सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पोस्ट

मार्च, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अन्तर्पीढ़ीय संघर्ष के कारण

अन्तर्पीढ़ीय संघर्ष के कारण  अन्तर्पीढ़ीय संघर्ष - अन्तर्पीढ़ीय संघर्ष से तात्पर्य दो अनुक्रमिक पीढ़ियों में पाया जाने वाला ऐसा मतभेद है जो संघर्ष या टकराव की स्थिति उत्पन्न कर देता है। किसी कालेज में नकल को लेकर छात्रों एवं अध्यापकों में पाया जाने वाला टकराव इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं। यदि छात्र तो नकल करना चाहते हैं, परन्तु अध्यापक उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए अडिग है तो यह जिस प्रकार के टकराव एवं संघर्ष को जन्म देगा उसे अन्तर-पीढ़ी-संघर्ष' कहा जाएगा। इसी प्रकार, किसी परिवार में यदि बच्चों एवं उनके माता पिता में प्रेम विवाह' को लेकर टकराव है, तो यह भी 'अन्तर-पीढ़ी संघर्ष का ही उदाहरण माना जाएगा। इलियट एवं मैरिल (Eliott and Merrill) के शब्दों में, प्रत्येक पीढ़ी यह विश्वास करती है कि उसके उत्तराधिकारी सीधे पतन के गर्त में जा रहे हैं। वे यह भूल जाते हैं कि वे भी अपने बड़ों की भयावह चिन्ता के विषय रहे हैं और जो भी परिवर्तन लाने में वे साधन बने हैं, आवश्यक रूप से विनाशकारी सिद्ध नहीं हुए हैं। विभिन्न पीढ़ियों में पाया जाने वाला यह संघर्ष आज युवा अतिसक्रियता एवं असन्तोष का

निर्धनता के दुष्परिणाम

निर्धनता के दुष्परिणाम  भारत में निर्धनता एक प्रमुख समस्या बनकर हमारे सामने उपस्थित हुई जो समाज में अनेक कुरीतियों को जन्म दे रहा है। इसी कारण निर्धनता को सभी बुराईयों की जड़ कहा जाता है। निर्धनता से होने वाले प्रमुख प्रभाव अथवा दुष्परिणाम निम्नवत हैं -  (1) परिवार का विघटन–निर्धनता का एक बड़ा दुष्परिणाम परिवारों का विघटन होना है। निर्धनता की स्थिति में परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे पर अविश्वास करने लगते हैं। घर में कलह का वातावरण बना रहता हैं और कभी-कभी परिवार अनैतिकता का भी केन्द्र बन जाता है। ऐसी स्थिति में सदस्यों में पारस्परिक प्रेम समाप्त हो जाता है और सभी लोग अपने-अपने स्वार्थों को पूरा करने में लग जाते हैं। परिवार में निर्धनता के कारण पति-पत्नी के बीच विवाह-विच्छेद हो जाने की सम्भावना भी बढ़ जाती है।  (2 ) चरित्र का पतन - निर्धनता चरित्र को गिराने वाला सबसे प्रमुख कारण है। निर्धनता के कारण जब परिवार की आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पातीं तो साधारणतया स्त्रियों को भी जीविका की खोज में घर से बाहर निकलना पड़ता है। बहुत-से व्यक्ति उनकी असमर्थता का लाभ उठाकर अथवा उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन

