सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वैदिक कालीन आर्यों की सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा

 वैदिक कालीन आर्यों की सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा 

वैदिक आर्यों के सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन से सम्बन्धित पहलुओं पर विचार करने से यह तथ्य हमारे सामने आता है कि वर्तमान परिवेश में भी आर्यों द्वारा अपनायी गई सामाजिक धार्मिक मान्यताएं विद्यमान हैं जो कहीं न कहीं हमारे समाज एवं संस्कृति को प्रभावित करती है। आर्य समाज पितृसत्तात्मक था, उनका खान पान, रहन-सहन, वेशभूषा आज के समाज की भाँति था, जिसका विवरण निम्नलिखित हैं - 

सामाजिक जीवन - वैदिक कालीन समाज पितृसत्तात्मक था। परिवार ही समाज का मुख्य आधार था। पिता अथवा घर का बड़ा परिवार का मुखिया होता था। पिता अथवा मुखिया अपने परिवार के सदस्यों का पूरा ख्याल रखता था। 

वर्ण व्यवस्था - वैदिक कालीन समाज चार वर्णों में विभाजित था। ऋग्वेद में वर्णन है कि प्रारम्भ में वर्ण शब्द रंग के अर्थ में प्रयुक्त किया गया था तथा कहीं-कहीं व्यवसाय के चयन के आधार पर वर्णों का निर्धारण किया जाता था। आयों को गौर वर्ण तथा दासों को कृष्ण वर्ण का कहा गया है। प्रारम्भ, में हम तीन वर्णों का उल्लेख पाते हैं-ब्रह्म, क्षेत्र तथा विशः। जब आर्य भारत में आये तब उन्हें अनार्यों से संघर्ष करना पड़ा। इसके लिये कुछ ऐसे योद्धाओं की आवश्यकता हुई जो असुरों से उनकी रक्षा कर सके। इस कार्य के लिये उन्होंने अपने में से कुछ उत्साही वीरों को चुना और उन्हें 'क्षत्र' नाम दिया। क्षेत्र का अर्थ है क्षत् अर्थात् हानि से रक्षा करने वाला। ऋग्वेद में क्षत्र शब्द का प्रयोग सैन्य बल तथा राज्य क्षेत्र तथा क्षत्रिय का प्रयोग उसमें निवास करने वालों के लिये हुआ है। नायक तथा योद्धाओं को भी क्षत्रिय कहा गया है। इसी प्रकार यज्ञों को कराने के लिये जो व्यक्ति चुने गये उन्हें ब्रह्म कहा गया। यह विद्वान तथा गुणवान लोगों का वर्ग था। कहीं-कहीं ब्राह्मण शब्द का प्रयोग "पुरोहित' के लिये भी मिलता है। शेष जनता को विश नाम से सम्बोधित किया जाता था।

विद्वानों की मान्यता है कि अनार्यों को पराजित करने के पश्चात् आर्यों ने उन्हें अपने सामाजिक संगठन में स्थान प्रदान किया जो कालान्तर में शूद्र कहलाये। प्रारम्भ में ऐसी मान्यता थी कि शूद्र वर्ण के अन्तर्गत केवल अनार्य वर्ण के लोग ही सम्मिलित थे। किन्तु बाद में, सभी श्रमिकों की सामान्य संज्ञा शूद्र हो गयी। आर्य शिल्पियों के वंशज भी, जो अपने प्राचीन व्यवसाय में लगे रहे, शूद्र समझे गये। इससे स्पष्ट है कि व्यवसाय आनुवंशिक नहीं था तथा जाति-व्यवस्था का जो संकीर्ण रूप हमें कालान्तर में देखने को मिलता है उससे ऋग्वैदिक समाज निश्चय ही अछूता था। 

स्त्रियों की दशा - वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी। उनकी शिक्षा व्यवस्था का समुचित प्रबंध किया जाता था। घोषलोपा, मुद्रा, विश्ववारा आदि विदुषी महिलाओं ने वैदिक मंत्रों की रचना की। विवाह के पश्चात् उन्हें व्यक्ति की अद्धांगिनी कहा जाता था। वे वैदिक यज्ञों, समारोहों एवं वाद-विवाद में भी भाग लेती थीं। परन्तु उत्तर वैदिक काल में उन्हें समारोहों एवं वाद-विवाद (सभाओं) में सम्मिलित होने की मनाही हो गयी। इसके बावजूद उनकी स्थिति उच्चकोटि की थी। माता के रूप में उनका विशेष महत्व था। समाज में नियोग प्रथा प्रचलित थी जबकि सती एवं पर्दा प्रथा का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। 

