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प्राचीन मिस्र की कला एवं निर्माण

प्राचीन मिस्र की कला एवं निर्माण

प्राचीन मिस्त्र में कला -मिस्र के इतिहास का प्राचीन राज्य-युग कलात्मक सृजनात्मकता और विराट उपलब्धियों का काल था इसी युग के मिली समाज-व्यवस्थापकों और कला रूपों के प्रवर्तकों ने उन विचारों और प्रतिमानों का विकास किया जो मूलतः तो अपरिवर्तित रहे लेकिन दो सहस्राब्दियों तक उनमें संशोधन परिवर्तन होते रहे। कहना न होगा कि विश्व सभ्यता के प्राचीन इतिहास में मिल जैसी सर्वोत्कृष्ट शैली का विकास कहीं नहीं हुआ जिसमें शिल्पियों और मजदूरों के आत्मविश्वास तथा तेजस्विता का महत्तर योगदान था। कला के मिस्त्री शैली और चित्रलिपि का सहसम्बन्धित विकास अकारण नहीं हुआ था। मिस्त्री कला के प्ररम्भिक चरण में एक सौन्दर्यमयी सरलता थी जिसने आगे चलकर अद्वितीय आकर्षका रूप ग्रहण किया। प्राचीन मिस के दैनन्दिन जीवन में धर्म की भूमिका महत्वपूर्ण थी अतः कलात्मक रूपी पर धर्म का सर्थातिशायी प्रभाव दृष्टिगोचर होता है, लेकिन धर्म ने दैनिक जीवन के रूपों को कला के क्षेत्र में प्रस्तुत करने से प्रतिबन्धित नहीं किया। धार्मिक विचारतंत्र के प्रभाव के कारण ही मिल की कला में परम्पराओं का दवाव सक्रिय था लेकिन नवराज्ययुग के कलाकारों ने रूढ़िवादी योजना को शिथिल करके अभिव्यक्ति की सापेक्षिक स्वतंत्रता का दामन पकड़ लिया था। यह विवेचन वास्तुकला, चित्रकला और मूर्तिकला में क्षेत्रों में सही प्रतीत होता है। मिस्री कला की पृष्ठभूमि का वैचारिक मंथन करते समय हमें मिली सभ्यता के मर्मश् पलाइण्डर्स पेट्री की युक्तिसंगत मान्यता को ध्यान में रखना चाहिए। उनके मतानुसार- "नागरिकों के चरित्र की भाँति किसी देश की कला भी उसकी भूमि की प्रकृति से सम्बन्धित होती है कलाकार के मस्तिष्क को समझने के लिये हमें उसके साहित्य में विवेचित, जीवन के आदर्शों के रूप में प्रतिष्ठि गुणों को दखना चाहिये।" 

वास्तुकला -मिस्री कला के ऐतिहासिक विवरण में सर्वप्रथम वास्तुकला का उल्लेख समीचीन लगता है। मिस्र की वास्तुकला में राजनीतिक स्थायित्व, विजेता भाव, धार्मिक आस्था और लौकिक आवश्यकताओं का समवेत प्रभाव दिखलाई पड़ता है। उल्लेखनीय है कि मिस का वास्तुशिल्पी कार्यगत विशेषीकरण के बावजूद राजकीय अनुजीवी के रूप में अन्य कार्य भी करता था। परम्पराओं के संरक्षकों और व्याख्याताओं अर्थात् फराओ और पुरोहितों की इच्छाओं के अनुसार शिल्पी कार्य करते थे फिर भी मिस्र के वास्तुकारों ने ठोस और इतने विशाल निर्माण कार्यों को सम्भव किया जैसा सभ्यता के इतिहास में पहले कहीं नहीं सम्भव हुआ था। इसके साथ ही सफलतापूर्वक उन कुशल कारीगरों ने सौन्दर्य भावना को प्रतिष्ठापित करने के लिय उपयोगी वस्तुओं की सौन्दर्ययुक्त बनाया। वास्तुकला के उदात उदाहरणों को प्रस्तुत करने में नीलघाटी की उर्वरता, अमिकजनों के परिश्रम और एशिया तथा नूबिया से लूटी गई अपार धन सम्पदा का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। मिस्त्री वास्तुकला का परिचय भवनों, पिरामिडों और मन्दिरों के विवरण द्वारा प्राप्त किया जा सकता है 

भवन निर्माण - प्रारम्भ में मिट्टी तथा सरकंडे की सहायता से आवास का निर्माण किया जाता था। इमारती लकड़ी एशिया के तटीय क्षेत्रों से मंगाई जाती थी। प्रारम्भिक भवनों का आकार-प्रकार प्रायः परिवार की सदस्य संख्या पर आधारित होता था। दीवारों पर छतें बनाने में लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था। मकानों में कमरों के अतिरिक्त आंगन तथा सीढ़ियाँ बने होते थे। उच्चवर्गीय घरों से लगे रमणीक उद्यान बने होते थे और सामान्य जन के लिये सार्वजनिक उपवन होते थे लोगों को मनमोहक फूलों के पौधे लगाने का शौक था। प्राचीन राज्ययुग में भवन निर्माण हेतु पत्थरों का उपयोग होने लगा। यह पत्थर मोकलाम की पहाड़ियों में सूरा से जलमार्ग द्वारा लाया जाता था अतः फराओ और अभिजातवर्ग के सम्पन्न लोगों से सम्बन्धित भवनों में ही प्रायः पत्थरों का उपयोग हुआ। 