निर्धनता का अर्थ, परिभाषा एवं कारण

निर्धनता का अर्थ, परिभाषा एवं कारण निर्धनता का अर्थ एवं परिभाषा - निर्धनता समाज की एक सबसे बडी समस्या है। यह एक सापेक्ष शब्द है। जिस प्रकार प्रकाश एवं अंधकार का सम्बन्ध है, उसी प्रकार निर्धनता और प्रचुरता का भी सम्बन्ध है। इनका अर्थ एक दूसरे की तुलना से ही स्पष्ट ही सकता है, ये एक दूसरे के विरोधी हैं। निर्धनता एक सापेक्ष स्थिति है, इस कारण इसकी परिभाषा अनेक विद्वानों ने विभिन्न प्रकार से की है -  एडम स्मिथ ने कहा-"एक मनुष्य उन्हीं अंशों में प्रचुर व दरिद्र होता है जिन अशों में उसे जीवन की आवश्यकतायें, सुविधायें एवं मनोरंजन के साधन उपभोग के लिए प्राप्त हो सकते हैं।"  गेडार्ड ने लिखा-"निर्धनता उन वस्तुओं का अभाव है जो कि व्यक्ति व उसके आश्रितों को स्वस्थ एवं पुष्ट रखने के लिए आवश्यक है।"  गिलिन और गिलिन ने निर्धनता की परिभाषा इन शब्दों में की है। "निर्धनता वह दशा है जिसमें एक व्यक्ति अपर्याप्त आय या बुद्धिहीन व्यय के कारण अपने जीवन स्तर को इतना उच्च नहीं रख पाता है कि उसकी शारीरिक व मानसिक क्षमता बनी रह सके और उसको तथा उसके प्राकृतिक आश्रितों को समाज के स्तरों के

आन्तरिक पीढ़ी संघर्ष की समस्या

 आन्तरिक पीढ़ी संघर्ष की समस्या आन्तरिक पीढ़ी संघर्ष की समस्या (Problem of Intra-Generation Conflict) -  कार्ल मानहीन (Karl Mannheim) ने स्पष्ट किया है कि पीढ़ियों से सम्बन्धित समस्या एक विशेष समाजशास्त्रीय घटना है जिसका सम्बन्ध जन्म और मृत्यु के द्वारा समाज में नये समूहों के निर्माण और पुराने समूहों के निरसन (elimination) के रूप में देखने को मिलता है। अभी तक आयु को केवल एक जैविकीय तथ्य, मानकर ठसे समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय नहीं समझा जाता था। धीरे-धीरे जब समाजशास्त्रियों का ध्यान आयु के आधार पर बनने वाली पीढ़ियों और विभिन्न पीढ़ियों से सम्बन्धित सुंधर्षों की और जाना शुरू हुआ तो इसे सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक तनावों के एक प्रमुख आधार के रूप में देखा जाने लगा।  आन्तरिक पीढ़ी संघर्ष समाजशास्त्रीय रूप से एक विवादपूर्ण विषय रहा है साधारणतया यह माना जाता है कि जिन व्यक्तियों से एक पीढ़ी की रचना होती है, उनकी आयु. लगभग समान होने के कारण उनके विचारों, मनोवृत्तियों, मूल्यों और व्यवहारों में किसी तरह का अन्तर नहीं होता। इस कारण एक ही पीढ़ी के सदस्यों के बीच सामाजिक संघर्ष इतने गम्भीर नहीं होत

तलाक का अर्थ एवं परिभाषा, कारण

तलाक का अर्थ एवं परिभाषा, कारण तलाक का अर्थ एवं परिभाषा कानूनी रूप से वैवाहिक सम्बन्धों का टूट जाना ही तलाक कहलाता है। यह एक ऐसा विधान है जो समाज द्वारा स्वीकृत है तथा वैवाहिक असफलता से सम्बन्धित है। 'तलाक' को पारिवारिक विघटन का सूचक माना जाता है क्योंकि यह पारिवारिक संगठन में दरार का द्योतक होता है। वैवाहिक सम्बन्धों से सम्बन्धित होने के कारण इसे व्यक्तिगत घटना भी माना जाता है परन्तु यह मान्यता प्रत्येक दृष्टिकोण से उचित नहीं लगती है। इसका कारण यह है कि अत्यधिक तलाक की दर सामाजिक समस्या का रूप धारण कर लेती है। इसीलिए तलाक को पारिवारिक विघटन। का ही एक रूप स्वीकार किया जाता है।  सामान्य अर्थों में यदि देखा जाय तो अंग्रेजी शब्द 'Divorce' का ही हिन्दी रूपान्तर "तलाक है। 'Divorce' शब्द लैटिन भाषा के 'Divortiom' (Dis + Vertere) शब्द से बना है जिसका तात्पर्य है 'अलग हो जाना'। यह विवाह-साथियों का एक दूसरे से अलग हो जाना है। इनसाइक्लोपीडिया बिटानिका में इसका अर्थ 'विवाह सम्बन्धों का टूट जाना' बताया गया है। यह उस जीवन का अन्त है जो विवाहित दम

