिल पाता है तो वह अपराधी बन जाता है। विद्यालय में अनेक ऐसी परिस्थितियां होती हैं जो बालक को अपराधी बना देती हैं। ये परिस्थितियां निम्नलिखित है - (1) शिक्षा प्रणाली का दोषपूर्ण होना। (2) विद्यालय परिसर में छात्रों के पारस्परिक झगड़े। (3) विद्यालय में अनुशासन ठीक न होना। (4) विद्यालय में जातिवाद, साम्प्रदायिकता आदि की भावना का पाया जाना। (5) अध्यापकों द्वारा अध्यापन कार्य में रुचि न लेना। (6) विद्यालय का दूधित वातावरण (7) अध्यापक द्वारा बालक की अवहेलना व तिरष्कार करनी। 


(ग) पड़ोस का दूषित वातावरण -बालक के ऊपर उसके पड़ोस का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि बालक को 24 घंटे घर के अन्दर बन्द करके नहीं रखा जा सकता है। यद्यपि घर का वातावरण शुद्ध व स्वच्छ हो सकता है, किन्तु यदि पड़ोस का वातावरण दूषित है तो अवश्य ही बालक पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। पड़ोस में निम्नलिखित हानिकारक दशायें देखी जा सकती हैं - 


(1) पड़ोस में अपराधियों के अड्डों का होना। 

(2) पड़ोस में झगड़ालू व अपराधी प्रवृत्तियों के व्यक्तियों का होना।

(3) पड़ोस में ईर्ष्यालु. अशिक्षित, जातिवाद व साम्प्रदायिकता से असित परिवारों का होना। 

(4) पड़ोस में मद्यपान, तास, जुआ आदि खेलने वाले परिवारों का होना इत्यादि। 


(घ) सामाजिक दूषित वातावरण - मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह समाज में ही जन्म लेता है और समाज में ही बड़ा होता है। सामाजिक वातावरण भी व्यक्ति के अन्दर अपराधी प्रवृत्तियों उत्पन्न करने का एक कारक है । समाज निम्नलिखित प्रकार से व्यक्ति को अपराधी बनाता है। 


(i) चलचित्र -  हमारे समाज की वर्तमान पीड़ी चलचित्रों से बहुत ज्यादा प्रभावित हुयी है। बालक चलचित्रों व दूरदर्शन में दिखाये गये अपराधिक दृश्यों को देखकर अपराध करना सीख जाते हैं तथा व्यवहार में करते भी हैं चलचित्र ऐशो आराम व धन प्राप्ति की इच्छा को भड़काकर, शौर्य व साहसपूर्ण कार्यों की भावना जागृत कर तथा यौनइच्छा को जागृत कर युवक युवतियों को अपराध की ओर आकर्षित करते हैं। 


(ii) समाचार पत्र - यदि समाचार पत्रों के कुछ सकारात्मक प्रभाव है तो कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हैं। इनके नकारात्मक प्रभाव ये हैं कि यह भी अपराध को प्रोत्साहन देते हैं। अधिकांश समाचार पत्रों के संवाददाता घटनाओं को रुचिकर बनाने के लिए उन्हें काफी बढ़ा-चढ़ा कर जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं। इन अपराध सम्बन्धी घटनाओं का युवा पीढ़ी पर अत्यन्त ही कुप्रभाव पड़ता है। तथा युवा पीढ़ी के युवक युवतियों के अन्दर अपराधी प्रवृत्तियाँ जन्म लेती है। 


(ii) निर्धनता - निर्धनता व्यक्ति को अपराध करने के लिए मजबूर कर देती है जैसा कि कहावत में कहा गया है कि भूखा व्यक्ति क्या पाप नहीं कर सकता अर्थात निर्धनता मनुष्य में सब बुराइयों का आधार है। जब व्यक्ति को भूख लगती है तो ईमानदारी और बेईमानी का फर्क नहीं दिखाई देता है। भूख से पीड़ित होकर व्यक्ति, चोरी, डकैती व अन्य विभिन्न प्रकार के अपराध करने के लिए विवश हो जाता है। 


(iv) समाज में आर्थिक असन्तोध व अत्यधिक असमानता-आर्थिक असन्तोष तथा आर्थिक असमानता भी अपराध को जन्म देने का एक कारक हैं। व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रयत्न करता रहता है। इसके बाद भी आवश्यकत्तायें न पूरी होने पर वह कई बार अपराध की ओर प्रवृत्त हो जाता है। अत्यधिक आर्थिक असमानता भी आर्थिक असन्तोष को जन्म देती है। 


(v) समाज में ऊँच - नीच की भावना भारतीय सामाजिक संरचना में जाति व धर्म को प्रधानता दी गयी है। समाज में जो व्यक्ति ऊँची जाति में उत्पन्न होता है वह अपने को नीची जाति में उत्पन्न व्यक्ति से श्रेष्ठ समझता है तथा नीची जाति में उत्पन्न व्यक्ति से घृणा करता है। नीची कही जाने वाली जातियों में उत्पन्न व्यक्तियों का शोषण किया जाता है।इसके अतिरिक्त धनी व्यक्तियों द्वारा निर्धन व्यक्तियों का शोषण किया जाता है। इस शोषण से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति अपराधी बन जाता है। 


(vi) औद्योगीकरण एवं नगरीकरण - औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण अनेक समस्यायें उत्पत्र हुयी हैं, जैसे-संयुक्त परिवारों का विघटन, आवास की समस्या, पर्यावरण प्रदूषण की समस्या, वेश्यावृत्ति की समस्या, गन्दी बस्तियों की संख्या में वृद्धि की समस्या आदि। इन समस्याओं के मूल में अपराध-वृत्ति निहित है अर्थात औद्यीकरण एवं नगरीकरण के कारण अपराधों की संख्या में वृद्धि हो रही है।

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