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वैदिक काल में धर्म की प्रमुख विशेषता

वैदिक काल में धर्म की प्रमुख विशेषता

वैदिक कालीन निवासियों के धार्मिक जीवन अथवा वैदिक कालीन धर्म की विशेषताओं का ज्ञान हमें वैदिक साहित्य से ही होता है जो संसार के सबसे प्राचीन साहित्य कहे जा सकते हैं।

वैदिक साहित्य के आधार पर आर्यों के धार्मिक जीवन अथवा वैदिक कालीन घर्म की जो जानकारी प्राप्त होती हैं उसका विवरण निम्नवत् है -

वैदिक काल में आर्यों का धर्म सादा और सरल था। पुरोहितों द्वारा यह जटिल नहीं बना था। देवपूजा और पितृपूजा धर्म के मुख्य अंग थे। मूर्ति पूजन का ठोस प्रमाण नहीं मिला। ऋग्वेद के देवता प्रकृति की बड़ी शक्तियों के कल्पनात्मक मूर्त मानव रूप थे। जगत की एक ही मूल महाशक्ति को वैदिक कवि प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों में दैव शक्ति मानते थे। उनकी यह कल्पना मधुर और सौम्य थी। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि वैदिक कवियों ने प्राकृतिक शक्तियों का दैवीकरण किया था । 

वैदिक कालीन देवता 

आर्यों के इस युग के देवताओं व देवियों की तीन श्रेणियाँ थी। प्रथम स्वर्गस्थ जिसमें द्यौ (आकाश), सूर्य, वरूण, विष्णु आदि थे। द्वितीय अन्तरिक्षवासी जिसमें इन्द्र, वायु आदि थे। तृतीय पृथ्वीवासी जिसमें पृथ्वी, अग्नि, सोम आदि थे। इनके देवी देवताओं की सूची बड़ी लम्बी है, परन्तु इनमें मुख्य निम्नलिखित है- 

आकाश और पृथ्वी (द्यावापृथिवी )- यह आर्यों के सबसे प्राचीन देवता थे। आकाश को द्योस कहते थे। आकाश पिता, नभ का चमकता हुआ देवता था, पृथ्वी माता थी। द्यावापृथिवी जगत पिता-माता थे। 

वरूण- वैदिक काल में वरूण सर्वोत्कृष्ट देवता थे। वैदिक युग के अन्तिम चरण में वरूण जल के देवता ज्ञात होते हैं, परन्तु आरम्भिक काल की भावना इससे सर्वथा पृथक थीं। वरुण एक सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ एवं सर्वसाक्षी देवता थे। वह विश्व के त्रिकालदर्शी शासक है। वह आकाश, सूर्य और पृथ्वी के निर्माता है। आकाश और पृथ्वी के मध्य दूर स्थान पर उनका वास रहता है। वरूण धर्मपति है। पुण्य के देवता है वरूण से पाप शान्ति के लिए क्षमा याचना की जाती है। उन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रत और यज्ञ किये जाते हैं। वह प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। वरूण को प्रसन्न करने के लिए वैदिक ऋषियों ने बड़े सुन्दर सूक्त रचे हैं। विद्वानों का मत है कि वरूण के प्रति इस प्रकार भाव प्रदर्शन में आगामी भागवत धर्म के बीज अंकुरित हुए हैं। 

इन्द्र- यह सबसे अधिक सर्वप्रिय देवता थे इनकी शक्ति भी सबसे अधिक तथा अपरिमित थी इसीलिए उनका सबसे अधिक महत्व था। ऋग्वेद में सबसे अधिक ऋचायें इन्द्र को सम्बोधित की गयी है वह देवताओं में प्रधान है। वह आंधी, तूफान, बिजली और वर्धा का देवता है। इन्द्र की कृपा से ही जल वृष्टि होती है, और युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए इन्द्र से ही प्रार्थना की जाती थी। 

सूर्य- सूर्य के विभिन्न मुणों को अलग-अलग देवीकरण किया गया है प्रथम सूर्य मित्र के रूप में आते हैं। जो सूर्य की दानशीलता का सूचक है सूर्य से प्रकाश प्राप्त होता है। वही उत्तेजना प्रदान करते हैं। यह समस्त चर अचर जगत के जीवनदाता एवं पोषक हैं, वह दैनिक तीर्थयात्रा करते हैं। इन सब गुणों का मानवीकरण करके अधिष्ठान किया गया है। सूर्य के विभिन्न गुणों से कई प्रकार के देवगणों की कल्पना हुई है। 'आश्विन' प्रातः काल और सांयकाल के तारे हैं। 

अन्य देवता- विष्णु संसार के रक्षक है। मरूत या पवन वायु के देवता है। रूद्र विद्युत तथा घातक शक्ति के देवता है। वह भयानक, भीषण चमक वाले एवं अत्यन्त क्रोधी है। यजुर्वेद में रूद्र की ही 'शंकर' के रूप में उपासना की जाती है। शंकर इनका मंगलकारी रूप प्रस्तुत करता है। 

अग्नि- यह एक प्रमुख देवता है। इनके लिए वेद में दो सौ से अधिक स्तुतियाँ है। इनका महत्व इस प्रकार हैं कि अग्नि संवादवादक है। इन्हीं के द्वारा देवताओं को आमन्त्रित किया जाता है और उपासक की भेंट की हुई वस्तु यही देवताओं तक पहुँचाते हैं, इनका पार्थिक रूप दृष्टिगोचर होता है। ये मानव गण और देवगण के सम्पर्क का माध्यम है इसीलिए यज्ञ में अग्नि देव को विशेष महत्व दिया गया है। अग्नि के तीन रूप है- सूर्य, विद्युत और अग्नि। इस व्यापी रूप के कारण अग्नि का सबसे अधिक महत्व है। 

