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प्रारम्भिक औपनिवेशिक काल में आधुनिक भारत के सामाजिक एवं बौद्धिक जीवन पर पश्चिम के प्रभावों की विवेचना

प्रारम्भिक औपनिवेशिक काल में आधुनिक भारत के सामाजिक एवं बौद्धिक जीवन पर पश्चिम के प्रभावों की विवेचना 

प्रारम्भिक औपनिवेशिक काल अर्थात् ब्रिटिश कालीन शिक्षा का युग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रयासों से ही प्रारम्भ हुआ। इस काल से पूर्व भारतीय शिक्षा की दिशा अनिश्चित एवं अव्यवस्थित थी। पाठशालाओं में संस्कृत, हिन्दी, बंगला, फारसी अरबी तथा उर्दू भाषाओं के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। इसमें सन्देह नहीं ये पाठशालायें शिक्षा के प्रसार करने में अवश्य लगी थीं परन्तु इनकी आर्थिक दशा सोचनीय थी पाठशालाओं के संचालन के लिए धन का अभाव था। शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की कोई उचित व्यवस्था नहीं थी। पाठशालाओं के लिए सुन्दर भवन निर्माण का कोई प्रबन्ध नहीं था तथा तत्कालीन शासकों की शिक्षा के प्रति अत्यन्त उपेक्षापूर्ण नीति थी। श्री० ए० एन बसू ने लिखा है-पाश्चात्य शिक्षा शास्त्रियों के अनुसार भारत वर्ष की देशी शिक्षा व्यवस्था का कोई महत्त्व नहीं था तथा ब्रिटिश अधिकारी उसे समाप्त करना ही उचित समझते थे।"


यद्यपि अंग्रेजों को भारतीयों को शिक्षित करने का मूल उद्देश्य एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना था जो जन्म से तो भारतीय हो पर उनके मस्तिष्क को शिक्षा के माध्यम से ऐसा बनाना था वह ब्रिटिश प्रशासन के संचालन में महत्त्वपूर्ण सहयोग दे सकें। अर्थात् उनका मूल उद्देश्य व्यापारिक कम्पनियों साथ ही ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासन व्यवस्था के लिए क्लर्कों को तैयार करना था। वास्तव में उनकी इच्छा थी ऐसे भारतीयों को उत्पन्न किया जाय जो बोद्धिक दृष्टि से गुलाम हो।

जब भारत में अंग्रेजी शिक्षा प्रारम्भ हुई और पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान फलने लगे तब भारतीय सुसुप्तावस्था से जाग  पड़ा। स्मरण रहे कि 19वीं सदी के प्रथम कुछ दशकों में शिक्षित भारतीयों की संख्या बहुत ही कम थी। जब अंग्रेजी शासन में अधिकाधिक स्कूल और कॉलेज खुल गए और उनके साथ ईसाई मिशनरियों ने भी इस दिशा में काम करना प्रारम्भ किया तभी 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में शिक्षित भारतीयों के बहुत बड़े वर्ग का जन्म हुआ और उससे बुद्धिजीवियों का बहुत बड़ा वर्ग उभरकर सामने आया। इस प्रबुद्ध वर्ग ने भारत की दुर्दशा पर पश्चाताप करना प्रारम्भ किया और उसकी सुदशा के लिए सुधार को आवश्यक बताया। भारत में अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत का एक उद्देश्य एक ऐसे वर्ग को जन्म देना था जो अंग्रेज की मनोवृत्ति और विवेक रखता हो। शिक्षा के इस उद्देश्य की झलक लॉर्ड मैकाले के 1835 के मिनट में मिलता है जो इस प्रकार है-"हम ऐसे वर्ग को तैयार करें जो हमारे और हमारी करोड़ों प्रजा के बीच दुभाषिये का काम कर सके, एक ऐसा वर्ग जो शरीर और रंग से भारतीय हो। लेकिन विचारों, नैतिकता और बौद्धिक स्तर से अंग्रेज हो।" इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के आधार पर भारत में कई स्कूल कॉलेज और विश्वविद्यालय खोले। लॉर्ड हार्डिग्ज के काल में 1844 में यह घोषणा की गई "प्रत्येक मामले में सरकारी नौकरी के लिए उम्मीदवार के चुनाव के समय ऐसे लोगों को तरजीह दी जाएगी, जो अंग्रेजी शिक्षा के लिए स्थापित स्कूलों और कॉलेजों में पढ़े हों और उनमें भी विशेषकर उन लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी जिन्होंने सामान्य से अधिक योग्यता और सफलता का परिचय दिया होगा।" इस प्रकार, अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों का एक वर्ग बना जो सामाजिक परिवर्तन के लिए अग्रणी वना।


पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में भी मध्यम वर्ग अर्थात् बुद्धिजीवी वर्ग के विकास तथा इस वर्ग के लोगों की संख्या वृद्धि में सहयोग किया। मध्यम वर्ग अंग्रेजों की विद्वता तथा संपन्नता से काफी प्रभावित हुआ और वैसा ही बनने के लिए वह पश्चिम की भाषा, संस्कृति, साहित्य आदि का अध्ययन करने लगा। यह वर्ग अलग-थलग रहकर पश्चिम के 'आदर्श' को ग्रहण करने के लिए अधिक लालायित हुआ। फलतः पश्चिमीकरण की प्रक्रिया भारत में प्रारम्भ हुई। इस प्रक्रिया के दायरे में जो लोग थे, वे मध्यम वर्ग के थे। भारत में ऐसे लोगों की संख्या में वृद्धि होने लगी। अंग्रेजी शासन काल में यह वर्ग शक्तिशाली ही नहीं, अत्यन्त प्रबुद्ध और महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। समाज में डॉक्टरों, अभियंताओं, व्यापारियों, अधिवकत्ताओं, भारतीय नस्ल के सरकारी अधिकारियों आदि की संख्या बढी यह वर्ग पश्चिमी आदर्श को आधार बनाकर भारत में परिवर्तन लाने के लिए हर कदम पर नेतृत्व देने लगा।


आधुनिकीकरण की प्रवृत्ति भी मध्यम वर्ग अर्थात् बुद्धिजीवी वर्ग के उदय में कारगर सिद्ध हुई। आधुनिकीकरण का जन्म पश्चिमीकरण की प्रक्रिया के दौरान हुआ। भारतीय पश्चिमी साहित्य का अध्ययन करने लगे, ज्ञान-विज्ञान वाले विषयों को पढ़ने लगे। इन विषयों के अध्ययन ने उनको आधुनिकता की ओर जाने का, अपना और अपने देश का आधुनिकीकरण करने का उत्साह दिया। बुद्धिजीवियों ने भारतीय समाज की परंपरागत बुराइयों को दूर करने और आधुनिक मूल्यों व जीवन-प्रणाली को अपनाने के लिए प्रेरित किया। जैसे-जैसे अध्ययन के विषय-क्षेत्र तेज होते गए वैसे-वैसे आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेजी होती गई एवं मध्यम वर्ग के रूप में एक विशेष, वर्ग तैयार होता गया। इस वर्ग तर्क और बुद्धि का सहारा लिया और विकास तथा सुधार की पृष्ठभूमि तैयार होने लगी। तर्क तथा विवेक की कसौटी पर सामाजिक कुरीतियों एवं परंपरागत रीति-रिवाजों को कसा जाने लगा और ग्राह्य तथा अग्राहा को एक-दूसरे


से पृथक कर परिवर्तन का द्वार तैयार किया जाने लगा। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में जिस सामाजिक-धार्मिक-सुधार आंदोलन का जन्म हुआ उससे मध्यम वर्ग के जन्म एवं विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसी वर्ग के लोगों ने आंदोलन का नेतृत्त्व किया। ब्रह्म-समाज के प्रवर्तक एवं अनुयायी राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र ने तया देवेन्द्रनाथ ठाकुर, आय-समाज के जनक और समर्थक दयानंद सरस्वती, लाला लाजपत

