सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मुस्लिम समाज सुधार आन्दोलन में सर सैयद अहमद खाँ के योगदान

मुस्लिम समाज सुधार आन्दोलन में सर सैयद अहमद खाँ के योगदान


मुस्लिम सुधार आन्दोलन

यदि पश्चिम के प्रति प्रारम्भिक हिन्दू प्रतिक्रिया जिज्ञासा की थी तो मुसलमानों की प्रथम प्रतिक्रिया अपने आप को एक संकीर्ण ढकने में बन्द करने और पश्चिमी प्रभाव से बचाने की थी। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक कोई भी मुसलमान इस अकेलेपन को छोड़ने को उद्यत नहीं था।

वहाबी आन्दोलन-मुसलमानों की पाश्चात्य प्रभावों के विरुद्ध सर्वप्रथम प्रतिक्रिया जो हुई उसे वहाबी आन्दोलन अथवा वलीउल्लाह आन्दोलन के नाम से स्मरण किया जाता है। वास्तव में यह पुनर्जागरण वाला आन्दोलन था। शाह वलीउल्लाह (1702-62) अठारहवीं शताब्दी में भारतीय मुसलमानों के वह प्रथम नेता थे जिन्होंने भारतीय मुसलमानों में हुई गिरावट पर चिन्ता प्रकट की थी। उन्होंने मुसलमानों के रीति-रिवाजों तथा मान्यताओं में आई कुरीतियों की ओर ध्यान दिलाया। उनके योगदान के मुख्य दो अंग थे: 

(1) उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस्लाम धर्म के 4 प्रमुख न्याय शास्त्रों में सामंजस्य स्थापित होना चाहिए जिसके कारण भारतीय मुसलमान आपस में बंटे हुए ही (2) उन्होंने धर्म में वैयक्तिक अन्तश्चेतना पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि जहाँ कुरान और हदीस के शब्दों की कभी-कभी विरोधात्मक व्याख्या हो सकती हो तो व्यक्ति को अपनी विवेचना तथा अन्तश्चेतना के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।

अब्दुल अजीज तथा सैयद अहमद बरेलवी 1786-1831 ने वलीउल्लाह के विचारों को लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न किया। उन्होंने इसे राजनीतिक रंग भी दिया। इस विचार का आरम्भ तब हुआ जब एक मौलवी अब्दुल अजीज ने यह फतवा (धार्मिक आज्ञा) दिया कि भारत एक दार-उल-हर्ब (काफिरों का देश) है और इसे दार-उल-इस्लाम बनाने की आवश्यकता है। प्रारम्भ में यह अभियान पंजाब में सिक्ख सरकार के विरुद्ध था। परन्तु 1849 में अंग्रेजों द्वारा पंजाब के विलय के उपरान्त यह अभियान अंग्रेजों के विरुद्ध बदल दिया गया। यह आन्दोलन 1870 तक चलता रहा जब इसे वरिष्ठ सैनिक बल द्वारा समाप्त कर दिया गया। अलीगढ़ आन्दोलन-1857 के महान विद्रोह का एक सबसे बड़ा रिक्य (कारण) यह था कि सरकार की यह धारणा बन गई कि (1857-58) के षड्यन्त्र के लिए मुसलमान ही उत्तरदायी हैं और वे एक अत्यन्त षड्यंत्रकारी लोग हैं। 1860 तथा के आसपास हुई वहावी षड्यन्त्रों ने यह धारणा और दृढ़ कर दी। 