घरेलू हिंसा इसके प्रकार, कारण एवं निराकरण

 घरेलू हिंसा  इसके प्रकार, कारण एवं निराकरण  घरेलू हिंसा - घरेलू हिंसा से तात्पर्य परिवार में महिलाओं पर किये जा रहे अत्याचार से है। भारतीय समाज में पारिवारिक हिंसा अत्यन्त प्राचीन धारणा है न कि नवीन मानव समाज में पहले सतीत्व के नाम पर पति की मृत्यु हो जाने पर उसकी विधवा पत्नी को जिन्दा जला दिया जाता था। इसी प्रकार भारतीय हिन्दू महिलाओं में अत्यधिक असन्तोष पाया जाता रहा है क्योंकि महिलाओं का उत्पीड़न, उनका शोषण, उनके साथ मारपीट करना, गाली या अपशब्द कहना, जला देना, प्रताड़ित करना और हत्या करना आदि पारिवारिक हिंसा के अन्तर्गत आता है।  घरेलू हिंसाओं में मुख्य रूप से यह देखने को मिलता है कि घरेलू हिंसा का शिकार अधिकांश महिलाएं ही होती है ऐसा क्या? ऐसा इसलिए होता है कि अधिकांश घरेलू दायित्व महिलाओं को ही निर्वाह करने होते हैं और कुछ स्वियों को तो घर के साथ-साथ बाहरी कार्य भी देखने पड़ते हैं। इतना सब कुछ करने के बाद यदि कोई उनसे भूल या गलती हो जाती है तो उन्हें अपमानित किया जाता है. जिसे वे सहन नहीं कर पाती हैं और वे हिंसात्मक रूप धारण कर लेती है। घरेलू हिंसा के अन्तर्गत महिलाओं के साथ किया

दहेज प्रथा इसके कारण एवं परिणाम

 दहेज प्रथा इसके कारण एवं परिणाम  दहेज - दहेज का सामान्य अर्थ है, वर-मूल्य। कन्या का विवाह करने के उपलक्ष्य में कन्या पक्ष द्वारा वर का जो मूल्य चुकाया जाता है, उसे ही दहेज की संज्ञा दी जाती है। हिन्दू शास्त्रों में ब्रह्म विवाह के समय कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को वस्त्र तथा आभूषण देने की जो व्यवस्था थी. धीरे-धीरे उसी बार मुल्य चुकाने की पूरम्परा ने दहेज प्रथा को कल दिया है। इस प्रकार दहेज का सामान्य अर्थ उस उपहार या भेंट से लगाया जाता है जिसे कन्या के माता-पिता विवाह के समय बर को स्वेच्छा से प्रदान करते हैं वर्तमान युग में वर की योग्यता, पद व आर्थिक स्थिति के अनुसार जो वर-मूल्य चुकाया जाता है बही दहुज है। दहेज देने की यह परम्परा अब दहेज प्रथा में बदल चुकी है। प्रारम्भ में यह प्रथा स्नेह और श्रद्धा भाव की प्रतीक दी जो अब एक आवश्यक बुराई बन गई है। वर्तमान युग में वर मूल्य विवाह की एक आवश्यक शर्त बन गई है जिसे चुकायें बिना कन्या का विवाह सम्भव ही नही है। हमारे समाज सुधारकों से लेकर सरकार ने इस घातक रोग से छुटकारा पाने के भरसक निरोधक अधिनियम पारित करके दहेज लेना और देना एक दण्डनीय अपराध ब

श्वेतवसन अपराध के कारण एवं स्वरूप (प्रकार)