 राय और स्वामी श्रद्धानंद, रामकृष्ण मिशन के स्वामी विवेकानन्द, प्रार्थना समाज के जस्टिस एम० जी० रानाडे आदि सबके सब मध्यम वर्ग की उपज थे। बीसवीं सदी में हरिजनोद्धार आंदोलन का नेतृत्त्व करने वाले महात्मा गांधी भी इसी आंदोलन के संचालक वर्ग के पुत्र थे। मुस्लिम समाज में बहावी, अलीगढ़ और अहमदिया आंदोलन के संचालक भी इसी वर्ग के थे। इन हिन्दू-मुस्लिम आंदोलनों ने एक सशक्त मध्यम वर्ग के विकास में सहयोग किया। सरकार द्वारा पारित समाज सुधार अधिनियमों के कारण भी मध्यम वर्ग के आविर्भाव में सहयोग मिला। मध्यम वर्ग के सहयोग से सामाजिक सुधार के लिए जनमत तैयार हुआ। जनमत का अनुकूल रुख और मध्यम वर्ग का सहयोग पाकर सरकार ने सामाजिक बुराईयों के विरुद्ध अधिनियम बनाने के लिए कदम उठाया। सरकार ने अधिनियम बनाकर कुछ हो यों के अंदर सती-प्रथा, बाल-वघ, नर-हत्या बाल-विवाह, बहु-विवाह, विधवा-विवाह आदि जैसी कुप्रथाओं को रोक डाला। नारी शिक्षा तथा नारी सम्पत्ति से सम्बद्ध कई कानून भी बने । इन अधिनियमों तथा कानूनों का महत्त्व इस बात में है कि इन्होंने समाज-सुधार कार्य को वैधानिक रूप प्रदान कर दिया। मध्यम वर्ग के विकास को इससे बल मिला। आवागमन तथा संचार के क्षेत्र में क्रातिकारी परिवर्तन तथा उत्तम साधनों का विकास वस्तु ब्रिटिश शासन की ही देन है। रेल पर, राजपञ, सामान्य सड़क, डाक-तार आदि की व्यवस्था तथा विकास इस काल में अत्यधिक हुआ। आवागमन तथा संचार के इन साधनों ने देश में अखिलत्व तथा सहयोग की भावना को कायम करने तथा पश्चिमी विचारों के प्रसार करने में काफी सहयोग किया। देश के एक कोने के लोग दूसरे कोने के लोग से मिलने-जुलने लगे और उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान होने लगा। इसके चलते देश के तबदीली की गति और बढ़ गई। जात-पात की कठोरता का बंधन टूटने लगा और मध्यम वर्ग का महत्त्व वढ्ने लगा। ब्रिटिश शासन काल में भारतीय समाज में अनेक वर्गों का जन्म हुआ। नगरों में पूँजीपति वर्ग, उद्योगपति वर्ग, व्यापारी वर्ग शिक्षकों, डाक्टरों, चित्रकारों, साहित्यिक लिपिकों आदि के वर्ग पैदा हुए। इस प्रकार ग्रामों में किसानों, जमींदारों या सामंतों साहूकारों, मजदूरों आदि के भी वर्ग थे। किन्तु ये सभी वर्ग मध्यमवर्गीय नहीं कहे जा सकते। मध्यम वर्ग की कुछ विशिष्ट विशेषताएँ थीं।

इन विशेषताओं से जो लोग समन्वित और प्रभावित थे वे ही मध्यमवर्गीय लोग थे। वे विशेषताएँ हैं उनका बुद्धिजीवी होना, उच्च वर्ण से सम्बद्ध होना ही-प्रवृत्ति का होना और समाज में परिवर्तन लाने के लिए मनोविज्ञान रखना। इन विशेषताओं का संक्षिप्त विश्लेषण करना समीचीन होगा।