सोम- यह मूलतः वनस्पति के विधिपूर्वक तैयार किया हुआ रस था, जिसके पान करने से विशेष स्फूर्ति तथा आनन्द प्राप्त होता था। इस शक्ति के आभास से, इसे देवता का रूप दिया गया है। बाद में सोम का अर्थ चन्द्रमा भी माना जाता है 

 ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएं 

(1) आर्यों का धर्म उपासना प्रधान था। वह प्रकृति को विभिन्न शक्तियों को देवता के रूप में देखते थे। वर्षा, विद्युत, धूप, सूर्य आदि को दैवी शक्ति मानते थे उन देवताओं में सब मानवी गुणों की कल्पना करते थे। इस प्रकार प्रकृति की शक्तियों को देवीकरण तथा देवों का मानवीकरण उनके धर्म की विशेषता थी। 

(2) वैदिक काल की दूसरी प्रमुख विशेषता बहु देववाद है। इस काल में देवी देवताओं की संख्या अत्यधिक थी। परन्तु इन सभी देवी-देवताओं में कोई छोटा बढ़ा तथा ऊँचा व नीचा नहीं था। वैदिक युग के लोगों ने सभी देवताओं को सर्वशक्तिमान तथा सर्वमंगलकारी माना है। (3) वैदिक कालीन धर्म की एक विशेषता आशावादी विचारधारा थी। इस धर्म का मानना था कि मनुष्य धर्म के अनुसार आचरण करके परम तत्व को प्राप्त कर सकता है। यह आत्मा की अमरता पर विश्वास करते हुए आत्मा का सम्बन्ध परमतत्व से मानता है। इसमें गृहस्थ या संसार को त्याग का महत्व प्रदान नहीं किया गया है इसके अनुसार व्यक्ति को गृहस्थ जीवन में रहकर देवों की उपासना तथा नैतिकता के आधार पर कल्याण प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार उस समय के लोग संसार में रहते हुए धर्म परायण जीवन की इच्छा रखते थे। उसे पाने के लिए निस्वार्थ भाव से लगे रहते थे।

(4) वैदिक धर्म में एक ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं किया गया है। यह धर्म बहुदेव वाद पर विश्वास करता था इस समय के लोग प्रकृति की प्रत्येक शक्ति को एक अलग देवता के रूप में स्वीकार करते थे और उनकी पूजा अर्चना करते थे। इस प्रकार वे प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों को विभिन्न देवताओं के रूप में स्वीकार करते थे। 

(5) वैदिक काल का धार्मिक जीवन अत्यन्त उच्च एवं आदर्शों से परिपूर्ण था। यह धर्म व्यक्ति के सद्गुणों तथा नैतिकता के विकास पर अत्याधिक बल देता था यह धर्म

पुनर्जन्म तथा स्वर्ग की प्राप्ति पर विश्वास करता था किन्तु कर्म के आधार पर जन्म का सिद्धान्त इस समय प्रचलित नहीं था।

(6) वैदिक काल में पुरूष देवताओं को अधिक महत्व प्रदान किया गया था। इस युग में देवियों की संख्या कम थी तथा पुरुषों की तुलना में उनका स्थान नीचा था। इस प्रकार देवियों का स्थान शक्ति और वैभव के आधार पर पुरूषों के बाद आता है। आदि शक्ति मातृ देवी की उपासना इस समय नहीं की जाती थी।

(7) वैदिक काल के धर्म में छठी यज्ञों की प्रधानता थी। यज्ञों के माध्यम से देवताओं की स्तुति करके उन्हें प्रसन्न किया जाता था और उनमें मनोवांछित फल एवं वरदान प्राप्त किये जाते थे। इस प्रकार उस समय धर्म में यज्ञों की प्रधानता पायी जाती थी, साधारण यज्ञों को तो व्यक्ति स्वयं सम्पन्न कर लेते थे किन्तु जटिल यज्ञों के अनुष्ठानों में पुरोहितों की आवश्यकता पड़ती थी।

(8) वैदिक युग के धर्म की प्रमुख विशेषता सामूहिक देवगणों की कल्पना थी वैदिक काल में एक दूसरे से सम्बन्धित देवताओं को उनके परिवार का अंग मान लिया गया है। जैसे सूर्य के साथ अग्नि, उषा और अश्विन को जोड़ दिया गया है।

(9) वैदिक काल में सभी धार्मिक कार्य प्रत्येक व्यक्ति स्वयं कर लेता था। उसे किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती थी। उस समय मन्दिर और मूर्तियों का प्रचलन नहीं था। सभी व्यक्ति खुले स्थानों में अपनी पूजा अर्चना करते थे। इसलिए धार्मिक अनुष्ठान में पुरोहितों की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।

(10) वैदिक धर्म में भक्ति सिद्धान्त को विशेष महत्ता प्रदान की गयी है इसमें आकाश और पृथ्वी की कल्पना करके दैवीय स्त्री पुरूष के संयोग से सम्पूर्ण संसार की सृष्टि की रचना की कल्पना की है तथा इनकी भक्ति भावना से उपासना की गयी है।

इस प्रकार वैदिक कालीन धर्म उच्च आदर्श प्रधान, सद्गुण से युक्त और मानव के लिए कल्याणकारी था। ऋग्वैदिक धर्म सीधा और सरल था लेकिन उत्तर वैदिक काल में इसमें कर्मकाण्डों का प्रवेश हो गया तथापि यह धर्म, अपने मूल रूप को कुछ अंशों में लिए हुए आज भी हिन्दू धर्म के रूप में जाना जाता है।

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