 श्वेतवसन अपराध के कारण एवं स्वरूप (प्रकार)  श्वेतवसन अपराध के कारण - श्वेतवसन अपराध अलग-अलग समाज में अलग-अलग होते हैं, जिसके पीछे कई कारण मौजूद होते हैं। इन कारणों में प्रमुख हैं।  (1) कानून की जटिलता - कानून की जटिलता का लाभ सफेदपोश अपराधी उठाते रहते हैं और कानून के शिकंजे से बचते रहते हैं। सामान्य व्यक्ति इन कानूनों को समझता नहीं। वह लोगों की चतुराई का शिकार होता है। श्वेतवसन अपराधी साधन सम्पन्न होते हैं बड़े-बड़े नेता, वकील, अधिकारी, उनकी सहायता करते हैं। इस तरह दण्ड से बचते रहते हैं।  (2) पूँजीवादी व्यवस्था - श्वेतवसन अपराध पंजीवादी व्यवस्था की देन है। भौतिक सुख सुविधा को खोज में हर प्रकार का अनैतिक व अवैधानिक कार्य करने में संकोच नहीं होता। जैसे तैसे धन कमाना श्वेतवसन अपराध को प्रोत्साहित करता है। पूँजीपति धन के कारण अनेक हथकण्डे अपनाकर लाभ कमाने में सफल होते हैं।  (3) कानून की जानकारी न होना - कानून जटिल होते हैं और सामान्य व्यक्ति को इनकी जानकारी कम होती है। इसका लाभ मालिक, महाजन और अधिकारी उठाते हैं। कोरे कागजों में हस्ताक्षर प्राप्त कर लिए जाते हैं। रसीदें लिखवा ली जाती हैं।

श्वेतवसन अपराध अर्थ एवं परिभाषा, विशेषता

श्वेतवसन अपराध अर्थ एवं परिभाषा, विशेषता श्वेतवसन अपराध अर्थ एवं परिभाषा - सामान्य तौर पर श्वेतवसन अपराधी वे होते हैं जो श्वेत अथवा अच्छे वस्त्र धारण किये होते हैं और अपनी उच्च आर्थिक स्थिति की आड़ में अपने द्वारा किये गये अपराधों को छिपाने में सफल हो जाते हैं और अधिकांश कानून की पकड़ में नहीं आ पाते हैं। धर्म की आड़ में किये जाने वाले अपराध भी इस वर्ग में आते हैं। जहाँ निर्धन व्यक्ति अपराध किये जाने के बाद शीघ्र ही पकड़ लिया जाता है वहीं दूसरी ओर श्वेतवसन अपराधी धन के बल पर अपने हथकण्डों द्वारा लम्बे समय तक कानून के शिकंजे में नहीं आ पाते हैं। श्वेतवसन अपराध की अवधारणा डॉ. सदरलैण्ड ने विकसित की । इसके कई नाम है जैसे अभिजात्य अपराध, भद्रवर्गीय अपराध या सफेद पोश व उच्च वर्गीय अपराध। दरलैण्ड के अनुसार, "श्वेतवसन अपराध ऐसे अपराध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो सम्मानित व उच्च सामाजिक स्थिति वाले व्यक्ति द्वारा व्यवसाय के दौरान किया जाता है। अर्थात् 'श्वेतवसन अपराध एक ऐसा अपराध है जो सुप्रतिष्ठित व उच्च सामाजिक स्थिति वाले व्यक्ति द्वारा अपने व्यवसाय के दौरान किया जाता है।

बाल अपराध की रोकथाम हेतु सरकारी प्रयत्नों

 बाल अपराध की रोकथाम हेतु सरकारी प्रयत्नों  बाल अपराध एक गम्भीर समस्या है यही कारण है कि सरकार का मुख्य प्रयत्न आज बाल-अपराधियों का इस तरह सुधार करना है जिससे वे भविष्य में अपराधी न बन सकें। इसके लिए सरकार द्वारा एक और ऐसे कानून बनाये गये जिनके द्वारा बाल-अपराधियों के साथ सहानुभूति का व्यवहार करते हुए उन्हें भविष्य में अपराध करने से रोका जा सके तथा दूसरी और ऐसे प्रयत्न किये गये जिनके द्वारा आल-अपराधियों को दूसरे अपराधियों से पृथक रखकर उनके जीवन में सुधार किया जा सके। इस दिशा में सरकार द्वारा किये जाने वाले प्रमुख कार्यों का वर्णन निम्नवत् हैं -  (1) परिवीक्षा अधिनियम - केन्द्र सरकार द्वारा सन् 1958 में अपराधियों के लिए परिवीक्षा अधिनियम पास किया गया। इस अधिनियम के द्वारा यह व्यवस्था की गयी कि यदि 21 वर्ष से कम की आयु के किसी बच्चे या किशोर को न्यायालय द्वारा कोई दण्ड दिया जाये तो परिवीक्षा की संतुति पर विचार अवश्य किया जाये। साधारणतया यदि कारावास की अवधि 6 माह तक हो तो उसे जेल न भेजकर परिवीक्षा अधिकारी की देख-रेख में छोड़ दिया जाता है। इसके लिए बाल-अपराधी को अच्छे आचरण का एक प्रतिज्ञा-

