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अपराध की परिभाषा, कारण

अपराध की परिभाषा, कारण

अपराध का अर्थ - ऐसे कार्य या व्यवहार जो समाज और कानून के विरुद्ध हैं या समाज की दृष्टि में समाज विरोधी है, अपराध कहलाता है। 

अपराध की परिभाषा - विभिन्न विद्वानों ने अपराध की परिभाषा निम्न प्रकार से दी है - 

इलिएट व मैरिल -"समाज विरोधी व्यवहार जो कि समूह द्वारा स्वीकार किया जाता है जिसके लिए समूह दण्ड निर्धारित करता है, अपराध है।"

काल्ड वेल-"अपराध किसी निश्चित स्थान व समय पर संगठित समाज-सम्मत मूल्यों के संगत का उल्लंघन है।"

मॉवरर के अनुसार-"अपराध सामाजिक मानदण्डों का उल्लंघन है। अपराध के कारण-अपराध के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं - 


(1) शारीरिक कारक - अपराध के लिए उत्तरदायी शारीरिक कारक निम्नलिखित हैं - 


(i) शारीरिक अयोग्यता-शारीरिक अयोग्यता भी अपराध के लिए उत्तरदायी है। सल्फ वाने के अनुसार अपराध और शारीरिक कुरूपता के बीच सम्बन्ध पाया जाता है। क्योंकि इससे उनमें हीनता की भावना उत्पन्न होती है इस हीनता की भावना के कारण ये अपनी इस आयोग्यता की पूर्ति अपराध से करते है। 


(ii) लिंग - लिंग के आधार पर अपराध में भिन्नता होती है क्योंकि स्त्रियाँ घर तक सीमित रहती हैं जबकि पुरुष घर से बाहर रहते हैं। परिवार की पूर्ण जिम्मेदारी पुरुषों पर होती है। कई बार व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए विवश होकर अपराध करते हैं। स्वियों द्वारा ऐसी स्थिति में यौन सम्बन्धी अपराध किये जाते है। 


(iii) बीमारी - कोई व्यक्ति जब अधिक समय तक बीमार रहता है तो उसमें चिड़चिड़ापन, तनाव व निराशा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह स्थिति अपराध करने के लिए प्रोत्साहित करती है। 


( iv) पैतृकता - विभिन्न विद्वानों के अध्ययन के अनुसार यदि माता-पिता अपराधी है तो उनकी संताने भी अपराधी ही होती हैं। गोडार्ड ने सन् 1912 में काली कैक परिवारों का अध्ययन करके यह पता लगाया कि उनके सभी पूर्वज अपराधी थे। इसके अतिरिक्त विभिन्न अध्ययनों में विद्वानों ने पाया कि अपराध के लिए बंशानुक्रम भी उत्तरदायी है। 


(2) आर्थिक कारक - अपराध के लिए उत्तरदायी आर्थिक कारक निम्नलिखित हैं - 


(i) निर्धनता - निर्धनता यह स्थिति है जो एक नैतिक गुणों से पूर्ण व्यक्ति को भी अपराध करने के लिए विवश कर देती है। जब व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं हो पाता है तो वह अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपराध करना प्रारम्भ कर देता है। 


(ii) आर्थिक संकट - देश में आर्थिक संकट आने से महंगाई बढ़ जाती हैं, उद्योग धंधों में काम बन्द हो जाता है। लोगों के पास जीवन यापन के साधन नहीं रहते हैं। ऐसी स्थिति में, लोग अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आपराधिक कार्य करने लगते हैं। 


(iii) अकाल - देश में प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, भूचाल, सुखा आदि आने की दशा में लोग बेघर हो जाते हैं और उनके जीवन-यापन के साधन समाप्त हो जाते हैं, उनके पास खाने-पाने को कुछ नहीं बचता है ऐसी स्थिति में वे अपना पेट भरने के लिए अपराध करते है। 


(iv) बेरोजगारी - जब व्यक्ति पर्याप्त शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त कर लेने के बाद भी मजनूरी में कारी काटता है तो उसमें निराशा, तनाव व चिन्ता जन्म लेती हैं। ऐसी स्थिति में वह अपराध के द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगता है। 


(3) राजनीतिक कारक - अपराध को प्रोत्साहित करने वाले राजनीतिक कारक निम्नलिखित हैं 


(i) राजनीतिक भ्रष्टाचार - राजनीतिक क्षेत्र में इतना भ्रष्टाचार फैला हुआ है कि एक नेता अपने स्वार्थ के लिए जनता में अराजकता फैला देता है तथा ईमानदार नेताओं की हत्या करना देता है। प्रष्ट नेता कुछ लोगों की विवशता का लाभ उठाकर उनसे अनुचित कार्य करवाता हैं, लोगों की हत्यायें करवाते हैं। 


(ii) युद्ध - देश में युद्ध होने से जनता का सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसके साथ-साथ महंगाई भी बढ़ जाती है। लोग बेरोजगार, बेघर व बेसहारा हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में वे अपराध करने के लिए मजबूर हो जाते है। 