नवीन बुद्धिजीवी ही मध्यम वर्ग के लोग थे। ऐसे तो अनेक बुद्धिजीवी थे, किन्तु जिन बुद्धिजीवी के नाम से पुकारा क्योंकि निस्संदेह वे बुद्धिजीवी वर्ग थे। इन बुद्धिजीवियों ने बीज स्वरूप के रूप में आधुनिक भारत के निर्माण में सहयोग का काम किया है। मैं उन्हें मध्यम वर्ग के नाम से नहीं अभिहित करूंगा क्योंकि यह उचित नहीं होगा।" उन्होंने भारत के सुधारकों और विद्वानों को मध्यम वर्ग के लोग न कहकर बुद्धिजीवी वर्ग के लोग के रूप में माना है। अतः मध्यम वर्ग की एक बड़ी विशेषता उनका बुद्धिजीवी होना है-ऐसा बुद्धिजीवी जो देश और समाज के जीवन में उपयोगी परिवर्तन लाने की क्षमता और आकांक्षा रखता हो। मध्यमवर्गीय की एक विशेषता उसकी ह्वैधवृत्ति है। द्वैधवृत्तिक के दो पक्ष थे। प्रथम पक्षबाले बुद्धिजीवियों के हृदय में समाज में नव-परिवर्तन लाने की भूख थी और जो एक नए भारत का निर्माण करने का स्वप्न देखते थे। वे ही मध्यम वर्ग के थे। श्री-निवास ने मध्यम वर्ग को बुद्धिजीवी के नाम से ही संबोधित किया है। उन्होंने लिखा है कि "मैं उन्हें (मध्यम वर्ग) नवीन

मध्यम वर्ग के लोग अपने समाज की गिरावट और पतन से क्षुब्य थे और अपनी कमजोरी खोजने लग जाते थे। वे अपने समाज की बुराइयों की आलोचना करते थे और उसके सुधार के लिए उत्सुक थे। दूसरे पक्ष वाले अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन से देश के प्रति भक्ति की भावना रखते थे। ये देश को स्वाधीनता के समर्थक थे। मध्यम वर्ग के लोग केवल अपने देश के प्रति ही द्वि-विचार नहीं रखते थे अपितु अंग्रेजों के प्रति भी उनके द्वि-विचार थे। एक तरफ वे अंग्रेजों की प्रगति, योग्यता तथा प्रवीणता के प्रशंसक थे तो दूसरी तरफ वे उससे घृणा भी करते थें

क्योंकि अंग्रेज समानता की बात करते थे, हिन्दू धर्म की आलोचना करते थे और भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते थे। ये द्विपक्षीय विचार रखने वाले मध्यमवर्गीय थे जो अंग्रेजों के साथ रहकर भी भारत से प्रेम करते थे और देश के लिए सुधार तथा स्वतन्त्रता की भावना रखते थे। आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में युद्धिजीवी की भूमिका निर्णायक रही है। काफी हद तक उन्होंने भारत के नागरिकों को आधुनिक राष्ट्र के रूप में एकान्वित किया और देश में कई धार्मिक सामाजिक सुधार आंदोलन का संगठन एवं सूत्रपात किया जो प्रकृति में प्रगतिशील थे। इस वर्ग के लोग राजनीति के संचालक, देश में चलने वाले राष्ट्रीय आंदोलन के जनक, नागरिकों के संगठनकर्ता और नेतृत्त्व में अग्रणी थे।

वस्तुतः इन लोगों ने राजनीतिक संगठनों को कायम किया और ऐसे संगठनों में सम्मिलित होकर राष्ट्रवाद को उभारा। सिपाही विद्रोह के बाद जब देश में कॉलेजों की अधिक संख्या में स्थापना हुई तब भारतीय शिक्षा का अध्ययन कर ज्ञान बटोरने लगे। इन्हीं शिक्षित भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना सबसे पहले आई। बुद्धिजीवी वर्ग के अग्रणी नेताओं ने वाणिज्यिक और आरम्भिक औद्योगिक वुर्जुआजी के समर्थन और बल पर 1885 में भारतीय जनता का पहला राष्ट्रीय, राजनीतिक संगठन काम किया। इण्डियन नेशनल कांग्रेस ने अंग्रेजी को अपनी भाषा बनाया और इस तरह प्रबुद्ध शिक्षित वर्ग के लोग ही सबसे पहले इसके नेता हुए।