बाल अपराध के कारण और उसके रोकथाम

 बाल अपराध  के कारण और उसके रोकथाम  बाल अपराध की अवधारणा - "बाल अपराध के अन्तर्गत हम एक स्थान एवं समय विशेष के कानून के द्वारा निर्धारित उम्र के नीचे के बालक एवं बालिकाओं के त्रुटिपूर्ण व्यवहार को शामिल करते हैं। इसके अतिरिक्त आपने उन समस्त बालकों को भी अपराध के अन्तर्गत ही सम्मिलित किया है जो कि अब सुधार से परे हैं। ऐसे बालक या बालिकायें अपने माता-पिता की आज्ञा की अवहेलना करते हैं। सेथना ने तो यहाँ तक लिखा है कि जो विद्यार्थी अपने समय का सदुपयोग नहीं करते, विद्यालय नहीं जाते या कक्षा से भागते हैं, गन्दी गालियां बकते हैं, अश्लील साहित्य पढ़ते हैं, किसी प्रकार की यौन तृप्ति के शिकार हो चुके हैं और पान, बीड़ी, सिगरेट या अन्य मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं, बाल अपराधी ही कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त भीख मांगने वाले बालक तथा जूतों में पालिश करने वाले छोकरों को तथा पान की दुकानों या सस्ते होटलों पर नौकरी करने वाले कम उम्र के वालकों को भी आपने बाल अपराधियों की ही कोटि में सम्मिलित किया है। बाल अपराध को परिभाषित करते हुए मार्टिन न्यूमेयर मे लिखा है-"बाल अपनाधी एक निश्चित आयु से कम का व

अपराध की समाजशास्त्रीय अवधारणा

 अपराध की समाजशास्त्रीय अवधारणा   अपराध की समाजशास्त्रीय अवधारणा (Sociological Concept of Crime) - समाजशास्त्रियों तथा अपराधशास्वियों का विचार है कि अपराध की अवधारणा को केवल कानूनी आधार पर ही नहीं समझा जा सकता। वास्तविकता यह है कि कानून के विरुद्ध किये जाने वाले कार्य जिनके लिए राज्य द्वारा दण्ड की व्यवस्था की जाती है, उनके अतिरिक्त वह सभी व्यवहार अपराध हैं जो समाज-विरोधी होते हैं। इस आधार पर जे. एल. गिलिन का कथन है कि अपराध एक ऐसा कार्य है जो वास्तविक रूप में समाज के लिए हानिकारक होता है अथवा जिसे समूह द्वारा सामाजिक हितों के विरुद्ध मानकर उसके लिए किसी न किसी रूप में स्वयं दण्ड देने की व्यवस्था की जाती है। राज्य द्वारा अपराधी व्यवहार को स्पष्ट करने के लिए जो कानून बनाये जाते हैं, उनमें समाज के प्रमुख मूल्यों तथा जन भावनाओं का समावेश नहीं हो पाता। दूसरी बात यह है कि अपराध का सम्बन्ध ऐसे सभी कार्यों से है जो व्यक्ति और समूह की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं तथा सार्वजनिक हितों के विरुद्ध होते हैं। अपराध की समाजशास्त्रीय आधार पर विवेचना करना इसलिए भी जरूरी है कि यदि जन-भावनाओं तथा सामाजि