प्रारम्भि राजमहलों के बारे में प्रत्यक्ष प्रमाणों का अभाव है लेकिन समाधिभवनों (मस्तवा) के आधार पर मिस्त्री कला समीक्षकों ने उनकी रूपरेखा प्रस्तुत की है। प्रमुख नगरों को बहारदीवारी से सुरक्षित करते थे और प्राचीन मिस के वास्तुशिल्पी गढ़नुमा राजभवन बनाते थे जिनका गुम्बद द्वार आकर्षक होता था। एमनहोतेपण और उसके पुत्र इख्नाटन के भव्य राजभवन अल्लेखनीय रहे हैं। राजवंश युग के प्रारम्भ होने पर समाधि-भवनों (मसतवा) का निर्माण प्रारम्भ हो गया था। चौथे राजवंश से इनके निर्माण में पत्थरों का इस्तेमाल होने लगा था। मस्तवा का अर्थ है-घर के बाहर बैठने का स्थान (बैंच)। इस समाधि-भवन में एक से अधिक कमरे होते थे और इन्हें आयताकार योजना में निर्मित किया जाता था। नवराज्य युग के वास्तुशिल्प में एक प्रभावशाली अध्याय जुड़ा था। समाधि भवनों पर अन्य भवनों की तरह अलंकरण भी किया गया था इन का चरम विकास पिरामिडो के रूप में हुआ था। 

मंदिर -  प्राचीन मिस्र में वैसे तो प्राचीन राज्ययुग से ही मंदिर निर्माण का प्रारम्भ हो चुका था लेकिन थुत्मोस ने जब दृश्यमान अधिरचना के बगैर समाधि बनवाने का फैसला किया तो उससे मंदिरों के निर्माण की स्वतंत्र परम्परा पर दूरगामी प्रभाव पड़ा। यही कारण है कि नवराज्ययुग में मंदिरवास्तु का चरमोत्कर्ष हुआ था। कारनाक, लवसर एवं अन्य मंदिरो तथा भवनों के निर्माण में मिस्र के कलाकारों ने स्तम्भ योजना और अलंकृत स्तम्भशीर्षों के निर्माण में विशेष दक्षता का उदाहरण प्रस्तुत किया था। उल्लेखनीय है कि वास्तुकता के क्षेत्र में विश्वइतिहास में पहली बार मित्र ने ही स्तम्भों का निर्माण किया था जिसका व्यापक प्रभाव पाश्चात्य वास्तुशिल्प पर पड़ा था। मिस्र वासियों के लिये स्थायित्व का विशेष महत्व था अतः मंदिरों और उनमें स्थापित मूर्तियों के निर्माण में भी इस दृष्टि का प्रभाव विशेष रूप से पड़ा था। ये दर्पयुक्त मूर्तियाँ शाश्वतभाव को अभिव्यक्त करती हैं। प्रसिद्ध मंदिरों में हदशेपसुत का अलबाहरी का मंदिर, थिविस स्थित बुमोस ८ का मंदिर, मेदिनेतहाबू स्थित रैमिसिस III का मंदिर, लक्सर और कारनाक के एमनरी के मंदिर, अबू शिम्बेल का शिलामंदिर तथा अल-अमना का इख् मटन द्वारा निर्मित एटन का मंदिर-विशेष प्रसिद्ध हैं। मंदिरों की रंगीन मूर्तियां और दीवारें अलंकृत थीं जिन पर आनुष्ठानिक तथा दैवी दृश्य चित्रित थे। इख्नाटन के धार्मिक विप्लव का प्रभाव कलात्मक यथार्थवाद पर पड़ा था और वास्तव में नवराज्य युग के जीवन के अन्य पक्षों की तरह, निर्माण कार्य भी इससे प्रभावित हुये थे।

टिप्पणियाँ

  1. चतुर्थ राजवंश के सम्राट खुफु के शासन काल में 2900 ई० पू० में मेमफिस के निकट गीजे में विश्व का प्रसिद्ध पिरामिड बनाया गया |
    इसे एक लाख श्रमिकों ने 20 वर्ष में पूरा किया | यह लगभग 5.2 हेक्टेयर (लगभग 13 एकड़) भूमि पर फैला है |

    गीजे का प्रसिद्ध पिरामिड :-
    ऊ०:- 150 m
    वर्गाकार विस्तार :-230 m
    इसमे कूल 23 लाख शिलाखंड प्रयुक्त हैं , जिनका औसत भार 2.55 मीट्रिक टन (25 टन लगभग) है , कुछ का भार तो 15.3 मीट्रिक टन तक है |
    इसकी गणना विश्व के सात आश्चर्यों मे की गयी है |

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