सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हड़प्पा सभ्यता के पतन के प्रमुख कारण

हड़प्पा सभ्यता के पतन के प्रमुख कारण

सैंधव सभ्यता जिस द्रुतगति से प्रकाश में आयी उसी गति से ही यह विनष्ट हो गई। इसके पतन के लिए विद्वानों ने कई कारण बताए है। जैसे मार, आर्यो का आक्रमण, जलवायु परिवर्तन, भू-तात्विक परिवर्तन, व्यापार में गतिरोध, प्रशासनिक शिथिलता, महामारी एवं साधन का अधिक उपभोग आदि। 

1. बाढ - सिन्धु सभ्यता के पतन का प्रधान कारण बाद ही माना जाता है। मार्शल ने मोहनजोदड़ों मैके ने चन्दड़ों तथा एस.आर. राव ने लोथल के पतन का प्रमुख कारण आड़ भाना है। मार्शल के अनुसार मोहनजोदड़ों में 7 बार बाढ़ आयी, वयोकि इसकी खुधाई से इसके 7 स्तरों का पता चलता है धीरे-धीरे लोग नगर छोड़कर अन्या चले गए। परन्तु इससे उन नगरों के पतन के कारणों पर प्रकाश नहीं पड़ता जो नदियों के किनारे स्थित नहीं थे। 

2. आर्यों का आक्रमण-व्हीलर, गाईन चाइल्ड, मैके, प्रिगनट आदि विद्वानों ने सिन्धु सभ्यता के पतन का कारण आर्यों का आक्रमण माना है। अपने मत की पुष्टि में उन्होंने मोहनजोदड़ों से प्राप्त नर कंकालों तथा ऋग्वेद के देवता इन्द्र का उल्लेख दुर्ग संहारक के रूप में किया है परन्तु अमेरिकी इतिहासकार केनेडी ने सिद्ध कर दिया है कि मोहनजोदड़ों के नर-कंकाल मलेरिया जैसी किसी बिमारी से प्रसित थे। परवर्ती अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि व्हीलर की यह धारणा कि आर्य लोग हड्प्पाई सभ्यता का नाश करने वाले थे मात्र एक मिथक थी। तथ्य यह है कि 5000 ई.पू. से 800 ई.पू. तक के समय में पश्चिमी या मध्य एशिया से सिन्यु या सरस्वती की घाटियों में किसी आक्रमण अथवा सामूहिक प्रवास का कोई पुरातात्विक, जैविक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। इस अवधि में पाये गये सभी नर-कंकाल एक ही समूह के लोगों के थे। 

ऋग्वेद में दुर्ग संहारक के रूप में इन्द्र को अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता क्योंकि ऋग्वेद की सही तिथि अभी निर्धारित नहीं की जा सकी है। अतः आर्यों के आक्रमण को पतन का प्रमुख कारण नहीं माना जा सकता। 

3. जलवायु परिवर्तन - आरेल स्टाइन और अमलानन्द घोष आदि विद्वानों के अनुसार जंगलों की अत्यधिक कटाई के कारण जलवायु में परिवर्तन आया। राजस्थान के क्षेत्र में जहाँ पहले बहुत वर्षा होती थी वहाँ वर्षा कम होने लगी । अतः सभ्यता धीरे धीरे विनष्ट हो गई। 

4. भू-तात्विक परिवर्तन-एम.आर. साहनी, आर. एल. राइक्स, जार्ज एफ.डेल्स. और एच.टी. लैम्ब्रिक सिन्धु सभ्यता के पतन में भू-तात्विक परिवर्तनों के प्रमुख कारण मानते हैं। भू-तात्विक परिवर्तनों के कारण नदियों के मार्ग बदल गए, जिससे लोगों में सिंचाई, पीने के पानी, आदि का अभाव हो गया। सारस्वत प्रदेश में तो इसका पतन मुख्य रूप में नदी धाराओं के बदलने अथवा स्थानान्तरण के कारण हुआ। इस कारण ये अपने अपने स्थानी को छोड़कर दूसरे स्थानों को चले गए। 

5. विदेशी व्यापार में गतिरोध - सन् 1995 ई. में डब्ल्यू, एप. अल््राइट ने यह मन व्यक्त किया कि मेसोपोटामिया के साक्ष्यों के अनुसार सैन्धव सभ्यता का अन्त लगभग 1750 ई.पू. में माना जा सकता है। 2000 ई.पू. के बाद सैन्धव सभ्यता में ग्रामीण संस्कृति के लक्षण प्रकट होने लगे थे, उससे पता चलता है कि उनका आर्थिक द्वँचा लड़खाड़ाने लगा था। 

6. प्रशासनिक शिथिलता - मार्शल के अनुसार सिन्धु सभ्यता के अन्तिम चरण में प्रशासनिक शिथिलता के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगते हैं। अब मकान व्यवस्थित ढंग के थे तथा उनमें कच्ची ईंटों का प्रयोग भी अधिक होने लगा। अतः सभ्यता धीर धीर नाश हो गई| 

7. महामारी - अमेरिकी इतिहासकार के. यू.आर. केनेडी का विचार है कि मलेरिया जैसी किसी महामारी से सैन्धव सभ्यता की जनसंख्या नष्ट हो गई। 

8. साधनों का अतिशय उपभोग - एक आधुनिक मत यह है कि इस सभ्यता ने अपने साधनों का ज्यादा से ज्यादा व्यय कर डाला. जिससे उसकी जीवन शक्ति ना हो गई। यह एक आकर्षक परिकल्पना है परन्तु इसकी जाँच के लिए विस्तृत अनुसंधान की आवश्यकता है। 

9. अदृश्य गाज के कारण - रूसी विद्वान एम. दिमित्रियेव का मानना है कि सैन्धव सभ्यता का विनाश पर्यावरण में अचानक होने वाले किसी भौतिक रासायनिक विस्फोट अदृश्य गाज के कारण हुआ। इस अदृश्य गज से निकली हुई ऊर्जा तथा ताप 1500000°C के लगभग मानी जाती है। जिससे दूर दूर तक सब कुछ विनिष्ट हो गया उन्होंने इस सम्बन्ध में महाभारत में उल्लिखित इसी प्रकार के दृष्टिकोण की ओर संकेत किया है जो मोहनजोदड़ों के समीप हुआ था।

निष्कर्ष रूप से यही कहा जा सकता है कि उपर्युक्त सभी कारणों ने मिलकर सिन्धु सभ्यता को गर्त में मिला दिया, परन्तु विद्वानों में पतन का सर्वाधिक मान्य कारण बाढ़ है। हालांकि गुजरात में हाल ही में आए भूकम्पों ने इस सभ्यता के पतन के प्रमुख कारण पर पुनः विचार करने को विवश कर दिया है।

इस संदर्भ में यह बताना जरूरी है कि हड़प्पा सभ्यता अचानक लुप्त नहीं हुयी। पुरातात्विक साक्ष्य से पता चलता है कि पतन क्रमिक रूप से और धीरे धीरे हुआ जिससे अधःस्थिति को प्राप्त में लगभग 600 वर्षों (1900 ई.पू. से 1300 ई.पू. तक) का समय लग गया। यद्यपि हड़प्पाई सभ्यता 1300 ई.पू. के आस-पास लुप्त हो चुकी थी फिर भी इस सभ्यता में विकसित अनेक सांस्कृतिक विशेषताएं हमारे दैनिक सांस्कृतिक और भौतिक जीवन में देखी जा सकती है। विशेषतः धर्म के क्षेत्र में यह सातत्यता आज भी उस रूप में कायम है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे