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ब्रिटिश प्रधानमंत्री के कार्य, अधिकार, भूमिका

ब्रिटिश प्रधानमंत्री के कार्य, अधिकार, भूमिका

ब्रिटिश शासन प्रणाली प्रधानमंत्री का पद केन्द्रबिन्दु है। शासन की समस्त रत्तित्यां उसी के इर्द-गिर्द घूमती है। वास्तव में प्रधानमंत्री ही सर्वोच्च कार्यकारिणी का अध्यक्ष होता है और इस रूप में रेम्जेम्योर के अनुसार यह अमेरिका के शासनाच्यक्ष राष्ट्राध्यक्ष से भी अधिक शक्तिशाली होता है। डॉक्टर के शब्दों में आधुनिक प्रधानमंत्री संसार के अधिकतम शक्तिशाली निर्वाचित पदाधिकारियों में से एक है। युद्ध की अवधि में तो टसकी शक्तियों का इस सीमा तक प्रसार हो जाता है कि वह वर्तमान अधिनायकों की शक्तियों की भी चुनौती देता है यद्यपि उस पर निरन्तर अपने सहयोगियों, संसद तथा जनता का अंकुश रहता है।

मंत्रिमण्डल ब्रिटेन की बास्ता कार्यपालिका है और प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल का प्रधान। इस प्रकार प्रधानमंत्री शासन प्रणाली का केन्द्र है उसकी स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है शासन में प्रधानमंत्री की स्थिति इतनी अधिक महत्वपूर्ण और केन्द्रीय है कि वर्तमान समय में कुछ पक्षों

द्वारा ब्रिटिश शासन प्रणाली को मंत्रिमण्डलीय शासन प्रणाली या सरकार के स्थान पर प्रधानमंत्री शासन प्रणाली या सरकार कहा जाने लगा है। प्रो० लास्की के मतानुसार-"इंग्लैण्ड का प्रधानमंत्री समान पद वालों में प्रथम से अधिक परन्तु तानाशाह से कुछ कम है।" एक अन्य स्थान पर लास्की ने लिखा है, "प्रधानमंत्री सम्पूर्ण तंत्र की धुरी है।" हारकोर्ट के मतानुसार, "यह नक्षत्रों में चन्द्रमा के सद्त है।" जैनिंग्स के अनुसार, "प्रधानमंत्री को सम्पूर्ण संविधान की आधारशिला कहना अधिक श्रेयस्कर एवं उपयुक्त होगा।" रेमजेम्योर के शब्दों में- जबकि राज्य रूपी जहाज को चलाने वाला यंत्र मंत्रिमण्डल है, प्रधानमंत्री उस यंत्र का चालक है।" ब्रिटेन में सम्प्रभु जहाँ राज्य का औपचारिक प्रधान है वहीं प्रधानमंत्री शासन का वास्तविक प्रधान है। प्रधानमंत्री के कार्य अधिकार एवं भूमिका को अग्रलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत परिभाषित किया जा सकता है

प्रधानमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ- प्रधानमंत्री सम्राट द्वारा अपनी नियुक्ति के पश्चात अपने मंत्रिमण्डल का गठन करता है। यह (सम्राट) के परामर्श से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है जो मात्र औपचारिकता है। प्रधानमंत्री अपने विधान मण्डल दल के जिन व्यक्तियों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करना चाहता है, वहउनकी नियुक्ति करने की औपचारिकता पूरी करता है उनकी नियुक्ति करने के मामले में प्रधानमंत्री भी निरंकुश और स्वेच्छाचारी नहीं हो  पाता है। उसे भी अनेक बातों पर ध्यान रखना पड़ता है। सामान्यतः मंत्रिमंडल के सदस्यों की संख्या क्या हो तथा पार्लियामेंट के किन सदस्यों को उसमें शामिल किया जाय, इसके बारे में निर्णय करने का एकमात्र अधिकार प्रधानमंत्री का ही है, जबकि ऐसा करते समय वह दल के नेताओं से भी विचार-विमर्श करता है। अपनी इच्छानुसार वह किसी ऐसे व्यक्ति को अपने मंत्रिमण्डल में शामिल कर सकता है जो पार्लियामेंट का सदस्य न हो, मंत्री बनने के बाद उसे दोनों में से किसी एक सदन का सदस्य बनना पड़ता है।

मंत्रियों की नियुक्ति के साथ-साथ वह उनके विभागों का निर्धारण एवं वितरण तथा भविष्य में उनमें परिवर्तन भी करता है। इस सम्बन्ध में इसका निर्णय अंतिम होता है। जो मंत्री अपने विभाग से असंतुष्ट होता है, वह इस्तीफा दे सकता है परन्तु ऐसा असाधारण रूप में ही होता है। ऐसा करने वाले मंत्री का राजनीतिक भविष्य अन्य कार्य हो सकता है। इसके साथ साथ वह उनके कार्यों का निरीक्षण तथा उनका निर्देशन भी करता है मंत्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता करते हुए उसकी कार्यवाहियों का संचालन तथा उसमें किये जाने वाले निर्णयों को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है। अपने सहयोगियों के मतभेदों में समन्वय स्थापित कर वह सर्वमान्य निर्णय का मार्ग प्रशस्त करता है। दो मंत्रियों के मतभेदों को वह अपने परामर्श और अपनी मध्यस्थता से दूर करता है। बैठक में विचार प्रस्तुत विषयों को भी स्वीकार अथवा प्यार करने का अधिकार ठसे ही है। यही कारण है कि कोई मंत्री कोई विषय प्रस्तुत करने के पूर्व व्यावहारिक रूप में उनकी राय ले लेता है। प्रधानमंत्री के अस्तित्व में ही पूरे मंत्रिमण्डल का अस्तित्व होता है सभी मंत्री इसी के साथ तैरते और डूबते हैं। उसके इस्तीफा देने के बाद पूरे मंत्रिमण्डल का अंत हो जाता है अर्थात् वह भंग हो जाता है। व्यक्तिगत रूप में भी जो मंत्री उससे असहमत होता है, उसे इस्तीफा दे देना पड़ता है। अपनी इसी स्थिति के कारण वह शासन की आधारशिला तथा उसका केन्द्र बिन्दु है परन्तु अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह उसका मालिक नहीं है। लाई मार्ले ने उसे समकक्षों में प्रथम कहा है परन्तु रैम्जेम्योर के अनुसार अपने वास्तविक अधिकारों के कारण वह अमेरिकी राष्ट्रपति से भी अधिक प्रभावशाली है। डॉ० जेम्स के अनुसार वह समकक्षों में केवल प्रथम तथा नक्षत्रों के बीच केवल चन्द्रमा ही नहीं अपितु सूर्य के समान है जिसके चारों तरफ ग्रह पूमते हैं 

(1) प्रशासन पर नियंत्रण एवं संचालन-संवैधानिक दृष्टि से सम्राट कार्य पालिकीय शक्तियों का स्रोत है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से प्रधानमंत्री सहित मंत्रिमण्डल उनका उसी (सम्राट) के नाम पर वास्तविक उपयोग करता है। इस प्रकार व्यावहारिक दृष्टि से प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका प्रधान अर्थात् शासनाध्यक्ष है। अपने विभागीय उत्तरदायित्व के बहन के साथ-साथ वह सम्पूर्ण मंत्रिमण्डल के कार्यों का निरीक्षण एवं निर्देशन भी करता है। इसी प्रकार शासनाध्यक्ष होने के कारण वह शासन तथा साथ ही साथ प्रशासन को नियंत्रित करने का कार्य करता है। 

(2) पार्लियामेंट और दल का नेतृत्त्व- 'हिट्स ऑफ कामन्स में बहुमत प्राप्त दल का नेता ही प्रधानमंत्री होता है। सदन में दल का बहुमत समाप्त होते ही उसे इस्तीफा दे देना पड़ता है। इसी कारण वह पूरे सदन का नेता होता है। वह केवल हाउस ऑफ कामस' का ही नहीं अपितु पूरी पार्लियामेंट का नेतृत्व करता है। उसके परामर्श से ही सम्राट् सदन की बैठक आहत करता है और उसका सत्रावसान करता तथा उसकी सिफारिश पर उसे हाउस ऑफ कामन्स को भंग करना पड़ता है। नेता के रूप में वह पार्लियामेंट को एकता का प्रतीक होता है तथा प्रतिनिधित्व करता है वह उसकी कारवाई के संचालन का नेतृत्त्व तथा विधिनिर्माण के मामले में उसका पप प्रदर्शन करता है। सरकारी विधेयक ठसके निरीक्षण और निर्देशन में तैयार किये जाते हैं। बजट तैयार करने में उसके नेतृत्त्व की प्रमुख भूमिका होती है। वह अपने दल के उसका सचेतक के माध्यम से हाउस ऑफ कामन्स में व्यवस्था बनाये रखने में अध्यक्ष की सहायता करता है। उसके कार्यक्रम तथा सहकारी एवं निजी कार्यों की रूपरेखा उसके नेतृत्व में तैयार की जाती है। वह विपक्ष के परामर्श से उसकी कार्यवाही के लिए समय का निर्धारण करता है।