इसके उपरान्त डब्ल्यू डब्ल्यू हण्टर को 'इण्डियन मुसलमान नाम की पुस्तक में एक सुझाव दिया गया कि मुसलमानों से समझौता करना चाहिए और निश्चित रियासतों द्वारा अंग्रेजी सरकार की ओर मिलाना चाहिए। मुसलमानों का एक वर्ग जिसके नेता सैयद अहमद खां थे, सरकार के इस संरक्षण भरे रुख को स्वीकार करने को उद्यत थे। वह कम्पनी के प्रति पूर्ण राजभक्त रहे। उन्होंने मुसलमानों के दृष्टिकोण को आधुनिक बनाने का प्रयत्न किया। उन्होंने चाहा कि मुसलमान अंग्रेजी सरकार के तथ्य को स्वीकार करें और उसके अधीन सेवा करना आरम्भ कर दें। वह अपने प्रयत्न में बहुत सफल रहे। उन्होंने इस्लाम में सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयत्न भी किया। उन्होंने पीरी मुरीदी की प्रथा को समाप्त करने का प्रयत्न किया। पीर लोग अपने आप को सूफी मानते थे और अपने मुरीदों को कुछ रहस्यमय शब्द देकर गुरु बन जाते थे। उन्होंने दास प्रथा को भी इस्लाम के विरुद्ध बतलाया। उन्होंने अपने विचारों का प्रसार एक पत्रिका 'तहजीव-उल-अखलाक परन्तु उनका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कुरान पर टीका थी। उन्होंने कुरान के अध्ययन पर बल दिया और कहा कि ईश्वरीय ज्ञान की व्याख्या ईश्वरीय कार्य द्वारा, जो सबके सम्मुख है,(सभ्यता और नैतिकता) द्वारा किया।

 उन्होंने 1875 में अलीगढ़ में एक मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल स्कूल आरम्भ किया जहाँ पाश्चात्य विषय तथा विज्ञान और मुस्लिम धर्म दोनों ही पढ़ाए जाते थे। शीघ्र ही अलीगढ़ मुस्लिम सम्प्रदाय के धार्मिक तथा सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केन्द्र बन गया। यही पौधा आगे चलकर 120 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय के वृक्ष के रूप में सामने आया।

अहमदिया आन्दोलन-इस आन्दोलन के प्रवर्तक मिर्जा गुलाम अहमद थे। वे अपने आपकों हिन्दुओं का अवतार, मुसलमानों को पैगम्बर तथा ईसाइयों का ईसा मसीह मानते थे। अधिकांश

मुसलमान उन्हें पैगम्बर स्वीकार नहीं करते थे लेकिन फाहियानी उन्हें पैगम्बर स्वीकार करते थे। वे कहते थे सभी धर्मों में सुधार आवश्यक है। वे समस्त एमों को सुमार्ग पर ले जाने वाला तथा इस्लाम को सर्वश्रेष्ठ मानते थे। मिर्जा गुलाम अहमद ने पर्दा प्रथा, तलाक तथा बहु विवाह का समर्थन किया। देवबन्द शाखा-मुसलमान उलमा ने, जो प्राचीन मुस्लिम विद्या के अग्रणी थे, देवबन्द आन्दोलन चलाया। यह एक पुनर्जागरण वाला आन्दोलन था, जिसके दो मुख्य उद्देश्य थे: (1) मुसलमानों में कुरान तथा हदीस की शुद्ध शिक्षा का प्रसार करना और (2) विदेशी शासकों के विरुद्ध जिहाद' की भावना को जीवित रखना।

उल्मा ने मुहम्मद कासिम बनौती (1832-80) तथा रशीद अहमद गंगोही 18281905 के नेतृत्व में देवबन्द, उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर में एक विद्यालय खोला (1866) उद्देश्य यह था कि मुस्लिम सम्प्रदाय के लिए धार्मिक नेता प्रशिक्षित किए जाय। पाठशाला के पाठ्यक्रम में अंग्रेजी शिक्षा तथा पाश्चात्य संस्कृति पूर्णरूप से वर्जित थी।

राजनीति में देवबन्द शाखा ने 1885 ई० को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्वागत किया 1888 में देवबन्द के उलमा ने सैयद अहमद खां की वनाई संयुक्त भारतीय राजभक्त सभा तथा मुस्लिम एंग्लो ओरिएन्टल सभा के विरुद्ध फतवा (धार्मिक आदेश) दे दिया। कुछ आलोचकों की यह धारणा है कि देवबन्द टेल्मा का समर्थन किन्हीं निश्चित राजनीतिक विश्वासों के कारण अथवा अंग्रेजों के कारण नहीं अपितु सर सैयद अहमद खां के क्रियाकलापों के विरोध में किया गया था। महमूद-उल-हसन 18511920 जो देवबन्द शाखा के नये नेता थे, ने इस शाखा के धार्मिक विचारों को राजनीतिक तथा बौद्धिक रंग देने का प्रयत्न किया।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त

 राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त   राज्य की उत्पत्ति संबंधित सामाजिक समझौते के सिद्धांत का प्रतिपादन सत्रहवीं एवं अठराहवीं शताब्दी में हुआ। इस सिद्धांत पर विश्वास करने वाले विचारकों का यह मानना है कि राज्य एक मनुष्यकृत संस्था है और समझौते का परिणाम है। इस विद्वानों का कहना है कि राज्य की उत्पत्ति के पूर्व की अवस्था को अराजक अवस्था या प्राकृतिक अवस्था कहा जायेगा। इस अवस्था में मनुष्य को कुछ ऐसी दिक्कतें हुई। जिनके कारण उसे राज्य का निर्माण करना पड़ा। विभिन्न कठिनाइयों के कारण ही लोगों ने आपस में समझौता कर राज्य की स्थापना की और अपने प्राकृतिक-अधिकारों का तयाग कर राज्य द्वारा रक्षित नागरिक अधिकारों को प्राप्त किया। इसी को राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता -सिद्धान्त कहते हैं। राज्य को समाज के उन व्यक्तियों द्वारा किये गये समझौते का परिणाम मानता है, जो उन संगठन निर्माण के पूर्व सब प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे।" सामाजिक समझौते सिद्धांत की व्याख्या-सामाजिक समझौते के सिद्धांत का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले भारतवास

मानव एवं पशु समाज में अन्तर

मानव एवं पशु समाज में अन्तर  सृष्टि में मानव ही एक ऐसा जैविकीय प्राणी है, जिसमें अनेकों ऐसी विशेषताएँ हैं जिसकी सहायता से उसे एक विकसित संस्कृति का निर्माण किया। इसके विपरीत पशु एकजैविकीय प्राणी हेर्ने के बावजूद मानवों से सर्वचा भिन्न है। यह भिन्नता चाहे शारीरिक हो अथवा वैद्धिक। अब यहाँ मानव एवं पशु की शारीरिक भिन्नताओं का वर्णन करना समीचीन लगता है। मानव तथा पशु समाज में जैविकीय अन्तर- (1) मस्तिष्क का विकास-मानव और पशु के मस्तिष्क में बड़ा अन्तर पाया जाता है। मनुष्य का मस्तिष्क जहाँ पूर्ण विकसित होता है, वहीं पशु का मस्तिष्क बहुत छोय होता है। मनुष्य के मस्तिष्क में लगभग 19 अरव नाड़ियों के सिरे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं, जिनकी सहायता से मनुष्य विभिन्न कार्यों एवं व्यवहारों को सम्पादित करता है। इसी विकसित मस्तिष्क की सहायता से मनुष्य ने एक विकसित संस्कृति को जन्म दिया। (2) सीधे खड़े होने की क्षमता-मनुष्य अपने पैरों के बल सीधे खड़ा हो सकता है,जबकि पशु खड़ी मुद्रा में नहीं आ सकता। इस प्रकार मनुष्य अपने स्वतंत्र हाथों से कोई भी कार्य कर सकता है, जबकि पशु को अपने

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण

लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त का आलोचनात्मक परीक्षण  जान लॉक का प्राकृतिक अधिकार सिद्धान्त सत्रहवीं व अठारहवीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धांत अत्यन्त प्रचलित था। सामाजिक संविदा सिद्धान्त के प्रवर्तकों ने यह विचार प्रस्तुत किया कुछ अधिकार राज्य के उद्भव अर्थात् उत्पत्ति के पहले विद्यमान थे अर्थात् ये मानव के पास प्राकृतिक अवस्था में भी मौजूद थे। इसी अधिकार को राजनीतिशास्त्र में प्राकृतिक अधिकार के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इन प्राकृतिक अधिकारों का सृजनकर्ता राज्य नहीं था वरन् राज्य का जन्म इन अधिकारों के रक्षा के लिए हुआ है। राज्य का यह दायित्त्व है इन अधिकारों को मान्यता प्रदान कर विधि अथवा कानून के रूप में परिवर्तित कर दे। लॉक ने अपने सामाजिक सम्विदा सिद्धान्त के अन्तर्गत जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार की श्रेणी में रखा है। ये अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित होते हैं, ये सर्वव्यापक एवं असीम होते हैं। प्राकृतिक अधिकारों के प्रवल पोषक लॉक के अनुसार यदि राज्य की प्रकृति प्रदत्त अर्थात् प्रकृति के अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं होता तो ऐसे