(4) सामाजिक कारक - अपराध के लिए निम्न सामाजिक कारण उत्तरदायी हैं - 


(i) बुद्धिहीनता - मन्द बुद्धि वाले व्यक्ति उचित और अनुचित व्यवहार में अन्तर नहीं कर पाते हैं। कुछ व्यक्तियों की शारीरिक आयु बढ़ जाती है लेकिन उसी अनुपात में उनके मस्तिष्क का विकास नहीं हो पाता है। ऐसे व्यक्ति अपराध करने के लिए प्रेरित होते हैं। 


(ii) भावात्मकता - जो लोग अत्यधिक भावुक होते थे वे शीघ्र ही उत्तेजित हो जाते हैं और ऐसी स्थिति में वे अपराध कर बैठते है। 


(5) पारिवारिक कारक - अपराध के लिए प्रोत्साहित करने वाले पारिवारिक कारण निम्नलिखित हैं - 


(i) असंतुलित परिवार - असंतुलित परिवार में उसका प्रभाव बालकों के व्यक्तित्व पर पड़ता है। परिवार में असंतुलित वातावरण होने से परिवार में तनाव संघर्ष परित्याग तथा अशांति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति व्याकुल होकर अपराध कर सकता है। 


(ii) टूटे एवं अपराधिक परिवार - परिवार का जब विभाजन हो जाता है या टूट जाता है। ती परिवार के सदस्यों में तनाव और संघर्ष की भावना बनी रहती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपराध कर सकता है। 


(iii) भावात्मक स्थिरता - जो व्यक्ति अत्यधिक भावुक प्रवृत्ति के होते हैं, वे शीघ्र, उत्तेजित और व्याकुल हो जाते हैं और ऐसी स्थिति में वे अपराध कर देते हैं । 


(iv) अनैतिक परिवार - जिन परिवारों में नैतिकता को महत्व नहीं दिया जाता है उस परिवार के बालक चोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, नियमहीनता, नशा आदि की प्रवृत्ति सीख जाते हैं और अपराध की ओर बढ़ते जाते है। 


(6) अन्य कारक - उपर्युक्त कारकों के अतिरिक्त और भी कई कारक हैं जो समाज में होने वाले अपराधों के लिए उत्तरदायी हैं जैसे-धर्म, न्याय एवं पुलिस व्यवस्था, गतिशीलता, अशिक्षा आदि। 


अपराध की विशेषताए -अपराध में निम्नलिखित विशेषताएँ या लक्षण पाए जाते हैं - 


1. कानून द्वारा वर्जित व्यवहार - अपराध वह व्यवहार है जिसे कानून द्वारा वर्जित कर दिया गया है। किसी समूह द्वारा अशोभनीय समझा जाने बाला व्यवहार अपराध ही है। राज्य ही कानून बनाता है और उन्हें लागू करता है, अतः कानून की दृष्टि में जो कार्य निषेध हैं वही अपराध माना जाता है। 


2. दण्ड की व्यवस्था - प्रत्येक अपराध के लिए कानून की ओर से निश्चित दण्ड की व्यवस्था की जाती है। दण्ड के अभाव में कोई भी व्यवहार अपराध नहीं हो सकता। इस प्रकार अपराधी व्यवहार के लिए निश्चित दण्ड व्यवस्था लागू की जाती है। अपराध करने वालों को राज्य दण्डित करता है। 


3. अपराध भावना -अपराध करने में अपराध के मन्तव्य को भी विशेष महत्व दिया जाता है। यदि अचानक अथवा संयोगवश कोई अपराध हो जाता है तो इसे गम्भीर अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। उदाहरण के लिए अचानक बन्दूक से गोली चल जाने पर किसी की मृत्यु होने पर उसे सामान्य अपराध ही माना जाता है। उसी प्रकार आत्म-रक्षा दूसरे को जान से मार देना भी अपराध नहीं है। सेना में शत्रु के सैनिकों को अधिक से अधिक जान से मारना सम्मानजनक कार्य समझा जाता है, वह अपराध नहीं है। 


4. हानि का समावेश - अपराध उन्हीं कार्यों को कहा जाता है जिनसे सामूहिक कल्याण को खतरा होता है। समाज या राज्य को हानि पहुंचाने वाले कार्य अपराध की श्रेणी में रखे जाते हैं। हानि देखते हुए ही राज्य कानून बराबर उन्हें निषिद्ध करता है। इस प्रत्येक अपराध में समूह के हित की हानि का भाव जुड़ा रहता है। 


5. समय तत्व का महत्व - अपराध में समय तत्व बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। अपराध की विवेचना एक समय विशेष में व्यवस्थित कानून के अनुरूप करनी चाहिए। कल जो अपराध था आज नहीं है या कल जो अपराध नहीं था आज वह अपराध है। प्राचीन काल में सती प्रथा अपराध नहीं था परन्तु अब अपराध है। 


6. तुलनात्मक अवधारणा - प्रत्येक समाज में अपराधों का एक समान प्रारूप नहीं होता। समाज विशेष में परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप जिस कार्य को समूह के 'हितों के लिये घातक समझा जाता है, उन्हें अपराध मान लिया जाता है। एक समाज में जिस कार्य को अपराध की श्रेणी में रखा जाता है दूसरे समाज में बही सामान्य व्यवहार समझा जाता है। इस प्रकार अपराध एक तुलनात्मक अवधारणा है।

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