 (3) प्रशासनिक नीति का निर्धारण और उसकी घोषणा- प्रधानमंत्री के नियंत्रण भी निर्देशन में ही प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण होता है। इस कार्य में वह प्रमुख भूमिका निभाता है। इसकी घोषणा के सम्बन्ध में वह अन्तिम और अधिकृत प्रवक्ता होता है। शासन-सम्बन्धी समस्याओं के बारे में उसी से प्रश्न पूछे जाते हैं और अधिकांशतः वही उत्तर देता है। उसके उत्तर अंतिम माने जाते हैं। किसी मंत्री के भाषण से पैदा हुई गलतफहमी दूर करने करता है। वह किसी मंत्री के भाषण में संशोधन भी करता है। कार्य व

(4) सम्राट और मंत्रिमण्डल के बीच कड़ी का कार्य- मंत्रिमण्डल का प्रधान होने के नातं सम्राट और उसके बीच की कड़ी का कार्य करता है। वह मन्त्रियों के कार्यों से सम्राट को तथा उसको इच्छा से अपने मंत्रिमण्डलीय सहयोगियों को अवगत कराता रहता मंत्रिमण्डलीय सचिवालय द्वारा लिपिबद्ध रिपोर्ट की प्रति भेजकर वह सम्राट को शासन-सम्बन्धी सूचनाएँ देता है। 

(5) सम्राट को परामर्श- संवैधानिक दृष्टि से कार्यपालिका की कार्यपालिका तथा अन्य शक्तिमान सम्राट में निहित हैं तथा प्रधानमंत्री के परामर्श से वह उसका उपयोग करता है। केवल प्रशासनिक ही नहीं अपितु व्यक्तिगत मामले में भी उसे परामर्श देने का अधिकार है तथा सम्राट् उसे मानने के लिए बाध्य है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री इसे अपना अधिकार और कर्तव्य दोनों ही मानता है। 

(6) विदेश नीति और विदेश सम्बन्ध का नियंत्रण और संचालन- यद्यपि विदेश विभाग उसके हाथ में न होकर विदेश मंत्री के हाथ में होता है तथापि विदेश नीति के निर्धारण में उसको प्रमुख भूमिका होती है। वह उसका प्रमुख निर्धारक तथा उसपर और विदेश सम्बन्ध के संचालन पर उसका पूरा नियंत्रण होता है। उसी के निर्देशन और नियंत्रण में विदेश नीति निर्धारित होती है तथा विदेश सम्बन्ध का संचालन होता है। वह विदेश मंत्री और विदेश विभाग के कार्यों पर कड़ी निगरानी रखता है तथा वही विदेश नीति का अंतिम और अधिकृत प्रवक्ता होता है। शासनाध्यक्ष के रूप में महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और उत्सवों में भाग लेकर वह अंतरराष्ट्रीय जगत् में अपने राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है।


(7) उच्च पदों पर नियुक्ति तथा उपाधि देने का अधिकार संविधानतः सभी उच्च पदस्थ अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार सम्राट् को है तथा यह प्रधानमंत्री के परामर्श से यह कार्य करता है परन्तु व्यवहार: इस वास्तविक उपयोग प्रधानमंत्री ही करता है। नियुक्ति और पदच्युति, दोनों ही कार्य सम्राट के नाम पर होते हैं परन्तु वास्तविक रूप से इन्हें प्रधानमंत्री हो सम्पन्न करता है। अपने इस अधिकार के माध्यम से भी वह प्रशासन पर पर नियंत्रण रखता है। उपाधि प्रदान करने का अधिकार भी इसे प्राप्त है, जबकि संवैधानिक दृष्टि से यह सम्राट में निहित है। वह प्रधानमंत्री के परामर्श से उपाधि प्रदान करता तथा लोगों को पीयर बनाता है। 

(8) आपातकालीन अधिकार ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था में कार्यपालिका के आपातकालीन अधिकारों के बारे में कोई लिखित प्रावधान नहीं है परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से युद्ध, संवैधानिक तथा आर्थिक संकट के कारण उत्पन्न आपातकालीन स्थिति में कार्यपालिका को शक्तियां काफी बढ़ी है और इनसे विस्तृत संवैधानिक अधिनायकत्व की स्थापना हो जाती हैं। वास्तविक शासनाध्यक्ष होने के कारण प्रधानमंत्री की आपातकालीन शक्तियों का वास्तविक उपयोगकर्ता होता है। शासन और प्रशासन पर उसका नियत्रंण और कड़ा हो जाता है तथा वे सामान्य स्थिति की तुलना में उसके और निर्देशन में कार्य करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर वह मंत्रिमंडल से विचार-विमर्श किये बिना भी निर्णय कर लेता है तथा बाद में ठसकी स्वीकृति प्राप्त करता है। युद्ध-संचालन के सम्बन्ध में किये जाने वाले निर्णयों में उसकी प्रमुख भूमिका रहती है। आपातकाल में यह शक्ति एवं उत्तरदायित्व का केन्द्रविन्दु हो जाता है। उसकी स्थिति किसी अधिनायक से कम नहीं होती है, जबकि वह निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी नहीं हो पाता है।

स्थिति भूमिका एवं महत्त्व- ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री का पद बहुत ही महत्त्वपूर्ण, प्रभावशाली एवं शक्तिशाली है। विद्वानों ने उसे शासन और संविधान की आधारशिला माना है। उसे राज्य रूपी जहाज के यन्त्र का चालक तथा इंग्लैण्ड का राजनीतिक शासक कहा गया है संवैधानिक दृष्टि से प्राशसनिक शक्तियों का स्रोत न होते हुए भी वही वस्तुतः वास्तविक शासनाध्यक्ष तथा शासन का केन्द्र बिन्दु है। फाइनर ने उसे सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति का मूर्त रूप कहा है। आपातकाल में तो उसकी स्थिति और अधिक महत्त्वपूर्ण, प्रभावशाली एवं शक्तिशाली हो जाती 

(1) अधिकारों की दृष्टि से (2) मंत्रिमण्डल से सम्बन्ध की दृष्टि से (3) अन्य लोकतांत्रिक देशों के शासनाध्यक्ष से तुलनात्मक दृष्टि से।

(1)अधिकारों की दृष्टि से- ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री द्वारा प्रयुक्त अधिकारों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि वह वास्तविक शासनाध्यक्ष, मंत्रिमण्डल का निर्माणकर्ता, पालनकर्ता एवं संहारकर्ता,शासन एवं प्रशासन का नियंत्रणकर्ता, पार्लियामेंट और दल का नेता, प्रशासनिक नीति का निर्धारण एवं उसका अंतिम और अधिकृत प्रवक्ता, सम्राट और मंत्रिमण्डल के बीच की कड़ी विदेश नीति और विदेश सम्बन्ध का केन्द्र विन्दु तथा 

(2) मंत्रिमण्डल से सम्बन्ध की दृष्टि से- अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह वह अपने मंत्रिमण्डल का स्वामी तो नहीं परन्तु उसका निर्माता पालनकर्ता तथा संहारक्ता अवश्य है। शासन और प्रशासन पर नियंत्रण तथा शासन का केन्द्र बिन्दु होने के कारण अपने सहयोगियों की तुलना में उसकी स्थिति अधिक महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली है।आपातकाल में संविधान अधिनायक है।

(3) अन्य लोकतांत्रिक देशों के शासनाध्यक्षों से तुलना की दृष्टि से-संसदीय प्रणाली की शासन व्यवस्था होने के कारण ब्रिटेन में प्रधानमंत्री ही वास्तविक शासनाध्यक्ष तथा आसन का केन्द्र बिन्दु है। व्यवहारिक दृष्टि में ब्रिटेन में इस पद की गरिमा और उसका महत्त्व प्रधानमंत्रियों के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है फ्रांस का प्रधानमंत्री भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री से तुलना नहीं कर सकता है। क्योंकि अपने राष्ट्रपति के समक्ष उसकी अधीनस्य स्थिति है। जहाँ तक रूस के प्रधानमंत्री का प्रश्न है, संवैधानिक दृष्टि से वह कम्युनिस्टपार्टी के नियंत्रण में है। पार्टी का एक शीर्षस्थ नेता होने के कारण व्यावहारिक दृष्टि से रूसी संवैधानिक व्यवस्था में उसको एक प्रभावशाली स्थिति है। यदि हम स्टालिन की स्थिति से तुलना करे तो हमें कहना पड़ेगा कि रूसी प्रधानमंत्री अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली है उसकी स्थिति तो अधिनायक की सी थी। उसके बाद के प्रधानमंत्री भी शक्तिशाली और प्रभावशाली रहे अथवा है परन्तु उसकी स्थिति वह नहीं रही, अथवा है जो उसकी थी। सामान्यतः ब्रिटिश प्रधानमंत्री की तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति से की जाती है। कुछ दृष्टियों से अधिक और कुछ से ठसे कम कहा जाता है।

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