सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अपराध की समाजशास्त्रीय अवधारणा

 अपराध की समाजशास्त्रीय अवधारणा  

अपराध की समाजशास्त्रीय अवधारणा (Sociological Concept of Crime) - समाजशास्त्रियों तथा अपराधशास्वियों का विचार है कि अपराध की अवधारणा को केवल कानूनी आधार पर ही नहीं समझा जा सकता। वास्तविकता यह है कि कानून के विरुद्ध किये जाने वाले कार्य जिनके लिए राज्य द्वारा दण्ड की व्यवस्था की जाती है, उनके अतिरिक्त वह सभी व्यवहार अपराध हैं जो समाज-विरोधी होते हैं। इस आधार पर जे. एल. गिलिन का कथन है कि अपराध एक ऐसा कार्य है जो वास्तविक रूप में समाज के लिए हानिकारक होता है अथवा जिसे समूह द्वारा सामाजिक हितों के विरुद्ध मानकर उसके लिए किसी न किसी रूप में स्वयं दण्ड देने की व्यवस्था की जाती है। राज्य द्वारा अपराधी व्यवहार को स्पष्ट करने के लिए जो कानून बनाये जाते हैं, उनमें समाज के प्रमुख मूल्यों तथा जन भावनाओं का समावेश नहीं हो पाता। दूसरी बात यह है कि अपराध का सम्बन्ध ऐसे सभी कार्यों से है जो व्यक्ति और समूह की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं तथा सार्वजनिक हितों के विरुद्ध होते हैं। अपराध की समाजशास्त्रीय आधार पर विवेचना करना इसलिए भी जरूरी है कि यदि जन-भावनाओं तथा सामाजिक मूल्यों पर ध्यान दिये बिना राज्य द्वारा कोई आपराधिक कानून बना दिये जायें तो उन्हें कठिनता से ही लागू किया जा सकता है। प्रश्न यह उठता है कि यदि किसी साम्यवादी या पूँजीवादी देश में ऐसे सभी कार्यों को अपराध घोषित कर दिया जाय जो उनकी साम्यवादी अथवा पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध हो तो ऐसे कानूनों के विरुद्ध होने वाले सभी व्यवहारों को क्या अपराध माना जा सकता है ? दूसरी ओर, आज भी ऐसे बहुत-से जनजातीय समुदाय हैं जिनकी सामाजिक व्यवस्था पर निगन्त्रण रखने में वहां की सरकार के कानूनों का कोई प्रभाव नहीं होता लेकिन फिर भी कहाँ अपराधियों को कठोर दण्ड देकर सामाजिक नियन्त्रण की व्यवस्था को बनाये रखा जाता है। इसका तात्पर्य है कि सामाजिक आधार पर भी ऐसे कानूनों का उद्भव हो सकता है जो अपराधी तथा गैर-अपराधी कार्यों में भेद कर सके। 


ऐसे विचारकों की सूची बहुत लम्बी है जो अपराध की कानूनी परिभाषाओं का समर्थन नहीं करते। इस सम्बन्ध में थास्टॅन सेलिन (Thorsten Sellin) का कबन है कि अपराधी व्यवहार की व्याख्या व्यवहार के मानक नियमों के उल्लंघन के आधार पर की जानी चाहिए। सेलिन यह नहीं कहते कि अपराध की कोई कानूनी परिभाषा होनी ही नहीं चाहिए बल्कि उनका मानना यह है कि अपराध की वास्तविक अवधारणा को तभी समझा जा सकता है जब यह कानून द्वारा निर्धारित दायरे से स्वतन्त्र हो। उनके अनुसार आचरण के मानक नियमों का तात्पर्य व्यवहार करने के उन तरीकों से है जो सामाजिक अन्तक्रियाओं द्वारा समूह में स्वयं विकसित होते हैं तथा उन्हें पूरे समूह की स्वीकृति मिली होती है। इनका सम्बन्ध सामाजिक मूल्यों से होता है और इसलिए यह मानक नियम सुपरिभाषित हो जाते हैं। इस आधार पर सैलिन ने यह निष्कर्ष दिया कि अपराध आचरण सम्बन्धी मानक नियमों का उल्लंघन है. केवल राज्य के कानूनों का उल्लंघन नहीं। 