वस्तुतः इसी वर्ग को लोग ही भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के सूत्रधार थे। यह राष्ट्रीय आंदोलन मुख्यत: काँग्रेस के नेतृत्व में बीसवीं सदी के पहले दशक के व्यापक मध्मवर्गीय आधार पर 1918 के बाद और अधिक व्यापक जनाधार पर विकसित हुआ। अपने विकास के प्रत्येक चरण में प्रबुद्ध वर्ग ने ही इस आन्दोलन का नेतृत्त्व किया। इस वर्ग के चाहे जिस अंग ने जिस किसी विचार पद्धति, क्रिया-प्रणाली और कार्यक्रम के साथ यह काम किया हो। उदारवादी चरण में राष्ट्रीय आंदोलन की अगुआई आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त गोपालकृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, महादेव गोविन्द रानाडे, फीरोजशाह मेहता आदि उदारवादी नेताओं ने की। दूसरे गर्म वादी चरण में बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, अरविंद घोष जैसे अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगों और महान् आत्मत्यागी नेताओं ने इस आंदोलन का नेतृत्त्व किया। आतंकवादी आंदोलन में अपेक्षाकृत कम लोगों ने सक्रिय भाग लिया। लेकिन इसकी शुरुआत और अगुआई मध्यम वर्गीय युवक वर्ग ने ही की जिन्होंने और कई समाजवादी बुद्धि नदियों जैसे शिक्षित वर्ग के ही लोगों ने किया। ताराचंद लिखते हैं

आयरिश आतंकवादी और रूसी शून्यवादी आंदोलन के इतिहास का अध्ययन किया था । 1918 के बाद भी जब राष्ट्रवादी आन्दोलन जनसाधारण के बीच फैल चुका था, इसका नेतृत्त्व महात्मा गांधी, देशबंधु चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, जे० बी० कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, सुभाषचन्द्र बोस कि "जनता में राष्ट्रीयता की भावना का विस्तार राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का संगठन और अंत में देश को विदेशी शासन से मुक्त करने का श्रेय इसी वर्ग को मिलना चाहिए।" राष्ट्रीय भावना का उद्गम सामाजिक-धार्मिक आंदोलन से भी हुआ। इस आन्दोलन के जनक भी इसी वर्ग के लोग थे। इसी वर्ग के डॉ० अम्बेडकर ने हरिजनों के उद्वार के लिए आन्दोलन का नेतृत्व किया। अछूतों को राजनीतिक चेतना देने वाले आप ही थे। वस्तुतः ब्रिटिश शासनकाल में भारत में जितने भी बिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों, पारसियों आदि के समाज में आन्दोलन प्रारम्भ हुए. उन सभी का नेतृत्त्व इसी वर्ग के लोगों ने किया। भारतीय किसानों और मजदूरों का पथ-प्रदर्शन करने वाले मध्यवर्गीय लोग ही थे। इसी वर्ग के लोगों ने दूसरे देशों में हुए किसान और मजदूर आन्दोलन का ज्ञान प्राप्त किया और उसके आधार पर भारत में भी किसान तथा मजदूर आन्दोलन का सूत्रपात करना प्रारम्भ किया। उन्होंने जनतंत्र तथा स्वतन्त्रता के आधुनिक विचारों को भी आत्मसात किया था और उन्हें दूसरे देशों की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक उपलब्धियों का ज्ञान था। अतः उन्होंने शिक्षित भारतीयों को बीच इस ज्ञान का भी प्रचार-प्रसार किया।

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