भोजन एवं वस्त्राभूषण - आर्य शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन करते थे। घी, दूध, दही उनका प्रिय भोज्य पदार्थ था। ऋग्वेद में एक स्थान पर दूध में पकी हुई खीर (क्षीर पारकौदन) का उल्लेख हुआ है। एक अन्य स्थान पर दही में बनने वाले पनीर का उल्लेख मिलता है। घी में पके हुए मालपूवे (अपूप धृतवतम्) का भी वर्णन हुआ है। जी के सत्तू को दही में मिलाकर करंभ नामक खाद्य पदार्थ बनाया जाता था। भोजन को मीठा बनाने के लिये मधु का भी प्रयोग किया जाता था। मधु देवताओं को भी चढ़ाया जाता था। मांसाहार का भी प्रचलन था। ऋग्वेद में नमक का उल्लेख नहीं मिलता है प्राय: भेड़ बकरी आदि पशुओं का मांस खाया जाता था। गाय के लिये अध्या (न मारने योग्य) शब्द मिलता है। ए एल बाशम के अनुसार इस शब्द से गाय की आर्थिक महत्ता सृचित होती है क्योंकि गाएँ ही विनिमय का माध्यम बनती थीं। ऐसा लगता है कि विवाह एवं सम्मानित अतिथि के आगमन आदि के अवसरों पर ही गाय का वध होता था। शतपथ ब्राह्मण अतिथि के सम्मान में विशाल वृषण अथवा बकरी को मांसाहार के लिये मारे जाने का विधान करता है। 

परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि मांस के लिये गाय का वध धीरे-धीरे बन्द होने लगा था। सोम तथा सुरा आर्यों के मुख्य पेय थे। सोम अपनी मादकता के लिये प्रख्यात था जिसे मूजवन्त पर्वत पर प्राप्त किया था। यज्ञों के अवसर पर सोमरस पान करने तथा देवताओं को पीने के लिये उसे समर्पित करने की प्रथा थी। इसका पान करने से शविर में उत्साह भर जाता था और मन में मोहक मस्ती छा जाती थी। ऋग्वेद के नवे मण्डल में सोम की स्तुति में कई सूक्ति मिलते हैं। एक स्थान पर कण्व ऋषि दावा करते हैं कि सोम रस पीने के बाद उन्होंने अमरन्व प्राप्त कर लिया है तथा देवताओं को जान लिया है ऋग्वेद में सुरा के दुष्परिणामों का उल्लेख हुआ है तथा बताया गया है कि लोग इसे पीकर दुर्मद हो जाते थे और सभा-समितियों में लड़ने-झगडने लगते थे। सुरा की गणना क्रोध, द्यूत, अज्ञान आदि अनिष्टकारी वस्तुओं के साथ की गयी है। इसे निन्दनीय तथा त्याज्य बताया गया है।

महादेवन का विचार है कि सोम वस्तुतः सैन्धव निवासियों का पेय था और आर्यों ने आयों के वस्त्र सूत, ऊन तथा मृगचर्म से बनाये जाते थे। भेड़ की ऊन का ही वस्त्र प्रायः प्रयुक्त होता था। गन्धार प्रदेश की भेड़े प्रसिद्ध थीं। वस्त्र तीन प्रकार के होते थे - 

(1) नौवी जो कमर के नीचे पहना जाता था।

(2) वासस जो कमर के ऊपर पहना जाने वाला प्रमुख वस्त्र था।

(3) अधिवास जो ऊपर से धारण किया जाने वाला चादर या ओढ़नी होती थी। लोग वस्त्रों को काटने तथा सीने की कला से परिचित थे। कभी-कभी वस्त्रों पर सोने के तारों से कढ़ाई की जाती थी। स्त्री-पुरूष दोनों पगड़ी धारण करते थे। दोनों आभूषण पहनते थे। कानों में कर्णफूल, गले में निष्क, हाथों में कड़े, पैरों में खड्ए, छाती पर सुनहले पदक तथा गले में मणियों का हार (मणि-ग्रीवा) आदि आभूषण पहने जाते थे। लोग केश प्रसाधन की कला से भी परिचित थे। स्त्रियाँ बालों का जूड़ा बनाती तथा पुरुष दाढ़ी एवं जटा रखते थे। कुछ लोग छुरे से दाढ़ी मूंछ भी बनवाते थे। 

