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भारतीय शिक्षा पर पश्चिमी प्रभाव

भारतीय शिक्षा पर पश्चिमी प्रभाव 

अठारहवीं शताब्दी में भारत में हिन्दू-मुस्लिम शिक्षा केन्द्र प्रायः लुप्त हो गये थे। इसका कारण राजनीतिक उथल-पुथल थी। 784 ई० में हेस्टिंगस ने बोर्ड आफ डारेक्टर्स का ध्यान इस ओर खींचा। प्रारम्भ में तो अंग्रेजों इंग्लैण्ड की परम्पर के अनुसार शिक्षा का भारत निजी हाथों में रहने दिया। कुछ समय पश्चात् 1781 ई० में हेस्टिंगस ने कलकत्ता में एक मदरसा स्थापित किया जिसमें फारसी और अरवी की शिक्षा दी जाती थी। 1791 ई० में बनारस में ब्रिटिश रेजीडेन्ट डंकन ने बनारस में ही संस्कृत कॉलेज खोला जिसका उद्देश्य हिन्दुओं के धर्म साहित्य और कानून का अध्ययन और प्रसार करना था। 

लेकिन इसमें असफलता मिली और कॉलेज में विद्यार्थियों की अपेक्षा शिक्षक अधिक थे। ईसाई धर्म प्रचारकों ने इसकी निन्दा की और इस बात पर जोर दिया कि पाश्चात्य साहित्य और ईसाई मत अंग्रेजी माध्यम द्वारा स्थापित किया जाना चाहिए। 1813 ई० के चार्टर एक्ट द्वारा भारत में शिक्षा प्रसार पर एक लाख रुपये व्यय करने का निर्णय किया गया। ब्रिटिश कम्पनी को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता थी जो स्थानीय एवं अंग्रेजी भाषा दोनों जानते हों जिससे प्रशासनिक कार्यों में आसानी हो। 

भारतीय समाज सुधारक राजा राममोहन राय के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने कलकत्ता में हिन्दू कालेज बनाने के लिए अनुदान दिया। इस कॉलेज में पाश्चात्य विज्ञान एवं मानविकी आदि पढ़ाई जाती थी। लार्ड विलियम बैंटिक ने मैकाले का दृष्टिकोण अपनाया जो विप्रेवशन सिद्धान्त में विश्वास रखता था। 1854 ई० में शिक्षा पर चार्ल्स वुड का डिस्पैच आया जिसे भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा कहा जाता है। इस डिस्पैच में पाश्चात्य विद्या के प्रसार पर बल दिया गया तथा कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास में विश्वविद्यालय स्थापित किया गया। इस डिस्पैच का 50 वर्ष तक बोलवाला रहा एवं इसने बहुत ही तेजी से भारतीय शिक्षा का पाश्चात्यीकरण कर दिया। हण्टर शिक्षा आयोग। (1882-83) के सुझावों के परिणामस्वरूप आनेवाले 20 वर्षों में माध्यमिक और कॉलेज शिक्षा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ।

कर्जन के शासन काल में भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम पारित हुआ। जिसके इसी अधिनियम के नियमों के कारण विधान परिषद् के बाह्य और अन्दर राष्ट्रवादी तत्त्वों ने कड़ी आलोचना की। 21 फरवरी 1913 ई० को शिक्षा नीति पर सरकारी प्रस्ताव आया जिसने अनिवार्य शिक्षा के सिद्धान्त को स्वीकार तो नहीं किया लेकिन निरक्षरता समाप्त करने की नीति को अवश्य स्वीकार किया। 19171919 ई० में कलकत्ता विश्वविद्यालय के सम्भावनाओं के अध्ययन तथा रिपोर्ट के लिए सैडलर आयोग गठित किया गया। सैडलर आयोग ने विश्वविद्यालयी शिक्षा में सुधार के लिए माध्यमिक शिक्षा सुधार पर जोर दिया। इस आयोग द्वारा कर्जन के अधिनियम की आलोचना की गयी। हाटा समिति 1929 ई० ने भी अपनी योजनाएँ प्रस्तुत की। 

इसने प्राथमिक शिक्षा के राष्ट्रीय महत्त्व पर बल दिया एवं सुझाव दिया कि उन्हीं लोगों को उच्च शिक्षा दी जाय जो इसके योग्य हैं। इन सभी एवं अन्य पाश्चात्य योजनाओं के परिणामस्वरूप भारतीयों का ज्ञानवर्धन हुआ परिणामस्वरूप भारतीयों में दादाभाई नौरोजी, गोखले, रानाडे, तिलक जैसे प्रबुद्ध लोग उत्पन्न हुए तथा भारतीयों का शिक्षा सम्बन्धी अंधविश्वास को समाप्त हो गया। पाश्चात्य प्रभाव के परिणामस्वरूप भारतीय शिक्षा द्वारा समाज में जो जातिप्रथा, अस्पृश्यता आदि बुराई फैली थी दूर हुई। बुरे परिणाम भी सामने आये नवयुवकों ने अन्धानुकरण भी किया जिसका भारतीय शिक्षा एवं जनमानस तथा धर्म पर बुरा प्रभाव पड़ा। वैसे भारतीय शिक्षा का पश्चिमीकरण करके पाश्चात्य निवासियों की नीति क्लर्क पैदा करना एवं भारत की गुलामी की मानसिकता बनाये रखना था। लेकिन इसका विपरीत असर हुआ तथा शिक्षित व्यक्ति वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ जान गये एवं वे शेष जनमानस को शिक्षा के माध्यम से ही जागृत करने लगे। अत: इस प्रकार भारतीय शिक्षा का पाश्चात्यीकरण तो हुआ परन्तु परिणाम अंग्रेजों के विपरीत रहा।

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