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रविवार, 20 दिसंबर 2020

उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक आंदोलन

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उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक आंदोलन

उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन (धार्मिक पुनर्जागरण) के लिए कोई एक तत्त्व उत्तरदायी नहीं थे, वरन् कई तत्वों को मिलकर इस पुनर्जागरण को जन्म दिया। भारतीय धर्म तथा समाज में अंधविश्वास तथा कुप्रयाओं का बोलवाला था। भारत में ब्रिटिश शासन के प्रभाव के कारण तथा स्वयं अंग्रेजों के संस्कृति के प्रभाव के कारण भारत के सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में परिवर्तनों की आवश्यक्रता का अनुभव किया जाने लगा। ब्रिटिश सरकार ने समाज सुधार हेतु अनेक कुप्रथाओं का विरोध किया तथा भारतीय मनीषियों को सुधार हेतु प्रोत्साहित किया। अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के प्रभाव के कारण भारतियों के सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टिकोणों में परिवर्तन होने लगा। उन्होंने संकीर्णता, रूढ़िवादिता तथा अन्य विश्वास के निवारण के लिए प्रयास किए। ईसाई धर्म के विस्तार कारण तथा साथ इसके प्रचार-प्रसार की नीति ने भारतियों को यह सोचने के लिए विवश किया कि यदि उन्हें अपनी सभ्यता और संस्कृति को बनाये रखना है तो स्वयं अपनी मान्यताओं को आगे लाना होगा। वैज्ञानिक प्रगति, औद्योगिक क्रांति एवं आधुनिकीकरण के कारण भारत पर पाश्चात्य सभ्यता का गहरा प्रभाव पड़ने लगा। राष्ट्रीय चेतना की प्रबलता ने भारतीय राष्ट्रीयता को सजीव एवं चेतना युक्त बनाया। इसके परिणाम स्वरूप आदर्शों एवं संस्कृति की रक्षा के लिए, भारत को पाश्चात्य प्रभाव से मुक्ति दिलाने हेतु सामाजिक एवं धार्मिक चेतना प्रवल हो गई। समय की पुकार तथा परिस्थियों के मांग के अनुरूप अनेक सुधारों का जन्म हुआ। उन्हीं स्थानों ने भारतीय धर्म तथा समाज को पाश्चात्य प्रभाव से मुक्त करने का वीणा उठाया।


भारत में उन्नीसवीं शताब्दी में जो सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन शुरू हुए उसमें अनेक संस्थाओं और शक्तियों ने योगदान दिया। जिन संस्थाओं ने मुख्यतः हिन्दू धर्म की बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई उनमें प्रमुख थीं- आत्मीय सभा, ब्रह्म समाज, तरुण बंगाल तत्वबोधिनी सभा, बेथुन स्कूल, परमहंस मंडली, प्रार्थना सभा, रामकृष्ण मिशन, आर्य समाज, थियोसोफिकल सोसाइटी आदि। हिन्दू धर्म और समाज में पुनर्जागरण लाने वाले प्रमुख प्रचारकों में राजा राममोहन राय, हेनरी विलियम डिरोजियो, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, देवेन्द्र नाथ ठाकुर, गोपाल हरी देशमुख, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महादेव गोविन्द रानाडे, रामकृष्ण भंडारकर, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद और श्रीमती एनी बेसेन्ट आदि प्रमुख थे। जिन व्यक्तियों और संस्थाओं ने मुस्लिम समाज और धर्म में सुधार लाने के लिए प्रयास किये उनमें प्रमुख थे-सर सैयद अहमद और अलीगढ़ स्कूल आन्दोलन के कार्यकर्ता, मिर्जा गुलाम अहमद और अहमदिया आन्दोलन के समर्थक मुहम्मद अब्दुल वहाव और वहाबी आन्दोलन के कार्यकर्ता,देवबंद आन्दोलन, बदरुद्दीन तैयबजी और मुहम्मद इकबाल! सिक्खों में धर्म और समाज-सुधार लाने के लिए काका और अकाली आन्दोलन के समर्थकों का नाम उल्लेखनीय है। इन सभी संस्थाओं और कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने धर्म के अनुयायियों को प्रायः प्रचलित सामाजिक कुरीतियां छोड़ने के साथ-साथ प्रगतिशील धार्मिक दृष्टिकोण अपनाने को कहा।

आंदोलन की विशेषताएँ- (1) 19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक आंदोलन के फलस्वरूप भारत के निवासियों ने स्वयं अपने लिए अपनी ही संस्कृति में एक नवीनता का विकास किया। यह नवीनता परिवर्तनशील प्रवृत्तियों तथा परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालते हुए अधिकाधिक समृद्ध होती गयी। इसके परिणामस्वरूप वैदिक काल से लेकर आज तक की भारतीय संस्कृति में तारतम्यता तथा निरन्तरता स्थापित हो गयी। 2. इस समय के धार्मिक आंदोलन की प्रवृत्ति धर्मनिरपेक्ष, जनतन्त्रीय, समन्वयकारी, सहिष्णु तथा उदार थी।

3. आंदोलन के फलस्वरूप विभिन्न जातियों के विभिन्न भाषा-भाषी अलग संस्कृतियों के लोग भारतीय धरती पर एकाकार हों उनके मध्य सहिष्णुता तथा समन्वय स्थापित हो। 

4. इस आन्दोलन की अन्य विशेषता यह थी कि समस्त परिवर्तनों तथा सुधारों के बावजूद भारतीय संस्कृति की आत्मा अपरिवर्तित रही। पाश्चात्य संस्कृति ने भारत को प्रभावित मात्र किया, पराजित नहीं।

5. आन्दोलन के उपकरण, स्रोत तथा प्रेरणा विशुद्ध भारतीय थे। इसका आधार वेदों को प्रमुख शिक्षाएं, उपनिषद्, भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र आदि थे। राजा राममोहन राय ने उपनिषदों से, दयानन्द सरस्वती ने वेदों से, रामकृष्ण परमहंस ने भारतीय धार्मिक मतों से, तिलक, अरविन्द तथा महात्मा गांधी ने भगवद् गीता से प्रेरणा ली। 6. धार्मिक सुधार तथा सामाजिक आन्दोलन की अन्य विशेषता उनके राजनैतिक महत्त्व से सम्बन्धित थी। इन आन्दोलनों ने आत्मविश्वास की भावना को जागृत करके विकासमान राष्ट्रीयता को प्रबल बनाया। कालान्तर में इसी राष्ट्रीयता ने भारत को स्वाधीनता दिलवाई। इन सामाजिक सुधार आंदोलन का विवरण इस प्रकार है

ब्रह्म समाज के सिद्धान्त ब्रह्म समाज के निम्नलिखित सिद्धान्त माने जाते हैं-

(1) परमात्मा एक है सम्पूर्ण सद्गुणों का केन्द्र एवं गण्डार है। (2) वह सृष्टि का रचयिता एवं संरक्षक है। (3) वह न तो कभी जन्म लेता है और न कभी काया धारण करता है। (4) वह केवल प्रार्थना सुनता है और उसे स्वीकार करता है। (5) जीवात्मा अमर है वह केवल अपने कर्मों के लिये परमात्मा के प्रति उत्तरदायी है। (6) परमात्मा की पूजा शुद्ध हृदय से होनी चाहिये। (7) मनुष्य को पाप का परित्याग कर देना चाहिये और सभी धर्मों से सत्य को ग्रहण कर लेना चाहिये। (8) मनुष्य को प्रज्ञा, परोपकार और पवित्रा द्वारा ईश्वर की शक्ति में लीन हो जाना चाहिये क्योंकि यही सच्चा मोक्ष है।

योगदान-राजा राममोहन राय हिन्दू धर्म में प्रचलित छुआछूत, जातिवाद, सती प्रथा आदि को दूर करना चाहते थे और उन हिन्दुओं को, जिनकी धर्म में रुचि न घी धर्म की तरफ ले जाना चाहते थे। हम यह कह सकते है कि राजा राममोहन राय उन महान् व्यक्तियों में हैं जो अपने समाज, संस्कृति एवं देश के उत्थान के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते थे। वे महान् सुधारक थे। अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार भारत में उन्हीं के योगदान से हुआ। स्त्रियों की दशा में सुधार, सामाजिक बीमारियों को दूर करने के लिए हम भारतवासी उन्हें कभी नहीं भुला सकते हैं और भारतीय इतिहास में उनका नाम अमिट अक्षरों में लिखा जायेगा।

थियोसोफिकल सोसाइटी- इस सोसाइटी की स्थापना दिसम्बर, 1885 में श्रीमती ब्लाटावस्की और कर्नल अल्काट ने की। 1897 में स्वामी विवेकानन्द के निमन्त्रण पर दोनों सुधारक भारत आये। इसके बाद इस सोसायटी का सहयोग श्रीमती ऐनी बेसेन्ट को प्राप्त हुआ। वै भारतीय संस्कृति में विशेष महत्त्व रखती थीं। इसके सिद्धान्त आर्य समाज के सिद्धान्तों से मिलते हैं। राधा स्वामी मठ इस संस्था की स्थापना आगरा के स्वामी लाल शिवदयाल सिंह ने की। उन्होंने घोषणा कि परमात्मा ने उन्हें सतगुरु बनाकर भेजा है सन् 1870 में लाल साहब की मृत्यु हो गयी। इसके बाद श्री सालिक राम और श्री ब्रह्म शंकर क्रमशः उनकी गद्दी पर बैठे। चौथे गुरु आनन्द स्वरूपजी हुए। उन्होंने धार्मिक शिक्षा के साथ औद्योगिक उन्नति, आगरे के दयालयाग में डिग्री कालेज,गोशाला और कई कारखाने खोलें।

रामकृष्ण मिशन या वेदान्त समाज रामकृष्ण मिशन की स्थापना रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने की। रामकृष्ण परमहंस का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में 1834 में हुआ था वे काली के ठपासक थे।

रामकृष्ण परमहंस के बाद उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु के सन्देश समस्त संसार में फैलाने का बीड़ा उठाया। 1893 ई० के शिकागो के सर्वधर्म सम्मेलन में उन्होंने धर्म सिद्धान्तों के महत्त्व को समझाया। विवेकानंद ने अपने गुरु के नाम पर रामकृष्ण मिशन को स्थापना की।

सिद्धान्त-(1) सभी धर्म समान और सत्य है (2) परमात्मा अव्यक्त, अक्षेप और अजन्मा है। (3) हिन्दू धर्म के समस्त अंग सच्चे और रक्षणीय है तथा हिन्दू सभ्यता अति प्राचीन सुन्दर एवं आध्यात्मिकता से परिपूर्ण है। (4) मनुष्य को अपना मन निर्मल रखना चाहिये। मनुष्य मात्र की सेवा के लिये स्वार्थ और सम्प्रदाय को छोड़ देना चाहिये। (5)