एडविन एच. सदरलैण्ड (Edwin H. Sutherland) ने एक दूसरे ही रूप में अपराध की समाजशास्त्रीय अवधारणा को कानूनी अवधारणा से अधिक महत्वपूर्ण माना उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून की दृष्टि में केवल उन्हीं व्यवहारों को अपराध माना जाता है जो कानून द्वारा वर्जित हो, जिन्हें न्यायालय के द्वारा अपराध घोषित कर दिया जाय तथा जिनके लिए अपराधी को एक निश्चित दण्ड दिया जाय। दूसरी ओर, अपने अध्ययन में सदरलैण्ट ने यह पाया कि अमेरिका में अपने पद का दुरुपयोग करने वाले, उच्च प पर आसीन और समाज में प्रतिष्ठित लोगों में से जिन 547 लोगों के खिलाफ अभियोग दर्ज किये गये, उनमें से न्यायालयों के द्वारा केवल 9 प्रतिशत लोगों को ही दण्डित किया गया, जबकि दूसरे मामलों का निपटारा न्यायालय के बाहर उन संगठनों द्वारा किया गया जिनका कानून से कोई सम्बन्ध नहीं था। इसे स्पष्ट करते हुए सदरलैण्ड ने क्या श्वेतवसन अपराध एक अपराध है शीर्षक से एक लेख लिखा। इस लेख का उद्देश्य इसी बात को स्पष्ट करना था कि यदि अपराध की कानूनी अवधारणा को स्वीकार कर लिया जाय तो अपराध का दायरा बहुत सीमित रह जायेगा तथा विशेषकर वे व्यक्ति कभी भी अपराधी नहीं माने जा सकेंगे जो अपनी राजनीतिक, प्रशासनिक या। आर्थिक शक्ति के कारण अपने अपराध को सरलता से छिपा लेते हैं। इस दृष्टिकोण से भी अपराध की अवधारणा का आधार सामाजिक होना चाहिए, केवल कानूनी नहीं। इस दृष्टिकोण से आवश्यक है कि कुछ प्रमुख परिभाषाओं की सहायता से अपराध की समाजशास्त्रीय अवधारणा को समझने का प्रयास किया जाये। 


अपराध की समाजशास्त्रीय परिभाषाएँ एवं अर्थ

(Sociological Definitions and Meaning of Crime) - इलिएट तथा मैरिल (EIliott and Merrill) के शब्दों में, "अपराध को एक ऐसे समाज विरोधी व्यवहार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसका समूह के द्वारा बहिष्कार किया जाता है तथा जिसके लिए वह दण्ड निर्धारित करता है।" 


डॉ. हैकरवाल (B. S. Haikerwal ) ने लिखा है, "सामाजिक दृष्टिकोण से अपराध का तात्पर्य व्यक्ति के किसी भी ऐसे व्यवहार से हैं जो मानवीय सम्बन्धों की उस व्यवस्था में बाधा डालता है जिसे समाज अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक समझता है।" 


थॉमस तथा नैनिकी (Thomas and Zinancicki) के अनुसार, "अपराध बह कार्य है जो उस समूह की एकता का विरोधी है जिसे व्यक्ति अपना समझते हैं। इस परिभाषा के द्वारा थॉमस तथा नैनिकी ने अपराध की अवधारणा को समूह की मानसिकता के आधार पर स्पष्ट किया है।" 


बार्ल्स तथा टीटर्स (H. E. Barnes and N. K. Teeters) "तकनीकी रूप से अपराध का अर्थ समाज-विरोधी व्यवहार के उस रूप से है जो सार्वजनिक शाब्दों में, भावनाओं का इस सीमा तक उल्लंघन करता है कि उसे कानून के द्वारा निषिद्ध कर दिया जाता है।" उन्होंने आगे लिखा है, 'दूसरे शब्दों में, अपराध कोई भी बह कार्य है जिसे समूह द्वारा अपने अस्तित्व के लिए घातक समझा जाता है तथा उसके प्रति समूह की प्रतिक्रिया निन्दा के रूप में होने के साथ ही अपराधी को ऐसे कार्य से रोकने का प्रयत्न किया जाता है।" 


मानहीम (Mannheim) ने अपराध की बहुत संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है, "अपराध समाजविरोधी व्यवहार है।" 


सदरलैण्ड (Sutherland) ने अपराध को परिभाषित करते हुए लिखा है, "अपराध सामाजिक मूल्यों के लिए घातक एक ऐसा कार्य है जिसके लिए समाज द्वारा दण्ड की व्यवस्था की जाती है।" इस कथन के द्वारा सदरलैण्ड ने अपराध को सामाजिक आधार पर स्पष्ट करते हुए इसके तीन तत्वों पर प्रकाश डाला है -(क) समाज की एक मूल्य व्यवस्था जिसे समाज के संगठन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है; (ख) समूह में सांस्कृतिक संघर्ष अथवा अन्य कारणों से कुछ व्यक्तियों द्वारी इन मूल्यों को मान्यता न देकर इन्हें भंग करने का प्रयत्न करना तथा (ग) इन मूल्यों को स्वीकार करने वाले व्यक्तियों अथवा एजेन्सी द्वारा इन्हें अस्वीकार करने वाले व्यक्तियों पर कठोरता से लागू करना।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे