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अपराध की कानूनी अवधारणा

 अपराध की कानूनी अवधारणा 


अपराध की कानूनी अवधारणा (Legal concept of Crime) -

अपराध एक सापेक्षिक अवधारणा है जिसका सम्बन्ध देश, काल तथा सामाजिक मूल्यों से होता है लेकिन अधिकांश अपराधशास्त्री यह मानते हैं कि अपराध की सही व्याख्या कानूनी आधार पर ही की जा सकती है। माइकेल तथा एडलर (Michael and Adier) का यहाँ तक कथन है कि अपराध की वही परिभाषा वास्तविक, सुनिश्चित और कम सन्देहपूर्ण हो सकती है जिसके द्वारा अपराध को एक ऐसे व्यवहार के रूप में स्पष्ट किया जाये जिसे अपराधी संहिता में निषिद्ध घोषित किया गया हो। ऐसी परिभाषा केवल सही ही नहीं है वरन् यही एकमात्र सम्भव परिभाषा हो सकती है। इसे स्पष्ट करते हुए माइकेल और एडलर ने आगे लिखा है कि कानूनी आधार पर अपराधी भी केवल उसी व्यक्ति को माना जा सकता है जिसे कोई गैर-कानूनी काम करने के लिए न्यायालय द्वारा दोषी मानकर उसे दण्ड दिया गया हो। इसी तरह के विचारों के आधार पर अपराध की कानूनी अवधारणा को निश्चयवादी अवधारणा (defeministic concept) कहा जाता है क्योंकि इनके अनुसार कानून के अतिरिक्त दूसरे किसी भी सन्दर्भ में अपराध के सही अर्थ को नहीं समझ जा सकता। बहुत सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि कानूनी दृष्टिकोण से एक विशेष राज्य के कानून का उल्लंघन करना ही अपराध है। 


अपराध की कानूनी परिभाषा - डॉ. एम. जे. सेथना (M. J. Sethana) के अनुसार, "अपराध को किसी भी ऐसे कार्य अथवा त्रुटि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो किसी समय विशेष में एक राज्य अथवा समाज के कानून के अनुसार दण्डनीय होता है, इसका सम्बन्ध चाहे 'पाप' से हो अथवा नहीं।" 


टैफ्ट (D. R. Taft) ने अपराध की संक्षिप्त परिभाषा देते हुए लिखा है, "वैधानिक रूप से अपराध एक ऐसा कार्य है जो कानून के अनुसार दण्डनीय होता है।" 


विलियम ब्लेकस्टोन (William Blackstone) के अनुसार, "किसी भी सार्वजनिक कानून की अवज्ञा अथवा उल्लंघन से सम्बन्धित व्यवहार ही अपराध है।" 


अपराध की इन सभी परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि कानूनी आधार पर केवल उन्हीं कार्यों को अपराध कहा जा सकता है जिनसे राज्य के कानूनों का उल्लंघन प्रमाणित होता है और जिसके लिए राज्य द्वारा एक निश्चित दण्ड दिया जाता है। इस दृष्टिकोण से हत्या चोरी, लूट, जालसाजी नथा गबन आदि ऐसे व्यवहार हैं। जिन्हें कोई भी व्यक्ति अपराध कह सकता हैं। इस सम्बन्ध में जेरोम हाल (Jerome Hall) ने कानूनी दृष्टिकोण से अपराध के सात मानदण्डों का उल्लेख किया है। इन्हीं की सहायता से अपराध की कानूनी अवधारणा को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। 


(1) कानूनी रूप से निषिद्ध कार्य (Legally Forbiddn Act)- कानूनी आधार पर केवल उसी कार्य को अपराध कहा जा सकता है जो एक समय विशेष में राज्य द्वारा बनाये गये कानूनों के द्वारा निषिद्ध हो। इसके लिए दण्ड संहिता (Penal Code) में उन कार्यों का उल्लेख होना आवश्यक है जिन्हें गैर-कानूनी मानकर अलग-अलग कार्यों के लिए एक निश्चित दण्ड का प्रावधान किया जाता है। इसका अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे असामाजिक या समाज-विरोधी व्यवहार को करता है जो कानून द्वारा वर्जित न हो, सब ऐसे व्यवहार को अपराध नहीं कहा जा सकता। 


(2) ऐच्छिक आचरण (Voluntary Act ) - केवल उसी कार्य को अपराध कहा जा सकता है जो व्यक्ति ने स्वयं अपनी इच्छा से किया हो। ऐसे कार्य में किसी तरह का दबाव नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि एक व्यक्ति अपनी बन्दूक से गोली मारकर किसी व्यक्ति की हत्या कर देता है तो पारिभाधिक रूप से इसे 'अपराध' कहा जायेगा लेकिन यदि न्यायालय में यह प्रमाणित हो जाये कि उस व्यक्ति को अपनी बन्दूक से किसी को गोली मारने के लिए बाध्य किया गया तो उसे हत्या का दोषी नहीं माना जायेगा। दूसरे शब्दों में, उसका यह कार्य अपराध नहीं होगा। इस प्रकार स्वेच्छा से कानून को तोड़ना ही अपराध है। 


