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Railway RRB NTPC 2019 Download Admit Card, Exam Date

Name of Post -Railway RRB NTPC VARIOUS POST   Post Date -24 DEC 9:00 AM   Short Information - RRB has been invited you to fill an Online Application Form for Various Posts. Those candidates who are interested to apply and follow all Eligibility Criteria can Read the full Notification and Apply online.       Ministry of Railway, Railway Recruitment Board NTPC 10+2 and Various Graduate Level Post Recruitment 2019 Exam Notice no. 01/2019 short details Notification WWW.EXAMINATIONBUZZ.COM Important Dates Notification Publish:  28/02/2019 Online Application start Date :    01/03/2019 Examination Date Phase 1(Written): 28/12/2020 Admit Card Available: 24/12/2020 Last Dates Online Registration Last Date :  31/03/2019 Fee Payment Last Date :  05/04/2019 Last Date for Complete Online form : 12/04/2019     Application Fees General / OBC :  500/-  (Rs.  400 /- Refunded After Appear Stage I Exam) SC / ST / PH :  250/-  (Rs.  250 /- Refunded After Appear Stage I Exam) Female All  Category :  250/- 

मुस्लिम समाज सुधार आन्दोलन में सर सैयद अहमद खाँ के योगदान

मुस्लिम समाज सुधार आन्दोलन में सर सैयद अहमद खाँ के योगदान मुस्लिम सुधार आन्दोलन यदि पश्चिम के प्रति प्रारम्भिक हिन्दू प्रतिक्रिया जिज्ञासा की थी तो मुसलमानों की प्रथम प्रतिक्रिया अपने आप को एक संकीर्ण ढकने में बन्द करने और पश्चिमी प्रभाव से बचाने की थी। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक कोई भी मुसलमान इस अकेलेपन को छोड़ने को उद्यत नहीं था। वहाबी आन्दोलन-मुसलमानों की पाश्चात्य प्रभावों के विरुद्ध सर्वप्रथम प्रतिक्रिया जो हुई उसे वहाबी आन्दोलन अथवा वलीउल्लाह आन्दोलन के नाम से स्मरण किया जाता है। वास्तव में यह पुनर्जागरण वाला आन्दोलन था। शाह वलीउल्लाह (1702-62) अठारहवीं शताब्दी में भारतीय मुसलमानों के वह प्रथम नेता थे जिन्होंने भारतीय मुसलमानों में हुई गिरावट पर चिन्ता प्रकट की थी। उन्होंने मुसलमानों के रीति-रिवाजों तथा मान्यताओं में आई कुरीतियों की ओर ध्यान दिलाया। उनके योगदान के मुख्य दो अंग थे:  (1) उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस्लाम धर्म के 4 प्रमुख न्याय शास्त्रों में सामंजस्य स्थापित होना चाहिए जिसके कारण भारतीय मुसलमान आपस में बंटे हुए ही (2) उन्होंने धर्म में वैयक्तिक अन्तश्चेतना पर

भारतीय शिक्षा पर पश्चिमी प्रभाव

भारतीय शिक्षा पर पश्चिमी प्रभाव  अठारहवीं शताब्दी में भारत में हिन्दू-मुस्लिम शिक्षा केन्द्र प्रायः लुप्त हो गये थे। इसका कारण राजनीतिक उथल-पुथल थी। 784 ई० में हेस्टिंगस ने बोर्ड आफ डारेक्टर्स का ध्यान इस ओर खींचा। प्रारम्भ में तो अंग्रेजों इंग्लैण्ड की परम्पर के अनुसार शिक्षा का भारत निजी हाथों में रहने दिया। कुछ समय पश्चात् 1781 ई० में हेस्टिंगस ने कलकत्ता में एक मदरसा स्थापित किया जिसमें फारसी और अरवी की शिक्षा दी जाती थी। 1791 ई० में बनारस में ब्रिटिश रेजीडेन्ट डंकन ने बनारस में ही संस्कृत कॉलेज खोला जिसका उद्देश्य हिन्दुओं के धर्म साहित्य और कानून का अध्ययन और प्रसार करना था।  लेकिन इसमें असफलता मिली और कॉलेज में विद्यार्थियों की अपेक्षा शिक्षक अधिक थे। ईसाई धर्म प्रचारकों ने इसकी निन्दा की और इस बात पर जोर दिया कि पाश्चात्य साहित्य और ईसाई मत अंग्रेजी माध्यम द्वारा स्थापित किया जाना चाहिए। 1813 ई० के चार्टर एक्ट द्वारा भारत में शिक्षा प्रसार पर एक लाख रुपये व्यय करने का निर्णय किया गया। ब्रिटिश कम्पनी को ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता थी जो स्थानीय एवं अंग्रेजी भाषा दोनों जानते हों ज

ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल की मुख्य विशेषताएँ

ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल की मुख्य विशेषताएँ  ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल प्रीवी काउन्सिल का सक्रिय भाग है। मन्त्रिमण्डल ही देश की सर्वोच्चता कार्यकारिणी एवं प्रशासकीय अंग है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में मन्त्रिमण्डल का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। मन्त्रिमण्डल की सत्ता से प्रशासनिक प्रणाली का संचालन, संगठन का नियोजन किया जाता है। इंग्लैण्ड में वास्तविक तथा व्यावहारिक कार्यपालिका मन्त्रिमण्डल ही है। कुछ समय पूर्व मन्त्रिमण्डल सम्राट की एक परामर्श दात्री समिति मात्र थी और समस्त प्रशासनिक शक्ति सम्राट के हाथों में निहित थी परन्तु शनैः-शनैः सम्राट की सभी शक्तियों मन्त्रिमण्डल को प्राप्त हो गयी अब ब्रिटेन का सम्राट मात्र औपचारिक कार्यपालिका रह गया है। उसकी सभी शक्तियों का उपभोग मन्त्रिमण्डल करने लगी है। वैजहाट ने मन्त्रिमण्डल के महत्त्व को विवेचन करते हुए लिखा है,-"कैबिनेट व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित करने वाली शृंखला है।" कैबिनेट की व्याख्या करते हुये सिडनी लो ने कहा-"मन्त्रिमण्डल एक उत्तरदायी कार्यपालिका है जिसे राष्ट्रीय शासन पर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त है पर

उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक आंदोलन

उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक धार्मिक आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन (धार्मिक पुनर्जागरण) के लिए कोई एक तत्त्व उत्तरदायी नहीं थे, वरन् कई तत्वों को मिलकर इस पुनर्जागरण को जन्म दिया। भारतीय धर्म तथा समाज में अंधविश्वास तथा कुप्रयाओं का बोलवाला था। भारत में ब्रिटिश शासन के प्रभाव के कारण तथा स्वयं अंग्रेजों के संस्कृति के प्रभाव के कारण भारत के सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में परिवर्तनों की आवश्यक्रता का अनुभव किया जाने लगा। ब्रिटिश सरकार ने समाज सुधार हेतु अनेक कुप्रथाओं का विरोध किया तथा भारतीय मनीषियों को सुधार हेतु प्रोत्साहित किया। अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के प्रभाव के कारण भारतियों के सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टिकोणों में परिवर्तन होने लगा। उन्होंने संकीर्णता, रूढ़िवादिता तथा अन्य विश्वास के निवारण के लिए प्रयास किए। ईसाई धर्म के विस्तार कारण तथा साथ इसके प्रचार-प्रसार की नीति ने भारतियों को यह सोचने के लिए विवश किया कि यदि उन्हें अपनी सभ्यता और संस्कृति को बनाये रखना है तो स्वयं अपनी मान्यताओं को आगे लाना होगा। वैज्ञानिक प्रगति, औद्योगिक क्रांति एवं आधुनिकीकरण के क

ब्रिटिश प्रधानमंत्री के कार्य, अधिकार, भूमिका

ब्रिटिश प्रधानमंत्री के कार्य, अधिकार, भूमिका ब्रिटिश शासन प्रणाली प्रधानमंत्री का पद केन्द्रबिन्दु है। शासन की समस्त रत्तित्यां उसी के इर्द-गिर्द घूमती है। वास्तव में प्रधानमंत्री ही सर्वोच्च कार्यकारिणी का अध्यक्ष होता है और इस रूप में रेम्जेम्योर के अनुसार यह अमेरिका के शासनाच्यक्ष राष्ट्राध्यक्ष से भी अधिक शक्तिशाली होता है। डॉक्टर के शब्दों में आधुनिक प्रधानमंत्री संसार के अधिकतम शक्तिशाली निर्वाचित पदाधिकारियों में से एक है। युद्ध की अवधि में तो टसकी शक्तियों का इस सीमा तक प्रसार हो जाता है कि वह वर्तमान अधिनायकों की शक्तियों की भी चुनौती देता है यद्यपि उस पर निरन्तर अपने सहयोगियों, संसद तथा जनता का अंकुश रहता है। मंत्रिमण्डल ब्रिटेन की बास्ता कार्यपालिका है और प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल का प्रधान। इस प्रकार प्रधानमंत्री शासन प्रणाली का केन्द्र है उसकी स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है शासन में प्रधानमंत्री की स्थिति इतनी अधिक महत्वपूर्ण और केन्द्रीय है कि वर्तमान समय में कुछ पक्षों द्वारा ब्रिटिश शासन प्रणाली को मंत्रिमण्डलीय शासन प्रणाली या सरकार के स्थान पर प्रधानमंत्री शासन प्रणाल