आमोद-प्रमोद - वैदिक आर्य नृत्य, संगीत, रथ-दौड़, घुट़-दौढ़ एवं पाशा आदि खेलकर अपना मनोरंजन करते थे इसके अतिरिक्त द्यूतक्रीड़ा भी वें खेला करते थे। दुन्दुभि, कर्करि, वीणा एवं बांसुरी आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग करते थे। कभी-कभी धार्मिक नाटकों का भी वे आयोजन करते थे। 

आर्थिक जीवन - आर्यों का आर्थिक जीवन कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर था। कृषि योग्य भूमि को उर्वरा अथवा क्षेत्र कहा जाता था। काग्वेद में फाल का उल्लेख मिलता है जो सम्भवतः लकड़ी का बना होता था। हल में 6, 8 या 12 तक बैल जोड़े जाते थे। ऋग्वेद में अर शब्द का उल्लेख मिलता है। उल्लेखनीय है कि आज भी ग्रामीण भाषा में हल को हर कहा जाता है। इसके तात्पर्य हर से हो सकता है। बुआई. कटाई, मोटाई आदि क्रियाओं से लोग परिचित थे। खेत को हल-बैल की सहायता से जोतकर उसमें बीज बोया जाता था। पकी हुई फसलों को काटने के लिये हसिये (दात्र, सृणि) का प्रयोग किया जाता था। सिंचाई प्रायः नहरों द्वारा होती थी। कूप तथा अवट (खोदकर बने हुए गड्ढ़े) का उल्लेख भी बग्वेद में मिलता है। चक्र की सहायता से कूप से पानी निकाला जाता था तथा नालियों द्वारा उसे खेतों तक पहुंचाया जाता था। लोग खाद के प्रयोग से परिचित थे। खेती से उत्पन्न होने वाले अन्नों में यक्ष एवं धान्य का उल्लेख हुआ है। परन्तु इन दोनों शब्दों का अर्थ स्पष्ट नहीं है। बाद में इनका अर्थ क्रमशः जौ तथा चावल हो गया। परन्तु ऋग्वैदिक आर्य चावल से परिचित नहीं थे। कृषि के साथ-साथ आर्य पशुपालन भी करते थे। उनके प्रमुख पालतू पशु थे गाय, बैल, घोड़ा, भेड़, बकरी, गधा, कुत्ता आदि। इनमें गाय आर्यो के विनिमय का माध्यम थी, जबकि घोड़ा सर्वाधिक प्रिय पशु। 

व्यापार-वाणिज्य - वैदिक आर्य व्यापार भी करते थे। उनके मध्य सूद खोरी का व्यापार अधिक प्रसिद्ध था। प्रायः स्थल एवं जल दोनों मार्गों से व्यापार होता था। स्थल मार्ग से व्यापार बैलगाड़ियों से तो जलमार्ग से नावों द्वारा व्यापार होता था ऋग्वेद में समुद्र शब्द आया है। कुछ विद्वान समुद्र का अर्थ विशाल जल-समूह लगाते हैं। राधा कुमुद मुकर्जी के मतानुसार ऋग्वेद में समुद्र का प्रयोग निश्चित रूप सागर के लिये हुआ है। एक स्थान पर भुज्यु की समुद्र यात्रा का वर्णन है जिसने मार्ग में जलयान के नष्ट हो जाने पर आत्मरक्षा के लिये अश्विनिकुमारों से प्रार्थना की। अश्विनि कुमारों ने उसकी रक्षा के लिये सौ पतवारी वाली जहाज भेजा। यह उल्लेख समुद्री यात्रा की ओर संकेत करता है। एक अन्य स्थल पर समुद्र से प्राप्त होने वाले धन (वसूनि समुद्रात) का उल्लेख मिलता है। 

व्यवसाय, उद्योग-धंधे - ऋग्वेद में कुछ व्यवसायियों के भी नाम मिलते हैं। इनमें तक्षा (बढ़ई), कर्मा (धातु कर्म करने वाले), स्वर्णकार, चर्मकार, वाय, (जुलाहे), कुम्भकार आदि प्रमुख है। बढ़ई (तक्षा), संभवतः शिल्पियों का मुखिया होता था। वह सभी प्रकार की लकड़ी की वस्तुओं, विशेषकर रथ तथा गाड़ियों का निर्माण करता था। आर्यों के सामरिक जीवन में रथों का अधिक महत्व होने के कारण 'तक्षा' की सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक बढ़ी हुई थी। कुछ लोग धातुओं को गलाने तथा उन्हें पीटकर विविध वस्तुएँ बनाने के कार्य में भी कुशल थे। अयस नामक धातु का उल्लेख अनेक स्थलों पर मिलता है जिसकी सहायता से घरेलू उपयोग के बर्तनादि बनाये जाते थे। अयस की पहचान असंदिग्ध रूप से नहीं की जा सकती। कुछ विद्वान इसे तांबा, कांशा या लोहा बताते हैं किन्तु ऋग्वैदिक आर्य लोहे से परिचित नहीं थे। कताई-बुनाई का कार्य स्वी-पुरूष दोनों ही करते थे सूत, रेशम तथा ऊन से वस्त्र बनाये जाते थे। जावेद से चलता है कि सिन्ध तथा गन्धार प्रदेश सुन्दर ऊनी वस्त्रों के लिये विख्यात था। परूषणी (रावी) नदी के तट पर बढ़िया किस्म के रंगीन ऊनी वस्त्र बनाये जाते थे। गन्धार प्रदेश की भेड़ें अपने चिकने ऊन के लिये सर्वत्र विख्यात थीं । चर्म उद्योग भी ज्ञात था। बैल आदि पशुओं के चमड़े के कोड़े, लगाम, डोरी, थैले आदि बनाये जाते थे। इसके अतिरिक्त वैद्य (भिषक) नर्तक- नर्तकी, नाई (वाप्तृ) तथा सुरा बेचने वालों का भी अलग वर्ग था। ऋग्वैदिक काल में इनमें कोई भी व्यवसायी तुच्छ नहीं समझा जाता था, बल्कि सभी की अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा थी। 

धार्मिक जीवन - वैदिक आर्य बहुदेववादी थे। वे पृथ्वी अंतरिक्ष एवं आकाश के देवताओं की आराधना करते थे जिनका वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है -

(1) पृथ्वी के देवता- पृथ्वी, अग्नि, सोम, वृहस्पति, अपनिपातु, मातरिश्वन् तथा नदियों के देवता आदि। 

(2) अंतरिक्ष के देवता- इन्द्र, रूद्र, वायु-वात. पर्जन्य, आपः, यम, प्रजापति, अदिति आदि। 

(3) दुरस्थान (आकाश) के देवता- द्यौस, वरूण, मित्र, सूर्य, सवितृ, पुषन, विष्णु. आदित्य, उषा, अश्विन आदि।

इसके अतिरिक्त कुछ अमूर्त भावनाओं के द्योतक देवता भी हैं जैसे- श्रद्धा, मन्यु, धातु, विधातृ आदि।

उक्त देवताओं में इन्द्र को सर्वोच्च स्थान दिया गया था। ऋग्वेद में 250 बार इन्द्र का नामोल्लेख हुआ है। इसके बाद अग्नि को स्थान दिया जाता है जिनका उल्लेख 200 बार हुआ है। वैदिक आर्य अपने भौतिक सुखों के लिए इन देवताओं को यज्ञ, हवन आदि से प्रसन्न करते थे। इनके लिए वे स्तुति गान करते थे। यज्ञों में दूध, धान्य, मांस आदि की आहूति देते थे। यज्ञ पुरोहितों की सहायता से होते थे जिनके बदले दान दक्षिणा मिलती थी यज्ञों के साथ पारलौकिक शक्तियों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जादू-मंतर, टोने-टोटके आदि का भी प्रयोग आर्य करते थे। इस समय मंदिरों या मूर्ति पूजा का प्रमाण नहीं मिलता है।

इस प्रकार उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक काल में आर्यों का रहन सहन आर्थिक एवं सामाजिक जीवन बिल्कुल वैसा ही था, जैसा कि वर्तमान में है। अतः यह कहा जा सकता है कि वैदिक आर्यों से ही ये मान्यताएँ हमारे समाज एवं संस्कृति में आईं

