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प्राचीन मिस्त्र में मरणोत्तर जीवन की अवधारणा

प्राचीन मिस्त्र में मरणोत्तर जीवन की अवधारणा 

 प्राचीन मिस्त्र में मरणोत्तर जीवन की अवधारणा -  प्राचीन मिलवासियों को धार्मिक मरणोपरान्त जीवन में विश्वास था। इनकी पारलौकिक जीवन की कल्पना बहुत लौकिक जीवन के अनुरूप थी। इनका विश्वास था कि 'क' नामक एक शक्ति मनुष्य के जन्म से ही उसके साथ आती है और जीवन भर उसके साथ रहती है। मृत्यु के बाद भी इसका नाश नहीं होता और यह शरीर से चिपकी रहती है। 

इनकी कल्पना में क का स्वरूप पार्थिव शरीर की ही भाँति था। अतएव मृत्यु के बाद शरीर नष्ट हो जाने पर भी इसे भोजन, पेय इत्यादि की आवश्यकता पड़ती थी। इसीलिए प्रवासी मृतकों की समाथियों में खाद्य एवं पेय सामग्री रखते थे। इनका विश्वास था कि यदि ये ऐसा नहीं करेंगे तो खाद्य के अभाव में 'क मल-मूत्र का भक्षण करने लगेगी 'क' के अतिरिक्त मिसवासी शरीर में आत्मा का निवास भी मानते थे। इसका स्वरूप ऐसे पक्षी के समान था जो वृक्षों पर फुदकती रहती थी। 'क' सम्बन्धित मान्यता के विकास का प्रभाव इनकी समाधियों तथा मृतक संस्कार विधियों पर पड़ा। क' की रक्षा के लिए ये शवों की सुरक्षा के उपाय भी करने लगे। प्रागराजवंशीय काल में बालू में गड्ढा खोद कर बनायी गयी समाधियों के स्थान पर विशाल पिरामिड बनने लगे। मृतक संस्कार में सत्तर दिन लगते थे। 

प्राचीन राज्य काल में मृतक के शरीर पर ऐसा लेप लगा दिया जाता था जिससे वह दीर्घकाल ते सुरक्षित रहता था इस लेपयुक्त शव को काष्ठ की एक पेटिका में रख कर फिर उस पेटी को एक पाषाण की पेटी में रखकर समाधि के साथ एक कमरे में बन्द कर दिया जाता था। मृतक के साथ उसके उपयोग के लिए आश्वयक खाद्य-पदार्थ, पेय, प्रसाधनोपकरण इत्यादि भी रख दिये जाते थे।इसके पश्चात् कक्ष के मार्ग को पूर्णतया बन्द कर दिया जाता था। प्राचीन राज्यकालीन मिसवासी इतने से ही सन्तुष्ट नहीं थे। 

ये मानते थे कि इस संस्कार के बाद भी मृतक बराबर खाद्य, पेय इत्यादि की आवश्यकता का अनुभव करता है। अतः समृद्ध लोग मृत्यु के पूर्व ही किसी पुजारी की नियुक्ति कर देते थे जो उनकी समाधि पर समय-समय पर मृतक संस्कार की पुनरावृति करता रहता था तथा उसे खाद्य-पेयादि समर्पित करता रहता था। सिद्धान्ततः यह व्यवस्था सदैव के लिए की जाती थी लेकिन चार-पांच पीढ़ियों के अनन्तर इससे ये उदास हो जाते थे और नई समाधियों की ओर अधिक ध्यान देने लगते थे। 


प्राचीन राज्यकालीन सिमवासी परलोक को 'मृतकों का लोक', 'अधोलोक', 'यारूभूमि' अथवा 'खाद्य-भूमि' के नाम से पुकारते थे। मृतकों के लोक' का संकेत पिरामिड-ग्रन्थों में मिलता है। यह लोक पश्चिम में स्थित था। यहाँ प्रतिदिन सूर्यदेवता रात्रि में जाते थे। इसीलिए मित्रमवासी मृतकों को पश्चिमी कह कर भी सम्बोधित करते थें। अधोलोक में मृतात्माएँ प्रतिदिन सूर्यदेव की अलौकिक नौका की प्रतीक्षा करती रहती थीं। यारूभूमि आकाश के उत्तरपूर्व स्थित था। यह लोक धन धान्य से समृद्ध था। अतः यहाँ मृतात्माएँ आनन्दित जीवन-यापन करती थीं। यारुभूमि के चारों ओर जल भरा रहता था अतः यहाँ तक पहुंचना कठिन कार्य था। 

मृतकों को यहाँ जाने के लिए एक नौका का सहारा लेना पढ़ता था। इसका परिचालन दैवी नाविक करते थे वे उन्हीं आत्माओं को पार करते थे जो पुण्य कर्मा होती थीं। पुण्यकर्मा का तात्पर्य धार्मिक अनुष्ठानों एवं कृत्यों के सम्यक सम्पादन से था। कुछ समाधियों पर यह लिखवाया गया था कि उन्होंने दीन-दुःखियों की सहायता तथा सदाचारपूर्ण जीवन व्यतीत करके पुण्य प्राप्त किया है। किन्तु यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि सदाचार से उनका क्या मन्तव्य था? उनकी सदाचार विषयक मान्यता पर ओसिरिस आख्यान से कुछ प्रकाश पड़ता है। सम्भवतः जिन गुणों के कारण ओसिरिस पुनर्जीवित हुआ था. आइसिस ने स्वामी के प्रति जो प्रीति प्रदर्शित की थी नथा होनस ने जिस पितृभक्ति भाव से दुष्ट सेत से बदला लिया था, वही मिसवासियों के सदाचार विषयक आदर्श थे। इस प्रकार प्राचीन सिम के लोग पारलौकिक जीवन में विश्वास करते थे और उनके मृतक शरीर की सुरक्षा रखते थे। उनके अनेक मृतक शरीर आज तक सुरक्षित रखे हुए हैं जिन्हें मेमी कहा जाता है।

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