पाश्चात्य सभ्यता भौतिकवादी और छल से युक्त है। अतः प्रत्येक हिन्दू को अपने धर्म, जाति को पाश्चात्य सभ्यता से बचाने का प्रयास करना चाहिये। योगदान-धर्म, राजनीति और समाज सुधार आदि तीनों क्षेत्रों में इस मिशन ने सराहनीय कार्य किये। हिन्दू धर्म पूरे विश्व के निवासियों के लिये उपयोगी है सामाजिक क्षेत्र में इस मिशन ने छुआछूत मिटाने तथा स्त्रियों की दशा सुधारने का प्रयास किया। शिक्षा प्रचार हेतु विद्यालयों और दीन-दुखियों की सेवा के लिए आश्रमों और चिकित्सालयों की स्थापना की। स्वामी विवेकानन्द ने भारतीयों में राजनीतिक चेतना उत्पन्न की। आज भी अमेरिका के नगरों में न्यूयार्क, बोस्टन, वाशिंगटन, हिंडसवर्ग और सेनफ्रान्सिसकों में वेदान्त सभाएँ विद्यमान है। सन् 1861 तक समूचे भारत में भ्रमण के पश्चात् सन् 1875 में मुम्बई में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज के सिद्धान्त स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने "वेदों की ओर लौटो" की घोषणा कर उन्हें सत्य ज्ञान का आदि स्रोत स्वीकार किया। वैदिक मंत्रों का पाठ एवं यज्ञ तथा हवन कर्मकाण्ड के प्रमुख आधार स्वीकार किये गये। मूर्ति पूजा वैदिक घोषित की गयी इसलिये इसका खण्डन हो। तीर्थयात्रा, अवतारवाद में विश्वास वैदिक है अतः इनका करना श्रेयस्कर नहीं। कर्म के आधार पर जीव का पुनर्जन्म होता है ईश्वर एक एवं निराकार है। स्त्री शिक्षा को उपयोगी माना जाय। बाल विवाह एवं बहुविवाह उचित नहीं अत: इनका विरोध हो। विशेष परिस्थितियों में विधवा विवाह किये जायें। हिन्दी एवं संस्कृत भाषा का भारतीयों में प्रचार एवं प्रसार हो।

 मुस्लिम सुधार आन्दोलन

सैयद अहमद बरेलवी ने मुस्लिम समाज के सुधार के लिये एक ईश्वर की उपासना पर बल दिया और सूफी फकीरों की पूजा का कड़ा विरोध किया। इस प्रकार उन्होंने मौलिक इस्लाम के प्रचार पर बल देकर वहाबी आन्दोलन प्रारम्भ किया। उन्होंने पाश्चात्य शिक्षा का विरोध किया एवं भारतीय मुसलमानों को संगठित कर भारत में हिन्दुओं के विरुद्ध इस्लामी राज्य की स्थापना का सुझाव दिया। किन्तु बहावी आन्दोलन सफल न हो सका। महत्त्व- 19वीं शताब्दी के धार्मिक आंदोलनों के फलस्वरूप भारतीय धर्म, संस्कृति तथा दर्शन ने आधुनिक मूर्त रूप ग्रहण किया। आंदोलन का विशेष महत्त्व उसके लक्ष्य में परिलक्षित होता है। इस लक्ष्य के अनुसार आधुनिक ज्ञान-विज्ञान तथा विचारों के आधार पर भारतीय धर्म तथा समाज का पुनर्गठन किया गया परम्परागत रूप से स्वीकृत किन्तु पुरानी पड़ चुकी जीवन प्रणालियों से विलग होकर भारतीय संस्कृति ने समर्थता तथा गति प्राप्त की। सामाजिक तथा धार्मिक पुनर्जागरण के फलस्वरूप भारत में राजनैतिक जागरण हुआ और एक दिन विदेशी सत्ता के पैर उखड़ गये भारतीय संस्कृति अपराजित, अजेय तथा ओजस्वी बनी रही।

पाश्चात्य शिक्षा के प्रचलन और पश्चिमी विचारों के सम्पर्क से अशिक्षित भारतीयों को अनेक देश के अतीत का ध्यान करने की प्रेरणा मिली। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि पश्चिम की सभ्यता नई शक्ति से सम्पन्न थी और भारत अपनी उन्नति के लिए पश्चिम से बहुत कुछ सीख सकता है। इस दृष्टिकोण ने भारतीय जीवन को पूरी तरह से प्रभावित किया। अपनी अनेकानेक उपलब्धियों द्वारा धार्मिक आंदोलन ने भारतीय संस्कृति को अद्भुत स्फूर्ति प्रदान की। धार्मिक पुनर्जागरण के फलस्वरूप राष्ट्रीय चेतना, देशप्रेम की भावना तथा विदेशी आधिपत्य से मुक्ति पाने के संकल्प का दृढ़ीकरण हुआ।

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