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना

रूसो के 'सामान्य इच्छा' सिद्धांत की विवेचना  रूसो का सामान्य इच्छा सिद्धान्त अवधारणा रूसो की 'सामान्य इच्छा सम्बन्धी सिद्धान्त अथवा अवधारणा आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में एक महत्त्वपूर्ण देन है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह लोकतन्त्र की आधारशिला है। रूसो के राजनीतिक विचारों में सामान्य इच्छा' का विचार सबसे मौलिक है यद्यपि उसके सम्बन्ध में वह स्वयम् स्पष्ट नहीं है। रूसों के अनुसार प्रारम्भिक समझौते के लिए समाज के समस्त सदस्यों का एक मत होना आवश्यक है, किन्तु बाद में सामान्य इच्छा के अनुसार ही शासन का कार्य होता है। रूसो की सामान्य इच्छा के सन्दर्भ में जोन्स महोदय का कथन उल्लेखनीय है-सामान्य इच्छा का विचार रूसों के सिद्धान्त का न केवल सबसे अधिक केन्द्रिय विचार है, अपितु यह उसका सबसे अधिक और मौलिक व रोचक विचार है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण देन है। इसकी उपयोगिता का आधार इसी आधार पर लगाया जा सकता है कांट, हीगल, ग्रीन और बोसांके आदि अंग्रेजी दार्शनिकों की विचारधारा भी इसी पर आधारित थी। रूसो ने अपने सामन्य इच्छा के सन्दर्भ

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत

राज्य की उत्पत्ति के विकासवादी सिद्धांत  राज्य की उत्पत्ति के ऐतिहासिक विकासवादी सिद्धांत राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं। परन्तु गंभीर विवेचना से स्पष्ट होता है कि अन्य सभी सिद्धान्त गलत हैं और उन्होंने राज्य की उत्पत्ति की सही व्याख्या नहीं की है। इस सम्बन्ध में गार्नर का कहना ठीक है कि, "राज्य न तो ईश्वर की कृति है, न किसी उच्च शक्ति का परिणाम, न किसी प्रस्ताव या समझौते की सृष्टि है, न परिवार का विस्तारमात्र" अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राज्य की उत्पत्ति का सबसे अच्छा सिद्धान्त कौन है। इस सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि राज्य विकास का परिणाम है। इसका निर्माण मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ था और अच्छे जीवन के लिए अब भी चल रहा है। राज्य की उत्पत्ति का सबसे सही और वैज्ञानिक सिद्धान्त विकासवादी या ऐतिहासिक सिद्धान्त को ही कहा जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य की उत्पत्ति एक विकास का परिणाम है। यह विकास धीरे-धीरे क्रम: चलता रहता है। इसी विकास के परिणामस्वरूप राज्य ने वर्तमान का रूप धारण किया है। राज्य की उत्पत्ति और व

तुलनात्मक राजनीति का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth

तुलनात्मक राजनीति  का महत्व,अर्थ | Tulnatmak Rajneeti Mahattav Arth परिचय  राजनीति एक सर्वव्यापी गतिविधि है जो हमारे चारो तरफ हमको देखने को मिल जाती है। प्रारंभ से ही एक  राजनीति व्यवस्था की तुलना दूसरे राजनीति व्यवस्था से की जाती रही है।किसी एक राजनीतिक व्यवस्था की अन्य राजनीतिक व्यवस्था से तुलना करने  के तरीके को सामान्य तुलनात्मक पद्धति कहते है। वास्तव में तुलनात्मक राजनीति का अर्थ और लक्ष्य विभिन्न देशों के मध्य एक राजनीति समस्याओं विषमताओं समानताओं की जानकारी का अध्ययन करना है। इसे हम तुलनात्मक राजनीति कहते हैं। यह समस्या या वह विभिन्नताओं के मिश्रण का परिपेक्ष से विकास करने का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति हमारे समानताओं और विभिन्नताओं का अध्ययन करता है  और उसके द्वारा राज्य के विकास का कार्य करता है। तुलनात्मक राजनीति सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि विश्व की सरकार और उनकी क्या परिस्थितियां हैं किस प्रकार से उनका प्रचलन हो रहा है किस प्रकार से सरकारें चल रही हैं। इसके अंतर्गत जो अध्ययन करते हैं पहला राज्य के कार्य दूसरा संगठन, नीति, दबाव समूह का अध्ययन होता है।  अर्थ और