(3) अपराधी उद्देश्य (Criminal Intent)- अपराध की एक प्रमुख कसौटी यह है कि इसके लिए अपराध करने वाले व्यक्ति में एक आपराधिक निश्चय का उद्देश्य अवश्य हो। यदि कोई व्यक्ति पागल या निक्षित हो तथा उसे अचित और अनुचित का ज्ञान ही न हो, तब उसके द्वारा किया गया कोई कार्य कानून का उल्लंघन होने के बाद भी उसका उद्देश्य आपराधिक नहीं होगा। इस दशा में उसके व्यवहार को अपराध नहीं कहा जा सकता। इसका अर्थ है। कि अपराध केवल वही कार्य है जिसमें अपराधी उद्देश्य' तथा अपराधी प्रेरणा का समावेश होता है। 


(4) अपराधी उद्देश्य तथा व्यवहार में संगति (Consistency between Mensren and Behaviour)- अपराधी कार्य के लिए यह भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति के अपराधी उद्देश्य तथा उसके द्वारा किये गये वास्तविक व्यवहार के बीच एक स्पाट संगति हो। उदाहरण के लिए, यदि एक पुलिस अधिकारी किसी अभियुक्त को पकड़ने के लिए बलपूर्वक किसी के घर में प्रवेश कर अथवा भागते हुए अपराधी को रोकने के लिए उस पर गोली चला दे तो कानूनी दृष्टिकोण से यह दोनों व्यवहार अपराधी व्यवहार है लेकिन इनका उद्देश्य अपराधिक नहीं है। इस दशा में पुलिस अधिकारी के इस व्यवहार को अपराध नहीं कहा जायेगा। 


(5) बाह्य हानि या दुष्परिणाम (Overt Injury or Adverse Effect) - किसी कार्य को अपराध तभी कहा जा सकता है जब उसे करने से राज्य को क्षति पहुँचती हो अथवा राज्य के अपराध कानून का उल्लंघन होता हो। इस कसौटी को लेकर अपराधशास्त्रियों में मतभेद है। अनेक लेखक यह मानते हैं कि जिन व्यवहारों से दीवानी या वैयक्तिक जीवन से सम्बन्धित कानूनों का उल्लंघन होता है, उन्हें अपराध नहीं कहा जा सकता। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति विवाह तलाक के कानून, व्यक्तिगत समझौते या सम्पत्ति अधिकार आदि से सम्बन्धित अपराध करता है तो यह व्यक्ति के बिरुद्ध किया जाने बाला दोष अथवा अन्याय है तथा जिस व्यक्ति के साथ इस तरह का अन्याय किया गया हो, केवल वही व्यक्ति अपनी क्षति को पूरा करने के लिए उस पर मुकदमा चला सुकता है। ऐसे विचारकों का मानना है कि प्राचीन समाजों में हत्या, डकैती और बलात्कार को भी इसलिए. अपराध नहीं माना जाता था कि इससे केवल प्रभावित व्यक्ति को ही हानि पहुँचती थी। वर्तमान समाजों के सन्दर्भ में ऐसे विचार सही नहीं हैं। आज के जटिल समाजों में किसी सावहार से होने वाली क्षति चाहे राज्य को होती हो अथवा किसी व्यक्ति को, ऐसे प्रत्येक 


व्यवहार को अपराध माना जाता है। 


(6) यथोचित आयु ( Sufficient Age)-कानूनी दृष्टिकोण से अपराध की एक प्रमुख कसोटी कानून का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति की आयु है। अग्रेजी 'कॉमन ला के अनुसार यदि सात वर्ष से कम आयु का बच्चा किसी अपराधी कानून का उल्लंघन करता है तो उसे अपराध नहीं माना जाता। भारत में भी अनेक राज्यों में अपराध केवल वही कृत्य है जो सात वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्ति द्वारा किया गया हो। इसका कारण यह है कि आपराधिक उद्देश्य अपराध की एक प्रमुख कसौटी है लेकिन सात वर्ष से कम के बच्चे में इतनी बुद्धि नहीं होती कि वह एक विशेष अपराधी उद्देश्य को लेकर किसी कानून का उल्लंघन करे। कानून के उल्लंघन से होने वाले परिणामों को भी वह नहीं जानता। 


(7) दण्ड का प्रावधान (Provision of Punishment)- कानूनी आधार पर अपराध की अन्तिम कसौटी किसी विशेष व्यवहार के लिए राज्य के द्वारा एक निश्चित दण्ड का प्रावधान होना है। इसका तात्पर्य है। कि यदि राज्य के द्वारा किसी विशेष कार्य या व्यवहार को निषिद्ध घोषित कर दिया जाय लेकिन उसे करने वाले व्यक्ति के लिए किसी दण्ड का प्रावधान न किया जाय तो ऐसे कार्य को अपराध नहीं कहा जायेगा। 


अपराध की कानूनी अवधारणा से यह स्पष्ट हो जाता हैं कि वेवल उसी कार्य को अपराध कहा जा सकता है जिससे आपराधिक कानून का उल्लंघन होता हो तथा न्यायालय द्वारा अभियुक्त (offender) का दोष प्रमाणित मानकर उसे एक निर्धारित दण्ड दिया गया हो। अपराध के लिए अभियोग का प्रमाणित होना एक आवश्यक देशा है जो पूरी तरह गवाहियों पर निर्भर होती है। न्यायालय में सुनवाई की लम्बी प्रक्रिया तथा गयाहियों से सम्बन्धित दोषों के कारण अपराधी कानून के उल्लंघन से सम्बन्धित अधिकांश मामले प्रमाणित न हो पाने के कारण अपराध नहीं रह जाते। यही अपराध की कानूनी अवधारणा का सबसे बड़ा दोष है। यही कारण है कि अपराध की ब्याख्या केतल कानूनी आधार पर करना पर्याप्त नहीं समझा जाता।

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