अपराध की कानूनी अवधारणा

 अपराध की कानूनी अवधारणा  अपराध की कानूनी अवधारणा (Legal concept of Crime) - अपराध एक सापेक्षिक अवधारणा है जिसका सम्बन्ध देश, काल तथा सामाजिक मूल्यों से होता है लेकिन अधिकांश अपराधशास्त्री यह मानते हैं कि अपराध की सही व्याख्या कानूनी आधार पर ही की जा सकती है। माइकेल तथा एडलर (Michael and Adier) का यहाँ तक कथन है कि अपराध की वही परिभाषा वास्तविक, सुनिश्चित और कम सन्देहपूर्ण हो सकती है जिसके द्वारा अपराध को एक ऐसे व्यवहार के रूप में स्पष्ट किया जाये जिसे अपराधी संहिता में निषिद्ध घोषित किया गया हो। ऐसी परिभाषा केवल सही ही नहीं है वरन् यही एकमात्र सम्भव परिभाषा हो सकती है। इसे स्पष्ट करते हुए माइकेल और एडलर ने आगे लिखा है कि कानूनी आधार पर अपराधी भी केवल उसी व्यक्ति को माना जा सकता है जिसे कोई गैर-कानूनी काम करने के लिए न्यायालय द्वारा दोषी मानकर उसे दण्ड दिया गया हो। इसी तरह के विचारों के आधार पर अपराध की कानूनी अवधारणा को निश्चयवादी अवधारणा (defeministic concept) कहा जाता है क्योंकि इनके अनुसार कानून के अतिरिक्त दूसरे किसी भी सन्दर्भ में अपराध के सही अर्थ को नहीं समझ जा सकता। बहुत सरल श

अपराध की परिभाषा, कारण

अपराध की परिभाषा, कारण अपराध का अर्थ - ऐसे कार्य या व्यवहार जो समाज और कानून के विरुद्ध हैं या समाज की दृष्टि में समाज विरोधी है, अपराध कहलाता है।  अपराध की परिभाषा - विभिन्न विद्वानों ने अपराध की परिभाषा निम्न प्रकार से दी है -  इलिएट व मैरिल -"समाज विरोधी व्यवहार जो कि समूह द्वारा स्वीकार किया जाता है जिसके लिए समूह दण्ड निर्धारित करता है, अपराध है।" काल्ड वेल-"अपराध किसी निश्चित स्थान व समय पर संगठित समाज-सम्मत मूल्यों के संगत का उल्लंघन है।" मॉवरर के अनुसार-"अपराध सामाजिक मानदण्डों का उल्लंघन है। अपराध के कारण-अपराध के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं -  (1) शारीरिक कारक - अपराध के लिए उत्तरदायी शारीरिक कारक निम्नलिखित हैं -  (i) शारीरिक अयोग्यता-शारीरिक अयोग्यता भी अपराध के लिए उत्तरदायी है। सल्फ वाने के अनुसार अपराध और शारीरिक कुरूपता के बीच सम्बन्ध पाया जाता है। क्योंकि इससे उनमें हीनता की भावना उत्पन्न होती है इस हीनता की भावना के कारण ये अपनी इस आयोग्यता की पूर्ति अपराध से करते है।  (ii) लिंग - लिंग के आधार पर अपराध में भिन्नता होती है क्योंकि स्त्रियाँ घर त

अपराधी जन्मजात नहीं होते वरन् बनाये जाते हैं

 "अपराधी जन्मजात नहीं होते वरन् बनाये जाते हैं"  "अपराधी जन्मजात नहीं होते वरन् बनाये जाते हैं"।अनेक समाजशास्त्रियों का मानना है कि अपराधी जन्मजात नहीं होते हैं बल्कि बनाये जाते हैं। बच्चा अपने जन्म के समय निर्दोष होता है। जन्म के समय बच्चे का अन्तःकरण शुद्ध तथा निर्मल होता है। अपराध के बीज तो सामाजिक परिस्थितियों में छिपे हुए होते हैं। जैसे ही इन बीजों को उपजाऊ भूमि प्राप्त होती है उनमें अंकुर फूटकर निकलने लगते हैं। अपराध जन्म की देन नहीं है बल्कि सामाजिक परिवेश की देन है। दूषित सास्कृतिक प्रतिमान ही अपराध के जन्मदाता होते हैं। इस सम्बन्ध में कुछ विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किये है  दुर्खीम के अनुसार, “मनुष्य समाज की उपज हैं और जैसा समाज होगा वैसे मानव होंगे।' सदरलैण्ड के अनुसार, अपराधी जन्म से नही होते वरन् अपराधी बनाने का काम समाज करता है।"  समाजशास्त्रियों का मानना है कि अपराध भी एक सीधा व्यवहार है। अपराध को व्यक्ति पारस्परिक सम्पर्क और अन्तः क्रिया द्वारा प्राप्त करता है। अपराध के बीज एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तान्तरित कर दिये जाते हैं। अप