लार्ड सभा के कार्य एवं अधिकार

 लार्ड सभा के कार्य एवं अधिकार   ब्रिटिश संसद सम्राट लोक सदन और लार्ड सभा का सम्मिलित रूप है। लोक सदन ब्रिटेन की संसद का प्रथम और दूसरा सदन लार्ड सभा है। ब्रिटिश के संवैधानिक इतिहास का अवलोकन करें तो ज्ञात होता है लोकसभा दोनों सदनों प्राचीन सदन है। लार्ड सभा की इंग्लैण्ड की लोकतन्त्रात्मक प्रणाली में एक कुलौन तन्त्रीय कहा जा सकता है, क्योंकि इसकी सदस्यता का मूल आधार वंशानुगत प्रणाली है। बीसवीं शताब्दी के अन्त तक इंग्लैण्ड की राजनीति में लार्ड सभा को लोक सदन से अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। किन्तु वर्तमान समय में स्थिति में परिवर्तन अ गया है और लार्ड सभा न केवल द्वितीय वरन् द्वितीय महत्त्व का सदन हो गया है। लार्ड सभा की संरचना (संगठन) लार्ड सभा कामन सभा के समान निर्वाचित सदन नहीं है। इसके लगभग 85% सदस्य वंशानुगत होते हैं इसके सदस्यों की संख्या निश्चित नहीं है। यह घटती-बढ़ती रहती है। वर्तमान में इसकी संख्या 1080 है। अत: इस प्रकार इसके सदस्यों में निम्न प्रकार के सदस्य होते हैं। लार्ड सभा के सदस्यों को निम्नलिखित सात वर्गों में बांटा जाता है। 1. राजवंश का राजकुमार-राजवंश के कुछ राजक

अमेरिकी संविधान की प्रमुख विशेषता

अमेरिकी संविधान की प्रमुख विशेषता संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय प्रणाली विश्व प्रसिद्ध है। विश्व के समस्त संविधानों में अमेरिका का संविधान सबसे प्राचीन एवं सर्वाधिक सफल संघीय संविधान माना जाता है। इसकी सफलता का प्रमाण यह है जब सन् 1787 में "अमेरिका का संयुक्त राज्य" नाम से इस संघ की स्थापना की गई तब इसमें मात्र 13 इकाईयाँ (राज्य) शामिल थे और वर्तमान समय में इसकी संख्या 50 हो गई है। जिस प्रकार इंग्लैण्ड संसदात्मक प्रणाली का जनक माना जाता है, ठीक उसी प्रकार अमेरिका संघात्मक प्रणाली का। अमेरिकी संघात्मक प्रणाली को अपना आदर्श मानते हुए विश्व के कई अन्य देशों में अपना संघात्मक संविधान का निर्माण करते समय उससे प्रेरणा ग्रहण की है जैसे- कनाडा, स्विटजरलैण्ड, ऑस्ट्रेलिया आदि। संघात्मक शासन प्रणाली का अर्थ-संघात्मक शासन प्रणाली का तात्पर्य एक ऐसे शासन व्यवस्था से होता है जिसमें संविधान द्वारा ही संघीय सरकार एवं ईकाइयों की सरकारों के मध्य शक्तियों का वर्गीकरण कर दिया जाता है तथा शासन के तीनों अंगों-कार्यापालिका, व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र पृथक-पृथक होते हैं तथा वे अ

प्रारम्भिक औपनिवेशिक काल में आधुनिक भारत के सामाजिक एवं बौद्धिक जीवन पर पश्चिम के प्रभावों की विवेचना

प्रारम्भिक औपनिवेशिक काल में आधुनिक भारत के सामाजिक एवं बौद्धिक जीवन पर पश्चिम के प्रभावों की विवेचना  प्रारम्भिक औपनिवेशिक काल अर्थात् ब्रिटिश कालीन शिक्षा का युग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रयासों से ही प्रारम्भ हुआ। इस काल से पूर्व भारतीय शिक्षा की दिशा अनिश्चित एवं अव्यवस्थित थी। पाठशालाओं में संस्कृत, हिन्दी, बंगला, फारसी अरबी तथा उर्दू भाषाओं के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। इसमें सन्देह नहीं ये पाठशालायें शिक्षा के प्रसार करने में अवश्य लगी थीं परन्तु इनकी आर्थिक दशा सोचनीय थी पाठशालाओं के संचालन के लिए धन का अभाव था। शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की कोई उचित व्यवस्था नहीं थी। पाठशालाओं के लिए सुन्दर भवन निर्माण का कोई प्रबन्ध नहीं था तथा तत्कालीन शासकों की शिक्षा के प्रति अत्यन्त उपेक्षापूर्ण नीति थी। श्री० ए० एन बसू ने लिखा है-पाश्चात्य शिक्षा शास्त्रियों के अनुसार भारत वर्ष की देशी शिक्षा व्यवस्था का कोई महत्त्व नहीं था तथा ब्रिटिश अधिकारी उसे समाप्त करना ही उचित समझते थे।" यद्यपि अंग्रेजों को भारतीयों को शिक्षित करने का मूल उद्देश्य एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना था जो जन्म से त